सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
३८४. उपदेश । त्रिताल
जप गोविन्द, विसर जनि जाइ, जनम सुफल करिये लै लाइ ॥ टेक ॥
हरि सुमिरण सौं हेत लगाइ, भजन प्रेम यश गोविन्द गाइ ।
मानुष देह मुक्ति का द्वारा, राम सुमिर जग सिरजनहारा ॥ 1 ॥
जब लग विषम व्याधि नहिं आई, जब लग काल काया नहिं खाई ।
जब लग शब्द पलट नहीं जाई, तब लग सेवा कर राम राई ॥ 2 ॥
अवसर राम कहसि नहीं लोई, जनम गया तब कहै न कोई ।
जब लग जीवै तब लग सोई, पीछे फिर पछतावा होई ॥ 3 ॥
सांई सेवा सेवक लागे, सोई पावे जे कोइ जागे ।
गुरुमुख भरम तिमर सब भागे, बहुरि न उलटे मारग लागे ॥ 4 ॥
ऐसा अवसर बहुरि न तेरा, देख विचार समझ जिय मेरा ।
दादू हार जीत जग आया, बहुत भांति कह-कह समझाया ॥ 5 ॥
३८५. प्रतिताल
राम नाम तत काहे न बोलै, रे मन मूढ़ अनत जनि डोलै ॥ टेक ॥
भूला भरमत जन्म गमावै, यहु रस रसना काहै न गावै ॥ 1 ॥
क्या झक औरै परत जंजाले, वाणी विमल हरि काहे न सँभालै ॥ 2 ॥
राम विसार जन्म जनि खोवै, जपले जीवन साफल होवै ॥ 3 ॥
सार सुधा सदा रस पीजे, दादू तन धर लाहा लीजे ॥ 4 ॥
३८६. तत्व उपदेश । प्रतिताल
आप आपण में खोजो रे भाई, वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥ टेक ॥
ज्यों मही बिलोये माखण आवै, त्यों मन मथियां तैं तत पावै ॥ 1 ॥
काष्ठ हुताशन रह्या समाई, त्यूं मन माँही निरंजन राई ॥ 2 ॥
ज्यों अवनी में नीर समाना, त्यों मन माँही साच सयाना ॥ 3 ॥
ज्यों दर्पण के नहिं लागै काई, त्यों मूरति माँही निरख लखाई ॥ 4 ॥
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