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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

६४ ] धम्मपद [ १०।१४
होता है। कड़वी वेदना, हानि, अंगका भंग होना, भारी
बीमारी, (या) चित्तविक्षेप (= पागल) को प्राप्त होता, है।
या राजासे दण्डको (प्राप्त होता है।), दारुण निन्दा, जाति
बन्धुओंका विनाश, भोगोंका क्षय; अथवा उसके घरको
अग्नि = पावक जलाता है, काया छोड़नेपर वह दुर्बुद्धि
नर्कमें उत्पन्न होता है।
जेतवन बहुभक्तिक (भिक्षु)
१४१-न नग्गचरिया न जटा न पङ्का
नानासका थण्डिलसायिका वा ।
रजोवजल्लं उक्कुटिकप्पधानं
सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकङ्खं ॥१३॥
( न नग्नचर्या न जटा न पंकं
नाऽनशनं स्थण्डिलशायिका वा।
रजोजलीयं उत्कुटिकप्रधानं
शोधयन्ति मर्त्य' अवितीर्णाकांक्षम् ॥१३॥ )
अनुवाद—जिस पुरुषकी आकांक्षायें समाप्त नहीं हो गईं, उस मनुष्य-
की शुद्धि, न नंगे रहनेसे, न जटासे, न पंक (लपेटने) से,
न फाका (=उपवास) करनेसे, न कड़ी भूमिपर सोनेसे,
न धूल लपेटनेसे, न उकडूँ बैठनेसे होती है।
जेतवन सन्तति (महामात्य)
१४२-अलङ्कतो चेपि समं चरेय्य
सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी।