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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

२०।१४ ] मग्गवग्गो [ १२७
अनुवाद—वनको काटो, वृक्षको मत, वनसे भय उत्पन्न होता है,
भिक्षुओ ! वन और झाड़ीको काटकर निर्वाणको प्राप्त हो
जाओ । जबतक अणुमात्र भी स्त्रीमें पुरुषकी कामना अखंडित
रहती है, तबतक दूध पीनेवाला बछडा जैसे मातामें
आसक्त रहता है, ( वैसे ही वह पुरुष बंधा रहता है ) ।
जेतवन सुवण्णकार (थेर)
२८५-उच्छिन्द सिनेहमत्तनो कुमुदं सारदिकं 'व पाणिना ।
सन्तिमग्गमेव ब्रूहय निब्बानं सुगतेन देसितं ॥१३॥
( उच्छिन्धि स्नेहमात्मनः कुमुदं शारदिकमिव पाणिना ।
शान्तिमार्गमेव बृंहय निर्वाणं सुगतेन देशितम् ॥१३॥ )
अनुवाद —हाथसे शरद्(ऋतु)के कुमुदकी भाँति, आत्मस्नेहको
उच्छिन्न कर डालो, सुगत (=बुद्ध )द्वारा उपदिष्ट (इस )
शान्तिमार्ग निर्वाणका आश्रय लो ।
जेतवन (महाधनी वणिक् )
२८६-इध वस्सं वसिस्सामि इध हेमन्तगिम्हेसु ।
इति बालो विचिन्तेति अन्तरायं न बुज्झति ॥१४॥
( इह वर्षासु वसिष्यामि इह हेमन्तग्रीष्मयोः ।
इति बालो विचिन्तयति, अन्तरायं न बुध्यते ॥१४॥ )
अनुवाद—यहाँ वर्षांमें बसूँगा, यहाँ हेमन्त और ग्रीष्ममें (बसूँगा)
—मूढ इस प्रकार सोचता है, (और ) अन्तराय (=विघ्न )
को नहीं बूझता ।