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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

६६ ] धम्मपदं [ १०।१७
सम्पन्नविज्जाचरणा पतिस्सता
पहस्सथा दुक्खमिदं अनप्पकं ॥१६॥
(अश्वो यथा भद्रः कशानिविष्ट
आतापिनः संवेगिनो भवत ।
श्रद्धया शीलेन च वीर्येण च
समाधिना धर्मविनिश्चयेन च ।
सम्पन्नविद्याचरणाः प्रतिस्मृताः
प्रहास्यथ दुःखमिदं अनल्पकम् ॥१६॥)
अनुवाद—कोड़े पड़े उत्तम घोड़ेकी भाँति, उद्योगी, ग्लानियुक्त,
(वेगवान् ) हो; श्रद्धा, आचार, वीर्य, समाधि, और धर्म-
निश्चयसे युक्त ( बन ), विद्या और आचरणसे
समन्वित हो, दौड़कर इस महान् दुःख(राशि) को पार
कर सकते हो ।
१४५-उदकं हि नयन्ति नेत्तिका
उसुकरा नमयन्ति तेजनं ।
दारुं नमयन्ति तच्छका
अत्तानं दमयन्ति सुव्वता ॥१७॥
(उदकं हि नयन्ति नेतृकाः, इषुकारा नमयन्ति तेजनम् ।
दारुं नमयन्ति तक्षका आत्मानं दमयन्ति सुव्रताः ॥१७॥)
अनुवाद—नहरवाले पानी लेजाते हैं, बाण बनानेवाले बाणको ठीक
करते हैं, बढ़ई लकड़ीको ठीक करते हैं, सुन्दर व्रतवाले
अपनेको दमन करते हैं ।
१०-दण्डवर्ग समाप्त