छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 109, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें"पिताजी को कर्नाटक से आये कितने दिन हो गये? इसका विचार आप
लोगों ने किया?"
"कितने दिन?"
"वे गर्मियों में चैत्र के महीने में स्वराज्य में लौटे। इस बात को एक दो नहीं
छः महीने हो गये। आज मेरी उम्र बीस वर्ष है। इतने बड़े और समझदार पुत्र को
उसका पिता छः-छः महीने तक नहीं मिल पा रहा है। वे मिलने के लिए सन्देश
तक नहीं भेजते। मैंने स्वयं मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उसका उत्तर तक नहीं
मिलता। राणू दीदी, दुर्गाबाई आप ही बताएँ कि इस संभाजी ने ऐसा कौन सा पाप
किया है? सारी दुनिया के लिए नदी की तरह अविरल भाव से प्रवाहित होने वाला
आपके शिवाजी महाराज का हृदय अपने स्वयं के बेटे के लिए इतना शुष्क क्यों रहता
है? आखिर यह संभाजी कोई भावनाहीन नींव का मौन पत्थर तो नहीं है।"
जिस प्रकार आकाश में गर्जन तर्जन के साथ बादल एकत्र होते हैं और तड़पते
हुए वर्षा के पानी की मसक खाली करके नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार शम्भुराजा
बहुत देर तक छटपटाते हुए लेटे रहे। दूसरे दिन लिम्ब गाँव के गोसावी के साथ पूरी
पूछ ताछ करने के बाद उन्होंने कहा, "आप पर अन्याय हुआ है, यह स्पष्ट दिख
रहा है। किन्तु इस सम्बन्ध में सरकारी अधिकारी होने के नाते अण्णाजी दत्तो को ही
आदेश देना चाहिए। मैं आज ही उन्हें सन्देश भेज देता हूँ।"
सदानन्द गोसावी का चेहरा उतर गया। घुटनों के बल उठते हुए उसने बड़ी
व्यग्रता से अभिवादन करते हुए कहा, "युवराज! ऐसा अधूरा न्याय न करें। आप
अपनी मुहर लगाकर, कागज़ बनाकर देने की कृपा करें।"
"देखो गोसावी, पिताजी के कार्यव्यापार में हम व्यतिक्रम कैसे पैदा कर
सकेंगे? सरकारी मुहर लगे कागज आपको अण्णाजी दत्तो के पास से ही मिलेंगे।
आप चिन्ता न करें। अण्णाजी दत्तो को हम आज ही सन्देश भेज देते हैं। चार पाँच
दिन बाद आप उनसे जाकर मिल लें।"
"जैसी आज्ञा।" कहते हुए गोसावी सिर हिलाकर बाहर निकल गये। चार
सप्ताह और बीत गये। समर्थ रामदास स्वामी अभी तक गढ़ पर नहीं लौटे। उनके
पट्ट शिष्य से और किले के अधिकारी बासुदेव बालकृष्ण तथा कृष्णाजी भास्कर से
युवराज बार बार पूछ रहे थे कि स्वामी जी कब आएँगे? उन्हें उत्तर मिलता था कि
स्वामीजी कोल्हापुर और बेलगाँव में ही अटके पड़े हैं। परली और सज्जनगढ़ के
परिसर में घूम-घूमकर युवराज ऊब गये थे।
एक महीने के बाद गोसावी फिर आये। युवराज ने उन्हें देखते ही पूछा,
"मिल गये कागज?"
सम्भाजी • 107