सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 472, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
सहजैं मन मथिया तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥ 5 ॥
387. उपदेश । धीमा ताल
मन मैला मन ही सौं धोइ, उनमनि लागै निर्मल होइ ॥ टेक ॥
मन ही उपजै विषय विकार, मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥ 1 ॥
मन ही दुविधा नाना भेद, मन ही समझै द्वै पख छेद ॥ 2 ॥
मन ही चंचल चहुँ दिशि जाइ, मन ही निश्चल रह्या समाइ ॥ 3 ॥
मन ही उपजै अग्नि शरीर, मन ही शीतल निर्मल नीर ॥ 4 ॥
मन उपदेश मनही समझाइ, दादू यहु मन उनमनि लाइ ॥ 5 ॥
388. मन प्रति शूरातन । धीमा ताल
रहु रे रहु मन मारूंगा, रती रती कर डारूंगा ॥ टेक ॥
खंड खंड कर नाखूंगा, जहाँ राम तहाँ राखूंगा ॥ 1 ॥
कह्या न मानै मेरा, सिर भानूंगा तेरा ॥ 2 ॥
घर में कदे न आवै, बाहर को उठि धावै ॥ 3 ॥
आतम राम न जानै, मेरा कह्या न मानै ॥ 4 ॥
दादू गुरुमुखि पूरा, मन सौं जूझै शूरा ॥ 5 ॥
389. नाम शूरातन । मकरन्द ताल
निर्भय नाम निरंजन लीजे, इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥ टेक ॥
सेवक शूर शंक नही मानै, राणा राव रंक कर जानै ॥ 1 ॥
नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पीवै पियाला ॥ 2 ॥
सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥ 3 ॥
हरि बलवंत सकल सिर गाजै, दादू सेवक कैसे भाजै ॥ 4 ॥
390. समर्थाई । प्रतिपाल
- 472 -