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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

१७२ ] धम्मपदं [ २६।६
श्रावस्ती ( पूर्वाराम ) आनन्द ( थेर )
३८७-दिवा तपति आदिच्चो रत्तिं आभाति चन्दिमा ।
सन्नद्धो खत्तियो तपति झायी तपति ब्राह्मणो ।
अथ सब्बमहोरत्तिं बुद्धो तपति तेजसा ॥५॥
( दिवा तपत्यादित्यो रात्रावाभाति चन्द्रमा ।
सन्नद्धः क्षत्रियस्तपति ध्यायी तपति ब्राह्मणः ।
अथ सर्वमहोरात्रं बुद्धस्तपति तेजसा ॥५॥ )
अनुवाद—दिनमें सूर्य तपता है, रातको चन्द्रमा प्रकाशता है,
कवचबद्ध ( होनेपर ) क्षत्रिय तपता है, ध्यानी ( होनेपर )
ब्राह्मण तपता है, और बुद्ध रात-दिन ( अपने ) तेजसे सब-
( से अधिक ) तपता है ।
जेतवन ( कोई प्रव्रजित )
३८८-वाहितपापो 'ति ब्राह्मणो समचरिया समणो'ति वुच्चति ।
पब्बाजयमत्तनो मलं तस्मा पब्बजितो'ति वुच्चति ॥६॥
( वाहितपाप इति ब्राह्मणः समचर्य्यः श्रमण इत्युच्यते ।
प्राब्राजयन्नाऽऽत्मनो मलं तस्मात् प्रव्रजित इत्युच्यते ॥६॥ )
अनुवाद—जिसने पापको ( धोकर ) बहा दिया वह ब्राह्मण है, जो
समताका आचरण करता है, वह समण (=श्रमण=
संन्यासी ) है, ( चूँकि ) उसने अपने ( चित्त-) मलोको हटा
दिया, इसीलिये वह प्रव्रजित कहा जाता है।