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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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हुए आ जाएँगे।"
"महाराज! आज का दिन अशुभ-सा लग रहा है। यहाँ पर बिलकुल न
रुकिए।"
"ऐसा बर्ताव हम कैसे कर सकते हैं? हम इस प्रदेश के राजा हैं। मैंने यादवों
को मिलने का वचन दिया था। यादव बन्धु आते ही होंगे।"
सूबेदार ने कहा, "वे गये ही कहाँ थे? कल रात से ही ड्योढ़ी पर अड्डा
जमाये बैठे हैं।"
"सुनो येसू? जैसे दहाड़ मारकर रोते हुए बच्चे को छोड़कर कोई माँ नहीं जा
सकती वैसे ही दरवाजे पर न्याय माँगने के लिए खड़ी प्रजा को छोड़कर कोई राजा
आगे नहीं जा सकता।"
सूचना देने के लिए सूबेदार बाहर चला गया। येसूबाई के पीछे-पीछे शम्भू
महाराज भी भीतर के दालान में आ गये। परन्तु येसूबाई की भीतरी घबराहट उन्हें
शान्ति से बैठने नहीं दे रही थी। आवेश में वह बगल के खम्भे पर हाथ रखकर रोने
लगीं। यह देखकर शम्भूराजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे महारानी के समीप आये।
जैसे कोई लता वृक्ष से लिपट जाती है येसूबाई ने उसी तरह शम्भूराजा को बाँहों में
भर लिया। शम्भू महाराज बिना कुछ बोले येसूबाई के सिर पर हाथ फेरने लगे। उन्हें
सान्त्वना देते हुए विनोदभाव मे बोले, "येसू आज तुम्हें क्या हो गया है? पूरे
महाराष्ट्र को कठोर अनुशासन में रखने वाली हमारी महारानी आज एक सामान्य
घरेलू औरत की तरह व्यवहार क्यों कर रही है? तुम्हारा प्रभुत्वमय और रोबदार
अनुशासन कहाँ चला गया?"
शम्भूराजा कुछ भी सुनने को तैयार न थे। उन्होंने येसूबाई को आश्वस्त किया
कि नाश्ते तक यहाँ का सारा काम पूरा करके हम निकल चलेंगे। निकलने का सारा
प्रबन्ध हो जाने पर सूबेदार ने पुनः आकर सूचना दी। तब शम्भूराजा ने येसूबाई से
कहा, "आपकी पालकी के साथ आठ सौ घोड़े निकलेंगे।"
"इतने किसलिए? फिर आपके साथ कौन रहेगा?" येसूबाई ने कहा।
"चार सौ घोड़े रहेंगे मेरे साथ।"
"नहीं, नहीं राजा की सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।"
"नहीं येसू, दुर्गाबाई और राणूदीदी की याद के अंगारे हमें जीवन भर जलाते
रहे हैं। तुम्हारे ऊपर कोई भी संकट नहीं आना चाहिए।"
"फिर हम ऐसा करेंगे कि साथ-साथ ही निकलेंगे।"
"नहीं, नहीं आप निकलिए।"
अन्तःपुर में कोई अन्य व्यक्ति नहीं था। येसूबाई ने शम्भूराजा के पैरों पर
अपना सिर रखकर गर्म आँसुओं के फूल चढ़ाए। उनकी यह दशा देखकर शम्भूराजा
का मन भर आया। उन्होंने अपनी प्रिय महारानी को बड़े वात्सल्य से सीने से लगा
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