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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

१०।६ ] दण्डवग्गो [ ६१
जेतवन बहुतसे लड़के
१३१-सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिंसति ।
अत्तनो सुखमेसानो पेच्च सो न लभते सुखं ॥३॥
( सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिनस्ति ।
आत्मनः सुखमन्विष्य प्रेत्य स न लभते सुखम् ॥३॥ )
१३२-सुखकामानि भुतानि यो दण्डेन न हिंसति ।
अत्तनो सुखमेसानो पेच्च सो लभते सुखं ॥४॥
( सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन न हिनस्ति ।
आत्मनः सुखमन्विष्य प्रेत्य स लभते सुखम् ॥४॥ )
अनुवाद—सुख चाहनेवाले प्राणियोंको, अपने सुख की चाहसे जो दण्ड
से मारता है, वह मरकर सुख नहीं पाता । सुख चाहनेवाले
प्राणियोको, अपने सुख की चाहसे जो दण्डसे नहीं मारता,
वह मरकर सुखको प्राप्त होता है ।
जेतवन कुण्डधान (थेर)
१३३-मा वोच फरुसं कञ्चि वुत्ता पटिवदेय्यु तं ।
दुक्खा हि सारम्भकथा पटिदण्डा फुसेय्यु तं ॥५॥
( मा वोचः परुषं किञ्चिद् उक्ताः प्रतिवदेयुस्त्वाम् ।
दुःखा हि संरम्भकथाः प्रतिदण्डाः स्पृशेयुस्त्वाम् ॥५॥ )
१३४-स चे नेरेसि अत्तानं कंसो उपहतो यथा ।
एस पत्तोसि निब्बाणं सारम्भो ते न विज्जति ॥६॥