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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

८।१६ ] सहस्सवग्गो [ ५३
( यश्च वर्षशतं जीवेद् अपश्यन् अमृतं पदम् ।
एकाहं जीवितं श्रेयः पश्यतोऽमृतं पदम् ॥१५॥ )
अनुवाद—अमृतपद ( =दुःखनिर्वाण ) को न ख्याल करनेके सौ
वर्षके जीवनसे, अमृतपदको देखनेवाले जीवनका एक
दिन श्रेष्ठ है।
जेतवन बहुपुत्तिका (थेरी)
११५—यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं धम्ममुत्तमं ।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो धम्ममुत्तमं ॥१६॥
( यश्च वर्षशतं जीवेदपश्यन् धर्ममुत्तमम् ।
एकाहं जीवितं श्रेयः पश्यतो धर्ममुत्तमम् ॥१६॥ )
अनुवाद—उत्तम धर्मको न देखनेके सौ वर्षके जीवनसे, उत्तम धर्मके
देखनेवालेके जीवनका एक दिन श्रेष्ठ है।
८–सहस्रवर्ग समाप्त