सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished40 पृष्ठ

१. अध्याय १-३: हिमालय-देवी संवाद, विराटरूप दर्शन व सृष्ट्युत्पत्ति

देवताओंके इसप्रकार उन मणिद्वीपनिवासिनी जगदम्बिकाके स्तव करनेपर प्रमत्त
कोकिलके कण्ठकी समान कण्ठवाली भगवती मधुर वचनों द्वारा उनसे कहनेलगी ॥
॥ ५४ ॥ देवी बोली हे देवताओ ! तुम किसलिये यहां आये हो ? तुम्हारा क्या
कार्य है सो कहो मैं सदाही भक्तोंकी वाञ्छाको कल्पतरु और वर देनेवाली विद्यमान
रहती हूं ॥ ५५ ॥ तुम मेरे भक्त हो मेरे विद्यमान रहते तुमको क्या चिन्ता है ?
मैं तुमको दुःखसागरसे उद्धार करूंगी ॥ ५६ ॥ हे देवताओ ! तुम मेरी यह
प्रतिज्ञा सत्यही जानो हे राजन् ! देवतागण देवीके यह प्रेमपूर्ण वचन सुनकर अत्यन्त
प्रसन्न हुए ॥ ५७ ॥ और जगन्मातासे अपना मनोदुःख निवेदन करनेलगे देवता
बोले हे परमेश्वरि ! आप सर्वज्ञ और सब जगत्की साक्षी हैं इन तीनों जगतोंमें
आपसे अज्ञात कुछ नहीं है ॥ ५८ ॥ हे मातः ! शिवे ! तारक
नामक असुर हमको दिनरात दुःख देता है ॥ ५९ ॥ विश्वस्रष्टा विधाताने
शिवके औरसपुत्रसे उसका वध निर्दिष्ट किया है. हे महेश्वरि ! इस समय
शिवगृहिणी सतीने देह त्यागकिया है सो आप जानती हैं ॥ ६० ॥ जो सर्वज्ञ
हैं फिर उनके सामने पामरगण क्या कहे हैं हे जगदम्बिके ! हमने यह सम्पूर्ण वृत्तान्त
संक्षेपसे वर्णन किया और हमारा अन्यान्य सम्पूर्ण दारुण दुःख आप मनमें जानसक्ती
हैं ॥ ६१ ॥ हम अधिक और क्या कहें ? आपके चरणकमलोंमें हमारी अचल
भक्ति सदा विद्यमान रहे यही हमारी मुख्य प्रार्थना है और शिवकी सुतोत्पत्तिके लिये
आप देह धारण कीजिये यह हमारी दूसरी प्रार्थना जानिये ॥६२॥ देवताओंके यह
वचन सुन प्रसादसुमुखी परमेश्वरी उनसे कहने लगी मेरी शक्ति जो गौरीरूपसे
हिमालयमें उत्पन्न होगी ॥६३॥ वही शिवसीमन्तिनी होकर पुत्रोत्पादनपूर्वक उसके
द्वारा तारकासुरका वध करके तुम्हारा कार्यसाधन करेगी और मेरे चरणकमलोंमें
तुम्हारी प्रेमपूर्ण निश्चल भक्ति होगी ॥ ६४ ॥ हिमालय भी अत्यन्त भक्तिसहित
एकान्तमनसे मेरी उपासना करते हैं अतएव उनके गृहमें मेरा जन्म ग्रहणकरना
अत्यन्त प्रिय जानना चाहिये ॥ ६५ ॥ व्यासजीने कहा हे राजन् ! गिरिराज
हिमालय भी उनके अत्यन्त अनुग्रहसूचक वचन सुनकर प्रेमजनित बाष्पमें भर
रुद्धकण्ठ हो अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे त्रैलोक्यसाम्राज्ञी भुवनेश्वरीसे कहनेलगे ॥ ६६ ॥ हे
देवि ! आप जिसके प्रति अनुग्रह करती हैं उसको आप अत्यन्त महत् करदेती हैं
नहीं तो जड़ और स्थावर पाषाणपुञ्ज मैं कहाँ ? और वाक्य तथा मनके अगोचर
५७

(७३८) देवीभागवत-भाषा । १३०
सच्चिदानन्दरूपिणी आप कहाँ ? हमारे गृहमें उत्पन्न होकर आप हमारे प्रति इतना
अनुग्रह कर क्यों प्रकाश करती यही आपके अनिर्वचनीय महत्त्वका परिचयप्रदान
करता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ६७ ॥ हे विमले ! हमारे पक्षमें आपके जनकत्वलाभका अनन्त
जन्म अश्वमेधादिजनित अथवा समाधिजनित पुण्यके अतिरिक्त और कोई
कारण दिखाई नहीं देता ॥ ६८ ॥ अहो ! हमारे प्रति आपने क्या
अनुग्रह किया है "जगन्माता जगद्धात्री इन हिमालयकी कन्या हुईं अतएव
यह व्यक्ति ही धन्य और भाग्यवान् है" अबसे हमारी इसप्रकार अतुल कीर्ति
इस सम्पूर्ण जगत्में प्रचलित होगी ॥ ६९ ॥ जिनके जठरमें करोड़ करोड़ ब्रह्माण्ड
स्थित रहते हैं वह जिनकी कन्या हुई पृथवीतलमें उसकी समान सौभाग्यवान् और
पुण्यवान् और कौन होसक्ता है ? ॥ ७० ॥ जिनके वंशमें मेरी समान पुण्यवान्
मनुष्यने जन्म ग्रहण किया है मेरे उन पितरोंके वासार्थ कैसे परमोत्कृष्ट समस्त स्थान
निर्मित हुए हैं वह मैं नहीं कहसक्ता ॥ ७१ ॥ हे मातः परमेश्वरी ! आपने जिस
प्रकार प्रेमपरिपूर्ण होकर कृपा प्रकाश की है इसी प्रकार आप हमसे अपना सर्व
वेदान्तसिद्ध स्वरूप ॥ ७२ ॥ और श्रुतिसम्मत भक्तियुक्त ज्ञान तथा योगका विषय
कीर्त्तन कीजिये क्योंकि हम उसी ज्ञानके बलसे आपका स्वरूपत्व प्राप्त करनेमें
समर्थ होंगे ॥ ७३ ॥ व्यासजीने कहा हे महाराज ! हिमालयके इसप्रकार स्तुतियुक्त
वचन सुनकर भुवनेश्वरीने प्रसन्न मुखसे श्रुत्युक्त गूढ रहस्यका विषय कहना आरम्भ
किया ॥ ७४ ॥
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे भाषायामेकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
॥ द्वात्रिंशोऽध्यायः ३२. ॥
देवीने कहा हे देवताओं ! जिसके श्रवणमात्रसे जीवगण मेरा स्वरूपत्व प्राप्तकर-
नेमें समर्थ होते हैं मैं इस समय वही विषय वर्णन करती हूं तुम समाहित चित्तसे
श्रवण करो ॥ १ ॥ हे गिरिवर ! सृष्टिके पूर्वमें एकमात्र मैंही विद्यमान थी अन्य
और कुछ नहीं था मेरेही आत्मस्वरूपको चित् संवित् और परब्रह्म इत्यादि नामसे
निर्देश किया है ॥ २ ॥ मेरा आत्मा अनुमानके अतीत लक्ष्यके अतीत उपमाके
अतीत और जन्ममरणादिविकारके भी अतीत पदार्थ है मेरेही आत्माकी स्वतः
सिद्ध एक शक्ति है यह शक्ति मायानामसे विख्यात है ॥ ३ ॥ ब्रह्मज्ञानद्वारा

[शीर्षक: १३१ | सप्तमस्कन्ध-अ० ३२. | (७३९)]

मायाका विनाश होता है यह माया सती अर्थात् सदा नित्य नहीं है और
मायाके न होनेसे व्यावहारिकसत्ताका विरोध होनेके कारण असती भी नहीं है
सत्ता और असत्ताकी स्थिति सम्भव नहीं होसक्ती अतएव माया सती और
असती यह उभयात्मिका भी नहीं होसक्ती इसप्रकार अनिर्वचनीय वस्तुरूप मायाशक्ति
मोक्षकालपर्यन्त विद्यमान रहती है ॥ ४ ॥ मेरी यह अनादि मोक्षपर्यन्त स्थायिनी
मायाशक्ति अग्निकी उष्णताके समान सूर्यकी मरीचिके समान चन्द्रमाकी ज्योत्स्नाके
समान स्वभावसे उत्पन्न होती है ॥ ५ ॥ सुषुप्तिकालके समय जीवोंका व्यवहार
जिसप्रकार उसमें लीन होता है इसीप्रकार प्रलयकालके समय जीवोंके कर्मसमूह
जीव और काल यह समस्तही अभिन्न भावसे मायामें लीन हो जाते हैं ॥ ६ ॥
हे गिरिवर! यद्यपि मैं निर्गुण हूं तथापि ऐसी मायाशक्तिके संयोगसे जगत्‌की कारण
स्वरूप हुई हूं किन्तु जो माया मेरा आश्रय करके रहती है उस मायाके मुझको
आवरण करनेसे मायामें आश्रयावरकता दोष विद्यमान रहता है हे हिमवान् !
तुमको जानना चाहिये कि मेरे माया और अविद्या नामसे दो रूप हैं तिनमें
विद्यारूपिणी प्रथम इसमें स्वाश्रय व्यामोहकारित्व दोष नहीं है और अविद्यारूपिणी
दूसरा इसमें स्वाश्रय व्यामोहकारित्व दोष विद्यमान है इसके द्वाराही जीवोंकी सृष्टि
होती है और विद्याके द्वारा जीवगण मोक्ष प्राप्त करते हैं ॥ ७॥ मायाके सहित चैत-
न्यका संयोग होनेपरही वह मायाप्रतिबिम्बित चैतन्य अर्थात् चिदाभासही जगत् का
निमित्तकारण है और यह माया प्रपञ्चरूप परिमाण समवायिकारण कहा जाता है
॥ ८ ॥ कोई कोई शाखाध्यायी वेदके जाननेवाले इस मायाको तप कोई कोई
तम कोई कोई जड कोई कोई ज्ञान अथवा कोई कोई माया प्रधानप्रकृति अजा और
शक्ति नामसे निर्देश करते हैं ॥ ९ ॥ शैवशास्त्रतत्वज्ञ पंडितलोग उसको विमर्श
और अन्यान्य वेदतत्वार्थचिन्तक कोविदगण अविद्या कहकर निर्देश करते हैं
फलतः यह माया समस्त वेदान्तिगणोंकी उपजीव्य (निर्वाहक) है इसप्रकार
निगमादि शास्त्रमें माया अनेक नामोंसे कही गई है ॥ १० ॥ जो वस्तु दृश्यमान हैं
वही वही वस्तु जड हैं इस अभिचारी लक्षण हेतु मायाका जड़त्व और स्वाधिष्ठान
ज्ञाननाशेहेतु मिथ्यात्व प्रतिपादित होता है किन्तु चैतन्य दृश्य पदार्थ नहीं है
अतएव उसको जड़भी नहीं कहा जाता ॥ ११ ॥ चैतन्य स्वप्रकाश है वह
अन्यके द्वारा प्रकाशित नहीं होता क्योंकि चैतन्य अन्यद्वारा प्रकाशित होता है यह

( ७४० ) देवीभागवत-भाषा । १३२

स्वीकार करनेसे चैतन्य प्रकाशक प्रकाशित होता है ॥ १२ ॥ वह अन्यद्वारा
प्रकाशित होताहै इसप्रकार अनवस्था दोष उपस्थित होता है स्वयंप्रकाश पदार्थकी
स्थिरता नहीं है यहभी नहीं कहा जाता क्योंकि उसमें कर्म्म कर्त्ताका विरोध होता
है एक पदार्थमें ही एक कालमें कर्तृत्व और कर्म्मत्व नहीं रहसक्ता अतएव दीप
ककी समान चैतन्यको स्वप्रकाश पदार्थ स्वीकार करना चाहिये ॥ १३ ॥ चैतन्य
स्वयं प्रकाशमान पदार्थ होनेपरभी अन्य चन्द्र सूर्यादि पदार्थोंकोभी प्रकाशित
करता है अतएव हे पर्वतवर ! मेरे संवित् रूप तनुका नित्यत्व सिद्धहुआ ॥१४॥
कारण कि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इत्यादि अवस्थाओंमें दृश्य पदार्थका व्यभिचार
होता है किन्तु किसी अवस्थामें ही सम्वित् वा चैतन्यका व्यभिचार अनुभव नहीं
होता क्योंकि जो मैंने जाग्रत अवस्थाका अनुभव किया है वही मैं स्वप्न और सुषुप्ति
अवस्थाका अनुभव करती हूं मैं इस समय सोती थी, इसप्रकार अनुभव किया अत
एव संवित् पदार्थका कभी व्यभिचार नहीं होता ॥ १५ ॥ बौद्धगण कहते हैं कि
जिसप्रकार संवित्का अनुभव होता है इसीप्रकार संवित्के अभावकाभी अनुभव
होता है जो सत् है वही क्षणिक है इसप्रकार अनुमानद्वारा ज्ञानका भी अनित्यत्व
प्रतिपादित होता है इससे कहाजाता है कि यद्यपि संवित्के अभावका अनुभव
होता है तथापि जिस साक्षीद्वारा उस संवित्के अभावका अनुभव होता है वही
साक्षी संवित् वपु है अर्थात् ज्ञानशरीररूपसे प्रतिपन्न होता है क्योंकि साक्षी
ज्ञानका नित्यत्व सबको ही स्वीकार करना होता है ॥ १६ ॥ अतएव अनवद्य
सत् शास्त्रोंके तत्वज्ञ पंडितगण कहते हैं कि संवित् नित्य और परम प्रेमका आस्पद
होनेसे वह आनन्दस्वरूप है कारण कि असुखं कभी परम प्रेमका आस्पदीभूत
नहीं होसक्ता ॥ १७ ॥ और "मैं हूं" जीवोंका इस प्रकार अनुभव नहीं होता
किन्तु "मैं विद्यमान हूं" इसप्रकार प्रेम सम्पूर्ण जीवोंके आत्मामें प्रतिष्ठित रहता है
यदि आत्माका आनन्दरूपत्व न हो तो इसप्रकार आत्मप्रेम कभी संभव नहीं होता
अतएव प्राणिमात्रके अनुभव हेतु संवित्का आनन्दरूपत्व सर्वथा सिद्ध हुआ है
हे गिरिराज ! यह सम्पूर्ण जगतप्रपंच मायानिर्मित है अतएव वह मिथ्या भ्रम होनेसे
सर्पादि मिथ्या पदार्थका जिसप्रकार रज्जु इत्यादिके सहित सम्बन्ध नहीं होता इसी
प्रकार इस जगतके सहित मेरा (आत्माका) असङ्गत्व भलीभांति सिद्ध हुआ और
यह सम्पूर्ण संसार मिथ्या और परिच्छेद्य होनेसे मेरा आत्मस्वरूपिणीका अपरि-

१३३ सप्तमस्कंध-अ० ३२. (७४१)
छिन्नता प्रमाणित होती है ॥ १८ ॥ यदि कोई कहै कि ज्ञान आत्माका
स्वरूप नहीं है वह आत्माका धर्म है यह भ्रान्तिविलास है क्योंकि यदि
आत्माका धर्म होता तो अवश्यही उसकी जड़ता संघटित होती इसमें सन्देह
नहीं ज्ञानका जडत्व सम्भव नहीं होता अतएव अन्य कहीं भी ज्ञानका जड़परिणामित्व
दिखाई नहीं देता ॥ १९ ॥ यदि कहो कि तो ज्ञानका जड़त्व हो वहभी नहीं
होसक्ता क्योंकि ज्ञान भी चित्स्वरूप और आत्मा भी चित्स्वरूप है चित् पदार्थका
धर्मत्व नहीं और चित्पदार्थ चित्से भी भिन्न नहीं होसक्ता अतएव चिद्रूप ज्ञानका
धर्माधर्मभाव किसप्रकार सम्भव होसक्ता है ? ॥ २० ॥ अतएव आत्मा सर्वदाही
ज्ञानस्वरूप आनन्दस्वरूप सत्यस्वरूप पूर्ण संगरहित और द्वैतवर्ज्जित है ॥ २१ ॥
यह आत्मा कामना और कर्मादियुक्त अपनी मायाद्वारा पूर्वानुभूत संस्कार
वशसे काल और कर्मके विपाकानुसार ॥ २२ ॥ चौबीस तत्वोंके अविवेक-
जनितही इसप्रकार सृष्टिविषयमें इच्छावान् होता है हे गिरिवर ! सोता हुआ
पुरुष जिस प्रकार पूर्वसंस्कारसे अबुद्धिपूर्वक नींदसे उठता है इसीप्रकार
आत्माकी यह सृष्टिभी कालकर्मके संस्कार अबुद्धिपूर्वकही साधित होती है
॥ २३ ॥ हे अचलेन्द्र ! मैंने जो तत्वका विषय वर्णनकिया यही सर्वोत्तम
और मेरा अलौकिक रूपमात्र है वेदमैं यही अव्याकृत अव्यक्त और मायाशवल कह-
कर उल्लिखित हुआ है ॥ २४ ॥ और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें इसको सर्व कारणोंका
कारण सब तत्वका आदिभूत तथा सच्चिदानन्दविग्रह कहकर निर्देश करतेहैं ॥ २५॥
ज्ञान और क्रियासंयुक्त समस्त कर्म घनीभूत होनेसे वह ह्रींकार मंत्रका वाच्य
होताहै तत्वदर्शी महर्षिगण उस ह्रींकाररूप मायाबीजकोही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका आदि
तत्त्व कहकर उल्लेख करते हैं ॥ २६ ॥ उस ह्रींकारवाच्य महतस्वरूप मायाबीज
रूप आदितत्त्वसे क्रमानुसार शब्दतन्मात्ररूप अपञ्चीकृत आकाश उत्पन्न होता है
अनन्तर उससे स्पर्शात्मक वायु अनन्तर उससे क्रमानुसार रूपात्मक तेज ॥ २७ ॥
इसके उपरान्त रसात्मक जल तदनन्तर गन्धगुणात्मक पृथ्वि उत्पन्न होती है पंडित-
लोग कहते हैं कि आकाशगुण एकमात्र शब्द है वायुका गुण शब्द और स्पर्श है
॥ २८ ॥ तेजका गुण शब्द स्पर्श और रूप जलका गुण शब्द स्पर्श रूप और रस
है॥२९॥ तथा शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध यह पांच पृथ्वीके गुण हैं इन अपञ्ची
कृत भूतोंसे व्यापक सूत्र उत्पन्न होता है वही लिङ्गदेहनामसे कहागया है ॥ ३० ॥

(७४२) देवीभागवत-भाषा। १३४
यह सूत्र अर्थात् लिंगदेह सर्वप्राणात्मक और यही परमात्माका सूक्ष्म देह है पूर्वमें
जो कहागया है जिसमें जगत्का बीज प्रतिष्ठित और जिससे लिङ्गदेहकी उत्पत्ति है
वही परमात्माका कारण देह है, पूर्वोक्त रूपसे अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूत उत्पन्न
होनेपर ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ फिर उनसे पञ्चीकरण द्वारा जिसप्रकार पञ्चीकृत भूतकी
उत्पत्ति होती है इस समय उसका ही नियम कहती हूं हे गिरिराज ! पूर्वोक्त पञ्चमहा
भूतोंके प्रत्येकको दो भागोंमें विभक्त करके ॥ ३३ ॥ और उनके एकएक भागको
पुनर्वार चारभागमें विभक्त करके फिर एक २ सबमें से ले प्रत्येकमें मिलावै इस
प्रकार यह अष्टमांश पंचीकरण लानेसे वह पंचपंच अंशयुक्त हो एक एक स्थूल
महाभूत होता है ॥ ३४ ॥ इस पंचीकृत भूतपंचकका कार्य विराड्देह है वह परमे-
श्वरका स्थूलदेह कहा गया है इन पंचभूतस्थित प्रत्येकके सत्त्वांशसे श्रोत्र (कान)
त्वगादि (त्वचाआदि) पंच ज्ञानेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है ॥३५॥ उक्त सम्पूर्ण
ज्ञानेन्द्रियोंके प्रत्येकका सत्त्वांश मिलित होकर एक अन्तःकरण होता है यह अन्तः-
करण वृत्तिभेदसे चारप्रकार है ॥ ३६ ॥ जब उसका संकल्प और विकल्पात्मक
कार्य होता है तब उसको मन जब संशयविहीनरूपसे निश्चित ज्ञानरूप कार्य होता
है तब उसको बुद्धि ॥ ३७ ॥ जब अनुसंधानरूप वृत्ति होती है तब चित्त
जब अहंकृतिस्वरूप आत्मवृत्तिसमन्वित होता है तब उसको अहङ्कार कहते हैं
॥ ३८ ॥ उन पंचभूतके प्रत्येक रजअंशसे वाक् पाणी पाद पायु (गुदा) और
उपस्थनामक पंच कर्मेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है उनमें प्रत्येकके सम्पूर्ण रजअंशमि-
लित होकर प्राण अपान समान उदान और व्यान यह पंच प्राणवायु उत्पन्न होती
हैं ॥ ३९ ॥ उनमें प्राणवायु हृदयमें अपानवायु गुह्यमें समानवायु नाभिस्थलमें उदान
वायु कण्ठमें और व्यान वायु समस्त शरीरमें व्याप्त होकर स्थिति करती है ॥ ४० ॥
पंच ज्ञानेन्द्रिय पंच कर्मेन्द्रिय पंच वायु और बुद्धि तथा मन यह सत्रह पदार्थ
मिलित होकर ॥ ४१ ॥ मेरे सूक्ष्म शरीर अथवा लिंगदेहकी उत्पत्ति होती है,
उसमें जो प्रकृति स्थिति करती है वह दो भागमें विभक्त है ॥ ४२ ॥ एक शुद्ध
सत्वात्मिक माया और दूसरी गुणमिश्रित मलिनसत्वप्रधान अविद्या कही जाती है.
जो स्वाश्रयको आवृत न करके रक्षा करती है वही माया शब्दसे उक्त हुई है ॥४३॥
इस स्वाश्रयकी अव्यामोहकारिणी शुद्ध सत्व प्रधान मायामें परमात्माका जो प्रति
बिम्ब पड़ता है वही ईश्वरनामसे कहागया है शुद्धसत्वप्रधान माया तदाधार ब्रह्मको

१३५ सप्तमस्कंध-अ० ३२. (७४३)
आवरण न करनेके कारण यह स्वाश्रयज्ञानवान् अर्थात् व्यापक ब्रह्मको जानती है
और सर्वव्यापित्व हेतु तथा सर्वत्र इसके ज्ञानावरणके अभावहेतु इसको सर्वज्ञ कहा
जाता है और अचिन्त्य मायाशक्तिविशिष्ट होनेके कारण सर्वकर्ता और सम्पूर्ण
जगत्‌का अनुग्रह करनेवाला कहा जाता है ॥ ४४ ॥ और मलिनसत्वप्रधान अवि-
द्याम परमात्माका जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह जीवनामसे अभिहित हुआ है॥४५॥
मलिनसत्वप्रधान अविद्या तदाश्रयरूप आनन्द करनेके कारण यह जीव सर्वदुःखका
आश्रय होता है उक्त जीव और ईश्वर दोनोंकेही अविद्या और विद्याद्वारा तीन देह
होते हैं ॥ ४६ ॥ इन तीनों देहके अभिमानहेतु तीन नाम हैं जीव कारणदेहाभिमानी
होनेसे उसको प्राज्ञ सूक्ष्मदेहाभिमानी होनेसे तैजस ॥ ४७ ॥ और स्थूलदेहाभिमानी
होनेसे विश्व कहा जाता है और ईश्वरभी कारणदेहाभिमानी होनेसे ईश सूक्ष्मदेहा
भिमानी होनेसे 'सूत्र' और स्थूलदेहाभिमानी होनेसे 'विराट्' नामसे अभिहित
होता है ॥ ४८ ॥ प्रथम जीव व्यष्टि देहत्रयाभिमानी और ईश्वर समष्टिदेहत्रयाभि-
मानी होता है, यह सर्वेश्वर निरन्तर आनन्दानुभवहेतु तृप्त होनेपरभी जीवके प्रति
मोक्षलाभरूप अनुग्रह करनेकी इच्छासे ॥ ४९ ॥ विविध भोगका आश्रयस्वरूप
विश्वकी सृष्टि करता है हे राजन् ! वह ईश्वरभी ब्रह्मरूपिणी मेरी मायाशक्तिसे प्रेरित
होकरही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करता है क्योंकि मैं ब्रह्मरूपिणी हूं वह मुझमें ही
रज्जुकल्पित सर्पके समान कल्पित होरहाहै अतएव उनकोभी मेरी शक्तिके आधीन
जानना चाहिये ॥ ५० ॥
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कंधे भाषायां द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
॥ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ३३. ॥
देवीने कहा हे गिरिराज ! चराचरयुक्त यह सम्पूर्ण जगत् मेरीही मायाशक्ति-
द्वारा रचित होता है वह माया मुझमेंही कल्पित होती है किन्तु वास्तवमें वह
माया मुझसे पृथक् नहीं है अतएव एकमात्र मैं ही चिद्वस्तु हूं मेरे अतिरिक्त चिद्वस्तु
अन्य कुछ नहीं है ॥ १ ॥ व्यवहारदृष्टिसे वह माया विद्यादि स्वतन्त्र नामसे
विख्यात होती है किन्तु तत्व अथवा ब्रह्मदृष्टिसे मायाकी विद्यमानता नहीं है केवल
एकमात्र ब्रह्मही विद्यमान रहता है ॥ २ ॥ मैंही वह चिद्ब्रह्मरूपिणी अविद्या कर्म

और अनेकप्रकार संस्कारयुक्त कूटस्थ ब्रह्मरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करके उसके
भीतर चिदाभासरूपसे प्राणवायु आगे करके प्रवेश करती हूं ॥ ३ ॥ हे गिरिवर !
इसप्रकार मेरे प्राणस्वीकारपूर्वक प्रवेशनकरनेपर लोकान्तरगमन जन्म और मरणादि
व्यवहार किसप्रकार सिद्ध होसके हैं ? जिसप्रकार एकमात्र व्यापक महाकाश उपाधि
भेदसे घटाकाश और मठाकाश इत्यादि भिन्न भिन्न नामसे विख्यात होतेहैं इसीप्रकार
मैं अनेक स्थलमें प्राणस्वीकार करके अविद्या और अन्तःकरणके प्रभेदसे हेतु भिन्न
भिन्न होती हूं अतएव उससेही अनेकप्रकार भिन्नभिन्न जीवोंकी उत्पत्ति होती है
॥ ४ ॥ जिसप्रकार सूर्य स्वीय किरणसंयोगसे पृथ्वीकी सम्पूर्ण वस्तु प्रदीपितकरके
भी दूषित नहीं होता इसीप्रकार मैंभी उत्कृष्ट और निकृष्ट सम्पूर्ण वस्तुके अन्तःप्रवेश
हेतु दोषलिप्त नहीं होती ॥ ५ ॥ मद्धुद्धि अज्ञानद्वारा बुद्धयादिनिष्ठ कर्तृत्व
आत्मरूपिणी मुझमें आरोपित करके आत्माकोही कर्ता कहते हैं किन्तु बुद्धिमान्
पंडितगण उसको स्वीकार नहीं करते फलतः मैं जीवके भीतर कत्रींरूपसे न रहकर
साक्षीरूपसे स्थिति करती हूं ॥ ६ ॥ हे अचलेन्द्र ! अविद्या और विद्याके भेदहेतु
जीवबहुत्व और ईश्वरबहुत्व प्रतिपादित होता है फलतः मायाद्वारा ही मनुष्य पशु
इत्यादि जीवभेद और ब्रह्मा, विष्णु इत्यादिमें ईश्वरभेद होता है ॥ ७ ॥ जिसप्रकार
महाकाश घटावच्छिन्न होनेपर महाकाश और घटाकाश ऐसा विभाग कल्पित होता
है इसीप्रकार व्यापक परमात्मा जीवावच्छिन्न होकर परमात्मा और जीवात्माका
इसप्रकार भेद कल्पित होता है ॥ ८ ॥ जिसप्रकार जीवका बहुत्व मायाद्वारा
कल्पित होता है स्वभावसे नहीं होता इसीप्रकार ईश्वरबहुत्वभी स्वभावसे नहीं होता
मायाद्वाराही कल्पित होता है ॥ ९ ॥ हे धरणीधर ! देह इन्द्रिय और मन इत्यादिके
भेदसे अविद्या ही जीवके भेदका हेतु है अन्य कुछ नहीं है ॥ १०॥ और जो तीनों
गुणकी वासनाभेदसे अर्थात् सात्विक राजसिक और तामसिक वासनाभेदसे मायाकीभी
भिन्नता उत्पन्न होती है ॥ ११ ॥ वह विभिन्नमायाही ब्रह्मा विष्णु इत्यादि ईश्वरके
भेदका कारण है नहीं तो और कुछ नहीं है हे धराथरेन्द्र ! यह सम्पूर्ण जगत् ओत
प्रोतभावसे मुझमें ही स्थित रहता है ॥ १२ ॥ अतएव मैं ही कारणदेहाभिमानी
ईश्वर लिंगदेहाभिमानी सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ और स्थूल देहाभिमानी विराट् हूं मैं ही
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर और मैं ही ब्राह्मी वैष्णवी और रौद्री शक्ति हूं ॥ १३ ॥ मैं ही सूर्य
मैंही चन्द्रमा मैं ही तारका और मैं ही पशु पक्षी चाण्डाल और तस्कर हूं ॥ १४ ॥ मैंही

१३७ सप्तमस्कन्ध-अ० ३३. (७४६)
क्रूरकर्मा व्याध और सत्कर्मा महाजन तथा मैंही स्त्री पुरुष और नपुंसक हूं इसमें सन्देह
नहीं ॥ १५ ॥ हे गिरिवर ! जिस किसी स्थानमें जो कोई वस्तु दिखाई देती अथवा सुनाई
देती हैं मैं उस सम्पूर्ण वस्तुके भीतर और बाहर व्याप्त होकर सर्वदा स्थित रहती हूं
॥ १६ ॥ मेरेविना चराचरकी कोई वस्तु विद्यमान नहीं है यदि कुछ है तो वह
वन्ध्याके पुत्रकी समान निरर्थक है ॥ १७ ॥ जिसप्रकार एकमात्र रज्जु सर्प और
मालादिरूपसे प्रतिभात होती है इसप्रकार एकमात्र मैंही ब्रह्मस्वरूपिणी मैंही ईश्वरादि
रूपसे प्रतिभात होती हूं इसमें सन्देह नहीं है ॥ १८ ॥ क्योंकि यह कल्पित जगत्
अधिष्ठानसत्ताके अतिरिक्त हेतु प्रतिभात नहीं होता यह मेरी सत्ताद्वाराही सत्तावान्
होताहै नहीं तो अन्य किसीप्रकार सम्भव नहींहोसक्ता ॥ १९ ॥ हिमालयने कहा
हेदेवि ! यदि मेरे प्रति आपकी कृपा हो तो आपकी समष्ट्यात्मक अर्थात् सर्वसम-
ष्टीरूप सर्वाभिमानी विराट्मूर्ति देखनेकी इच्छा करता हूं आप अनुग्रहकरके वह
मुझको दिखाइये ॥ २० ॥ व्यासजीने कहा हेमहाराज ! गिरिवरके यह वचन
सुनकर विष्णु इत्यादि सम्पूर्ण देवताओंने प्रसन्नचित्त हो अत्यन्त मानसहित उनके
उस वचनका अनुमोदन किया ॥ २१ ॥ अनन्तर भक्तोंकी वाञ्छा पूर्ण करनेवाली
भक्तोंकी कामधेनु और कल्याणरूपिणी देवी भुवनेश्वरीने अपना रूप देखनेमें देवता-
ओंको उत्सुक जानकर अपना विराड्रूप दिखाया ॥ २२ ॥ वह महादेवीके उस
विराट्रूपको देखनेलगे. सम्पूर्ण उर्द्धस्थित सत्यलोक उस विराट्रूपिणीका मस्तक
चन्द्रमा और सूर्य उसकी दोनों आँखें ॥ २३॥ सम्पूर्ण दिशा श्रोत्र (कान) सम्पूर्ण
वेद वाक्य, वायु उसका प्राण, विश्व उसका हृदय, पृथ्वी जघनस्थल, ॥ २४ ॥
नभस्थल अर्थात् भुवर्लोक नाभिसरोवर ज्योतिषकमण्डल ऊरुस्थल महर्लोक ग्रीवा
जनलोक मुखमण्डल ॥ २५ ॥ सत्यलोकके अधःस्थित तपोलोक उसका ललाट-
फलक इन्द्रादि देवतायुक्त स्वर्गलोक उसकी बाहु, शब्द उस महेश्वरीका श्रवणेन्द्रिय
॥ २६ ॥ दोनों अश्विनीकुमार उसके नासापुट, गन्ध घ्राणेन्द्रिय, मुखके भीतर
अग्नि, दिन और रात उसके दोनों पक्षरूपसे प्रकाश पाते थे ॥ २७ ॥ और उनकी
दोनों भौंहें चतुर्मुख ब्रह्माजीका स्थान, जल उसका तालु, रस उसकी जिह्वा, यमराज
उनकी दाढे ॥ २८ ॥ स्नेह विलास दाँत, माया उसका हास्य, ब्रह्माण्डसृष्टि उसका
कटाक्ष, व्रीडा उर्द्ध ओष्ठ ॥ २९ ॥ लोभ अधर और अधर्म उसका पृष्ठभाग,
जो जगतीतलमं सृष्टिकर्ता प्रजापति हैं वह उसका मेढ्र ॥ ३० ॥ सम्पूर्ण समुद्र

(७४६) देवीभागवत-भाषा । १३८
कुक्षि समस्त पर्वत उस महेश्वरीके अस्थिस্বরূপ, समस्त नदियें नाडी और सम्पूर्ण
वृक्ष उसके केशरूपसे प्रकाश पाते थे ॥ ३१ ॥ हे राजेन्द्र ! कौमार यौवन और
जरा उसकी उत्तम गति मेघसमूह उसका केशजाल दोनों सन्ध्या उन परम प्रभुकी
दोनों वस्त्रस्वरूप ॥ ३२ ॥ चन्द्रमा उस जगदम्बिकाका मन हरि उसकी विज्ञान
शक्ति और रुद्र उसके अन्तःकरण ॥ ३३ ॥ अश्वादि सम्पूर्ण जीव उसको नितम्ब
देश और अतलादि सम्पूर्ण महर्लोक उसके कटिदेशसे चरणकमलोंतक स्थिति करते
थे॥ ३४॥ देवतागण आश्चर्ययुक्त नेत्रोंसे जगदम्बिकाकी इसप्रकार मूर्त्ति देखने लगे
उनकी उस मूर्त्तिसे सहस्र सहस्र ज्वाला माला निकलने लगीं जिह्वाद्वारा सम्पूर्ण जगत्का
आस्वादन करने लगी ॥ ३५ ॥ दोनों दशनपंक्तियोंमें कटकटा शब्द होनेलगा सम्पूर्ण
अक्षियोंसे अग्नि उद्गार आरम्भ हुआ हाथमें अनेक प्रकारके आयुध ब्राह्मण और क्षत्रिय
उस घोरदर्शन वीरपुरुषके ओदनस्वरूप ॥ ३६ ॥ उनकी उस मूर्ति में अनेक मस्तक
अनेक नेत्र और अनेक चरण थे जिनकी सीमा नहीं उस मूर्त्तिके देखनेसे बोध
होता था कि एक वारही करोड सूर्य उदय हुए हैं मानों अनेक विद्युन्माला
एकत्र प्रकाशित होरहीं हैं ॥ ३७ ॥ महादेवीके वह महाभयंकर नेत्रभी मनको
त्रासउत्पन्न करते थे इस प्रकार महाघोर विराट्मूर्त्ति देख सम्पूर्ण देवतालोग भीत
होकर हाहाकार करनेलगे ॥ ३८ ॥ और उनका हृदय काँपनेलगा वह अत्यन्त
मूर्च्छासे आक्रान्त होगये “यही हमारी पालनकरनेवाली जगदम्बिका है” यह ज्ञान
एकवारही दूर होगया ॥ ३९ ॥ उससमय उन भुवनेश्वरीके चारोंओर जो सम्पूर्ण
वेद स्थिति करतेथे उन्होंने मूर्च्छासे उठायकर देवताओंको समझाया ॥ ४० ॥
अनन्तर वह निर्जरगण वह अत्युत्तम श्रुति प्राप्तकर धैर्यअवलम्बनपूर्वक अन्तर्जनित
बाष्पसे रुद्धकण्ठ हो ॥ ४१ ॥ प्रेमविगलित अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे गद्गदवचनद्वारा जग-
दम्बिकाका स्तव करनेलगे देवताओं ने कहा हे मातः ! हम अत्यन्त दीन और
आपसेही हम उत्पन्न हुए हैं आप हमारा अपराध क्षमाकीजिये ॥ ४२ ॥ और
हमारे प्रति कोप त्यागकीजिये, हम आपके इस रूपको देखनेसे अत्यन्त भीत हुए हैं
हे देवि ! पामर अमरगण आपकी क्या स्तुति करें ? ॥ ४३ ॥ आप स्वयं जब
कि अपने पराक्रमकी सीमा करनेमें असमर्थ हैं तब हम आपके पीछे जन्म ग्रहण
करके किसप्रकार उसको जानसक्ते हैं॥४४॥ हे प्रणवात्मिके भुवनेश्वरि ! हम आपको
नमस्कार करतेहैं हेदेवि ! सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्रमें आपको प्रतिपादित किया है हम आपकी

१३९ सप्तमस्कंध-अ० ३४. (७४७)
उसी ह्रींकारमूर्तिको नमस्कार करते हैं ॥४५॥ जिनसे अग्नि सूर्य चन्द्रमा और जिनसे
सम्पूर्ण ओषधियें उत्पन्न हुई हैं उन्ही सर्वात्मरूपिणीको नमस्कार है ॥४६॥ जिनसे
सम्पूर्ण देवतागण साध्यगण पशुगण पक्षीगण और मनुष्यगण उत्पन्न हुए हैं हम उन्हीं
सर्वात्मरूपिणी देवीके विराट्रूपको नमस्कार करते हैं॥४७॥ जिनसे प्राण अपान व्रीहि
यव तपस्या श्रद्धा सत्य ब्रह्मचर्य और सम्पूर्ण हितकर्तव्यतारूप विधि उत्पन्न हुई है हम
उन्हीं सर्वात्मिका महामायाकी महामूर्तिको नमस्कार करते हैं॥४८॥ जिनसे सप्त प्राण
सप्त दीप्ति सप्त समाधि सप्त होम और सप्त लोक उत्पन्न हुएहैं हम उन्हीं सर्वस्वरूपिणीको
नमस्कार करतेहैं॥४९॥ जिनसे सम्पूर्ण समुद्र सम्पूर्ण पर्वत समस्त नदी सम्पूर्ण औषधि
और समस्त रस उत्पन्न हुए हैं हम उन्हीं भुवनेश्वरीकी विराद्रूर्तिको नमस्कार करतेहैं
॥५०॥ जिनसे यज्ञ यूप और दक्षिणा एवं ऋक् यजु और सामवेद उत्पन्न हुए हैं हम
महामायाकी उस अखिल विश्वात्मक विराट्रूपको नमस्कार करते हैं॥५१॥हेमातः
महामाये ! आपकें पुरोभागमें नमस्कार आपके पृष्ठ भागमें नमस्कार आपके दोनों पार्श्वमें
नमस्कार आपके ऊर्द्धभागमें नमस्कार आपके अधोभागमें नमस्कार और आपके चारों
ओर वारंवार नमस्कार करते हैं॥५२॥ हे देवि ! आप अपने इस अलौकिक रूपको
दूर करके अपना परम सुन्दर मनोहर रूप हमको दिखाईये ॥५३॥व्यासजीने कहा हे
राजन् ! करुणाकी अर्णवरूपिणी जगदम्बिकाने सुरगणोंको भीत देख अपना घोर
विराद्रूप दूर करके परमसुन्दर भुवनमोहन पूर्वरूप दिखाया ॥ ५४ ॥ उनका सम्पूर्ण
शरीर कोमल होगया उन्होंने एक हस्तमें पाश और एक हस्तमें अङ्कुशास्र
धारण किया अपर दोनों हाथोंमेंसे एक हस्तमें वरदान और अन्य हस्त
अभयदान भङ्गिमामें उद्यत उनके नेत्र देखनेसे बोध होता था कि मानो उनके
एकवारही करुणारससे परिपूर्ण मुखकमलमें कुछेक हास्य विराजमान है ॥ ५५ ॥
देवतागण जगदम्बिकाकी इसप्रकार मूर्ति देखकर भयरहित हो शान्तचित्तसे
हर्ष और गद्गदशब्दपूर्वक प्रणाम करनेलगे ॥ ५६ ॥
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कंधे भाषायां त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ३४.
श्रीदेवी बोली कहां तो तुम मंदभाग्य और कहां यह मेरा अद्भुत रूप तौभी भक्ति
वत्सलतासे तुमको मैंने यह रूप दिखाया है ॥ १ ॥ वेदाध्ययन योग दान तप यज्ञसे

(७४८) .देवीभागवत-भाषा । १४०
यह मेरा रूप नहीं दीखता इसमें केवल मेरी कृपाही कारण है ॥ २ ॥ अब उसी
प्रकृत विषयको श्रवणकरो जो परमात्मा उपाधियोगसे जीवताको प्राप्त और कर्तृआ-
दिपदसे व्यवहार कियाजाता है ॥ ३ ॥ धर्म अधर्मके कारण अनेकप्रकारकी क्रिया
करता है और यह जीव अनेकयोनियोंको प्राप्त होकर सुखदुःख भोगता है ॥ ४ ॥
फिर उन्ही संस्कारोंके वशसे अनेकप्रकारके कर्मोंमें रत होता है अनेक देहोंसे युक्त
हो अनेक सुखदुःख पाताहै ॥ ५ ॥ घडीयंत्रकी समान यह सदा विचरताही
रहता है इसको कभी विश्राम नहीं मिलता आजतक अनेकसृष्टि प्रलय हुई
पर इसका विराम न हुआ इसका मूल अज्ञान है इस अज्ञानसे इच्छा और
उससे क्रिया होती है ॥ ६ ॥ इससे अज्ञान नाशके निमित्त क्रिया करनी
चाहिये यही जन्मकी सफलता है ॥ ७॥ जो अज्ञाननाश कियाजाय “यो ह्यविदित्वा-
त्मानमस्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः” इति श्रुतेः। पुरुषार्थकी समाप्ति जीवन्मुक्तकी दशाकी
प्राप्ति और अज्ञाननाशनमें एक विद्याही समर्थ है ॥ ८ ॥ हे पर्वतराज ! अज्ञानसे
उत्पन्न कर्म अज्ञानसे उत्पन्न हुए कर्मके नाशमें समर्थ नहीं है कारण कि इन दोनोंका
परस्पर विरोध नहीं है कर्मद्वारा अज्ञानके नाशकी आशा न करनी चाहिये ॥ ९ ॥
कारण कि यह अनर्थके देनेवाले कर्म वारंवार प्रगट होते हैं फिर राग और फिर
दोष इससे महाअनर्थ होता है ॥ १० ॥ इसकारण सब प्रयत्नसे मनुष्यको ज्ञान
सम्पादन करना चाहिये और “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” इस श्रुतिसे कर्मकोभी सदा करना
आवश्यक कहा है॥ ११॥तथा'ज्ञानादेव हि कैवल्यम्'अर्थात् ज्ञानसे ही मुक्ति होतीहै
इनका समुच्चय इसप्रकार है कि ज्ञानके होनेमें कर्म सदा सहायक है ॥ १२॥ इसप्र-
कार इसविषयमें कोई कहते हैं इस भांतिसे विरोध सम्भव नहीं होता कारण कि ज्ञानसे
हृदयकी गांठ खुलती है, और हृदयकी ग्रंथिमें कर्म स्थित है जहां ज्ञानके आगे कर्मकी
भावना हो वहां ज्ञानकर्मका समुच्चय कहनाचाहिये ॥ १३ ॥ इसकारण उन ज्ञान और
कर्मका तम और प्रकाशकी समान एकसाथ विरोध नहीं संभव होसक्ता, इसकारण यदि
ज्ञान उत्पन्न न हो तो यावज्जीव कर्मानुष्ठान करता रहै ॥ १४ ॥ हेमहामते! इस कारण जितने
वैदिक कर्म हैं, वह सब चित्तशुद्धिके निमित्त हैं उनको यत्नपूर्वक करनाचाहिये, चित्तशुद्धि
होनेसे ज्ञान प्राप्त होकर ज्ञानी होगा ॥ १५ ॥ शम-अन्तर इन्द्रियका निग्रह, दम बाह्य
इन्द्रियोंका निग्रह तितिक्षा शीत उष्ण आदिका सहना वैराग्य दोनों लोकके फलमें
विराग और अन्तःकरणकी शुद्धि जबतक यह प्राप्त न हो तबतक कर्म करता रहै

१४१ सप्तमस्कन्ध-अ० ३४. (७४९)
फिर कर्म करनेकी आवश्यकता नहीं ॥ १६ ॥ ज्ञान होनेपर सब कुछ त्याग
आत्मवान् गुरुका आश्रय करै वेदपाठी ब्रह्ममें निष्ठावाले वेदवेदांगके ज्ञातासे छल
रहित भक्तिपूर्वक ॥ १७ ॥ सावधान हो नित्य वेदांत श्रवण करै और 'तत्त्वमसि'
इत्यादि वाक्योंका नित्यही अर्थ विचारता रहै ॥ १८ ॥ "तत्त्वमसि" इत्यादिवाक्य
जीव और ईशकी एकताबोधक हैं इनकी एकता जानकर यह निर्भय होकर मेरा
रूप होजाता है ॥ १९ ॥ पहले पदार्थका ज्ञान फिर वाक्यार्थका ज्ञान करै
हे पर्वतराज 'तत्' पदका अर्थ षड्गुण ऐश्वर्यसम्पन्न मैं हूं ॥ २० ॥ और 'त्वं'
पदका वाच्यार्थ निःसन्देह जीव है, 'असि' पदसे दोनो जीव ईश्वरकी एकता ज्ञात
होती है अर्थात् वही तू है ॥ २१ ॥ यदि कहो कि अत्यन्त विरुद्ध धर्मवाले
जीवेश्वरकी एकता किसप्रकार होसकती है तो भागलक्षणासे कहते हैं, आशय
यह कि, जब वाच्यार्थ विरुद्ध होनेसे दोनोंकी एकता न घटे तो उसमें लक्षणा
करनी चाहिये जीवके असर्वज्ञत्व और परिच्छिन्नत्व आदि निकृष्ट धर्म हैं
ईश्वरकी सर्वज्ञता व्यापकताआदि उत्कृष्ट धर्म हैं तब इनका अभेद कैसे हो इसपर
श्रुतिसम्मत 'तत्, त्वं' पदकी लक्षणा करनी चाहिये ॥ २२ ॥ किस अर्थमें
लक्षणा करनी चाहिये तब कहते हैं चिन्मात्रमें लक्षणा होती है, सर्वज्ञत्वा-
दिविशिष्ट ब्रह्मचैतन्य ईश्वर है असर्वज्ञत्वादिविशिष्ट ब्रह्मचैतन्य जीव है इनमें
दोनों धर्म छोड़कर चिन्मात्र भागत्यागलक्षणासे ग्रहण करना, इसप्रकार
लक्षणासे दोनोंकी एकता होगी अपने अभेदसे इनकी एकताका ज्ञान होनेसे
अद्वय होगा यह इसका महाफल है ॥ २३ ॥ वही यह देवदत्त है इस वाक्यसे
तत्कालविशिष्ट देवदत्तका इसकालविशिष्ट देवदत्तसे भेद होनेपरभी वैशिष्ट्यरूप
दोनों धर्मके त्यागसे अविरुद्ध व्यक्तिको भागत्यागलक्षणासे ग्रहणकर अभेद किया
जाता है इसीकारण लक्षणा ग्रहण की है इस अनुभवसे स्थूलादिभेदरहित हो यह
ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ पंचीकृतमहाभूतसेही यह स्थूलदेह प्रगट हुआ
है, यह भोगका स्थान जरा व्याधि तथा सब कर्मोंसे युक्त है ॥ २५ ॥ यह मिथ्या
भी है परन्तु मायासे सत्यसा दीखता है हे पर्वतराज ! यह मेरे आत्माकी स्थूलउपाधि
है ॥ २६ ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियसे युक्त प्राणपंचकसे संयुक्त तथा मनबुद्धिसे युक्त देह
सूक्ष्मउपाधि है ॥ २७ ॥ अपंचीकृत भूतोंसे प्रगट यह आत्माका सूक्ष्म देह है, यह अन्तः
करणकी सुखदुःखादिअवबोधक दूसरी उपाधि है ॥ २८ ॥ हे नगेश्वर ! अनादि अनि-