दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 474 में से
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हमेकदा रागमञ्जर्याः प्रणयकोपप्रशमनाय सानुनयं पायितायाः पुनःपुनः
प्रणयसमर्पितमुखमधुगण्डूषमास्वादमास्वादं मदेनास्पृश्ये । शीलं हि म-
दोन्माद्योरमार्गेणाप्युचितकर्मस्वेव प्रवर्तनम् । यदहमुपोढमदः 'नगरमिद-
मेकयैव शर्वर्या निर्धनीकृत्य त्वद्भवनं पूरयेयम्' इति प्रव्यथितप्रियतमा-
प्रणामाञ्जलिशपथशतातिवर्ती मत्तवारण इव रभसच्छिन्नशृङ्खलः कयापि
धात्र्या शृगालिकाख्ययानुगम्यमानो नातिपरिकरोऽसिद्वितीयो रंहसा परे-
गच्छन्तीति भावः । अलं समर्थः । अतिनिपुणः अतिचतुरः । नियतिलिखितां
विधिनिर्दिष्टं लेखां गणनाम् । अतिक्रमितुमुल्लंघयितुम् । अहमपहारवर्मा । प्रण-
यकोपप्रशमनाय मानभञ्जनाय । पायितायाः कृतपानायाः सुरामिति शेषः । प्रण-
येति-प्रणयेन प्रेम्णा समर्पितं दत्तं यन्मुखमधुनो मुखामृतस्य गण्डूषं तत् । आस्वा-
दमास्वादम्-पुनः पुनरास्वाद्य । णमुल् । मदेन मत्ततया । अस्पृश्ये स्पृष्टोऽभवम् ।
मत्तोऽभवमित्यर्थः । शीलं स्वभावः । मदोन्माद्योः-मदो मत्तता-उन्मादः चि-
त्तता तयोः शीलमित्यनेन सम्बन्धः । अमार्गेण विरुद्धमार्गेण । उचितकर्मसु
अभ्यस्तकार्येषु । प्रवर्त्तनं प्रवृत्तिः । एतदेव शीलं मदोन्मादयोः । उपोढमदः
अतिशयत्तः । प्रव्यथितेति-प्रव्यथिता दुःखिता या प्रियतमा राजमञ्जरी तस्याः
प्रणामाञ्जलिना यत् शपथशतं तदतिक्रम्य वर्त्तत इति । रभसच्छिन्नशृङ्खलः-रभ-
सेन वेगेन छिन्ना शृङ्खला बन्धनरज्जुर्येन सः । नातिपरिकरः स्वल्पपरिजनः ।
डोलने लगे, जिन्हें मैंने समृद्ध कर दिया था । परम प्रवीण मनुष्य भी ब्रह्माकी
लिखित रेखाको मिटाने में सर्वदा असमर्थ ही रहते हैं । एक दिनकी घटना है कि, मैंने
रागमञ्जरीके प्रणयकोपके शमनार्थ प्रेमसे उसके मुखके अमृत-गण्डूषका बार-बार आस्वादन
किया । और मैं प्रेमसे पान करता हुआ, मन्दोन्मत्त हो गया । मद और उन्माद दोनोंका
यही स्वभाव है कि, उनके वशीभूत होनेपर भी मनुष्य पूर्वकी अभ्यस्त उचित प्रवृत्तिकी
ओर ही प्रवृत्त होता है। मैं उस कालमें अति मदोन्मत्त था । 'मैं एक ही रातमें इस
नगरको निर्धन बना करके तुम्हारे घरको धनसे पाट दूँगा।' (आदि बक रहा था)।
दुःखिता प्रियतमा रागमञ्जरी द्वारा बार-बार हाथ जोड़ करके प्रणाम करनेको तथा
शपथादि खानेको न मान करके मैं उस मतवाले हाथीके समान हो गया जो बड़े वेगसे
अपनी लोहेकी सीकड़ी आदि तोड़ देता है । कोई शृगालिका नामक दूती जो (मुझे
समझाने) मेरे पीछे आ रही थी । उससे अनुगम्यमान मैं स्वल्पपरिजनवाला एक हाथमें
तलवार लिये हुए वेगसे मार्गपर आ गया । नगररक्षक पुरुष जो मुझे चोर समझ करके