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सर्वकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished40 पृष्ठ

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१३७ सप्तमस्कन्ध-अ० ३३. (७४६)
क्रूरकर्मा व्याध और सत्कर्मा महाजन तथा मैंही स्त्री पुरुष और नपुंसक हूं इसमें सन्देह
नहीं ॥ १५ ॥ हे गिरिवर ! जिस किसी स्थानमें जो कोई वस्तु दिखाई देती अथवा सुनाई
देती हैं मैं उस सम्पूर्ण वस्तुके भीतर और बाहर व्याप्त होकर सर्वदा स्थित रहती हूं
॥ १६ ॥ मेरेविना चराचरकी कोई वस्तु विद्यमान नहीं है यदि कुछ है तो वह
वन्ध्याके पुत्रकी समान निरर्थक है ॥ १७ ॥ जिसप्रकार एकमात्र रज्जु सर्प और
मालादिरूपसे प्रतिभात होती है इसप्रकार एकमात्र मैंही ब्रह्मस्वरूपिणी मैंही ईश्वरादि
रूपसे प्रतिभात होती हूं इसमें सन्देह नहीं है ॥ १८ ॥ क्योंकि यह कल्पित जगत्
अधिष्ठानसत्ताके अतिरिक्त हेतु प्रतिभात नहीं होता यह मेरी सत्ताद्वाराही सत्तावान्
होताहै नहीं तो अन्य किसीप्रकार सम्भव नहींहोसक्ता ॥ १९ ॥ हिमालयने कहा
हेदेवि ! यदि मेरे प्रति आपकी कृपा हो तो आपकी समष्ट्यात्मक अर्थात् सर्वसम-
ष्टीरूप सर्वाभिमानी विराट्मूर्ति देखनेकी इच्छा करता हूं आप अनुग्रहकरके वह
मुझको दिखाइये ॥ २० ॥ व्यासजीने कहा हेमहाराज ! गिरिवरके यह वचन
सुनकर विष्णु इत्यादि सम्पूर्ण देवताओंने प्रसन्नचित्त हो अत्यन्त मानसहित उनके
उस वचनका अनुमोदन किया ॥ २१ ॥ अनन्तर भक्तोंकी वाञ्छा पूर्ण करनेवाली
भक्तोंकी कामधेनु और कल्याणरूपिणी देवी भुवनेश्वरीने अपना रूप देखनेमें देवता-
ओंको उत्सुक जानकर अपना विराड्रूप दिखाया ॥ २२ ॥ वह महादेवीके उस
विराट्रूपको देखनेलगे. सम्पूर्ण उर्द्धस्थित सत्यलोक उस विराट्रूपिणीका मस्तक
चन्द्रमा और सूर्य उसकी दोनों आँखें ॥ २३॥ सम्पूर्ण दिशा श्रोत्र (कान) सम्पूर्ण
वेद वाक्य, वायु उसका प्राण, विश्व उसका हृदय, पृथ्वी जघनस्थल, ॥ २४ ॥
नभस्थल अर्थात् भुवर्लोक नाभिसरोवर ज्योतिषकमण्डल ऊरुस्थल महर्लोक ग्रीवा
जनलोक मुखमण्डल ॥ २५ ॥ सत्यलोकके अधःस्थित तपोलोक उसका ललाट-
फलक इन्द्रादि देवतायुक्त स्वर्गलोक उसकी बाहु, शब्द उस महेश्वरीका श्रवणेन्द्रिय
॥ २६ ॥ दोनों अश्विनीकुमार उसके नासापुट, गन्ध घ्राणेन्द्रिय, मुखके भीतर
अग्नि, दिन और रात उसके दोनों पक्षरूपसे प्रकाश पाते थे ॥ २७ ॥ और उनकी
दोनों भौंहें चतुर्मुख ब्रह्माजीका स्थान, जल उसका तालु, रस उसकी जिह्वा, यमराज
उनकी दाढे ॥ २८ ॥ स्नेह विलास दाँत, माया उसका हास्य, ब्रह्माण्डसृष्टि उसका
कटाक्ष, व्रीडा उर्द्ध ओष्ठ ॥ २९ ॥ लोभ अधर और अधर्म उसका पृष्ठभाग,
जो जगतीतलमं सृष्टिकर्ता प्रजापति हैं वह उसका मेढ्र ॥ ३० ॥ सम्पूर्ण समुद्र