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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 793 में से

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पृष्ठ 104

वे युवराज को देखती थीं। युवराज अपनी मेज पर बैठे लगातार लिखते ही रहे। भोर
हो गयी। बगल के बरगद और पीपल के पेड़ों पर से चमगादड़ों की आवाजें आने
लगीं, तब जाकर शम्भूराजा उठे और बिस्तर पर निढाल होकर लेट गये। येसूबाई
अब पूरी तरह जग गयी थीं। उन्होंने मेज की ओर देखा। वहाँ चारों ओर बहुत से
कागज बिखरे पड़े थे।
येसूबाई धीरे-से उठीं। उन्होंने सामने देखा तो मेज पर एक शाही थैली
दिखाई पड़ी। उस पर लगी औरंगजेब की मुहर को येसूबाई ने तत्काल पहचाना।
उनका मन अनेक शंकाओं से घिर गया। उनसे उस थैली में आया समाचार बिना पढ़े
नहीं रहा गया। उसे पढ़ने के बाद उन्होंने जाना कि औरंगजेब का पुत्र शाहआलम
दक्खन का सूबेदार बनकर आया है। शाहआलम के हस्ताक्षर और मुहर के साथ
दिलेरखान ने शम्भूराजा के पास इस आशय का पत्र भेजा था कि यदि शम्भूराजा
मुगलों से जाकर मिलें तो उन्हें अभयदान दिया जाएगा। शम्भूराजा की भावी दिशा
येसूबाई की समझ में आ गयी। शम्भूराजा देर से सोकर उठे । येसूबाई आँसू भरी
आँखों से उनके चरणों में नत थीं। युवराज के पैरों को पकड़कर येसूबाई उपालम्भ के
स्वर में बोलीं, "दया करो युवराज ! इस तरह का गलत निर्णय न लें। आपके जाने
से शत्रु के महल पर विजय का ध्वज चढ़ेगा। राज्य कर्मचारियों से नाराज होकर
शिवाजी महाराज के स्वराज्य का गला मत घोंटो युवराज।"
"आपको क्या पता युवराज्ञी ? हम मूर्ख ही ठहराये जा रहे हैं। वहाँ पन्हाला
पर पक्का निर्णय हो चुका है, बारा भावल और रायगढ़ का राज्य राजाराम को
मिलेगा और हम जिंजी की ओर चलते बनेंगे।"
येसूबाई ने अपनी आँखों को आँचल से पोंछ लिया। युवराज की आँखों में
आँखें डालते हुए उन्होंने सीधा प्रश्न किया— "राज्य गया तो गया किन्तु युवराज!
आप जैसे संस्कृत विद्वान, तलवार वीर और कवि हृदय विवेकी पुरुष को राज्य और
सत्ता का लोभ कब से सताने लगा ? युवराज ! एक ओर विशाल साम्राज्य और दूसरी
ओर शिवाजी महाराज जैसा पिता इनमें से आप किसको चुनेंगे ?"
"इस प्रश्न का उत्तर आपको पता है। इसलिए उसी प्रश्न को बार-बार पूछने
का पागलपन मत करो। येसूराणी आपको यह भी पता है कि शिवाजी महाराज के
बिना, उनके सपनों के बिना, यह संभाजी एक पल भी नहीं जी सकता। परन्तु जिस
महाराज के हृदय में सारी दुनिया के लिए इतनी ममता है उसी के हृदय में आज इस
शम्भू के लिए दया और ममता का एक कण भी शेष नहीं है? ऐसा क्यों है?"
येसूबाई मौन हो गयीं। युवराज का असह्य दुख देखकर उनकी आँखों से आँसू
भी पलायन कर गये।
उसी रात में येसूबाई को तीव्र ज्वर चढ़ गया। वैद्यराज ने काढ़ा बनाया।
102 :: सम्भाजी