दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिश्रित अंग ४३
ऊगा बीज भया कुछ मोटा, हिरदा में डहडाया१।
किया निदान२ भरम सब खोया, जहँ प्रेम नीर बरखाया ॥२॥
नाभी माहिं भया कुछ दीरघ, पोटा सा दरसाना।
अर्ध कँवल में सिरा निकाला, गगन नाद गरजाना ॥३॥
मेरु डंड होय डाँडी निकसी, ता ऊपर परकासा।
बीज बुवा था बिरह भोम में, फल लागा आकासा ॥४॥
परथम जहाँ संख धुन उपजी, मन की अति रति जागी।
गाजै गगन सुधा रस बरसै, नौबत बाजन लागी ॥५॥
त्रिकुटी चढ़ा अनंत सुख पाया, मन की ऊनत३ भागी।
ऊँचे ज्ञान ध्यान सत बरतै, जहाँ सुषमना चूने लागी ॥६॥
चढ़ आकास सकल जग देखा, जुगती थी सो जानी।
सम्पत मिली बिपत सब भागी, ब्रह्म जोत दरसानी ॥७॥
जम गया दूध ब्रह्म कन निरजा, सुरत अवेरनहारी४।
हुई रास५ तब बरतन लागा, आनंद उपजा भारी ॥८॥
निरजा नाज भवन भर राखा, ता मध सुरत समाई।
जन दरिया निर्भय पद परसा, तहँ काल न पहुंचे आई ॥९॥
बाबल कैसे बिसरा जाई।
जदि मैं पति सँग रल खेलूंगी, आपा धरम समाई ॥टेक॥
सतगुर मेरे किरपा कीनी, उत्तम बर परनाई६।
अब मेरे साँईं को सरम पड़ैगी, लेगा चरन लगाई ॥२॥
थे७ जानराय मैं बाली भोली, थे७ निर्मल मैं मैली।
वे बतलाएं मैं बोल न जानूँ, भेद न सकूं सहेली ॥३॥
(१) लहलहाया। (२) निराव। (३) तपन। (४) जमा करनेवाली। (५) खलियान।
(६) ब्याह कराया। (७) तुम।