धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें२६।४ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७१
अनुवाद—जब ब्राह्मण दो धर्मों (—चित्त-संयम और भावना) में पारंगत
हो जाता है, तब उस जानकारके सभी संयोग (=बंधन )
अस्त हो जाते हैं ।
जेतवन मार
३८५-यस्स पारं अपारं वा पारापारं न विज्जति ।
वीतद्दरं विसञ्जुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणम् ॥३॥
( यस्य पारं अपारं वा पारापारं न विद्यते ।
वीतदरं विसंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३॥ )
अनुवाद—जिसके पार (=आँख, कान, नाक, जीभ, काया, मन ),
अपार (=रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श, धर्म ) और
पारापार (=मैं और मेरा ) नहीं हैं, ( जो ) निर्भय और
अनासक्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।
जेतवन ( कोई ब्राह्मण )
३८६-झायिं विरजमासीनं कतकिच्चं अनासवं ।
उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥४॥
( ध्यायिनं विरजसमासीनं कृतकृत्यं अनास्रवम् ।
उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४॥ )
अनुवाद—( जो ) ध्यानी, निर्मल, आसनबद्ध (=स्थिर ), कृतकृत्य
आस्रव (=चित्तमल)-रहित है, जिसने उत्तम अर्थ (=सत्य)
को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।