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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

९।१३ ] पापवग्गो [ ५९
जेतवन ३ भिक्षु
१२७–न अन्तलिक्वे न समुद्दमज्झे
न पब्बतानं विवरं पविस्स ।
न विज्जती सो जगतिप्पदेसो
यत्थट्ठितो मुञ्चेय्य पापकम्मा ॥ १२ ॥
(नान्तरिक्षे न समुद्रमध्ये
न पर्वतानां विवरं प्रविश्य ।
न विद्यते स जगति प्रदेशो
यत्रस्थितो मुच्येत पापकर्मणः ॥ १२ ॥ )
अनुवाद—न आकाशमें न समुद्रके मध्यमें न पर्वतोंके विवरमें प्रवेश
कर—संसारमें कोई स्थान नहीं है, जहाँ रहकर—पाप
कर्मोंके (फलसे) (प्राणी) बच सके ।
कपिलवस्तु (न्यग्रोधाराम) सुप्पबुद्ध (शाक्य)
१२८–न अन्तलिक्वे न समुद्दमज्झे
न पब्बतानं विवरं पविस्स ।
न विज्जती सो जगतिप्पदेसो
यत्थट्ठितं न प्पसहेय्य मच्चू ॥ १३ ॥
(नान्तरिक्षे न समुद्रमध्ये
न पर्वतानां विवरं प्रविश्य ।
न विद्यते स जगति प्रदेशो
यत्रस्थितं न प्रसहेत मृत्युः ॥ १३ ॥ )
अनुवाद—न आकाशमें ०—जहाँ रहनेवालेको मृत्यु न सतावे ।
९–पापवर्ग समाप्त