सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

हैं? जो ससुरजी मेरी जैसी पराये घर की लड़की को इतना प्यार देते हैं वे आप जैसे
अपने होनहार पुत्र को कैसे भूल सकते हैं?''
"नहीं येसू, इस शम्भू के लिए अपने पिता के राज्य में न्याय नहीं है। उल्टे
यह राज्य के बहुत से लोग उसके चेहरे पर कलंक के काले दाग लगाने का प्रयत्न
कर रहे हैं। हमारे शत्रु मुझे एक दुष्ट, मद्यप, उदंड, अहंकारी युवराज सिद्ध करने की
होड़ में लगे हैं।"
"युवराज भगवान पर भरोसा रखें।"
"हम बहुत से देवी-देवताओं की पूजा रोज करते हैं किन्तु सच्चे मन से
शिवाजी महाराज नामक देवता के अतिरिक्त संभाजी ने न किसी देवता को अपने
हृदय के मन्दिर में बिठाया और न ही पूजा की। उन्हें एक विशाल वटवृक्ष मानकर
हम उनकी छाया के लिए व्यग्र हैं। किन्तु कुछ विरोधी शक्तियाँ इस महावृक्ष को
मेरी जिन्दगी से दूर ले जाकर, मुझे जड़ से उखाड़ देने का प्रयास कर रही हैं।"
कोमल बिछौने पर भी शम्भुराजा को चैन की नींद नहीं आ रही थी। उनका
जागना, मछली की तरह तड़पना, गरम और गहरी साँसें लेना आदि येसूबाई निकट
से अनुभव कर रही थीं। उन्होंने धीरे से कहा-
"युवराज, राज्य के इन अधिकारियों ने भी स्वराज्य का निर्माण करने के लिए
अपने जीवन को समर्पित किया है। आप स्वयं उनके साथ बात क्यों नहीं करते?
आप स्वयं जाकर अण्णाजी से क्यों नहीं मिलते?''
"क्या करेंगे उनसे मिलकर? उस अभागी हंसा ने आत्महत्या की और
उसका सारा दोष मुझ पर लगाया गया। उसी समय वह गोदू आयी, वह अण्णाजी
के साढ़ू की लड़की निकली। यहाँ सारी परिस्थिति ने ही ऐसा विचित्र मोड़ लिया है
कि समझदारी अँधेरे में अपना मुँह छुपा रही है।"
पुरानी पीड़ादायक स्मृतियाँ शम्भुराजा का पीछा नहीं छोड़ रही थीं। युवराज
और युवराज्ञी सारी रात जागते रहे।
दूसरे दिन शम्भुराजा कुछ विलम्ब से बैठक में गये। कवि कलश पहले से ही
उनकी प्रतीक्षा में वहाँ खड़े थे। उनके साथ संगमेश्वर का थानेदार भी खड़ा था।
सवेरे-सवेरे देर तक दौड़कर आने के कारण वह पसीने से तर हो रहा था। वह
युवराज से मिलने के लिए उपस्थित हुआ था। शम्भुराजा उससे कुछ पूछें उससे
पहले वही विनम्र शब्दों में निवेदन करने लगा-
"युवराज! सब कुछ गड़बड़-घोटाला हो गया है। कल रायगढ़ से एक सेना
की टुकड़ी आयी। सैनिकों ने गरीब किसानों के बर्तन-भाँड़े जब्त कर लिये। दूध देने
वाली गायों और भैंसों को भी सरकारी क़ब्ज़े में ले लिया।"
सम्भाजी . ४१

"जप्ती! मगर किस लिए?" आश्चर्यचकित शम्भूराजा ने कवि कलश की
ओर देखा। कविराज भी क्रुद्ध मुद्रा में नजरें झुकाए नीचे की ओर देख रहे थे।
शम्भूराजा के मस्तिष्क में बात कौंधी। उन्होंने दाँत पीसते हुए कहा, "मैंने गरीब और
मेहनती प्रजा को माफीनामा लिखकर दिया सम्भवतः इसीलिए इन बेचारे पर यह
विपत्ति आयी है।"
"हाँ! हाँ सरकार।" थानेदार डरते हुए बोला, "मैंने उनको बहुत समझाया,
उनसे कहा कि यह निर्णय स्वयं युवराज ने लिया है और किसानों की हालत वास्तव
में बहुत खराब है। मगर उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे बोले बोले "
"बताओ, बताओ, कुछ भी छुपाओ नहीं, साफ साफ बोलो।"
"उनका कहना है मतलब सैन टुकड़ी के साथ आया हुआ राहुजी सोमनाथ
का कार्य व्यापार सँभालने वाला कह रहा था कि शम्भूराजा अभी तो गद्दी पर बैठे
नहीं हैं जब बैठेंगे तब कर लेना मुजरा।"
"रुक क्यों गये? बोलो बोलो !"
"वे कर्मचारी कहते थे कि यहाँ महाराज के जाने के बाद युवराज का हुक्म
चलाना था तो महाराज ने कर्नाटक जाते समय रायगढ़ का कार्यभाग शम्भूराजा को न
दिया होता? उन्हें कंकड की तरह अलग करके शृंगारपुर के जंगलों में थोडे ही
फेका होता?"
थानेदार किसी प्रकार घटित घटना का विवरण देकर मुक्त हो गया। शम्भूराजा
की मुख मुद्रा वेदनायुक्त और सम्भ्रमित बनी रही। किन्तु येसूबाई और कवि कलश
के चेहरे उतर गये थे। युवराज के अपमान से दोनों बहुत क्रुद्ध हो गये थे। शम्भूराजा
कुछ अधिक नहीं कह पाये। उन्होंने धीमी किन्तु कठोर आवाज में कवि कलश से
कहा, "कविराज साथ में एक हजार सैनिक ले लो और इसी वक्त संगमेश्वर की
ओर कूच करो। राहुजी सोमनाथ के कार्यभागी के साथ रायगढ़ के उन हृदयहीन गुंडों
को गिरफ्तार करके यहाँ लेकर आओ और शृंगारपुर के कारागार में बन्द कर दो।"
उसी दिन सूर्यास्त के पूर्व ही कवि कलश ने अपने मालिक के हुक्म की
तामील कर दी। जब कविराज ने शम्भूराजा को आकर अभिवादन किया तो युवराज
ने कहा "उन बदमाशों को चार दिन तक भूखे प्यासे रखो। उनको खूब पीटो।"
शम्भूराजा की इस कार्यवाही से शृंगारपुर उनकी ख्याति फैल गयी। इससे पहले
जावली प्रान्त के सूबेदार स्वयं अण्णाजी दत्तो ही थे। उनके कार्यकाल में वसूली
करने वाले कर्मचारियों ने अनेक स्थानों पर अकारण किसानों को सताना आरम्भ कर
दिया था। ऐसे लोगों को सबक सिखाने वाला कोई मिला था, इसलिए प्रभावली
प्रान्त के परिश्रमी किसान बहुत प्रसन्न थे।
९० सम्भाजी

रात को शम्भुराजा ने येसूबाई से कहा, "येसू परसों बालाजी काका चिटणीम
जो बताकर गये उसमें कुछ भी झूठ नहीं था। हवा का रुख बदल रहा है।"
येसूबाई ने अपने सात महीने के पेट पर शम्भुराजा का हाथ रखा। वे भरे गले
से बोलीं, "युवराज! हवा के इस रुख से हमें अकारण ही भय लग रहा है।
इसलिए थोड़ा धीरज रखें। मसूरजी के कर्नाटक से वापस आ जाने तक कोई भी
साहसी कदम न उठाइए।"

सम्भाजी १७ |

बगावत
एक
रणुबाई आक्का की पालकियाँ कुछ ही दिन पहले वाई से आकर शृंगारपुर पहुँची
थीं। राणुबाई को इस बात की बड़ी प्रसन्नता थी कि उनके छोटे भाई के घर झूला
झूलने वाला है। शम्भुराजा को अपनी माँ का प्यार नहीं मिला था। युवराज केवल दो
वर्ष के थे तभी उनकी माँ भगवान को प्यारी हो गई थीं। किन्तु संभाजी राजा पर
तीनों बहनों की स्नेह छाया थी। बड़ी बहन सकवार बाई उर्फ सखूबाई फलटण के
निम्बालकर से ब्याही गयी थीं। बीच वाली राणुबाई वाई के जाधव के यहाँ दी गयी
थीं। सबसे छोटी अम्बिकाबाई तारला के हरजी महाडिक से ब्याही गयी थीं। तीनों
बहने शम्भुराजा से बड़ी थीं। सबसे छोटी अम्बिकाबाई पर युवराज की असीम
ममता थी। किन्तु शम्भुराजा पर सर्वाधिक प्राण निछावर करनेवाली थीं रणुबाई।
शम्भुराजा अपने महल में जिस समय पहुँचे, बाहर घना अँधेरा घिर आया था।
महल के चौक चिराग जल रहे थे। वे बीच के कमरे में आये। वहाँ पर येसूबाई ने
हँसकर उनका स्वागत किया। बगल वाले मन्दिर की ओर संकेत करके वे बोलीं—
"युवराज! आज अपने यहाँ कौन मेहमान आये हैं आपने देखा नहीं क्या?"
शम्भुराजा ने मन्दिर की ओर देखा। एक स्त्री भगवान के सामने बैठी थी।
शम्भुराजा सहजभाव से चार कदम आगे गये। उनकी आहट पाते ही उस स्त्री ने
अपना चेहरा ऊपर करके उनकी ओर देखा। उसे देखते ही शम्भुराजा कुछ झेंप गये।
गोदू सचमुच बहुत बदल गयी थी। उसके सुन्दर शरीर और पीठ पर लोटती काले
घने बालों की नागिन जैसी चोटी में कोई अन्तर नहीं आया था। किन्तु उसका शोख
बचपना खो गया था। आँखों के चारों ओर हल्का सा काला रंग चढ़ने लगा था।
कोई चिन्ता उसे अन्दर से खाये जा रही थी। युवराज के कुछ कहने के पहले ही गोदू
कहने लगी, "महाराज! आपने यहाँ जब से वसूली करने वाले कर्मचारियों को कैद
किया है तब से वहाँ किले पर आपके विरुद्ध हर तरह के षड्यन्त्र रचे जा रहे हैं।
अधिकारियों ने बहुत ऊधम मचा रखा है।"
92 सम्भाजी

“जाने दो गोदू! ये कलम बहादुर मेग क्या बिगाड़ लेंगे?”
“युवराज! अण्णाजी काका की मदद मे राहूजी पन्त और अन्य लोगों ने
मिलकर शिवाजी महाराज को एक विशेष सन्देश भेजा है। मरकारी वसूली और
राज्य के कार्य व्यापार में बाधा डालने के लिए आपको अपराधी ठहराकर आपको
कैद किया जाय। यह भी प्रस्ताव है कि यदि महाराज युवराज को गिरफ्तार करने की
आज्ञा नहीं देते तो जब तक महाराज के वापस लौटने तक के लिए उन्हें युवराज पद
से हटा देना चाहिए। आपके विरोध में कार्यवाही की जाएगी। युवराज, इम प्रकार के
कम से कम तीन प्रम्ताव भेजे गये हैं।”
इन सभी घटनाओं पर युवराज ने युवराज्ञी येसूबाई के माथ विचार विमर्श
किया। चिन्तित युवराज को धैर्य बँधाती हुई येसूबाई बोलीं-
“युवराज, आपके पिताजी की बुद्धिमानी औग हृदय की विशालता का ज्ञान
मुझे आपसे भी ज्यादा है। वे राम्ता चलते व्यक्ति को भी न्याय देते हैं तां अपने पुत्र
को न्याय मे वंचित करेंगे?”
दूमरे दिन युवराज और कवि कलश शास्त्री नदी के पार के गाँवों में गये। वहाँ
के किसानों ने आम के नये बगीचे लगाए थे। दोपहरी में युवराज और कवि कलश,
परिश्रमी किसानों के माथ घुल मिलकर एक कुएँ के पास बैठे, किसानों के साथ
चावल की गेटी, मक्खन औग हरी मिर्च खायीं।
शम्भुराजा औग कवि कलश के घोड़े श्रृंगारपुर की ओर लांट रहे थे, तभी
युवराज की दृष्टि नदी की सूखी धारा के बीच मे गुजरती शाही पालकी पर पड़ी।
पालकी राजमहल की ही थी। येसूबाई के आदेश से कहार गोदू को लेकर मारवट
गाँव की ओर जा रहे थे। पालकी को शम्भुराजा ने रोका। अन्दर बैठी गोदू तो क्या
नदी की धारा को भी कुछ समझ में नहीं आया। कविराज भी अपना घोड़ा लेकर
नदी के पार जाकर रुके। कहार भी थोड़ी दूर जाकर खड़े हो गये। युवराज गोदू की
ओर देख रहे थे। व्यावहारिक जगत के कठोर आघात से उसका चेहरा मुरझा गया
था।
“गोदू तुम्हार पति और ससुर...?”
महाराज, वे दोनों मेरे लिए जिन्दा नहीं हैं। उन्होंने जिम दिन स्वराज के
विरुद्ध विद्रोह किया, मेरे लिए उसी दिन मर गये।”
शम्भुराजा कुछ रुक रुक कर बोले, “गोदू तू एक बार फिर से विवाह क्यों
नहीं कर लेती?”
“विवाह करूँगी न! किन्तु सिर्फ एक ही व्यक्ति के साथ।” गोदू की आँखें
चमक उठीं। गोदू ऐसे बोली थी जैसे स्वप्न में बोल रही हो।
“कोई भी हो, किन्तु गोदू समय से विवाह कर ले। तेरे दिल की भाषा तेरे
सम्भाजी :: 93

दिलवर की समझ में नहीं आती क्या?"
"वह तो भगवान को मालूम होगा।" गोदू धीमे स्वर में बोली, "मेरी समझ
में तो इतना ही आता है कि उसकी पत्नी साक्षात् माता लक्ष्मी है। उसे दुखी करने का
साहस मैं नहीं कर सकती।"
एक ओर तो रायगढ़ में दोषपूर्ण ढंग से शम्भूराजा के विरोध में योजनाबद्ध रूप
से अफवाह फैलाई जा रही थी। इससे वे दुखी हो रहे थे। किन्तु दूसरी ओर उनका
तन-मन कर्नाटक की लड़ाई की ओर लगा रहता था। प्रतिदिन विजय के समाचार
उनके कानों तक आते थे। शिवाजी महाराज के स्वागत में पूरा भागानगर (हैदराबाद)
रास्ते पर उतर आया था। गोलकोंडा के कुतुबशाह ने उनका खूब स्वागत किया था।
कुतुबशाह के प्रमुख प्रधान की समझ में ही नहीं आ रहा था कि महाराज को कहाँ
रखें कहाँ नहीं। सुदूर जिंजी के बुर्ज पर घोड़ों को चढ़ाकर मराठा सैनिकों ने
हिन्दुस्तान का दक्षिणी दरवाजा अपने घोड़ों की टाप के नीचे कर लिया था। खुशी
की ये खबरें सुनकर युवराज प्रसन्नचित हो जाते थे।
गोदू जिस दिन वापस गयी उसी दिन येसूबाई ने शम्भूराजा से कहा,
"युवराज का गुस्सा ऐसा है जैसे गरजते गरजते बरस जाने वाली लहर। वह जितने
वेग से आती है उसी गति से नष्ट हो जाती है।"
"नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं है।" शम्भूराजा ने उत्तर दिया।
ऐसा नहीं है तो रायगढ़ के जिन वसूली कर्मचारियों को आप महीने भर की
यातनापूर्ण सजा देने वाले थे, उन्हें दो दिन में ही मुक्त क्यों कर दिया? उल्टे
कविकलाश को हुक्म दिया कि उनके भोजन और आने-जाने की व्यवस्था करें।"
इस बात पर शम्भूराजा अपनी हँसी रोक नहीं पाये।
दो ही दिन में दिलेर खान के जासूस नया सन्देश लेकर, गुप्त रूप से श्रृंगारपुर
में दाखिल हुए। कवि कलश ने वह सन्देश पत्र युवराज के सम्मुख प्रस्तुत किया।
युवराज ने क्रुद्ध होकर कहा—
"क्या पागल हो गया है, वह बुड्ढा खान?"
उनकी दृष्टि तेजी से सन्देश पत्र की पंक्तियों पर दौड़ने लगी।
"रुस्तम ए दख्खन संभाजी महाराज!"
मेहरबानी करो। हमारे पास आ जाओ। पातशाह औरंगजेब गाजी है। उसे
सह्याद्रि के साथ पूरा दख्खन देश जीतना है। गुस्ताखी माफ। हमें आपके शाही
खानदानी मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं हैं। मगर फिर भी हम आपके
दिल का दर्द जानते हैं। आपके पिता की सच्ची मोहब्बत सोयराबाई और राजाराम से
है। दरबार के मारे कारकून आपके जैसे स्वाभिमानी मर्द को दुश्मन की निगाह से
94 सम्भाजी

देखते हैं। इसीलिए तुम्हें रियासत के एक टुकड़े का शहजादा बनकर अपमान से
रहना पड़ रहा है। इससे तो अच्छा आप आलमगीर के पास जाओ। हमारी दोस्ती
का हाथ थाम लो। आज नहीं तो कल आलमगीर साहब दक्खन में आएँगे ही
तुम्हारी और हमारी किस्मत रोशन हो जाएगी।''
अपनी आँखों के सामने से सन्देश पत्र को हटाते हुए शम्भुराजा ने कहा—
‘‘कविराज ! दिलेर को लगे हाथ जवाब दो। उसका खत बिना जवाब के नहीं
रहना चाहिए।’’
‘‘राजन ! इसका क्या अभिप्राय है ?’’
‘‘हमारे चुप रहने का अर्थ वह हमारी मौन सहमति न लगा ले।’’ शम्भुराजा
के मुख से शब्द निकलने लगे। वहीं पर पैर मोड़कर, लिखने की मेज पर कागज
रखकर कवि कलश उत्तर लिखने लगे—
‘‘खान साहेब, हमें अपना मानकर, हमारे विषय में जो चिन्ता प्रकट करते हो
उसके लिए हमें अल्लाह का शुक्रगुजार होना चाहिए। हमारे राजपरिवार में गृह-
भेद, दरार पड़ने की खबर आपने जो सुनी है वह सच है। मगर उससे आपको जरा
भी आनन्दित होने की आवश्यकता नहीं है। यह वतन हम सभी के हाथों में सौंपकर
मेरे पिताजी कितने विश्वास से दूसरे प्रदेश में चले गये है। क्या आपका कहना है कि
उनके पीछे हम गद्दारी करके राज्य को अपनी झोली में डाल लेंगे ? हमारे हाथ से
ऐसा कुछ घटित होने का मतलब होगा, मेरे प्यारे दिलेर भाई रावण की मदद के
लिए श्रीराम का दशरथ से बगावत करना। शिवाजी महाराज जैसा पिता दैवी कृपा से
मिला है उस वटवृक्ष की शीतल छाया छोड़कर तुम्हारी सोने की लंका का हमें क्या
करना ?’’
खत की इबारत बोलते-बोलते संभाजी राजा की आँखें भर आयीं। उनका
अपने पिता और स्वराज के प्रति प्रेम देखकर कवि कलश भी गद्गद हो गये। इसी
बीच मन में कुछ सोचकर युवराज एकाएक रुके और पत्र को थैली में बाँधते हुए
कवि कलश से बोले, ‘‘रुको, मुझे लगता है कि इस पत्र में कुछ और जोड़ दें।’’
‘‘जैसी आज्ञा।’’
दोनों फिर से नीचे बैठ गये। युवराज ने पुनः बोलना आरम्भ किया—
‘‘दिलेर जी, यदि तुम्हें और तुम्हारे पातशाह को सचमुच हमारा पराक्रम बहुत
पसन्द है तो हम दोनों एक हो जाएँ और दूसरा कोई देश जीतकर पातशाह को भेंट
कर दें।’’
‘‘किन्तु राजन ! जिससे हाथ नहीं मिलाना है उसमे हाथ क्यों मिलाएँ ?’’
कवि कलश आवेश में पूछने लगे।
सम्भाजी . 95

शम्भूराजा का मुख उतर गया। बनावटी मुस्कान के साथ, लम्बी साँस छोड़ते
हुए बोले, "कविराज ! मनुष्य की जिन्दगी में समय पूछकर नहीं आता।"
दो
राजमहल के अलिन्द पर येसूबाई खड़ीं थीं। वे संगमेश्वर की ओर ध्यान से देख रही
थीं। उन्हें घने जंगलों के बीच एक दल तेजी से दौड़ता दिखाई दिया। येसूबाई ने पैर
उठाकर और ध्यान से देखा। यह घुड़सवारों का दल था। येसूबाई ने देखा कि सामने
से आ रहे घुड़सवारों के हाथ में भगवा झंडा था। येसूबाई को तत्काल बड़े महाराज
का स्मरण हो आया। उनके मन की कली खिल गयी। लगभग पौने दो वर्ष बाद
शिवाजी महाराज पन्हालगढ़ लौटे थे। चार ही दिन पहले उनके आने का समाचार
युवराज और युवराज्ञी के कानों तक पहुँचा था। तभी से दोनों के कान पन्हालगढ़ की
ओर लगे थे कि कब वहाँ से बुलावा आ जाय।
पन्हाला से शृंगारपुर आये सवारों की खबर तुरन्त फैल गयी। कवि कलश
तत्काल अपने आवास से दरबार में आ गये। शिवाजी महाराज का समाचार जानने के
लिए मानो सारा चराचर उत्सुक हो उठा। दरबार में सरदार विश्वनाथ, कवि कलश,
राणूबाई युवराज पर प्राण निछावर करने वाले अन्य साथी इकट्ठा हो गये थे।
स्वास्थ्य ठीक न होने पर भी बूढ़े पिताजी शिर्के भी कपड़े ठीक ठाक करके उसी
समय शम्भूराजा दरबार में आ गये थे। सभी के मन में उत्सुकता भरी थी। उसी
समय शम्भूराजा दरबार में हाजिर हुए। सभी ने उनका अभिवादन किया। उनके पीछे
ही येसूबाई आयीं और सामने वाले आसन पर प्रसन्न मुद्रा में बैठ गयीं। महत्त्वपूर्ण
पत्र को कवि कलश ही पढ़ेंगे ऐसी दरबार की प्रथा बन गयी थी। उनकी ओर संकेत
करके सम्भाजी राजा बोले, "कविराज चलो पढ़ो।"
"प्रिय शंभो ! कर्नाटक अभियान में विजयी होकर हम प्रतिदिन बड़ी तेजी से
दौड़े चले आ रहे थे। हम कितने उत्सुक थे कि वायु वेग से आकर हम आपको
बाँहों में लेकर, गले से लगाकर मिलेंगे। किन्तु "
कवि कलश भयभीत होकर वहीं रुक गये। उन्होंने लम्बी साँस ली। सुनने
वालों ने अपने मन को समझाया कि 'किन्तु' शब्द का प्रयोग कवि कलश ने अपने
मन से किया होगा। "किन्तु आपके आपके "
कविराज भय से काँप उठा। इसी समय युवराज की धीर गम्भीर वाणी दरबार
96 • सम्भाजी

में गूँज उठी, "कलश जो भी हो पढ़कर सुनाओ।"
अपने को किसी प्रकार सँभालते हुए कविराज धीमी गति से एक-एक शब्द
पढ़ने लगे—
"परन्तु आपके एक-एक कारनामे हमारे कानों तक आये और हम धन्य हो
गये। युवराज! आप कोई बच्चे नहीं हैं, इक्कीस-बाइस वर्ष के जवाँमर्द हो चुके हैं।
हमारी पीठ पीछे आपने न केवल कर डुबाने वालों को माफी दी बल्कि हमारे
कर्मचारियों को बार-बार अपमानित किया। हमारे अष्टप्रधानों को आपने समझ क्या
रखा है? विगत पचीस-पचीस तीस-तीस वर्षों से हमारे साथ कन्धे से कन्धा
मिलाकर स्वराज के हित में रात-दिन काम करने वाले, हमारे लिए प्राणों की बाजी
लगाने वाले वे हमारे अभिन्न साथी हैं। उनकी आयु उनके अनुभव और उनकी सेवा
का लिहाज न करके आपने सदैव ही उनका अपमान किया है और उन्हें सताया है।
आप मुझसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। किन्तु इसके बाद
अपना मुँह दिखाने का कष्ट न करें। पत्र को विराम देते हैं।"
कवि कलश भय दुःख और आश्चर्य से मौन हो गये । उनका हाथ थरथराने
लगा। दरबार में उपस्थित शम्भूराजा के सम्बन्धी हित मित्र सभी पत्थर की भाँति
जड़ हो गये। कविराज ने शम्भूराजा की ओर दुखभरी दृष्टि फेरी। वे दुख की आग
में जल रहे थे। फिर भी शम्भूराजा ने पत्र को आगे पढ़ने का संकेत किया। इतने में
येसूबाई ने कड़े शब्दों में कहा, "रुक जाओ"। भरी सभा में लोगों के सामने अपना
दुखड़ा रोने या बताने की उनकी इच्छा नहीं थी। फिर भी उनकी आँखें भर आयीं।
येसूबाई ने फिर कहा, "बस! बस! कविराज । अब आगे एक भी शब्द हमसे सुना
नहीं जाएगा।"
"कविराज! रुक जाना ही ठीक है।" राणूबाई ने कहा।
"क्यों? क्यों नहीं सुना जाएगा? ये शब्द अपने शिवप्रभु के ही हैं। कविराज
रुको नहीं। क्योंकि आधा-अधूरा पत्र सुनकर लोग चले गये तो कल इससे भी
अधिक अफवाहों के बुलबुले उठेंगे। उससे तो यही अच्छा है कि जो भी है वह
लोगों के कानों तक जाए।"
कवि कलश पत्र आगे पढ़ने लगे— "अभी भी यदि भूले बिसरे आपमें कुछ
विवेक बुद्धि बची हो तो हमारा सुझाव है कि मुझसे मिलने पन्हाला आने के बदले
आप सज्जनगढ़ चले जाइए। वहाँ श्री रामदास स्वामी के सत्संग में कुछ समय
रहिए। कुछ सदाचार और सद्व्यवहार सीखिए। समय से पहले समझदार हो
जाइए। स्वामीजी का प्रसाद लेकर जीवन भर सुखी रहिए।"
यह पत्र सुनकर सारा दरबार अवाक रह गया। बिना कुछ कहे लोग धीरे-धीरे
निकल गये। पिलाजी शिर्के भी बहुत दुखी मन से बाहर निकले। युवराज्ञी की ओर
सम्भाजी . 97

तो देखा नहीं जाता था। उनका शरीर काँप रहा था। युवराज पत्थर की तरह जड़वत्
होकर वहीं बैठ गये। बहुत समय तक कोई कुछ बोला नहीं। अन्त में शम्भूराजा एक
गहरी साँस छोड़ते हुए निराश स्वर में बोले, "देखो वह दिलेर खान शत्रु होकर भी
कितनी समझदारी की बात हमें सिखाता है। माया, ममता, नाते, रिश्ते सब झूठ हैं।
अनेक बार शत्रुओं के मुख से भी पवित्र सूक्तियाँ निकलती हैं।
"राजन् कृपा करें! आप धीरज न छोड़ें।" कविराज ने व्याकुलता से कहा।
"इसके अतिरिक्त आज तक हम कर ही क्या रहे हैं?" गहरी साँस छोड़ते
हुए शम्भूराजा बोले, "पौने दो वर्ष तक पिताजी का असह्य वियोग के बाद उनसे
मिलने की प्रतीक्षा हम कितनी उत्सुकता से कर रहे थे? कर्नाटक की ओर जाने से
पहले पिताजी ने हमें वचन दिया था कि आने के बाद मेरी शिकायतों और
अधिकारियों के आरोपो के सम्बन्ध में हमारे साथ गम्भीर चर्चा करेंगे। किन्तु
"युवराज ?"
"हाँ। किन्तु अब न मिलना न सीधी नजर से देखना, न ही प्रेमपूर्ण कोई
संवाद या पत्र। बिना स्पष्टीकरण का अवसर दिये हमें दोषी घोषित कर दिया गया
है। महाराज ने हमारे लिए भेजा भी तो यह फटे जूतों का हार।"
जैसे किसी बाघ के बच्चे को तेजधार वाले तीरों से घायल करके छोड़ दिया
जाता है और वह पीड़ा से छटपटाता रहता है, उसी तरह शम्भूराजा बेचैनी से
छटपटा रहे थे। उन्होंने भोजन नहीं किया। दोपहर ढल गयी। परछाइयाँ लम्बी होने
लगीं। थोड़े समय बाद युवराज्ञी डरते डरते भोजन की थाली लेकर आयीं।
शम्भूराजा ने उसे तत्काल दूर हटा दिया। युवराज बिस्तर पर छटपटा रहे थे। बिस्तर
मानो अंगारों का ढेर बन गया था। उसमें युवराज का सारा शरीर जल रहा था।
युवराज्ञी आगे आयीं। ज्वर से तपते शम्भूराजा गौर भाल पर हाथ हल्के से
फेरती हुई बोलीं "इतना ग्लानिग्रस्त न हों। ये दिन भी बीत जाएँगे। खुद को
सँभालें।"
"येसू कैसे सँभालूँ और कैसे सँवारू ? यहाँ कर्मचारी लोग गन्दा कीचड़
उछाल रहे हैं। वहाँ माँ सोयराबाई महाराज के बिस्तर के चारों ओर मेरे विरोध में
ईर्ष्या की अगरबत्ती रात दिन जला रखी है। केवल ममत्व के भूखे शिवाजी महाराज
के पुत्र के भाग्य में पिता की छाया तक सम्भव नहीं है। आज रायगढ़ दुर्जनगढ़ बन
गया है। येसू आज हम न किसी के रह गये हैं और न हमारा कहने के लिए ही कोई
बचा है।"
विरोधियों के षड्यन्त्र रुक नहीं रहे थे। रायगढ़ और पन्हालगढ़ के आसपास
मे शम्भूराजा के निजी जासूस भी खबरें ला रहे थे। उनके अनुसार अष्टप्रधानों के
महलों शिवाजी महाराज के दरबार में कुछ अलग ही राजनीति चल रही थी। वहाँ
५४ सम्भाजी

विचार हो रहा था कि हिन्दवी स्वराज को दो भागों में बाँट दिया जाय। रायगढ़ के
साथ पूरे मावल प्रदेश को छोटे युवराज अर्थात राजाराम को दे दिया जाय और बिना
भरोसे का जिंजी वाला हिस्सा शम्भुराजा को दिया जाय। विरोधी पक्ष के लोग शर्त
लगाकर कह रहे थे कि शिवाजी महाराज का भी ऐसा ही विचार है।
श्रृंगारपुर का वनवास न तो सहन हो रहा था न ही समाप्त। इसी प्रकार घाव
पर नमक छिड़कने की तरह दिलेरखान की ओर से एक और सन्देश आ पहुँचा।
"बदनसीब शहजादे, शम्भूराजे! अपने कार्यकर्ताओं द्वारा इतनी अच्छी सेवा
करने के बाद भी तुम किसके फैसले का इन्तजार कर रहे हैं? वहाँ सुदूर जिंजी जाने
की अपेक्षा भीमकाठ की बादशाह की छावनी शामियाना करीब नहीं है क्या? दिल
में बिना कोई शंका रखे हमारे पास आ जाओ तुम्हारे स्वागत के लिए हमारे
शामियानों के दरवाजे कब से बेसब्र हैं।"
दिलेरखान के इस ताजे खत से शम्भुराजा सावधान हो गये। मन्दिर के देवता
पत्थर बनकर बैठे थे और दूर मस्जिद के ऊपर चाँद तारे उनके विवश मन को संकेत
कर रहे थे।
मित्रता का हाथ बढ़ाने वाले दिलेरखान कोई सरल आदमी नहीं था।
लम्बा नारियल के पेड़ जैसा, मजबूत काठी का दिलेरखान एक कट्टर रोहिला था।
गगा यमुना का पानी पिया हुआ, औरंगजेब के दरबार में सिर ऊँचा करके खड़ा होने
वाला योद्धा था।
दिलेरखान को यही इच्छा हमेशा तड़पाती रहती थी कि वह आलमगीर
औरंगजेब की कुछ ऐसी अद्भुत सेवा कर दे कि वे चकित रह जायें। एक दिन कभी
दरबार में उसे सबसे ऊँचा स्थान देकर उसकी पगड़ी में स्वयं सम्मान का चार चाँद
लगाये। काबुल और कंधार से लेकर बंगाल तक औरंगजेब को चुनौती देने वाला
कोई नहीं था। शिवाजी महाराज ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे। औरंगजेब अपने
विशिष्ट मित्रों की मंडली में कहता था- "यदि हमने शिवाजी को जीत लिया तो
समझो सारी दुनिया फतेह कर ली।" दिलेरखान सोचता था कि बादशाह की ऐसी
मनोदशा में यदि वह शिवाजी के कलेजे के टुकड़े संभाजी को अलग करके
औरंगजेब के कदमों में पेश कर दे तो कितने आनन्द की बात होगी? इसी इच्छा की
पूर्ति के लिए वह दो बार फन्दा फेंककर अधीर होकर बैठा था। वह अपने गुप्तचरों
से रायगढ़ में संभाजी की उपेक्षा और उनके अपमान की छोटी-छोटी खबरें लेता
रहता था।
शम्भूराजा ने भी बड़ी चतुराई से नये नये दाव खेलना आरम्भ किया। उन्होंने
जोत्याजी केसकर को गुप्त रूप से दिलेरखान के मुल्क में भेज दिया। उन्होंने
परिस्थिति के सूक्ष्म निरीक्षण का आदेश दिया। इस बात का पता जब येसूबाई को
सम्भाजी :: 99

चला तो वे अत्यन्त चिन्तित हो गयीं।
एक दिन प्रातःकाल संभाजी राजा ने अपनी लम्बी पूजा समाप्त की। पवित्र
मन से नंगे शरीर मन्दिर से बाहर आये। उसी समय अचूक निशाना साधकर येसूबाई
सामने आयीं और अत्यन्त विनम्र स्वर में बोलीं, "युवराज! इतनी तामसी वृत्ति ठीक
नहीं है। संयम रखें और संघर्ष को टालें।" अपने पैरों में पड़ी युवराज्ञी की चिन्ता
किये बिना शम्भुराजा बोले-
"युवराज्ञी तुम कुछ भी कहो या समझो। यह संभाजी अब तुम्हारे स्वराज के
लिए निरर्थक हो गया है।"
"तो क्या इसीलिए आप उस दगाबाज दिलेरखान की गोद में अपना सिर
रखने के लिए निकले हैं?" येसूबाई की आँखों में क्रोध की चिनगारियाँ नाचने
लगीं। उन्होंने गरजते स्वर में पूछा, "आपको मालूम है कि कौन है यह दिलेरखान ?
पुरन्दर के घेराव में अपने वीर मुरार बाजी का सिर काटने वाला चंडाल यही है।
युवराज धैर्य धारण करो। सोचो।"
"तो यहाँ रुककर हम करेंगे क्या? इस राज्य का युवराज होते हुए भी हमें
युद्ध में जाना नहीं है, अपने राजमहल में रहना नहीं है हजार दो हजार घोड़ों की
सेना भी हम तैयार नहीं कर सकते, प्रजा की छोटी सी फरियाद भी सुनने की आज्ञा
हमें नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या हमें सज्जनगढ़ पर जाकर केवल तालियाँ बजाते
हुए जिन्दगी काटनी है।
शम्भुराजा के चेहरे पर दुख की छाया स्पष्ट दिख रही थी। वे अधीर स्वर में
बोले, "येसू! आजकल मुझे अकारण भी भय लगने लगता है। अगले महीने हम
दोनों छोटे युवराज राजाराम को लेकर पिताजी से मिलने जाने वाले थे। अपने कुल
का दीपक उनके चरणों में समर्पित करने वाले थे। परन्तु उसकी जगह - उससे
पहले हमें जंजीरों से जकड़कर जेरबन्द करके, गर्दन में फाँस लगाकर रायगढ़ में
प्रस्तुत होने का आदेश पिताजी ने नहीं दिया, यही बहुत बड़ी कृपा है।"
"युवराज! एक पक्ष से ही इतना क्यों सोच रहे हो? अपने वीर पिता के
सम्बन्ध में कुछ नहीं सोचते हो? जो कुछ भी चल रहा है, वह बहुत गलत चल रहा
है।" येसूबाई ने युवराज से कहा।
संभाजी राजा ने अपनी उद्विग्नता और अपमान के ज्वार को भीतर ही भीतर
दबाते हुए कहा, "अपने युवराज की निन्दा करने वाला इस प्रकार का पत्र पिताजी
को नौकर के हाथ क्यों भेजना चाहिए था। सामने बुलाकर हमारी खाल भी खींच
लेते तो भी मुझे इतना दुख न होता।"
येसूबाई एक महीने में ही बच्चे को जन्म देने वाली थीं! उनके पेट का आकार
बहुत बढ़ गया था और शरीर शिथिलता आ गयी थी किन्तु ऐसे समय में भी अपने
100 · सम्भाजी

पुरुषार्थी पति को अपमान की आग में जलते देखकर उनका हृदय चूर चूर हो रहा
था। उनके महल की बगल में ही दुर्गाबाई का महल था। उन्होंने राणुबाई के सामने
अपनी सौत दुर्गाबाई को रात में बुलाया था।
उन्हें विश्वास में लेते हुए येसूबाई ने कहा, "दुर्गावती युवराज की मानसिक
अवस्था ठीक नहीं है। हमें उनको सँभालना चाहिए।" दुर्गाबाई ने चुपचाप अपना
हाथ उनके हाथ पर रख दिया।
एक बार सुपे के जाधवराव के घर शम्भूराजा को भोजन के लिए आमन्त्रित
किया गया था। उसी समय विशिष्ट अतिथियों को भोजन परोसने के लिए
जाधवराव की रूपवती कन्या दुर्गा सामने आयी थी। उसकी स्त्री सुलभ विनम्रता,
शालीन व्यवहार, मीठी वाणी आदि ने पहली नजर में ही शम्भूराजा को आकर्षित
कर लिया था। दुर्गा येसूबाई की भाँति लम्बी और गोरी नहीं थी। इसके विपरीत वे
कुछ नाटे कद की, थोड़ी मोटी किन्तु आकर्षक शरीर और सुन्दर तथा कोमल
कपोलों वाली लड़की थीं। उनकी आँखें येसूबाई जैसी बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी नहीं
थीं, किन्तु छोटी दिखने वाली उनकी आँखों में किसी को भी वशीभूत कर लेने
वाला विलक्षण जादू था।
दुर्गा के साथ एक-दो बार नजरें मिलीं और शम्भूराजा का सुपे और बारामती
की ओर आना-जाना बढ़ गया। शिकार के बहाने वे करहा नदी के किनारे-किनारे
सुपे के जाधवराव के घर पहुँच जाते थे। कुछ ही दिनों में शम्भूराजा की इस भेदभरी
यात्रा का पता चल गया। उन्होंने स्वयं ही अपने पतिदेव के लिए दुर्गाबाई का हाथ
माँग लिया। विवाह के बाद एक दिन दोपहरी में येसूबाई दुर्गा से मन्दिर में मिलीं।
दुर्गा के कोमल हाथों को अपने हाथों में लेते हुए येसूबाई ने कहा, "एक बात ध्यान
में रख ! तुम्हें इस राजमहल में यों ही नहीं लाया गया है। शम्भूराजा जैसा जलता-
धधकता अंगारा सँभालना मेरे अकेले के बस का नहीं है। इसीलिए तुम्हें अपनी बड़ी
बहन की सहायता के लिए मैं तुम्हें ले आयी हूँ।"
येसूबाई का स्वभाव अधिक बोलने वाला था किन्तु दुर्गाबाई शान्त स्वभाव की
और कम बोलने वाली थीं। येसूबाई ने उसे अपने समीप लाकर कहा, "दुर्गा ! इसके
बाद आने वाला समय तुम्हारे और मेरे लिए बहुत कठिन है। शरीर की शिथिलता
और पेट में आठ महीने का बच्चा ले युवराज के पीछे भागना मेरे लिए सम्भव नहीं
है। दुर्गा ! युवराज को सँभालोगी न ? करोगी न उनकी सहायता ?"
"दीदी हम आपकी आज्ञा के बाहर हैं क्या ?" दुर्गा ने कहा। एक रात
शम्भूराजा सारी रात लगातार कुछ लिखते हुए बैठे रहे। उन्होंने बिना किसी लिपिक
अथवा कवि कलश की सहायता लिए यह कार्य आरम्भ किया था। पलंग पर लेटी
येसूबाई की आँखें जड़ हो रही थीं। बीच-बीच में उनकी नींद उचट जाती थी, तब
सम्भाजी :: 101

वे युवराज को देखती थीं। युवराज अपनी मेज पर बैठे लगातार लिखते ही रहे। भोर
हो गयी। बगल के बरगद और पीपल के पेड़ों पर से चमगादड़ों की आवाजें आने
लगीं, तब जाकर शम्भूराजा उठे और बिस्तर पर निढाल होकर लेट गये। येसूबाई
अब पूरी तरह जग गयी थीं। उन्होंने मेज की ओर देखा। वहाँ चारों ओर बहुत से
कागज बिखरे पड़े थे।
येसूबाई धीरे-से उठीं। उन्होंने सामने देखा तो मेज पर एक शाही थैली
दिखाई पड़ी। उस पर लगी औरंगजेब की मुहर को येसूबाई ने तत्काल पहचाना।
उनका मन अनेक शंकाओं से घिर गया। उनसे उस थैली में आया समाचार बिना पढ़े
नहीं रहा गया। उसे पढ़ने के बाद उन्होंने जाना कि औरंगजेब का पुत्र शाहआलम
दक्खन का सूबेदार बनकर आया है। शाहआलम के हस्ताक्षर और मुहर के साथ
दिलेरखान ने शम्भूराजा के पास इस आशय का पत्र भेजा था कि यदि शम्भूराजा
मुगलों से जाकर मिलें तो उन्हें अभयदान दिया जाएगा। शम्भूराजा की भावी दिशा
येसूबाई की समझ में आ गयी। शम्भूराजा देर से सोकर उठे । येसूबाई आँसू भरी
आँखों से उनके चरणों में नत थीं। युवराज के पैरों को पकड़कर येसूबाई उपालम्भ के
स्वर में बोलीं, "दया करो युवराज ! इस तरह का गलत निर्णय न लें। आपके जाने
से शत्रु के महल पर विजय का ध्वज चढ़ेगा। राज्य कर्मचारियों से नाराज होकर
शिवाजी महाराज के स्वराज्य का गला मत घोंटो युवराज।"
"आपको क्या पता युवराज्ञी ? हम मूर्ख ही ठहराये जा रहे हैं। वहाँ पन्हाला
पर पक्का निर्णय हो चुका है, बारा भावल और रायगढ़ का राज्य राजाराम को
मिलेगा और हम जिंजी की ओर चलते बनेंगे।"
येसूबाई ने अपनी आँखों को आँचल से पोंछ लिया। युवराज की आँखों में
आँखें डालते हुए उन्होंने सीधा प्रश्न किया— "राज्य गया तो गया किन्तु युवराज!
आप जैसे संस्कृत विद्वान, तलवार वीर और कवि हृदय विवेकी पुरुष को राज्य और
सत्ता का लोभ कब से सताने लगा ? युवराज ! एक ओर विशाल साम्राज्य और दूसरी
ओर शिवाजी महाराज जैसा पिता इनमें से आप किसको चुनेंगे ?"
"इस प्रश्न का उत्तर आपको पता है। इसलिए उसी प्रश्न को बार-बार पूछने
का पागलपन मत करो। येसूराणी आपको यह भी पता है कि शिवाजी महाराज के
बिना, उनके सपनों के बिना, यह संभाजी एक पल भी नहीं जी सकता। परन्तु जिस
महाराज के हृदय में सारी दुनिया के लिए इतनी ममता है उसी के हृदय में आज इस
शम्भू के लिए दया और ममता का एक कण भी शेष नहीं है? ऐसा क्यों है?"
येसूबाई मौन हो गयीं। युवराज का असह्य दुख देखकर उनकी आँखों से आँसू
भी पलायन कर गये।
उसी रात में येसूबाई को तीव्र ज्वर चढ़ गया। वैद्यराज ने काढ़ा बनाया।
102 :: सम्भाजी

युवराज ने अपने हाथ से काढ़े का प्याला येसूबाई के होठों से लगाया। उनके ज्वर
का सही कारण युवराज को ज्ञात था। अस्वस्थ येसू के चेहरे पर हल्के हाथ फेरते हुए
उन्होंने कहा, "डरो मत! अधिक सोचकर अपनी जान संकट में मत डालो, इतना
कष्ट न उठाओ। मान लो कल को हम मुगलों से जाकर मिलें भी तो कौन-सा
आसमान टूट पड़ने वाला है? इससे पहले स्वयं पिताजी ने हमारी छोटी उँगलियाँ
पकड़कर मुगलों का शामियाना हमें नहीं दिखाया था क्या? दो बार मुगलों की
अच्छी भली मनसबदारी की है, हमने।"
येसूबाई किसी तरह मुस्कराते हुए बोलीं, "उस समय आपका जाना ससुर जी
की राजनीति का एक हिस्सा था।"
किन्तु अब भी हमें और कितना शान्त बैठना चाहिए? इन राज्य कर्मचारियों
को लगता है कि शम्भू की गर्दन में रीढ़ की हड्डी नहीं है, सीने में आग नहीं है।
येसू अब हमें एक ही उपाय सूझता है। अपने अपमान को मिटाने के लिए, बाहर
यश कमाकर पिताजी के सामने सिर ऊँचा करके खड़े होने के लिए हम भी थोड़ा
खेल खेलें।
शम्भुराजा की बातें सुनकर भी येसूबाई का भ्रम दूर नहीं हुआ। इसलिए
संभाजी राजा उन्हें समझाते हुए बोले, "फिलहाल तो कुछ समय के लिए हम भी
मधुर भाव से शत्रु से मिलेंगे और समय आने पर पेट फाड़कर बाहर निकल
आएँगे।"
"युवराज, दिलेरखान कोई मछली नहीं पूरा मगरमच्छ है।"
"यह बालक भी नासमझ बच्चा नहीं है। यह शिवाजी महाराज का बेटा है,
मुगलों का काल बनने वाला है।"
युवराज और युवराज्ञी सारी रात जागते रहे। येसूबाई की राय थी कि युवराज
को मुगलों के पास जाना ही नहीं चाहिए। येसूबाई का मुरझाया चेहरा, चढ़ता हुआ
ज्वर, धीरे से निकलने वाला स्वर आदि शम्भुराजा के सबल पावों में ममता की
जंजीर डाल रहे थे। उसे तोड़कर बाहर निकलने के लिए शम्भुराजा छटपटा रहे थे।
अन्त में येसूबाई ने अपने मातृत्व, स्त्रीत्व और मैत्रीभाव की शक्ति को एकत्र की।
शम्भुराजा का हाथ अपने सीने पर रखते हुए बोलीं, "युवराज! अपनी नित्य सहचरी
को एक वचन दोगे?"
"बोलो।"
"पहले महाराज की आज्ञानुसार सज्जनगढ़ जाएँगे। स्वामी रामदास का
कृपाप्रसाद लेकर ही आगे जाएँगे?"
"हाँ! दिया वचन।"
सम्भाजी :: 103

तीन
शृंगारपुर के बाहर का शिवमन्दिर प्रातःकाल ही शम्भूराजा के संगी-साथियों से
खचाखच भर गया था। आसपास में घने बादल छाये थे। नयी ऊर्जा और नये धैर्य से
मार्ग पर निकलना था। शम्भूराजा ने महादेव का अभिषेक आरम्भ किया था। अनेक
शास्त्री पंडित बिना कुर्ता पहने शिवालय के गर्भगृह में उपस्थित थे। एक घंटे में
अभिषेक पूर्ण हो गया। काले बादल भी छँट गये थे और सफेद बादल बाहर आ गये
थे। दीवान सरदार विट्ठलराव मन्दिर से बाहर निकले। अब गर्भगृह में केवल
शम्भूराजा और कवि कलश ही खड़े थे। कवि कलश से नहीं रहा गया, उन्होंने
कहा, "राजन् आगरा-मथुरा से लेकर आजतक हम आपकी छाया बने रहे हैं। यह
मानकर कि आप ही हमारे घर बार और वतन हैं, आपके पीछे-पीछे घूमते रहे हैं।"
शम्भूराजा कवि कलश की ओर देखकर मन्द मन्द मुस्कराये। उन्होंने कहा,
"मुझे अकेले ही जाने दीजिए। यदि आप हमारे साथ आये तो जानते हैं कि ये
जहरीली जुबान वाले राज्याधिकारी चिल्ला-चिल्लाकर क्या कहेंगे? दुष्ट दगाबाज
कवि कलश ने ही सारी गड़बड़ी की है। पागल शम्भू को तन्त्र मन्त्र करके मुगलों
के झुंड में खींच ले गया।"
कलश खिन्नता से हँसे। शम्भूराजा की जुदाई का दुख उनके चेहरे से हट नहीं
रहा था! उनका धैर्य बँधाते हुए शम्भूराजा ने कहा, "यदि आप यहाँ रहेंगे तो हमारे
जाने के बाद भी शत्रुओं को आपकी दहशत बनी रहेगी। वहाँ मुझ पर कोई विपत्ति
आयी तो आपको बुला तो सकेंगे।"
"राजन् आपकी जो आज्ञा।" कवि कलश ने कहा, "किन्तु युवराज आपके
जाने के बाद भी धूर्त प्रवृत्ति शान्त नहीं रहेगी। महाराज से सीधे शिकायत करके हमें
भी निष्कासित करवाने का आग्रह करेंगे। ये लोग कैसी भी शिकायत करते हैं। कहते
हैं, हम भैंसे की खाल पर बैठकर साधना करते हैं।"
"ऐसे आरोप केवल अधिक चालाक बनने वाले लोग ही कर सकते हैं। भैंस
की खाल कितनी मोटी होती है? उसे काटने और बिछाने के लिए कितने लोग
लगते हैं? इसका ज्ञान क्या इन महानुभावों को है?" कविराज को धीरज देते हुए
शम्भूराजा ने कहा, "आपकी बुद्धिमत्ता और मेरे ऊपर आपकी निष्ठा महाराज को
भली-भाँति मालूम है। जैसा हमारे शत्रु कहते हैं वैसे यदि आप होते और पिताजी
104 :: सम्भाजी

को मालूम पड़ता कि उनका पुत्र सचमुच एक ढोंगी तान्त्रिक के जाल में फँस गया है
तो आपको कब का निकाल फेंक दिया होता, कविराज। "
कवि कलश कुछ अधिक नहीं बोल पाये। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में
लेकर इतना ही कहा, "राजन् अपने आपको सँभालें।"
दोपहर के समय काली घटाएँ घिर आयी थीं। श्रृंगारपुर पर उनकी छाया पड़
रही थी। अपने ढाई हजार घुड़सवारों के साथ संभाजी सज्जनगढ़ की ओर निकल
रहे थे। उन्हें और राणूबाई तथा दुर्गाबाई को बिदा करने के लिए आधा शहर सीमा के
पास जमा हो गया था। बिदाई के समय कवि कलश का गला भर आया था। येसूबाई
को लेकर आयी पालकी एक विशाल जामुन के पेड़ के नीचे रुकी थी। येसूबाई का
चेहरा सूज गया था। आँखें एकदम उतर आयी थीं। उनका चेहरा आसमान के
बादलों की तरह दुख से भर गया था। उनकी आँखों से आँसू बरसने लगे। आँखों
का काजल गोरे कपोलों पर उतर आया। शम्भूराजा ने अपने उत्तरीय से उनके आँसू
पोंछने का प्रयास किया।
येसूबाई और दुर्गाबाई राणूबाई के पास गयीं। राणूबाई ने दुर्गाबाई की पीठ पर
हाथ फेरते हुए धीमी आवाज में बोली, "सँभालो।" शम्भूराजा ने राणूबाई से बार-
बार आग्रह किया कि वे येसूबाई के साथ रहें। किन्तु राणूबाई ने कहा, "शम्भूराजा मैं
आपको सज्जनगढ़ में स्वामी जी के दरवाजे पर पहुँचा दूँगी और वहीं से वाई चली
जाऊँगी।"
शम्भूराजा को कुछ उदास देखकर, येसूबाई उन्हें सान्त्वना देते हुए बोली—
"मुझे विश्वास है युवराज, आपको सज्जनगढ़ पर स्वामी जी मिलेंगे। मन का
सारा भ्रम दूर हो जाएगा। ये दिन भी बीत जाएँगे।"
"युवराज्ञी अब आप भी श्रृंगारपुर में नहीं रहिए।"
"तो फिर?"
"शीघ्र ही पन्हाला पहुँचिए।"
"पन्हाला? वह क्यों?" येसूबाई ने आश्चर्य से पूछा।
"आपको पता नहीं है क्या? हमारे पिताजी बहुत थक गये हैं। बहुत बुड्ढे
दिखाई देने लगे हैं। उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए अपने घर का कोई उनके
निकट नहीं होना चाहिए क्या?" संभाजी राजा ने कहा। यह सुनकर येसूबाई की
आँखों से आँसू अपने आप सूख गये। पति के ऊपर अभिमान के कारण उनका सिर
ऊँचा हो गया।
सम्भाजी .: 105

चार
अपमान और अवहेलना का अंगार कितना दाहक होता है, इसकी कल्पना कोई
भावुक और स्वाभिमानी व्यक्ति ही कर सकता है। संभाजी राजा अपने सैनिकों के
साथ सज्जनगढ़ के दरवाजे के पास पहुँचे तो अत्यधिक विचार मंथन के कारण
उनका सिर दुखने लगा था। ऐसे सिरदर्द की दवा यही है कि या तो गैंडे की तरह
पत्थर पर सिर पटक-पटक कर हमेशा के लिए शान्त हो जाना या तुकाराम अथवा
स्वामी रामदास जैसे किसी सन्त के चरणों में मत्था टेककर उनके ज्ञान के कुएँ से
अमृत पान करना और उसी आधार पर जीवन की सफलता को ढूँढ़ना।
किन्तु आजकल युवराज जहाँ भी जाते थे, दुर्दैव की अघोरी छायाएँ उनका
पीछा करती रहती थीं। जिस दिन युवराज सज्जनगढ़ पहुँचे उससे ठीक एक दिन
पहले स्वामी जी कोल्हापुर की ओर निकल गये थे और पन्द्रह दिन तक उनके
लौटने की सम्भावना नहीं थी।
येसूबाई के न रहने पर दुर्गाबाई युवराज की देखभाल कर रहीं थीं। राणूबाई
युवराज को यही समझाने का बार-बार प्रयत्न कर रही थीं कि आज नहीं तो कल
सारी उलझनें अपने आप सुलझ जाएँगी। इसलिए युवराज को धैर्य नहीं छोड़ना
चाहिए। शम्भूराजा भी सज्जनगढ़ पर अपना मन बहलाने का प्रयास कर रहे थे।
उन्होंने गढ़ के एक छोर पर स्थित अन्न मारुति के दर्शन किये। अपने पीछे लगे सारे
संकट दूर हो जायें इसके लिए वे मारुति और शनिदेव की उपासना कर रहे थे।
अनेक बार अपने रक्षकों की एक टुकड़ी लेकर वे बाहर निकलते थे। कभी वे
डोरकटी पतंग की भाँति गढ़ के आसपास घूमते थे तो कभी रामगढ़ी के पास जाकर
ध्यानस्थ हो जाते थे। आकाश में सफेद बादलों को देखकर उन्हें येसूबाई और
कविकलेश की बहुत याद आती थी।
एक दिन सन्ध्या काल लिम्ब गाँव का सदानन्द गोसावी दौड़ता हुआ युवराज
के पास आया। उसने अपने मठ की बन्द की गयी वृत्ति को फिर से शुरू करने की
माँग की। युवराज ने दूसरे दिन उसका निर्णय करने का निश्चय किया। उस रात
शम्भूराजा का मन बहुत आश्वस्त और शान्त था। बहुत दिनों के बाद राज्य के
कार्यव्यापार में ध्यान देने का उन्हें अवसर मिला था। दुर्गाबाई और राणूबाई के साथ
चर्चा करते हुए बड़े महाराज का प्रसंग आ गया। शम्भूराजा की मुखमुद्रा विषादग्रस्त
हो गयी। यह देखकर राणूबाई ने पूछा, "शम्भूराजा! कितना गुस्सा करोगे हमारे
पिताजी पर?"
106 :: सम्भाजी

"पिताजी को कर्नाटक से आये कितने दिन हो गये? इसका विचार आप
लोगों ने किया?"
"कितने दिन?"
"वे गर्मियों में चैत्र के महीने में स्वराज्य में लौटे। इस बात को एक दो नहीं
छः महीने हो गये। आज मेरी उम्र बीस वर्ष है। इतने बड़े और समझदार पुत्र को
उसका पिता छः-छः महीने तक नहीं मिल पा रहा है। वे मिलने के लिए सन्देश
तक नहीं भेजते। मैंने स्वयं मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उसका उत्तर तक नहीं
मिलता। राणू दीदी, दुर्गाबाई आप ही बताएँ कि इस संभाजी ने ऐसा कौन सा पाप
किया है? सारी दुनिया के लिए नदी की तरह अविरल भाव से प्रवाहित होने वाला
आपके शिवाजी महाराज का हृदय अपने स्वयं के बेटे के लिए इतना शुष्क क्यों रहता
है? आखिर यह संभाजी कोई भावनाहीन नींव का मौन पत्थर तो नहीं है।"
जिस प्रकार आकाश में गर्जन तर्जन के साथ बादल एकत्र होते हैं और तड़पते
हुए वर्षा के पानी की मसक खाली करके नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार शम्भुराजा
बहुत देर तक छटपटाते हुए लेटे रहे। दूसरे दिन लिम्ब गाँव के गोसावी के साथ पूरी
पूछ ताछ करने के बाद उन्होंने कहा, "आप पर अन्याय हुआ है, यह स्पष्ट दिख
रहा है। किन्तु इस सम्बन्ध में सरकारी अधिकारी होने के नाते अण्णाजी दत्तो को ही
आदेश देना चाहिए। मैं आज ही उन्हें सन्देश भेज देता हूँ।"
सदानन्द गोसावी का चेहरा उतर गया। घुटनों के बल उठते हुए उसने बड़ी
व्यग्रता से अभिवादन करते हुए कहा, "युवराज! ऐसा अधूरा न्याय न करें। आप
अपनी मुहर लगाकर, कागज़ बनाकर देने की कृपा करें।"
"देखो गोसावी, पिताजी के कार्यव्यापार में हम व्यतिक्रम कैसे पैदा कर
सकेंगे? सरकारी मुहर लगे कागज आपको अण्णाजी दत्तो के पास से ही मिलेंगे।
आप चिन्ता न करें। अण्णाजी दत्तो को हम आज ही सन्देश भेज देते हैं। चार पाँच
दिन बाद आप उनसे जाकर मिल लें।"
"जैसी आज्ञा।" कहते हुए गोसावी सिर हिलाकर बाहर निकल गये। चार
सप्ताह और बीत गये। समर्थ रामदास स्वामी अभी तक गढ़ पर नहीं लौटे। उनके
पट्ट शिष्य से और किले के अधिकारी बासुदेव बालकृष्ण तथा कृष्णाजी भास्कर से
युवराज बार बार पूछ रहे थे कि स्वामी जी कब आएँगे? उन्हें उत्तर मिलता था कि
स्वामीजी कोल्हापुर और बेलगाँव में ही अटके पड़े हैं। परली और सज्जनगढ़ के
परिसर में घूम-घूमकर युवराज ऊब गये थे।
एक महीने के बाद गोसावी फिर आये। युवराज ने उन्हें देखते ही पूछा,
"मिल गये कागज?"
सम्भाजी • 107

"कैसे मिलेंगे?" सदानन्द गोसावी संतप्त होकर बोले, "युवराज, आपके
आदेशानुसार तीन हफ्ते तक रायगढ़ की बाहरी सीढ़ियाँ बैठे-बैठे घिस गयीं।
अण्णाजी और राहुजी की टालने वाली और उपहास करने वाली नजरों को देखते
देखते ऊब गया। अन्त में हिम्मत करके अण्णाजी से पूछ लिया—"पन्त सच्चाई
क्या है? हमें बता दीजिए।" तब अण्णाजी ने कहा, "हमारा राजा आजकल
पन्हालगढ़ पर रहता है, सज्जनगढ़ पर नहीं।" जब दुखी होकर गढ़ से उतरने लगा
तो लोगों की चर्चा सुनकर बात समझ में आयी।
"कैसी चर्चा ?"
"लोग कह रहे थे महाराज की पहले जैसी कृपा आप पर नहीं है। इसलिए
आपके द्वारा दिये गए न्याय का कोई अर्थ नहीं है। आपके आदेश का कार्यान्वयन तो दूर
आपके द्वारा दिये कागज़ को हाथ लगाने का कष्ट भी अधिकारी नहीं उठाना
चाहते।"
बात करते-करते सदानन्द गोसावी जलती तीली को घास की गट्टी में फेंककर
चले गये और आग भड़कती गयी। शम्भुराजा का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।
उनकी आँखों में खून उतर आया। कनिष्ठ श्रेणी के कर्मचारियों को शम्भुराजा ने
बैठक से बाहर जाने को कहा। किले के अधिकारी वासुदेव बालकृष्ण की ओर
अपनी सन्तप्त दृष्टि घुमाई। वासुदेव बालकृष्ण हड़बड़ा गये। उन्होंने युवराज के
सामने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "महाराज उस गोसावी का कहना बिलकुल
झूठ नहीं था। ऊपर से आदेश दिया गया है कि युवराज द्वारा दिये गए आदेशों और
निर्णयों को जहाँ तक सम्भव हो टाला जाए।"
"लिखित ?"
"लिखित नहीं, मौखिक।"
"पन्हाला से? पिताजी का आदेश?"
"वहाँ से नहीं, रायगढ़ से, राहुजी सोमनाथ और अन्य लोगों से।"
"उसके ऊपर आपने क्या निर्णय लिया?"
"सरकार हम आपके नौकर हैं। जब रायगढ़ से मौखिक आदेश आया तो
उसके स्पष्टीकरण के लिए हमने महाराज के पास पन्हालगढ़ दूत भेजे। किन्तु चार
दिन वहाँ रहने के बाद भी दूत को महाराज से कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। आप ही
बताएँ हम सेवक लोग इसका क्या अर्थ समझें?"
शम्भुराजा उदासी से हँसे। कर्मचारियों के सामने वे कुछ बोले नहीं। किन्तु
वहाँ उनका रहना अब कठिन हो गया। वे दुर्गाबाई और राणूबाई से बोले, "कर्नाटक
से लौटे लगभग आठ महीने बीत गये। पिताजी हमें मिले नहीं। यहाँ सज्जनगढ़ पर
108 :: सम्भाजी