छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
रायगढ़ तक नहीं पहुँच पाती थी। हरकारों के मार्ग अवरुद्ध हो गये थे। सम्भवतः
परिवर्तित वातावरण के कारण ही कुछ खानदानी मराठे भी मुगलों से हाथ मिला रहे
थे। यह बीमारी सुपे और पुणे प्रदेशों में सर्वाधिक फैल रही थी।
मुगलों के साथ होने वाली अन्तिम लड़ाई की गन्ध, फौज को, जंगलों को
और पराक्रमी पुरुषों को लग चुकी थी। आज कवि कलश की गौर मुखमुद्रा अत्यन्त
तेजस्वी लग रही थी। उनकी ओर हाथ से संकेत करते हुए शम्भुराजा ने कहा,
"कविराज पन्हाला और विशालगढ़ का जंगली इलाका, हमारे राज्य की बलिष्ठ
भुजाएँ हैं। आप उस ओर पूरी तरह सावधान रहें। जागरूक पहरे रखें।"
"राजन! आप निश्चिन्त रहें। कड़वी और शहाली जैसी जंगली नदियों के
जल से जिनका पालन-पोषण हुआ है, उन घोड़ों ने कभी पराजय का मुँह नहीं देखा
है। मलकापुर की घुड़साल तो हमारी शक्ति है ही। किन्तु - " कहते-कहते
कविराज ने अपने लम्बे बालों की गाँठ बाँधी। अपनी गिरती मूँछों पर हाथ रखते हुए
कवि कलश बोले, "राजन! आपकी संगति में काव्यानन्द की धुन में मैंने सरस्वती
का मन्दिर महका दिया था। राजन! आपके साथ जीने में मुझे सदैव ही आनन्द आया
है। आपके लिए मरने में भी मुझे स्वर्ग सा आनन्द आएगा। औरंग्या से दो दो हाथ
करेंगे। राजन! हमारे बनारस की ओर एक कहावत कही जाती है, "बिगड़ा हुआ
ब्राह्मण, भगवान के भी होश उड़ा देता है। फिर राजन! यह बादशाह यह
बादशाह किस खेत की मूली?"
बादशाह के आक्रमण का स्वरूप क्या होगा? उसके सबल पक्ष कौन कौन से
हैं। उसकी कमजोरियाँ कौन सी हैं? आदि बातों पर विस्तार से चर्चा हो रही थी।
युद्ध का कच्चा नक्शा सामने रखा गया था। कवि कलश और शम्भू महाराज प्रत्येक
चौकी का गम्भीरता से विचार कर रहे थे। शम्भू महाराज की नींद न पूरी होने के
कारण लाल आँखें पश्चिमी किनारे की जाँच कर रही थीं। महाराज ने कहा,
"हमारी पहले की सूझ बूझ अच्छी ही रही। बादशाह के यहाँ पहुँचने के पहले ही
हमने पुर्तगालियों और सिद्दियों को रौंद दिया। यही कारण था कि पिछले छह
सात वर्षों में बादशाह के दक्षिण में स्वयं उपस्थित रहने पर भी न तो पुर्तगाली आँख
उठा सके और न सिद्दी ही जंजीरे की बिल से बाहर निकल सके। किन्तु अब
स्थितियाँ बदल गयी हैं। मुझे लगता है कि इस अन्तिम और निर्णायक संग्राम में
बादशाह, जंजीरे के सिद्दियों और गोवा के पुर्तगालियों को बिना अपने साथ लिये
नहीं रहेगा। इसलिए सिद्दियों और पुर्तगालियों के पैर तोड़कर, उन्हीं के क्षेत्र में
पीछे धकेल देना हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।"
राजा के सुझाव से सभी लोग विचार मग्न हो गये। शम्भू महाराज ने रेख
उठान वाले तरुण धनाजी की ओर संकेत किया। धनाजी जाधव तत्काल उठकर खड़े
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हो गये और महाराज के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। महाराज ने कहा, "धनाजी,
रत्नागिरि की चौकी पर आपको पैर गड़ाकर खड़ा रहना होगा। औरंगजेब की
सहायता से फिरंगियों का आक्रमण उस ओर से होने की आशंका है। हमारे सगे
रिश्तेदार, सावन्तवाड़ी वाले महादजी खेगमावन्त के साथ औरंगजेब से मिल गये
हैं। गोवा और सावन्तवाड़ी की सेनाएँ एक साथ मिलकर युद्ध में उतर सकती हैं।"
शम्भुराजा ने एक बार पुनः धनाजी की ओर देखा। तब धनाजी मुस्कराकर
बोले, "महाराज ! कनखजूरे के चाहे कितने ही पैर हो जायें, यदि एक बार उसकी
कमर कुचल दी जाये तो वह समाप्त हो जाता है। आपने मुझ पर जो दायित्व सौंपा
है उसे हम निश्चित रूप से पूरा करेंगे।"
महाराज ने सन्ताजी घोडपड़े को अपने पास बुला लिया। नक्शे पर
हरिहरेश्वर, दंडाराजपुरी, चौल से पनवेल तक का प्रदेश और पश्चिमी किनारे के
सारे बन्दरगाह और खाड़ियाँ उन्हें दिखाई। फिर महाराज ने ललकारते हुए कहा,
"संतोबा, आप पर हमारा अटूट विश्वास है। अभी-अभी आप जिंजी तक दौड़
लगाकर लौटे हैं। जंजीरा के मगरमच्छों की दुबारा याद दिलाने की आवश्यकता नहीं
है। सिद्दी बहुत बड़ा लुच्चा है। वह ऐन मौके पर धोखा करेगा। इसलिए आप
हरिहरेश्वर से पनवेल तक निरन्तर दौड़ लगाते रहें।"
सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। वे अपने तरुण
पुत्र को आनन्दविभोर होकर देख रहे थे। सन्ताजी ने येसूबाई, अपने पिता म्हालोजी
और खंडो बल्लाल की ओर दृष्टिपात करते हुए शम्भू महाराज से कहा, "महाराज !
सागर के इस किनारे की ओर से तो आप निश्चिन्त हो जाइये। आपने मुझ जैसे
नवयुवक पर विश्वास करके यह दायित्व सौंपा है। मैं स्वयं को धन्य अनुभव कर
रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि दंडाराजपुरी के जंगलों में घोड़ा कुदाते हुए मुझे
कोंडाजी बाबा की आत्मा मिलेगी। जहाँ कहीं भी हम भटकेंगे, कोंडाजी बाबा
हमारा मार्ग-दर्शन करेंगे। इतना अवश्य कहूँगा, महाराज ! कि आज इस सभा में बैठे
खंडो बल्लालजी से मुझे ईर्ष्या हो रही है।"
सन्ताजी की बात को सुनकर सभी लोग उनकी ओर आश्चर्य से देखने लगे।
सन्ताजी ने ही कहना आरम्भ किया, "महाराज खंडो बल्लाल भी मेरी ही उम्र के
हैं। गोवा की लड़ाई जब सागर की तूफानी लहरें बहाये लिये जा रही थीं तब इन्हीं
खंडोबा ने पानी में छलाँग लगाकर आपके प्राणों की रक्षा की थी! यदि कल यहाँ
आग का दरिया बहने लग जाये और उस उमड़ती आग में कूदकर मैं आपकी
थोड़ी-सी भी सहायता कर सकूँ तो अपना जन्म सार्थक मानूँगा।"
धनाजी और सन्ताजी के उद्गारों से विचार-विमर्श के लिए बैठे सभी लोगों
में उत्साह आ गया।
सम्भाजा [641]
सुदूर तमिलों के प्रदेश जिंजी में केसो त्रिमल के पास सात-आठ हजार की
सेना थी। उस पर भी विचार किया गया। म्हालोजी घोडपड़े ने कहा, "उस ओर
जब तक केसो पन्त की सुसज्ज सेना का दबाव बना रहेगा तब तक हरजी महाड़िक
की स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं को बढ़ने का अवकाश नहीं मिलेगा। उन्हें अपनी जगह
पर ही रुका रहना होगा।"
महारानी येसूबाई और खंडो बल्लाल ने अपना हिसाब-किताब बैठक के
सामने प्रस्तुत किया। प्रत्येक किले पर कितने गोले-बारूद और कितने हीरे-
जवाहरात हैं? प्रत्येक क्षेत्र में कितनी सेना है? जंगलों, पहाड़ों और घाटियों में
कितनी चौकियाँ हैं और उन पर पहरे की कैसी व्यवस्था है? प्रत्येक किले में कितने
अनाज का भंडार है? यदि आसन्न युद्ध तीन वर्ष तक चलता रहे तो किस किले पर
कितने दिन का अनाज कम पड़ेगा? आवश्यकता पड़ने पर रसद किस क्षेत्र से ले
आयी जा सकती है? इस प्रकार के विषयों पर विस्तृत चर्चा हो रही थी। यद्यपि यह
सारा विवरण लिखित में रखा गया था, किन्तु महारानी येसूबाई और खंडो बल्लाल
को सबको जबानी याद था। शम्भूराजा चुप न रह सके। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा,
"महारानी येसूबाई! आप यह सारा हिसाब-किताब सँभालती हैं इसीलिए मुझ जैसे
सिपाही को रात-दिन युद्ध के मैदान में दौड़-धूप करने का अवसर मिलता है।"
शहजादा आजम अपनी बीस हजार की सेना के साथ चाकण के पास घेरा
डाले बैठा था। वह किसी भी समय कोंकण में उतर सकता है। इसके अतिरिक्त
फिरोजजंग सम्भवतः किसी बीच के रास्ते का फायदा उठाकर राजगढ़ में प्रवेश करने
की तैयारी कर रहा था। गुप्तचरों द्वारा इस प्रकार की खबरें मिल रही थीं। इन दोनों
मोर्चों पर किस प्रकार की तैयारी की जाय? इसका निर्देश भी महाराज ने दिया। इसी
बीच संगमेश्वर के सूबेदार एक हरकारे के साथ बैठक में प्रविष्ट हुए। घबराया हुआ
हरकारा बताने लगा, "महाराज इस खबर का पक्का प्रमाण तो नहीं है किन्तु बाहर
लोग इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि इस जंगल में महाराज के प्राणों को खतरा है।
इसलिए यहाँ से तत्काल कूच कर जाना ही उचित होगा।"
शम्भू महाराज क्षण भर के लिए चिन्तित दिखाई पड़े। उन्होंने तत्काल कहा,
"सच है, हमें यहाँ अधिक समय नहीं गँवाना चाहिए। बैठक समाप्त हो गयी है।
रात्रि-भोजन पूरा हो जाने के पश्चात् सभी को अपने-अपने कार्य पर चला जाना
है।"
उस गुप्तचर के आने के बाद बैठक में कुछ सुगबुगाहट आयी। उस समय
शम्भूराजा ने हँसते हुए कहा, "घबराने की कोई बात नहीं है। हमने यथायोग्य
सावधानी बरती है और आगे भी सावधान रहेंगे। इस प्रदेश के घनघोर जंगल में,
दिन में भी आवागमन करते समय शेर को भी पसीना छूट जाता है, सूर्य की किरणें
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भी जमीन पर पहुँचने के पहले पेड़ों की टहनियों पर झूलती लटकती हैं। नीचे
उतरने के लिए उनसे अनुमति माँगती हैं।" बोलते-बोलते शम्भूराजा रुक गये।
उनकी नजरें चौकन्नी होकर देखने लगीं। उन्होंने हरकारे से केवल एक प्रश्न पूछा,
"वह मुकर्रबखान कहाँ है?"
"कोल्हापुर के पास केला के पठार पर। कहते हैं कि उसे अचानक ठंडे
बुखार ने घेर लिया है। वह पिछले तीन दिनों से अपने डेरे से बाहर ही नहीं
निकला। इसकी मेरे पास पक्की खबर है।"
"और अपना मलकापुर का अश्वदल?" महाराज ने कवि कलश की ओर
मुड़ते हुए पूछा।
"महाराज! मलकापुर में केवल चार हजार घुड़सवार हैं। शेष छह हजार
अश्वदल आंबा घाटी के मुहाने पर और विशालगढ़ के रास्ते पर तैनात हैं।"
"कविराज!" महाराज ने आश्चर्यचकित होकर कहा।
कवि कलश ने कहा, "हाँ, राजन! विशालगढ़ की ढलान उतरने मे पहले ही
मैंने मलकापुर के लिए दूत भेज दिये थे। राजन! समय का कोई भरोसा नहीं होता।
प्रतिकूल समय कहकर नहीं आता। एक बार हवा के साथ भले ही खिलवाड़ कर लें
लेकिन समय के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।"
महाराज ने अपने आस पास मौजूद सेना का अन्दाजा लगाया। समीप ही
श्रृंगारपुर में पाँच हजार घोड़े तैयार खड़े थे। ऊपर प्रतीचगढ़ पर पाँच सौ सिपाहियों
का दल था। निवरे के रास्ते ऊपर जाने वाले और आगे कराड़ की ढलान पर मालेघाट
पर एक हजार सवारों का रात दिन सावधान पहरा था। यह मार्ग घनघोर और दुर्गम
जंगल से होकर जाता था। इस ओर से किसी के प्रवेश करने की सम्भावना नहीं थी।
दूसरी ओर गोवा मार्ग पर हातखंबे के पास दो हजार सिपाही पहरे पर तैनात थे।
इसके अतिरिक्त जयगढ़ और नावड़ी बन्दरगाह पर भी पहरा बैठाया गया था। कुल
मिलाकर थल अथवा जल मार्ग से किसी के भी संगमेश्वर पहुँचने की कोई
सम्भावना नहीं थी। फिर भी वहाँ से शीघ्र निकलकर राजगढ़ की ओर बढ़ना
महाराज को आवश्यक लग रहा था।
बड़े उत्साह से विचार विमर्श चल रहा था। देखते देखते सूर्यास्त हो गया।
संगमेश्वर के जंगल में अँधेरा गहराने लगा था। चर्चा के अधिकांश मुद्दे
समाप्त हो चुके थे। शम्भू महाराज ने अपने सभी साथियों को पान सुपारी भेंट की।
उन्होंने अपने महल से बाहर के अँधेरे की ओर देखा। हरी-भरी पर्वत-श्रेणियाँ
अन्धकार के गहवर में डूब चुकी थीं। नारियल, सुपारी एवं अन्य वृक्षों से हवा के
टकराने की ध्वनियाँ कानों में पड़ रही थीं। शम्भू महाराज ने बड़ी गम्भीर मुद्रा में
सभी की ओर देखा। उन्होंने आशा भरे स्वर में पूछा, "दोस्तो! क्या आपको लगता
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है कि भय के इस भयानक पर्वत को लाँघकर हम आगे बढ़ सकेंगे?''
"क्यों नहीं? क्यों नहीं महाराज?'- खंडो बल्लाल कहते हुए खड़े हो गये।
उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, "महाराज! आपने बहुत झेला और सहन
किया है। नासिक-वगलाण की ओर कुछ टूट-फूट हुई होगी। फिर भी आपने
सह्याद्रि पर्वत के बहुत से सशक्त किलों में से एक भी उस गीदड़ औरंगजेब के
क़ब्ज़े में नहीं जाने दिया। बड़े महाराज के जंगी बेड़े में से एक भी जहाज कम नहीं
होने दिया है। उल्टे आपने उनमें साठ-सत्तर जलपोतों की वृद्धि की है। हमारे पास
इतनी शक्ति है कि हम आने वाले पचास वर्षों तक उस पापी औरंगजेब के सेना-
समुद्र को पछाड़ते रहेंगे।"
उस महत्त्वपूर्ण बैठक के समाप्त होते-होते शाम घिर आयी। सन्ध्या समय
की ठंडी हवा चल रही थी। महल में चिरागों की लव फरफरा रही थी। मन्त्रणा
समाप्त हो जाने पर भी महाराज के पैर वहीं पर ठिठके हुए थे। आगे नहीं बढ़ रहे
थे। यह देखकर अन्य लोग भी वहीं पर खड़े हो गये।
महाराज ने गर्जना की, "दोस्तो! औरंगजेब जैसे कलिकाल का मुकाबला
करने के लिए मैंने हर सम्भव उपाय किये। आप ही लोगों की सहायता से हमने
जंजीरे के सिद्दियों को ऐसा कुचला कि औरंगजेब जैसे सहायक के होने पर भी वे
जंजीरे की बिल से बाहर नहीं निकल सके। गोवा के पुर्तगालियों की सारी मस्ती
उतारकर हमने उन्हें वहीं पर रोक दिया। एक ओर अरबों से मित्रता की तो दूसरी
ओर अंग्रेजों को छावनियों से निकलने नहीं दिया। तमिल और कर्नाटक पर दो-दो
बार आक्रमण करके उनके किलों पर भगवा झंडा फहराया। बीजापुर और गोलकुंडा
वालों से मित्रता करके दिल्लीश्वर बादशाह को लाचार बना दिया। उसकी पाँच
लाख की सेना को आठ वर्ष तक नंगा नाच नचाया और महाराष्ट्र को बचाया।"
"वाह! महाराज, वाह!" सभी ने एक साथ गर्जना की। ऐसा लगा मानो
शम्भू महाराज की बात सुनकर वर्षा ऋतु के मेघ घहराने लगे। महाराज की आँखों
की पुतलियाँ कड़कती बिजलियों की तरह चमकने लगीं। उन्होंने सभी की ओर
देखकर धीमे किन्तु दृढ़ स्वर में कहा, "एक शिवाजी महाराज के यश की ध्वजा,
आकाश की ऊँचाई तक फहराने के लिए, मेरे जैसे सैकड़ों सम्भाजी सिरों की बौछार
युद्ध भूमि में हो जाये तो अच्छा ही होगा।"
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घात और अपघात
एक
ऐसा भयानक धोखा करने वाला और भयंकर ढलान वाला जंगल अपने सात जन्मों
में भी नहीं देखा था। पिछले एक दिन और एक रात इन लोगों ने बड़ी दौड़ की थी
परन्तु अणुस्कुरा के जंगल में उतरते ही उन्हें छठी का दूध याद आ गया।
अणुस्कुरा घाटी की उतराई इतनी कँटीली और ढालू थी कि पहले झटके में
ही मुगल फौज का सारा जोश ठंडा पड़ गया। मुकर्रबखान, इखलास और गणोजी
के साथ सभी लोग चुपचाप घोड़ों से उतर गये। जहाँ जानवरों को खाली शरीर भी
उतर पाना कठिन हो रहा था वहाँ पीठ पर बोझ लादकर कैसे उतरते ?
घाटी की उतराई पर ऊँचे-ऊँचे पेड़, घनी लताएँ, कँटीली झाड़ियाँ, घनी
जंगली घास आदि भरे पड़े थे। इसलिए जमीन तक चन्द्रमा की किरणें तक नहीं
पहुँच पा रही थीं। जिस पगडंडी पर वे चल रहे थे वह भी हाथ-डेढ़ हाथ से
अधिक चौड़ी न थी। उस रास्ते से एक बार में केवल एक घोड़ा आगे बढ़ सकता
था। वह उतराई की राह कभी उल्टी-पुल्टी गोलाकार होती तो कभी एक लकीर
की तरह सीधी हो जाती, कभी तिरछी होती तो कभी सर्पीली तो कभी सिर तक
ऊँची घासों के बीच में छिप जाती थी। कभी-कभी ऐसा लगता कि वह लकड़ी का
सहारा लेकर थकी हुई किसी बुढ़िया की तरह धीरे-धीरे नीचे उतर रही है।
कभी-कभी नीचे फैली काई के कारण घोड़ों के पैर रपट जाते और भयभीत
जानवर आसपास किसी पत्थर की चट्टान देखकर सहारा पाने के लिए उस पर अपने
को झोंक देते। इस प्रकार अपनी लम्बी जीभ को बाहर निकालकर प्राणों की रक्षा का
उपाय करते। परन्तु कुछ घोड़े पत्थरों और सूखी घासों से इस प्रकार फिसलते कि
उनके सावधान होने के पहले ही उनका सन्तुलन बिगड़ जाता था। जैसे कोई भरी
गागर किसी खाली कुएँ में गिर जाये वैसे ही ये घोड़े बगल की घाटी में गिर जाते
थे। कँटीली झाड़ियों से होकर गिरने वाले घोड़ों की करुण चीत्कार फौज के कलेजे
सम्भाजी :: 645
को कँपा देती थी। बचे हुए घोड़े अपनी जगह पर रुक जाते और भय से देखते हुए
मूतने लगते।
उतराई पर पैरों की गति इतनी धीमी हो जाती कि समझ में ही नहीं आता कि
यह कठिन राह कभी समाप्त भी होगी या नहीं? दूसरी ओर की घाटी से रात की
ठंडी हवा शरीर को छू रही थी। परन्तु घबराये हुए मनुष्यों और जानवरों को पसीने
छूट रहे थे। उनका शरीर पसीने से तर हो रहा था। उस दानवी रास्ते ने देखते-देखते
चालीस घोड़ों को निगल लिया। उस रात के अँधेरे में अनेक प्राणी पहाड़ से नीचे
गिर गये। कुछ पन्द्रह-सत्रह फौजियों के जाते मुकर्रबखान के पेट में भी भय का
गोला घूमने लगा। मुकर्रब के साथी उसके आसपास इकट्ठे हुए। अँधेरे के कारण
उनके चेहरे का भाव स्पष्ट नहीं हो रहा था। किन्तु उनकी अवरुद्ध साँस, नाक से
निकलने वाली गर्म हवा एक ही प्रश्न पूछ रही थी, "खान साहब! इस मौत के कुएँ
में हमें लेकर कहाँ जा रहे हैं?"
मुकर्रब ने उन्हें निश्चयपूर्ण शब्दों में उत्तर दिया, "मैंने तो पहले ही कह
दिया था कि जिन्हें मौत कबूल हो वही हमारे साथ चलें।"
मुकर्रब के इस उत्तर से रुके हुए पैर फिर से चलने लगे। घोड़ों के पैरों में गति
आ गयी। उतार पर चलते हुए जंघाओं और पिंडलियों में गोले फूट रहे थे। पैरों के
फिसलने से नाखूनों का टूटना-फूटना तो मामूली बात थी। अनेकों के पैर फिसले
और वे मोच खाकर पंगु हो गये थे। उस भयंकर उतार पर अब कोई किसी के लिए
रुकने को तैयार न था। घोड़े एक-दूसरे के शरीर को रगड़ते हुए चल रहे थे। सैनिक
एक-दूसरे को हाथों का सहारा दे रहे थे। ठंड से ठिठुरते हुए सैनिक और जानवर
किसी प्रकार अंपनी जान बचाते हुए नीचे उतर रहे थे। बीच में किसी सैनिक का पैर
फिसल जाता तो वह लकड़ी के गट्ठे की तरह बगल की खड़ी चट्टान से नीचे गिर
जाता। 'या खुदाऽऽ, या खुदाऽऽ' की करुण चीत्कार की ओर कोई ध्यान न देता।
नीचे गिरा सैनिक किसी का चचेरा या मौसेरा भाई हुआ तो भी कोई ध्यान न देता।
सभी को अपनी जान बचाकर जल्दी से नीचे उतर जाने की चिन्ता थी। गिरे हुए
सैनिक के सम्बन्ध में केवल 'कौन था?' जैसी मामूली पूछताछ कर ली जाती थी।
आगे बढ़ते सैनिक अपने ठिठुरते स्वर में एक-दूसरे से बीच बीच में कानाफूसी
करते, 'यह शैतान गणोजी हमें कहाँ लिये जा रहा है?'
इस प्रकार के घने जंगल, पहाड़ियाँ, घाटियाँ हमेशा मराठों के अनुकूल होती
हैं। यही सोचकर मुकर्रब की फौज को भय लग रहा था। मराठे यदि बन्दरों की तरह
छलाँग लगाते अचानक सामने आ जाएँगे तो हम जाएँगे कहाँ? इस शैतानी रास्ते में
नष्ट हो जाने का खतरा था। भय के कारण घोड़ों के मुँह से फेन निकल रहा था।
उनकी पीठें पसीने से भीगी थीं।
646 :: सम्भाजी
रात समाप्त होने को आयी। आकाश में चाँद और चाँदनी डूबने लगे। दिन
निकल आया। सैनिक अपनी जगह पर ही ठिठक गये। पीछे के ऊँचे पहाड़ की
खड़ी चट्टान देखकर आँखों के आगे अँधेरा छा गया। अभी तक केवल आधा रास्ता
ही पार हुआ था। पीछे ऊँची खड़ी चट्टान और सामने गहरी खाई। सैनिकों और
जानवरों की देह भय के मारे गोल-गोल घूमने लगी। रात के अँधेरे के कारण ही वे
यह भयानक यात्रा कर सके थे। अन्यथा एक मुकर्रबखान को छोड़कर दूसरा कोई भी
सैनिक इन चट्टानों से उतरने के लिए तैयार न होता। दाहिने हाथ की बड़ी खाई और
पैरों के नीचे की भयंकर उतराई देखकर जानवर भी हड़बड़ा गये। समीप के पत्थरों
और पेड़ों से चिपककर नाक फुलाये खड़े हो गये। मुकर्रबखान जोर से चिल्लाया,
"चलो बेवकूफो, जल्दी चलो नहीं तो मराठे पीछे पड़ जाएँगे।"
घोड़ों की लगाम पकड़े सैनिक उन्हें नीचे की ओर खींचने लगे। परन्तु एक
भी जानवर आगे पैर रखने को तैयार न था। तब जानवरों के शरीर पर बेंत और कोड़े
पड़ने लगे। नीचे उतरने के स्थान पर जानवर वहीं पर झुक गये। भयभीत होकर
मूतने और लीद करने लगे। किन्तु भय के कारण एक ने भी आगे कदम नहीं
बढ़ाया। मुकर्रब ने सभी की ओर संकेत किया। उसने अपनी नुकीली टोपी पर बँधा
हुआ साफा खोला और उस लम्बे साफे से अपने घोड़े की आँखें बाँध दीं। अन्य
सैनिकों ने भी ऐसा ही किया। जिनके पास साफे नहीं थे उन्होंने अपने लम्बे कुर्ते
उतारे और घोड़ों की आँखों पर पट्टी बाँध दी। जो भी हो वह भयानक उतराई घोड़ों
की आँखों से दूर हो गयी। उन्हें भी कुछ साहस मिला। उनके पैरों में शक्ति का
संचार हुआ। घोड़े अपने मालिकों द्वारा खींची जाने वाली लगाम के सहारे चलने
लगे। जानवरों का सहारा लेकर सैनिक भी बचते-बचाते घाटी में उतरने लगे।
दोपहर होते-होते तीन हजार की फौज वह दुर्गम घाटी उतरकर एक बार नीचे आ
गयी।
घाटी में उतरते हुए जब सैनिकों और जानवरों ने सामने का समतल मैदान
देखा तो वे खुशी से नाच उठे। सैनिकों के पाँव, मोच खाकर अकड़कर, ऐंठकर,
लचककर बेजार हो गये थे। घोड़ों ने सामने घास से भरा मैदान देखा तो खुशी से
दौड़ने लगे। अपने शरीर को विश्राम देने के लिए जैसे हाथी पानी में अस्त-व्यस्त
होकर लेट जाता है उसी तरह घोड़े घास पर लोटने लगे। सिपाहियों ने भी बकरी के
बच्चों की तरह उछलते हुए अपने को घास पर झोंक दिया। विश्राम कर रहे सैनिक
और घोड़े रस्सी की तरह लटकने वाली चट्टान की पगडंडी को आश्चर्य से देख रहे
थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वे सचमुच इसी पगडंडी से उतरकर नीचे
आये हैं।
घास के मैदान पर सैनिकों और घोड़ों का फैला हुआ वह मेला बगल के
सम्भाजी :: 647
पीपल के नीचे खड़े गाँव वाले बड़े कुतूहल से देख रहे थे। कल हवा के पैरों से
भागने वाले कुछ हरकारों और कुछ मार्ग दिखाने वालों को गणोजी ने आगे भेजा
था। गणोजी ने सन्देश भेजा था कि मुगलों की सेना का एक हिस्सा मराठों के साथ
मिल गया है। वह दल सम्भाजी राजा से मिलने के लिए इसी रास्ते से आने वाला
है। आसपास की बस्तियों में भोर से ही रोटी-नाश्ते की व्यवस्था कर ली गयी थी।
गाँव वाले रोटी-चटनी लेकर इसी सेना की प्रतीक्षा कर रहे थे।
थोड़े विश्राम के बाद लोग रोटी-चटनी और जानवर हरी नरम घास पर टूट
पड़े। वहाँ बहुत समय रुकना खतरे से खाली नहीं था। मुकर्रबखान और गणोजी ने
जल्दी मचाई। सभी तरोताजा होकर दलान के सामने का रास्ता नापने लगे।
सामने का रास्ता चट्टान की ढलान की तरह नहीं था। फिर भी ठीक तरह से
दिखाई नहीं पड़ रहा था। ऊबड़-खाबड़ गड्ढों पोरसाभर ऊँचे-ऊँचे पत्थरों और
कँटीली झाड़ियों से होकर रास्ता आगे सरक रहा था। मुकर्रब के साथियों से जब न
रहा गया तो उन्होंने खान के सामने ही गणोजी की शिकायत की, "यह शैतान
गणोजी हमें कहाँ लिए जा रहा है ? उस ओर गोवा की ओर से आने वाली घोड़ों के
लिए सुगम राह को क्यों छोड़ रहा है ?"
इस शिकायत पर गणोजी हँस पड़े। मुकर्रब के सैनिकों से उन्होंने कहा,
"वह गोवा की ओर से आने वाला रास्ता सीधे आगे जाता है। परन्तु संगमेश्वर तक
कम-से कम दो जगहों पर सम्भाजी की पाँच पाँच हजार की सेनाएँ तैयार खड़ी
हैं। आपको हमारे पीछे पीछे आना है या सीधे सम्भाजी के जबडे में पहुँचना है ?"
गणोजी ने किसी को जवाब देने का मौका ही नहीं दिया। अँधेरा होते-होते
एक गाँव के मैदान में घोड़े रुक गये। गणोजी द्वारा पहले भेजे सन्देश के अनुसार
कोंकण क्षेत्र से खेममावन्त, देशमुख, दलवी जैसे अनेक जागीरदार पूरे प्रबन्ध के
साथ वहाँ एकत्र हुए थे। गणोजी से मिलते ही उन लोगों ने उन्हें बाँहों में भर
लिया। गणोजी के निर्देश के अनुसार उन लोगों ने चार सौ हृष्ट-पुष्ट घोड़े तैयार रखे
थे। मुकर्रब ने शीघ्रता की। उसने थके हारे और जख्मी घोड़ों को बदल दिया।
तरोताजा घोड़ों के मिलने से मुस्लिम सैनिक प्रसन्न हो गये।
अब संगमेश्वर तक का रास्ता केवल एक रात का रह गया था। अब लगातार
तीसरी रात का वह जानलेवा रास्ता आरम्भ हुआ।
इसी समय कुछ गुप्तचरों से गणोजी को समाचार मिला। डेढ़-दो दिन पहले
शम्भुराजा विशालगढ़ से उतरकर इसी रास्ते से संगमेश्वर से आगे गये हैं। यह खबर
सुनते ही मुकर्रब थरथरा गया। उसके सैनिक भी चौकन्ने हो गये। जिस शिकार के
लिए पिछली तीन रातों से इस भयानक जंगल में वे कुत्तों की तरह दौड़ रहे थे उस
शिकार की गन्ध आसपास के जंगल मे उनकी नाक में आने लगी। यह सोचकर
648 :. सम्भाजी
सभी प्रसन्न हो रहे थे। प्यारे गणोजी ने खाने पीने की कोई कमी नहीं होने दी थी।
अब केवल आगे-आगे बढ़ना था। यदि शम्भू महाराज संगमेश्वर छोड़कर चले गये
तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। अपने हिस्से में अपयश आने का भी भय था।
यदि शम्भू न मिले और अपयश का भागी होना पड़ा तो इस रास्ते से पीछे आकर
सुरक्षित ठिकाने पर पहुँचना बहुत कठिन था। यह तो सीधे मृत्यु के सामने खड़ा
होना था।
मुकर्रब जिस हट्टे-कट्टे घोड़े पर सवार था उसे कभी हाथों से थपकियाँ दे रहा
था तो कभी चमड़े के पट्टे से मारकर नचा रहा था। उसे सामने जंगल की गड्ढेदार
पगडंडी की कोई चिन्ता न थी। वह इस तरह भाग रहा था मानो शिकार उसके हाथ
में आ गया हो। सैनिक और जानवर सभी उत्साहित हो गये थे।
आधी रात हो गयी। मुगल सेना के साथ उस वन-प्रान्तर में चारों ओर चाँदनी
छा गयी। उनकी थकान दूर करने के लिए ठंडी हवा बहने लगी। ऐसा लगा मानो
गणोजी दादा के साथ प्रकृति भी दुश्मनों के साथ हो गयी थी। मुकर्रब पूरी तरह
एकाग्र हो गया था। उसकी आँखें जग रही थीं। उसके घोड़े के आगे गणोजी के
रास्ता दिखाने वाले दस-पन्द्रह घोड़े दौड़ रहे थे। उन्हीं की सहायता से मुकर्रब और
तीन हजार की फौज पूँछ की तरह पीछे-पीछे भाग रही थी।
मुकर्रब को लगा कि कोई उसे पुकार रहा है। उसने उसी क्षण घोड़े को रोक
दिया। उसका जवान बेटा इखलास 'अब्बाजानऽऽ, अब्बाजानऽऽ' कहते हुए उसके
पास आ गया। अपने पिताजी के घोड़े के बहुत समीप आकर इखलास ने मुकर्रब के
कानों में कुछ कहा। घोड़े अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो गये। फौज के पीछे
पीछे चलने वाले गणोजी को आगे बुलाया गया। गणोजी मुकर्रबखान के पास आये।
उनका उतरा हुआ चेहरा रात की चाँदनी में भी स्पष्ट दिख रहा था। गणोजी को
देखते ही मुकर्रब ने उन्हें फटकारते हुए कहा, "क्यों गणोजी! क्या बात है?"
"सरकार! मैं आपको बाघ की खोह तक ले आया हूँ। मेरे रहबर, मेरी रसद
सब आपकी सेवा में हैं। पर सरकार मुझ पर रहम कीजिए। मुझे यहाँ से पीछे जाने
की इजाजत दीजिए।"
"आप पागल तो नहीं हो गये?"
गणोजी का गला भर आया। आवाज भरभरा गयी। वे बड़ी कठिनाई से बोले,
"खानसाहब! आपसे क्या कहूँ? इन पहाड़ियों के भोले और पागल लोग उस
शिवाजी और सम्भाजी को भगवान मानते हैं। कल यदि सम्भा हाथ से निकल गया
तो वह आग का खेल खेलेगा। हमारी जड़-शाखा कुछ भी उपचार के लिए नहीं
बच पाएगी।"
मुकर्रबखान और इखलास ने आपस में बात की। उसके बाद मुकर्रब ने शिर्के
सम्भाजी :: 649
से कहा, "गणोजी आप घबराइये नहीं। हम आपको अगुआइ करने के लिए नहीं
कहेंगे। आपको फौज के पीछे रखेंगे। किन्तु किसी भी स्थिति में आपको साथ तो
चलना ही है।"
"परन्तु सरकार आपके साथ रसद, राह दिखाने वाले सब कुछ दे देता हूँ
किन्तु मुझे वापस जाने की इजाजत दीजिए।" गणोजी ने दोनों हाथ जोड़कर घबराये
हुए स्वर में कहा।
पहले ही देर हो चुकी थी। फौज बीच में रुकी थी। गणोजी ऐन मौके पर
हिम्मत हार रहा था। यह देखकर मुकर्रब लाल-पीला होने लगा। घोड़े पर से ही
अपने मजबूत दाहिने हाथ से गणोजी के गले की पट्टी पकड़कर खींचा और कहा,
"शिर्के, तुम क्या मुझे मूर्ख समझते हो? तुम्हारे बाप दादों ने कुछ शताब्दी पहले
इन्हीं जंगल-घाटियों में सात हजार की फौज के साथ मलिक उत्तुजार बन्दे को धोखे
से मार दिया था। वैसी स्थिति आयी तो मैं भी डूब मरूँगा लेकिन तुम्हें साथ लेकर।
चलो, बचपना छोड़ो।"
छिटकी चाँदनी में फौज की दौड़ पुनः आरम्भ हो गयी। घोड़े सरपट भाग रहे
थे। रास्ते की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ और खाइयाँ पीछे छूटती जा रही थीं। भोर के
समय संगमेश्वर से निकलकर आ रहे कुछ पथिक मिले। उनसे खबर मिली कि
कल दिन भर सम्भाजी राजा संगमेश्वर में ही थे। किन्तु आने वाली सुबह को
रायगढ़ की ओर निकलने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही मुकर्रब के घोड़ों को मानो
पंख उग आये। मुकर्रब, इखलास और गणोजी साथ तीन हजार की फौज तेजी से
भागते हुए कँटीले रास्ते को पार करने लगी। संगमेश्वर के संगम पर जीवन-मृत्यु
की आर-पार की लड़ाई ही अब उनका एकमात्र लक्ष्य था।
दो
पानी में छपाक से कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी। येसूबाई की आँख एकाएक
खुल गयी। वे बिस्तर पर उठ बैठीं। उन्होंने अनुमान लगाया कि पीछे की नदी में
कोई पेड़ की डाली गिरी होगी। येसूबाई अचकचाकर इधर-उधर देखने लगीं।
महल के पर्दे हल्की हवा से सरसरा रहे थे। पर्दों के साथ बँधे घुँघरुओं की भी
आवाज आ रही थी। चिरागदान का तेल समाप्त होने को आया था। थोड़ी देर पहले
650 :: सम्भाजी
ही पानी में उठी उस आवाज से घर के बाहर बँधे घोड़े हिनहिनाए थे और फिर
शान्त हो गये थे। थके-हारे शम्भू महाराज बिस्तर पर लकड़ी की तरह बेसुध पड़े
थे।
येसूबाई को पसीना छूट रहा था। मुँह से शब्द निकल नहीं रहे थे। इतना
भयानक स्वप्न उन्होंने जिन्दगी में कभी नहीं देखा था। वे अपने मस्तिष्क में स्वप्न
की टूटी कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर रही थीं। दिमाग पर बहुत दबाव डालने
पर वह दुःस्वप्न उनकी मन की आँखों के आगे फिर से घूम गया।
ऐसी दानवी भैयादूज संसार की किसी बहन ने भी कभी स्वप्न में भी नहीं
सोची होगी। येसूबाई पसीने से भीग रही थीं। सपने में उन्होंने देखा कि वे भैयादूज
के लिए सुन्दर रंगोली सजाकर भाई के लिए चन्दन की चौकी रखी। पूजा की थाली
और उपहार की वस्तुएँ तैयार कीं। किन्तु चौकी पर भाई की जगह उन्हें कोयले का
ढेर दिखाई पड़ा। ऐसे कोयले जिन्हें अभी-अभी धधकती आग से निकालकर
बुझाया गया हो। आरती की सोने की थाली के समीप दिखने वाला हाथ परिचित
था। उस कलाई पर सर्पाकार सुवर्ण कंगन निश्चय ही गणोजी का था। सपने में भी
आरती उतारने के बाद येसूबाई ने अपना सिर गणोजी के पैरों में रख दिया था। परन्तु
अपने भाई से मिले भयानक उपहार से वे थरथर काँप रही थीं। भय से कलेजा मुँह
को आ रहा था। पूजा की थाली में वह उपहार! वह रेशम जैसे लम्बे-लम्बे केश
कलाप, ताजे खून से चिपकी दाढ़ी, किसी शिल्पाकृति की भाँति अधखुली गहरी
आँखें और थाली में गिरा वह खून। यह सिर तो शम्भू महाराज का है। येसूबाई जोर
से चिल्लाने को हुई। परन्तु समीप ही गहरी नींद में सोये सम्भाजी पर उनकी दृष्टि
पड़ी। ऐसा लगा जैसे किसी लम्बी यात्रा से लौटा चन्द्रपुर का कोई राजकुमार मेघों
की दुलाई ओढ़े शान्तिपूर्वक सोया हो। शम्भूराजा की मुद्रा जितनी थकी हुई थी
उतनी ही पवित्र लग रही थी।
येसूबाई का दम घुट रहा था। महल के अलिन्दों से आने वाली तेज हवा पेड़ों
से गिरने वाले पत्तों को ही नहीं पूरे ब्रह्माण्ड को भयभीत कर रही थी। ऐसा लग रहा
था जैसे किसी अज्ञात शक्ति ने इस संगमेश्वर के वन प्रदेश को अपने वश में कर
लिया हो। यहाँ अधिक समय तक रुकना नहीं है ऐसा आग्रह उन्होंने पिछली रात
ही शम्भू महाराज से किया था।
रात की मन्त्रणा पूरी होने के बाद शम्भूराजा ने अपने सहकारियों से कहा,
"जिनके लिए सम्भव हो वे इसी समय निकल जायें। जिसके लिए जो जगह
निश्चित की गयी है, कल शाम तक वहाँ पहुँच जायें। उसी समय सेना की कुछ
टुकड़ियाँ सगमेश्वर से निकल पड़ीं। किन्तु शम्भूराजा के पैर थम गये। उन्होंने
अर्जोजी यादव के निवेदन को सुनने का वचन दिया था। दूसरे कुछ अन्य गरीबों को
सम्भाजी :: 651
न्याय देना था। इन सभी कार्यों को निपटाकर नाश्ते से पहले संगमेश्वर छोड़ देने का
शम्भूराजा ने निश्चय किया था। येसूबाई तत्काल निकलने का आग्रह कर रही थीं।
तब म्हालोजी घोडपड़े ने कहा, "बहूरानी इतनी जल्दी क्यों मचा रही हैं। कल
सवेरे सब लोग निकलेंगे।"
"ऐसी कोई बात नहीं है। किन्तु, "
"बेटी सुनो! रात को घाट से यात्रा करते समय कुछ मालूम नहीं पड़ता।
आकाश की छिटकी चाँदनी मामूली चिराग की तरह रोशनी देती है। पैरों के नीचे
की जमीन भी किसी प्रकार का धोखा नहीं देती।"
"परन्तु यहाँ किस बात का भय है?"
"यह कोंकण की बस्ती है। यहाँ पेड़ों की घनी छाया के कारण चाँदनी भी
जमीन तक नहीं पहुँच पाती। इसके यहाँ मणियार, फेटार कराइत जैसे विषधर पाए
जाते हैं। तुम शृंगारपुर में पली-बढ़ी हो। तुम्हें यह सब बताने की आवश्यकता
है क्या?"
अनेक आग्रह थे। किन्तु येसूबाई ने संगमेश्वर के सूबेदार को आदेश दिया था
कि चाहे जो भी हो एकदम सुबह निकलना है। उन्होंने यह भी कहा था कि पालकी
और ढोने वाले मजबूत कहारों को तैयार रखे। किन्तु रात को मोने के पहले सूबेदार
मोरे दौड़ते हुए आये। उन्होंने सूचना दी कि औंध से अर्जोजी और गिरोजी यादव
यहाँ पहुँच गये हैं। राजा ने तीन दिन पहले उन्हें विशालगढ़ पर संगमेश्वर में मिलने
का समय दिया था। अर्जोजी एक विश्वासपात्र आदमी थे। दुर्गाबाई और राणू दीदी
को बहादुरगढ़ में मिलने के लिए उन्होंने छद्मरूप से प्रवेश किया था। शम्भूराजा के
सामने संकट था कि यादव बन्धुओं की बात कल सुबह सुनें या आगे का समय दें।
किन्तु यह बात भी सच थी कि यादव बन्धु पिछले कई वर्षों से त्रस्त थे।
सूबेदार ने धीरे से कहा, "महाराज और भी दो तीन प्रार्थना पत्र हैं।"
"ठीक है, सबकी फरियाद सुनेंगे। परन्तु इन सभी को सूर्योदय से पहले यहाँ
आने को कहिए। नाश्ते से पहले सभी मामलों को समाप्त करना होगा। वहाँ रायगढ
पर कामों का अम्बार लगा है।" शम्भूराजा ने कहा।
येसूबाई को इन मामलों में समय गँवाना उचित नहीं लग रहा था। आधी रात
देखा हुआ वह भयानक स्वप्न येसूबाई के रक्त के प्रत्येक कण में व्याप रहा था।
उन्हें लग रहा था कि जितनी जल्दी यहाँ से निकल जायें उतना ही अच्छा।
प्रातःकाल महाराज उठ गये। उन्होंने स्नान करके पूजा की। येसूबाई ने भी
स्नान करके पूजा की। इसी बीच सूबेदार ने आकर कहा, "महाराज! बाहर पालकी
आदि सब तैयार है।"
येसूबाई की चिन्ताग्रस्त मुखमुद्रा को देखकर शम्भूराजा ने कहा, "महारानी
आप इतनी चिन्तित क्यों हैं? आप आगे निकलिए हम भी पीछे-पीछे घोड़ा भगाते
652 . सम्भाजी
हुए आ जाएँगे।"
"महाराज! आज का दिन अशुभ-सा लग रहा है। यहाँ पर बिलकुल न
रुकिए।"
"ऐसा बर्ताव हम कैसे कर सकते हैं? हम इस प्रदेश के राजा हैं। मैंने यादवों
को मिलने का वचन दिया था। यादव बन्धु आते ही होंगे।"
सूबेदार ने कहा, "वे गये ही कहाँ थे? कल रात से ही ड्योढ़ी पर अड्डा
जमाये बैठे हैं।"
"सुनो येसू? जैसे दहाड़ मारकर रोते हुए बच्चे को छोड़कर कोई माँ नहीं जा
सकती वैसे ही दरवाजे पर न्याय माँगने के लिए खड़ी प्रजा को छोड़कर कोई राजा
आगे नहीं जा सकता।"
सूचना देने के लिए सूबेदार बाहर चला गया। येसूबाई के पीछे-पीछे शम्भू
महाराज भी भीतर के दालान में आ गये। परन्तु येसूबाई की भीतरी घबराहट उन्हें
शान्ति से बैठने नहीं दे रही थी। आवेश में वह बगल के खम्भे पर हाथ रखकर रोने
लगीं। यह देखकर शम्भूराजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे महारानी के समीप आये।
जैसे कोई लता वृक्ष से लिपट जाती है येसूबाई ने उसी तरह शम्भूराजा को बाँहों में
भर लिया। शम्भू महाराज बिना कुछ बोले येसूबाई के सिर पर हाथ फेरने लगे। उन्हें
सान्त्वना देते हुए विनोदभाव मे बोले, "येसू आज तुम्हें क्या हो गया है? पूरे
महाराष्ट्र को कठोर अनुशासन में रखने वाली हमारी महारानी आज एक सामान्य
घरेलू औरत की तरह व्यवहार क्यों कर रही है? तुम्हारा प्रभुत्वमय और रोबदार
अनुशासन कहाँ चला गया?"
शम्भूराजा कुछ भी सुनने को तैयार न थे। उन्होंने येसूबाई को आश्वस्त किया
कि नाश्ते तक यहाँ का सारा काम पूरा करके हम निकल चलेंगे। निकलने का सारा
प्रबन्ध हो जाने पर सूबेदार ने पुनः आकर सूचना दी। तब शम्भूराजा ने येसूबाई से
कहा, "आपकी पालकी के साथ आठ सौ घोड़े निकलेंगे।"
"इतने किसलिए? फिर आपके साथ कौन रहेगा?" येसूबाई ने कहा।
"चार सौ घोड़े रहेंगे मेरे साथ।"
"नहीं, नहीं राजा की सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।"
"नहीं येसू, दुर्गाबाई और राणूदीदी की याद के अंगारे हमें जीवन भर जलाते
रहे हैं। तुम्हारे ऊपर कोई भी संकट नहीं आना चाहिए।"
"फिर हम ऐसा करेंगे कि साथ-साथ ही निकलेंगे।"
"नहीं, नहीं आप निकलिए।"
अन्तःपुर में कोई अन्य व्यक्ति नहीं था। येसूबाई ने शम्भूराजा के पैरों पर
अपना सिर रखकर गर्म आँसुओं के फूल चढ़ाए। उनकी यह दशा देखकर शम्भूराजा
का मन भर आया। उन्होंने अपनी प्रिय महारानी को बड़े वात्सल्य से सीने से लगा
सम्भाजी :: 653
लिया। राजा के उस प्रगाढ़ आलिंगन में येसूबाई को अपने पिता पिलाजीराव का
स्मरण हो आया। येसूबाई की आँखों के आँसुओं को अपनी उँगलियों से पोंछते हुए
शम्भू महाराज ने हँसते हुए कहा, "इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो? तुम्हें इतना भी
भरोसा किसी पर न रहा? सह्याद्रि का यह हरा-भरा जंगल, यहाँ की यह लाल
मिट्टी, शिवाजी के पुत्र सम्भाजी के साथ धोखा करेंगे? क्या तुम्हें ऐसा लगता है?"
बहुत विलम्ब हो रहा था। बाहर दिन निकल आया था। सूर्योदय के पूर्व ही
संगमेश्वर से बाहर निकल जाना था। दरवाजे पर पन्द्रह-बीस पालकियाँ तैयार खड़ी
थीं। कुछ दासियाँ भी साथ थीं। राजा को एक बार पुनः प्रणाम करके येसूबाई अपनी
पालकी में बैठ गयीं। चन्दनी मेहराब के झरोखे से वे बाहर झाँकने लगीं। महल की
सीढ़ियों पर शम्भू महाराज खड़े थे। राजा को दंडवत करके कहारों ने पालकी उठा
ली। उसी समय शम्भू महाराज ने धीमे स्वर में कहा, "रुको!" महाराज तेजी से
चलते हुए पालकी के पास आ गये। येसूबाई ने पूछा, "क्या बात है स्वामी?"
"महारानी जरा भी चिन्ता न करें। आपकी पालकी दोपहर को चिपलूण की
वशिष्ठी नदी के किनारे पहुँचेगी। वहाँ अमराई में दशमी का निवाला मुख में रखने
से पहले ही मैं घोड़ा दौड़ाते वहाँ पहुँच जाऊँगा।"
राजा के इस प्रकार भरोसा देने से येसूबाई उस वियोग के क्षण में भी बड़ी
मधुरता से हँस पड़ी। शम्भूराजा ने पुनः कहा, "परसों हम रायगढ़ के पायदान तक
पहुँच जाएँगे। वहाँ आपको एक महत्त्वपूर्ण कार्य करना है।"
"कौन-सा?"
"प्रवेशद्वार के चितदरवाजे पर लगने वाली पत्थर की देहरी को ध्यान से
देखकर रखिए।"
"किसलिए?"
"आने वाले कुछ दिनों में हम अवश्य ही विजयी होंगे। वह औरंगजेब
कहीं-न-कहीं मुझे अवश्य ही मिलेगा। उमका सिर काटकर हमें उसी देहरी के
पत्थर के नीचे दफनाना है।"
तीन
प्रातःकाल होते ही दरबार की कार्यवाही आरम्भ हुई। महाराज घंटे-दो घंटे के लिए
वहाँ रुकने वाले थे। यह जानने पर सन्ताजी, धनाजी, कवि कलश और खंडो
654 :: सम्भाजी
बल्लाल ने भी वहीं रुकने का निश्चय किया। उन्होंने तय किया कि महाराज के
निकलने के साथ ही वे भी निकलेंगे। इस बीच रंगनाथ स्वामी और कवि कलश के
बीच आध्यात्मिक विषयों पर रात से ही चर्चा चल रही थी। यह चर्चा अनेक धार्मिक
अनुष्ठानों और विधियों पर हो रही थी। दोनों ही शम्भूराजा के लिए बहुत चिन्तित
थे।
दिन निकल आया। लोगों के नित्य के क्रिया कलाप आरम्भ हो गये। किन्तु
फरवरी महीने की ठंडक अभी विद्यमान थी। महाराज ने बाग की खुली हवा में
फरियादें सुनने का निर्णय लिया था। सेवकों ने तत्काल गद्दे तकिये लगा दिये। सूरज
की कोमल किरणें ऊँचे पेड़ों से नीचे झरकर मृगशावकों की भाँति आसपास खेलने
लगीं। पीछे शास्त्री नदी पर कुहरे के ढेर के ढेर आसमान की ओर सरकने लगे।
बगीचे में शम्भूराजा द्वारा न्यायदान का कार्य आरम्भ हुआ। खंडो बल्लाल की
कलम तेजी मे चल रही थी। महाराज मामलों के निर्णय में व्यस्त थे। कवि कलश
ने समय का उपयोग करना चाहा। स्वामी जी और कवि कलश शास्त्री नदी पर गये।
उन्होंने वहाँ रेती पर कुछ पूजा-विधि सम्पन्न की। शम्भूराजा के सुख और कल्याण
के लिए देवी-देवताओं की पूजा की जा रही थी।
अर्जॉजी और गिरजोजी स्वभाव कृपण थे। दोनों यादव बन्धु अपनी अपनी
कैफियत रख रहे थे। शम्भू महाराज गर्मी और धूप को बढ़ते हुए देखकर बेचैन हो
रहे थे। उन्होंने यादव बन्धुओं से आग्रह किया, "मुद्दे की बातें करिए, शब्दजाल न
फैलाइये।" किन्तु यादव बन्धु पीछे हटने को तैयार न थे। उनकी फरियाद सुनने में
लगभग पौने दो घंटे बीत गये। शम्भूराजा ने पूरी बात सुनी और खंडो बल्लाल को
निर्णय लिखने के लिए बताया। वहाँ उपस्थित गरीब जनता की शिकायतें कुछ बड़ी
न थीं। उन सभी पर आधे घंटे में शम्भू महाराज ने विचार कर लिया। किन्तु अब तक
बढ़ती धूप की आँच आने लगी थी।
सुबह के नौ बजने को आये। महाराज एक अति गरीब व्यक्ति की फरियाद
सुनने में व्यस्त थे। इतने में जैसे किसी के पेट में भाला घुस जाये और वह चीखने-
चिल्लाने लगे, उसी तरह दूर से आक्रमण का शोर सुनाई देने लगा।
महाराजऽऽ, महाराजऽऽ, गजब हो गया। धोखा हो गया है। उस आवाज को
सुनकर शम्भूराजा धक्क से रह गये। बगल में रखी तलवार हाथ में लेकर खड़े हो
गये। दरवाजे पर हलचल मच गयी। बाग के शोरगुल को सुनकर कवि कलश भी
तेजी से नदी की कछार चढ़कर ऊपर आ गये।
इसी बीच एक हरकारा पसीने से तर-ब-तर शम्भू महाराज के सामने आकर
खड़ा हो गया। जिस घोड़े पर वह सवार था, उसके मुँह से फेन गिर रहा है। उसके
घुटने पथरीले रास्ते पर दौड़ते दौड़ते फट गये थे। हरकारा बड़े लाचार स्वर में
सम्भाजी :: 655
चीखते हुए कहने लगा, "महाराज, दुश्मन, संगमेश्वर पर आक्रमण करता चला आ
रहा है। छह सात सौ सवारों का दल मैने अपनी आँख से देखा है, महाराज।"
इधर-उधर घूम रहे सैनिक अपने-अपने घोड़ों पर सवार हो गये। शंभूराजा
ने जोर से आवाज दी, "पाखऱ्याऽऽ"। पाखऱ्या नाम का उनका घोड़ा दौड़ता हुआ
पास आ गया। पाखऱ्या महाराज के सामने आकर खड़ा हो गया। आगे की यात्रा के
लिए वह पहले से ही सोने और हीरे-मोतियों के गहनों से सज गया था। अपने
स्वामी के स्वर की हताशा उसकी समझ में आ गयी। शम्भू महाराज शीघ्रता से घोड़े
की पीठ पर सवार हो गये। रणांगण में शत्रु का सामना करने के लिए कवि कलश
पहले ही तैयार हो गये थे। वृद्ध म्हालोजी घोड़पड़े की आँखों से आग की लपटें
निकलने लगीं। उन्होंने हथेलियों पर जल्दी-जल्दी तम्बाखू मली और जबड़े में
रखा। हाथ के भाले की चमचमाती नोंक को ऊपर उछाला।
चार-पाँच सौ सैनिकों को लेकर सुरक्षात्मक युद्ध कैसे किया जाय? इसकी
योजना शम्भू महाराज ने शीघ्रता से निश्चित की। इतने में सामने के हरे भरे पेड़ों के
पीछे से शोर सुनाई देने लगा, 'अल्लाहो अकबरऽऽ अल्लाहो अकबरऽऽ, दीनऽ
दीनऽऽ' पीछे से आते मुगलों के घोड़े सामने दिखाई देने लगे।
इधर से म्हालोजी घोड़पड़े ने 'हर हर महादेवऽऽ' का नारा लगाया। उसके
बाद सन्ताजी और धनाजी जैसे युवकों ने जोरदार गर्जना की, 'शिवाजी महाराज की
जयऽऽ, सम्भाजी महाराज की जयऽऽ'
घोड़े घोड़ों से भिड़ गये। तलवारें बजने लगीं। घोड़े हिनहिनाने लगे! लोग
बेहोश होकर गिरने लगे।
चौड़ी पीठ वाले एक ऊँचे घोड़े पर मुकर्रबखान बैठा था। उसने चमड़े का
कुर्ता पहन रखा था। तीन-चार दिन की लगातार यात्रा से वह पूरी तरह थक गया
था। किन्तु लड़ाई के मैदान में उसने जैसे ही शम्भू महाराज को देखा, उसके शरीर में
भयंकर जोश व्याप गया। इसी अकेले शम्भू को मारने या पकड़ने की आकांक्षा से
वह पिछले कितने दिनों से पागल हो रहा था।
देखते-देखते मुगलों ने शंभूराजा की कोठी और सामने के परिसर को घेर
लिया। कुछ लोग नदी की ओर भागे, किन्तु शत्रुओं ने उस रास्ते को भी रोक दिया।
आरम्भ से मुगल भारी पड़ रहे थे। मुगलों के पास कम से कम हजार-बारह सौ
घोड़े थे। उनसे चारों ओर से घिरे शम्भू महाराज के चार सौ सैनिक बहुत विवश
दिखाई दे रहे थे। इतने वर्षों से पीछा करने के बाद; लाखों सैनिकों की हानि, सुदीर्घ
प्रयास, जानलेवा मानसिक यातना के बाद भी अप्राप्य-सा सम्भाजी घात-अपघात से
अप्रत्याशित रूप से हाथ लग रहा था। इस कल्पना मात्र से मुगल सैनिकों में अपार
जोश भर गया था। सपासप तलवार चलाते हुए मुगल सैनिक शम्भू महाराज की ओर
बढ़ रहे थे। मराठी सेना सैनिकों की भयंकर बाढ़ में टूटी नाव की तरह अटकी
656 :: सम्भाजी
दिखाई दे रही थी।
आरम्भ में इस अकल्पित और अनपेक्षित आक्रमण से मराठी सैनिक घबरा
गये थे। किन्तु जब अपने प्राणों से प्रिय राजा की जान का खतरा उन्हें महसूस हुआ
तो सभी मराठी सैनिक भड़क उठे। सन्ताजी और खंडो बल्लाल तो आग-बबूला
हो उठे। उन्होंने अपने भाले सँभाले। मराठों के घोड़े मुगलों के घोड़ों पर आक्रामक
हो उठे। 'पकड़ो', 'मारो', 'कुचल दो' जैसे शब्द युद्धभूमि में लाई की तरह फूटने
लगे।
कुछ मराठा सैनिक बगल के घने पेड़ों और झाड़ियों की आड लेकर भाले
चलाने लगे। अपने राजा को बचाने के आवेश और जोर-जोर से चिल्लाने से इतना
शोर उठा कि मुकर्रब को लगा कि जितने लोग सामने हैं उसके दुगुने झाड़ियों में
छिपे हैं। परन्तु अपने प्राणों की चिन्ता किये बिना मुकर्रब सम्भाजी की ओर दौड़
पड़ा। मुगल सैनिकों ने एक साथ सम्भाजी को चारों ओर से घेरने का प्रयास किया।
शम्भू महाराज भी ऐसी लड़ाई नहीं किये थे। इसलिए उनके रक्त-मांस में असीम
जोश भर गया था। शम्भुराजा के मजबूत हाथों में बहुत पैनी धार वाला भाला था।
अपनी पूरी ताकत लगाकर वे तलवारबाजी कर रहे थे। दीवाली के अवसर पर जैसे
चकरी चिनगारियाँ चारों ओर बिखेरती अपनी जगह पर घूमती है उसी तरह शम्भू
महाराज अपनी जगह पर चारों ओर घूमते हुए अपना घोड़ा नचा रहे थे।
शम्भुराजा की सहायता के लिए धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल एक
साथ आगे बढ़े। उन्होंने अपने घोड़ों को आक्रामक बनाया। उन्होंने भयानक
तलवारबाजी की। इसी बीच नदी की ओर से कुछ पठान धोखे से शम्भुराजा पर टूट
पड़े। उनका मुकाबला करने के लिए शम्भुराजा उनकी ओर मुड़े। मुकर्रब इसी बात
की प्रतीक्षा कर रहा था कि शम्भुराजा उसकी ओर से किसी तरह असावधान हों।
अपने हाथों में हैदराबादी नंगी तलवार लिए मुकर्रब शम्भू महाराज की ओर दौड़ा।
शम्भुराजा की पीठ उसकी ओर थी। मुकर्रब अपने घोड़े को दौड़ाते हुए शम्भू
महाराज के घोड़े पर चढ़ाने लगा। उसकी तलवार चमक उठी। वह ऐसा वार करना
चाहता था कि कम से कम शम्भू महाराज का एक हाथ कन्धे से अलग हो जाय।
इसी उम्मीद से उसने शम्भुराजा पर तलवार चलाई। किन्तु इसी बीच एक चमत्कार
घटित हुआ।
शम्भुराजा के शरीर पर तलवार पहुँचे इसके पहले ही बीच में कोई आ गया।
अपने घोड़े से छलाँग लगाकर शम्भुराजा के घोड़े पर कोई आ गया और शम्भुराजा
को अपनी गोद में ले लिया और शम्भुराजा के लिए आड़ बन गया। खान की
तलवार उस व्यक्ति के कन्धे में कचकचाकर धँस गयी। हड्डियाँ चूर चूर हो गयीं।
चारों ओर गर्म खून के फौवारे उड़ने लगे। शम्भुराजा का मखमली कुर्ता भी गर्म लहू
से भीग गया। राजा की जान बचाने के लिए अपनी कुर्बानी देने वाला यह हृष्ट-पुष्ट
सम्भाजी .. 657
व्यक्ति बीच में गिर पड़ा। शम्भुराजा ने अपना घोड़ा घुमाया और रक्तस्नात उस
व्यक्ति की ओर देखा।
ये थे सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े। म्हालोजी बाबा के धराशायी होते ही
मराठे पूरी तरह भड़क उठे। सन्ताजी को अपने पिता के शव की ओर देखने का
अवकाश नहीं था। सन्ताजी, धनाजी, खंडो बल्लाल आदि जान लगाकर लड़ रहे
थे। इसी समय किसी ने मुकर्रब के घोड़े के कूल्हे पर तलवार से जोरदार आघात
किया। पैरों की हड्डियाँ टूट जाने से घोड़ा जोर से हिनहिनाता हुआ बगल में गिर
गया। घोड़े के नीचे आने के पहले ही खान ने दूसरी छलाँग लगा दी। इससे पहले
किसी ने मुकर्रब को प्रत्यक्ष रूप से देखा नहीं था। परन्तु अपने पहनावे और रोब-
दाब से वही मुगल सरदार लग रहा था। शत्रु का सरदार बिना घोड़े का हो गया है,
यह देखकर मराठे उसकी ओर दौड़े। मुगल सैनिक भी पूरे जोश में थे। दोनों दल के
सैनिकों में घमासान युद्ध हो रहा था। एक दूसरे की गर्दनों पर तलवारें भाँज रहे थे।
तलवारों के चपल वार से सिर कट-कटकर बगल में गिर रहे थे। लाल खून से पूरा
बगीचा भर गया था।
घोड़े से नीचे गिरना मुकर्रब को अपशकुन-सा लगा। मुगल सैनिकों ने उसे
पीछे खींच लिया। सिपाही मुकर्रब को दूसरे घोड़े पर बिठाने लगे। इस बीच मराठों
ने उन्हें दबाते-कुचलते बगीचे से बाहर निकाला। इसी समय दूर विश्राम कर रहे
पचास-साठ मराठी सैनिकों का दल 'हर-हर-महादेव' की गर्जना करते हुए बड़े
वेग से महादरवाजे से निकलकर आया। मुकर्रब की दृष्टि उस ओर गयी। उसे लगा
कि कोठी में अभी भी हजार-दो हजार की फौज होगी। मराठों का मुकाबला कठिन
और जानलेवा था। दूसरे घोड़े पर बैठते हुए मुकर्रबखान ने अपने आसपास देखा तो
सैकड़ों पठानों और दक्खिनी मुसलमानों के शव बिखरे पड़े थे। उसके बारह सौ में
से कम-से-कम चार सौ सैनिक जान गँवा चुके थे। खान उस जंगल की रहस्यमयी
कोठी और आसपास के हरे-भरे जंगल से पूरी तरह घबरा गया। अपनी बची-खुची
सेना को उसने धीमे स्वर में आदेश दिया, "भागो पीछेऽऽ।"
शत्रुसेना लड़ाई छोड़कर पीछे हट गयी। शम्भुराजा की दृष्टि बगीचे पर गयी।
खलिहान में मक्के के गट्ठों की तरह चारों ओर शव बिखरे पड़े थे। जो जिन्दा थे वे
तड़प रहे थे, चिल्ला रहे थे, 'या अल्लाह।' 'हे भगवानऽऽ' कराहने की ऐसी
आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। घायल घोड़ों का पीड़ा से हिनहिनाना सुना नहीं जा रहा
था। अपनी हुकूमत के इलाके में शत्रु इतनी दूर तक कैसे चला आया ? यह सोचकर
शम्भुराजा को धक्का लग रहा था। चारों ओर के रास्ते पर सेनाएँ तैनात हैं, हर चौकी
पर पहरे लगे हैं। समुद्र से लेकर थल तक के रास्ते पर कड़े पहरे लगे फिर वह शत्रु
इतने समीप तक कैसे आ गया? निश्चय ही कहीं धोखा हुआ है। किसी धोखेबाज
की उँगली पकड़कर ही शत्रु-सेना यहाँ तक आ पायी है।
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अधिक विचार करने का समय नहीं था। कम से कम साढ़े तीन सौ मराठे
बलिदान हो चुके थे। शम्भुराजा के साथ केवल सौ-सवा सौ मावल ही बचे थे।
सन्ताजी, धनाजी, खंडो बल्लाल जैसे मँजे हुए वीर शम्भू महाराज के अगले आदेश
की प्रतीक्षा करते खड़े थे। अगली यात्रा जल्दी हो सके, इसलिए राजा ने अपनी
लड़ाकू सेना को बड़े आत्मविश्वास के साथ कल रात से ही भेजना आरम्भ कर दिया
था। अब उनके साथ बहुत मामूली संख्या में फौज थी। पेड़ों और कँटीली झाड़ियों
से भरी यह दुर्गम जगह जहाँ सूर्य की किरणें भी सरलता से नहीं पहुँच पातीं वहाँ
शत्रु पहुँच जाएगा, वह भी इतनी सरलता से, ऐसा तो किसी ने सोचा तक नहीं था।
खंडो बल्लाल, धनाजी सहित अनेक वीरों के छोटे-बड़े घावों के कारण उनके
कपड़े खून से सने थे। अभी भी अनेक सैनिकों के ललाट और गालों से खून बह
रहा था। लड़ाई के दौरान एक पठान का बाण कवि कलश की कलाई में घुस गया
था। उन्होंने जल्दी जल्दी में पट्टी बँधाई थी, परन्तु खून अभी भी रिस रहा था। इसी
समय किसी तरह अपनी जान बचाते हुए दो गुप्तचर भागते हुए वहाँ पहुँचे। वे
चिल्लाकर कहने लगे, "महाराजऽऽ महाराज अभी भी कम से कम डेढ़ हजार की
फौज पीछे से भागती हुई आ रही है। घर के ही किसी व्यक्ति ने धोखा किया है।"
"महाराज! बड़ा धोखा है। जल्दी से आगे निकल जाइये।" दूसरे गुप्तचर ने
कहा। धनाजी और सन्ताजी राजा के सामने अपने घोड़े चक्राकार घुमा रहे थे। दोनों
में से प्रत्येक ने कम से कम पचास मुगलों की जान ली थी। उनके हाथों की नंगी
तलवारों से अभी भी खून टपक रहा था। चेहरों पर, कपड़ों पर अभी रक्त दाग दिख
रहे थे। खंडो बल्लाल की आँखों में अभी भी रक्त के फौवारे छूट रहे थे। सभी
लोगों ने चिल्लाते हुए पूछा, "महाराज आज्ञा। महाराज आज्ञाऽऽ।"
शम्भुराजा ने एक क्षण के लिए आँखें मूँद लीं। भगवान का स्मरण किया।
उन्होंने कहा, "मित्रो। मैं आपके जोशभरे पौरुष की उमंग समझ सकता हूँ। परन्तु
परिस्थिति ने धोखा किया है। अब तलवार से नहीं बुद्धि से लड़ाई लड़नी होगी।"
"याने किस तरह?"
"यहाँ न रुककर, हमलोग अलग-अलग रास्तों से जाएँगे। सन्ताजी और
खंडोबा आप एक भी क्षण अब यहाँ न रुकें। चलिए हवा की गति से आगे बढ़िए।
चिपलून की वाशिष्टी नदी के घाट तक कहीं भी न रुकिए। वहाँ अपनी बड़ी चौकी
है।"
"पर महाराज आपको छोड़कर?" सन्ताजी का स्वर भर्रा गया।
"नहीं भाई, अब एक दूसरे की माया में न अटकिये। सन्ताजी और खंडोबा
आपलोग चिपलून की ओर भागिए। रास्ते में येसूरानी और अन्य राजपरिवार की
स्त्रियों की पालकियाँ मिल जाएँगी। उनकी रक्षा कीजिए। धनाजी आप बचे-खुचे
लोगों को लेकर हातखंबा की ओर निकल जाइये। कुछ भला-बुरा प्रसंग आ जाये
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