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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

[१८२ ] धम्मपदं [ २६।३०

अनुवाद—इस लोक और परलोकके विषयमें जिसकी आशायें (=चाह)
नहीं रहगई हैं, जो आशारहित और आसक्तिरहित है, उसे ,
मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

जेतवन महामोग्गलान (थेर)
४११—यस्सालया न विज्जन्ति अञ्ञाय अकथंकथी ।
अमतोगधं अनुपत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२६॥
(यस्याऽऽलया न विद्यन्त आज्ञायाऽकथंकथी ।
अमृतावगाधमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२९॥)
अनुवाद—जिसको आलय (=तृष्णा) नहीं है, जो भली प्रकार जानकर
अकथ(-पद)का कहनेवाला है, जिसने गाढे अमृतको
पालिया, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

श्रावस्ती (पूर्वाराम) रेवत (थेर)
४१२—यो'ध पुञ्ञञ्च पापञ्च उभो सङ्गं उपच्चगा ।
असोकं विरजं सुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३०॥
(य इह पुण्यं च पापं चोभयोः संगं उपात्यगात् ।
अशोकं विरजं शुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३०॥)
अनुवाद—जिसने यहाँ पुण्य और पाप दोनोंकी आसक्तिको छोड
दिया, जो शोकरहित, निर्मल, (और) शुद्ध है, उसे मैं
ब्राह्मण कहता हूँ ।