छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
मिला लिया था। हजारों तोपों से जो सफलतां नहीं मिल पायी थी उसे विश्वासघात
की तीक्ष्ण कटार ने प्राप्त कर लिया। इसी अस्त्र के उपयोग का बादशाह ने निश्चय
किया था। जिस प्रकार किसी भूखे ऊँट को रेगिस्तान में हरी घास दिखाई दे जाये
वैसे ही औरंगजेब को मुकर्रबखान से आशा की प्रतीति हुई। उसने मुकर्रबखान की
आँखों में दृढ़ निश्चय का तेज देखा। वह प्रसन्न होकर अपनी जगह से उठा और
बड़े प्यार से मुकर्रब की पीठ थपथपाते हुए बोला, "बहादुर! धन की चिन्ता
बिलकुल न करो। चाहिए तो निकलते समय हमारा आधा खजाना हाथी पर लादकर
भले ही ले जाओ। किन्तु कार्य में सफलता मिलनी चाहिए।" बोलते-बोलते
आलमगीर पुनः गम्भीर हो गया। गहरी साँस लेकर बोला, "लेकिर मुकर्रब इस
मुहिम में एक क्षण के लिए भी गफलत नहीं करना। हंगामा मचाकर वेग से
आक्रमण करने, छुप-छुपकर आक्रमण करके शत्रु को परेशान की कुशलता में वह
सम्भा माहिर है। वह अपने बाप शिवा से दस गुना तेज और सताने वाला है। कुछ
भी करो किन्तु उस काफिर बच्चे को लगाम जरूर पहनाओ। यही अल्लाह की
इच्छा है, यही उसकी सच्ची खिदमत है।"
604 :: सम्भाजी
उद्घोष
एक
सन्ध्या समय शीतल बयार चल रही थी। केर्ल्या के पठार पर मुकर्रबखान का पड़ाव
पड़ा था। तम्बू के द्वार पर मशालें भकभका रही थीं काले भुजंग से मशालची मशालों
में तेल भरते जा रहे थे। ऊँट और घोड़ों को दो दिनों के बाद विश्राम मिला था। वे
गीला सूखा जो भी चारा मिला उसे चबा रहे थे। अपने खूँटे के चारों ओर घूम कर
पूँछ झाड रहे थे या जुगाली कर रहे थे।
छावनी के मध्यभाग में मुकर्रबखान का डेरा था। उसके शामियाने के चारों
ओर मशालें फुरफुरा रही थीं। हाथों में नंगी तलवारें लिये सिपाही पहरा दे रहे थे।
मशालों के प्रकाश में तलवारें चमचमा रही थीं। अपने डेरे पर मुकर्रबखान मखमली
मसनद से टिका आराम कर रहा था। उसके चेहरे पर चिन्ता की रेखाएँ साफ-साफ
झलक रही थीं। वह बार बार दाईं ओर बनी कनात की खिड़की की ओर देख रहा
था। सामने की काली पहाड़ी पर स्थित पन्हालगढ़ उस अँधेरे में जैसे उसे मुँह चिढ़ा
रहा हो।
इसी समय बाहर कुछ दूरी पर कुत्ते जोर-जोर से भूँकने लगे। बीस पच्चीस
घुड़सवारों का एक दल, अपने घोड़ों को हवा की गति से दौड़ाता हुआ छावनी की
ओर आ रहा था। इस दल के बीच में मुकर्रबखान का एक पुत्र और एक दीवान था।
उन दोनों के पीछे कुछ मराठा सैनिकों के घोड़े दौड़ रहे थे। तेजी से आ रहा दल
प्रवेश द्वार पर रुक गया। शहजादे के पीछे एक पैंतालीस वर्ष का मराठा सरदार घोड़े
से उतरा। उसके शरीर पर जख्मों के निशान थे और चेहरा सूजा हुआ था। कुछ दिन
पहले ही उसकी एक आँख में चोट आयी थी इसलिए वह आँख लाल थी।
दल के सभी लोग खान का झुककर अभिवादन करते हुए उसके सामने गये।
उस विकृत चेहरे वाले मराठा सरदार ने शान से ऐंठकर बैठे हुए मुकर्रबखान को
देखा। उसे देखकर वह इतना आनन्दित हो गया मानो उसे अपने कुलदेवता का
सम्भाजी :: 605
दर्शन हो गया हो। वह मराठा सरदार रोते हुए मुकर्रबखान के चरणों में गिर पड़ा।
वह अपनी आँख और नाक खान के पैरों में रगड़-रगड़कर हिचकियाँ लेते हुए
बोला, "बचाओऽऽ, खानसाहब बचाओऽऽ।"
मराठा सरदार के इस अप्रत्याशित व्यवहार से मुकर्रबखान कुछ हड़बड़ा गया।
उसने सलीम से पूछा, "कौन है यह पागल आदमी?"
"बाबाजान! यही है वह गणोजी राजे शिर्के। सम्भाजी का सगा साला,
शिवाजी का जमाई।"
"उठिए गणोजी राजे।" कहते हुए मुकर्रबखान ने बड़े प्रेम से उसकी पीठ
पर एक थपकी दी और पूछा, "गणोजी बादशाह की छावनी में तुम्हारी इतनी इज्जत
है तो फिर तुम एक बेसहारा दासी की तरह यहाँ रो क्यों रहे हो?"
"क्या करें खानसाहब उस सम्भा और कलुशा ने हमारे शिर्के परिवार को
बेघर कर दिया है। सारे शिर्के लोगों को खदेड़ दिया है। हमारी कुटरे गाँव की
हवेली पर क़ब्ज़ा कर लिया है। हमारे दो-तीन चचेरे भाइयों को मार डाला है। मैं
खुद और मेरे साथ देवजी और दौलतराव जैसे लोग भागकर मुगलों की शरण में
आये हैं। क्या कहें! क्या बताएँ खान साहब ! अब हमारे बीवी बच्चे भी शिरकान में
नहीं रहते।"
"लेकिन भोसले तो तुम्हारे निकट सम्बन्धी हैं न?"
"ऐसे सम्बन्धी नष्ट हो जायँ तो ही अच्छा। सम्भाजी और उसके उस मूर्ख
मान्त्रिक ने शिरकान में हड़कम्प मचा रखा है। हमारे खेत-खलिहान लूट लिये,
खड़ी फसल जलाकर खाक कर दी, हमारे पहरेदारों को गड्ढे में पुआल डालकर
जिन्दा जला दिया।"
गणोजी की ओर दयापूर्वक देखते हुए मुकर्रबखान हँसा और बड़े उत्साह से
बोला, "अजी राजा साहब! इस तरह रोने-धोने की जगह तुम सम्भाजी पर सीधे
तलवार क्यों नहीं उठाते?"
"खान साहब ! पूरी तैयारी कर ली थी। सम्भा ने पहले कलुशा को हमारे
ऊपर चढ़ाई करने को भेजा था। उस समय मैंने अनेक सरदारों को और दक्षिण
कोंकण के सभी इज्जतदार जागीरदारों को इकट्ठा कर लिया था। अच्छी खासी दस
हजार की सेना बना ली थी। उस समय हमने कलुशा को दूर भगा दिया था।"
"फिर?"
"फिर क्या? उस मूर्ख कलुशा ने रायगढ़ से सम्भा को बुला लिया। उन दोनों
के पास सिर्फ पाँच हजार सेना थी।"
"तुम्हारी संख्या तो दुगुनी थी न?"
"उसका क्या फायदा, खानसाहब?" कौन जाने इस भोसले की औलाद ने
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रणचंडिका को ही अपने बस में कर लिया है। वह सम्भा जब हवा से बात करने
वाले घोड़े पर बैठकर रण भूमि में उतरता है तो उसके शत्रु भी मन्त्रमुग्ध होकर
उसकी ओर देखने लगते हैं। उसकी केवल एक ललकार सैनिकों में बारह भैंसों की
शक्ति भर देती है। खानसाहब क्या बताएँ? बताने में भी शर्म आती है। सम्भा ने
शिरकान में कदम रखा और हमारी जागीरदारों की संगठित सेना बड़ी मुश्किल से
दो-तीन घंटे ही उसके सामने टिक पायी। उसके बाद सभी उल्टे पैर खेतों और
जंगलों में शरण लेने के लिए भाग खड़े हुए।"
मुकर्रबखान ने गणोजी को थोड़ी देर शान्त होने दिया। परिचारकों ने बीजापुरी
ठंडा शरबत पेश किया। गणोजी का यथोचित स्वागत करके मुकर्रबखान ने उन्हें
सान्त्वना दी। मुकर्रबखान ने कहा, "गणोजी, जिस तरह सम्भाजी बादशाह के लिए
एक संकट है उसी तरह तुम जैसे खानदानी जागीरदारों के लिए भी है।"
"खानसाहब, इस गणोजी के पीछे अनेक सच्चे मराठा सरदार और वफादार
ब्राह्मण सरदार भी हैं। पीठ पीछे सभी लोग अपनी शेखी बघारते हैं, मूँछों को घी
लगाकर ऐंठते हैं किन्तु सम्भा के मैदान में उतरते ही बन्दरों की तरह पूँछ दबाकर
भागते हैं! बस! अब और क्या? अब तो हम सभी का यही विचार है.. यह
सम्भाजी रणभूमि में..।"
एकाएक गणोजी की आँखें भर आयीं। वह भरे गले से बोला, "बादशाह
सलामत के हुक्म के अनुसार मैं तैयार हो गया था। मैंने उनसे वादा भी किया था कि
हमारे क्षेत्र में वे आयें और जितने चाहें उतने मुगलों के मोर्चे बनाएँ। लेकिन उस
महाविनाशक सम्भा ने हमारा सारा शिकराना जलाकर खाककर दिया। जो शिर्के
कभी राजा थे आज उजड़े गाँव के भिखारी बन गये हैं। खान साहब आप जो चाहें
सो करें, लेकिन उस सम्भा को कसाई के बकरे की तरह छाँट दें।"
मुकर्रबखान ने सारी स्थिति का जायजा लिया। उसने गणोजी के शरीर के
अंग प्रत्यंग से, उसकी तेज चलती गर्म साँसों से, उसकी मिचमिचाती आँखों से
और सम्भाजी के प्रति द्वेष से भरे उसके सिर के बालों से लेकर पैर के नाखून तक
का पूरा अन्दाजा लगा लिया। अब उसे विश्वास होने लगा कि गणोजी शिर्के
सम्भाजी का नहीं औरंगजेब का ही साला है।
देर रात तक विचार विमर्श चलता रहा। मुकर्रबखान की निगाह कनात की
खिड़की से बार बार पन्हालगढ़ की ओर जा रही थी। चर्चा अधूरी ही रह गयी।
दूसरे दिन सवेरे ही पुनः खान और गणोजी की बातचीत शुरू हो गयी। भोर
में ही शहजादा आजम और औरंगजेब की ओर से कई महत्त्वपूर्ण सन्देशे आये।
उनका सूक्ष्मता से वाचन किया गया। अब पन्हालगढ़ की पहाड़ी स्वच्छ प्रकाश में
जगमगा रही थी। मुकर्रब ने हँसते हुए गणोजी से पूछा, "शिर्के सिंह तो हाथ लगता
सम्भाजी :. 607
नहीं है, कम से कम सामने का वह किला तो हमारे क़ब्ज़े में दो।"
"पन्हाला?"
"हाँ, पन्हाला पर क़ब्ज़ा करो ऐसा जहाँपनाह से हुक्म आया है। इसके
अतिरिक्त हमारी सैनिक गतिविधियों के लिए भी वह किला बहुत महत्त्वपूर्ण है।
बस एक बार उस पर हमारा क़ब्ज़ा हो जाये फिर पीछे के मसाई पठार, उससे थोड़ी
ही दूरी पर घोड़ दरी, विशालगढ़ वह अम्बाघाटी आदि सम्पूर्ण इलाके पर अपनी
हुकूमत स्थापित करना हमारे लिए बहुत आसान हो जाएगा।"
गणोजी कुछ सकपकाया। गला साफ करते हुए भरे गले से उसने कहा,
"खान साहब! बड़ा ही कठिन काम बताया है आपने! वहाँ के किलेदार त्र्यंबक
महाड़कर और प्रह्लाद पन्त जैसे खुर्राट और निष्ठावान जैसे बुजुर्ग हैं। वे जरा सा
भी विचलित होने वाले नहीं हैं।"
"अब जाने भी दो गणोजी राजे! अनेक मजबूत और खुर्राट मरगट्ठे लड़ते
लड़ते थक गये हैं अब उन्हें शान्ति चाहिए। उन्हें सिर्फ जागीर, जमींदारी, शान्ति
और सम्पत्ति चाहिए, बस। जाओ! साथ में हीरे जवाहरात भरी थैलियाँ ले जाओ।
किले के रक्षकों, प्रशासकों को द्रव्य दो, उनमें फूट डालो, उन्हें फोड़ो।"
"सरकार, बाकी सभी मान जाएँगे, मात्र वह प्रह्लाद पन्त जैसा खुर्राट बूढ़ा
आदमी है। उसे बस में करना बहुत मुश्किल है।" गणोजी ने कहा।
"शिर्के छोटे बच्चों की तरह बेकार की बातें मत करो। तुम अपने राष्ट्र भक्त
उस प्रह्लाद पन्त का यह पत्र ठीक से देखो जो उसने शहजादा आजम को भेजा
है।"
गणोजी का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उन्होंने झपट्टा मारकर वह पत्र
मुकर्रबखान के हाथ से ले लिया और साँस रोककर प्रह्लाद पन्त का पत्र पढ़ने
लगा—
"शहजादे आजम,
दया करो। हमें बचाओ। हमारा राजा अविचारी और विवेकहीन ही नहीं
पागल भी है। किसी क्लर्क या कर्मचारी की यदि कोई शिकायत उसके पास आते
ही वह एक नीति का अनुसरण करता है। वह बिना सोचे-समझे उसे पकड़वाकर
मारता-पीटता है और उसका सब कुछ लूट पाट लेता है। उसके लिए कवि कलश
ही उसका विश्वासपात्र है शेष सभी उसके लिए बेईमान हैं। महाराज उस कलशा
के जाल में बुरी तरह फँस गये हैं। शिर्के ही नहीं किसी का भी घर बर्बाद करने में
उसे कोई हिचक नहीं। जागीरदारों को बेइज्जत करना, ओछे और कमीने लोगों की
बात मानना उसका स्वभाव बन गया है। वह कान का कच्चा है और एकदम पगला
गया है।
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बादशाह ! दया करें और जुल्मी सम्भाजी के अत्याचारों से हमारी रक्षा करें।
मराठों का राज्य बचा लें। हमारे राजा के साथ राज्य भी क्षयग्रस्त हो गया है। हमारे
राज्य का विनाश निश्चित है। बादशाह सलामत हमारे राज्य को बचा लें। राजाराम
को गद्दी पर बिठाएँ। आपकी सेवा के लिए हमलोगों की मजबूत और बुद्धिमान
मंडली पूरी तरह तैयार है।'"
गणोजी ने एक ही साँस में पत्र को तीन बार पढ़ लिया। उसकी प्रसन्नता
छुपाए नहीं छिप रही थी। एक आँख को सिकोड़कर, अपनी मूँछों को बड़े प्यार से
ऐंठते हुए गणोजी आह्लादित होकर बोला, "बस सरकार, स्वयं प्रह्लाद पन्त की
ओर से ऐसा प्रस्ताव मिल जाने के बाद और क्या चाहिए ? अब आप आगे का कार्य
मुझ पर छोड़ दीजिए।"
बीच में दो रातें बीत गयीं। इस बीच गणोजी और देवजी शिर्के स्वयं रात के
अँधेरे में पन्हालगढ़ का चक्कर लगा आये थे। वहाँ से लौटते ही वे मुकर्रबखान के
डेरे में घुस गये। दोनों मुकर्रबखान से ऐसे लिपटे मानो विवाह मंडप में साले
बहनोई गले मिल रहे हों। उनके आनन्द की कोई सीमा नहीं थी। वे जोश में आकर
उन्मादी की तरह बोल पड़े, "बस खानसाहब ! अब केवल दो दिन और इन्तजार
करें। अब पन्हालगढ़ पर फिर भगवा झंडा दिखाई नहीं देगा। बिना किसी कोशिश
के किला स्वयं अपनी झोली में आ गिरेगा। आप बस हिम्मत से उसे अपने अधिकार
में लेने की तैयारी रखें।"
दो
पन्हालगढ़ जैसे शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण किले को अजगर ने अपनी चपेट में
लेना आरम्भ कर दिया था। यह खबर पाते ही कि उपराजधानी पन्हालगढ़ खतरे में
है, शम्भूराजा और कवि कलश ने अपने घोड़े उसी ओर दौड़ाये। कवि कलश ने
विशालगढ़ से निकलते ही मलकापुर की अपनी चौकी के लिए सन्देश भेज दिया
था। शहाली और कड़वी नदी के पानी से पोसे गये दस हजार घोड़ों में से तीन
हजार घोड़ों ने पन्हालगढ़ की ओर उड़ान भरी।
राजद्रोहियों ने गढ़ के ऊपर के निशान जानबूझकर हटा दिए थे। आधा किला
मुगलों के अधिकार में जा चुका था। इसी बीच पश्चिम मसाई पठार की ओर से
सम्भाजी 609
शम्भूराजा किले में प्रवेश किये। सम्भाजी और कविराज दोनों युद्ध में कूद पड़े।
किले पर चढ़कर बुर्ज की ओर भागने वाली मुगल सेना को उन्होंने काटकर गिरा
दिया। इस प्रकार पुनः किले को अधिकार में कर लिया। यह ऐसा ही कार्य था जैसे
अजगर के मुँह में चले गये आधे से अधिक भक्ष्य को उसका दाँत तोड़कर बाहर
निकाल लिया गया हो। रात में गद्दार राजद्रोहियों की तलाशी ली गयीं। प्रह्लादपन्त
को बन्दी बना लिया गया। राजद्रोही येसाजी और शिदोजी फर्जन्द को दंड के रूप में
खड़ी चट्टान से नीचे फेंक दिया गया। शम्भूराजा ने अपने बाहुबल से खोये हुए
किले को फिर से अपने अधिकार में कर लिया।
कवि कलश ने कहा, "राजन! हम बाल-बाल बच गये। भूख-प्यास
भूलकर आप विशालगढ़ से तीर की तरह दौड़कर पन्हालगढ़ आ गये अन्यथा
मुकर्रबखान तो किले को निगल ही चुका था।"
"कविराज पन्हाला की विजय से आज हमें कोई प्रसन्नता नहीं हो रही है।
हमारी जरा-सी चूक से वह नीच गणोजी शिर्के हमारे हाथ से बच निकला। इसी
पश्चाताप की आग से मेरा मन झुलस रहा है।"
"सत्य है राजन! उस धूर्त कुटिल सियार ने अँधेरे का लाभ उठा लिया और
बगल करौंदी के झुरमुट से चम्पत हो गया। यह हमारा दुर्भाग्य है, और क्या?"
"कविराज, मनुष्य के हाथ से कभी कभी ऐसी चूक हो जाती है जिसके
प्रायश्चित का भार उसे आजीवन ढोना पड़ता है। जिसको अपना समझकर हमेशा
सँभाला, रक्षा की, उसी ने ही कलेजा छलनी कर दिया।" शम्भूराजा ने व्यथित स्वर
में कहा, "रायगढ़ पर पिछली भेंट के समय गणोजी की जीभ में नागफनी के काँटे
उग आये थे। इसे येसूरानी सहन न कर सकीं और मेरी ही म्यान से तलवार खींच
ली थी। भाई के टुकड़े टुकड़े कर देने के लिए वे दौड़ पड़ी थीं। उस दिन यदि मैंने
उसे जीवन-दान न दिया होता तो क्या आज ये दिन देखने पड़ते?"
"सच है राजन! आज एक गणोजी बहुत महँगा पड़ रहा है।"
"नहीं, ऐसी बात नहीं है कविराज! स्वराज्य में आज अकेला गणोजी ही
नहीं है। वह तो एक जंग लगा मुखौटा भर है जिसकी आड़ में अनेक बेचैन
जमींदार, बाल-बच्चों की चिन्ता से ग्रस्त जागीरदार और न जाने कितने लोग मेरे
विरुद्ध एकत्र हो गये हैं। यह व्याधि आज की नहीं बहुत पुरानी है।
"ये धूर्त जागीरदार पिताजी के समय में भी भीतर से बहुत दुखी थे। वे
वस्तुतः केवल मेरे पिताजी की मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब तक वे जीवित थे
तब तक उनके स्वाभिमानी और कट्टर स्वभाव के सामने जागीरदारों की एक न
चलती थी। चुपचाप रहने के अतिरिक्त उनके पास कोई चारा भी नहीं था।"
"फिर ?"
610 :: सम्भाजी
"फिर क्या? इस शिवाजी के पुत्र को व्यभिचारी, व्यसनी, झक्की, मनमौजी
आदि कहकर पागल सिद्ध करने के अनेक प्रयास किये गये। किन्तु यह सम्भाजी इन
दुष्ट और षड्यन्त्रकारी बूढ़ों के मन की गाँठों को अच्छी तरह पहचानता था। मुझे
कत्ल करने के तीन प्रयास अब तक असफल हो चुके हैं। पन्हाळा का यह दाँव
चौथा और अन्तिम है।"
एक बार दोपहर में कराड के बाजार में नागोजी माने का मतवाला
काठियावाड़ी घोड़ा चला जा रहा था। इसी समय उसे घोड़ों पर सवार गिरोजी और
अर्जोजी यादव दिखाई पड़े। यादव बन्धुओं का उपहास करते हुए उसने पूछा, "क्यों
रे यादवोऽऽ सम्भाजी से तुम्हें जागीर के कागजात मिले क्या?"
"हमारी जागीर का फैसला पुराना है। मिल ही जाएँगे मुहर लगे कागज।"
गिरोजी ने कहा।
"मूर्ख हो तुम सभी। भोसलों की औलाद ने किसी को भी कभी इस तरह
जागीर लिखकर दी है, जो तुम्हें दे देंगे? पराया होने पर भी उस बादशाह को हम
जागीरदारों पर दया आती है किन्तु इन भोसलों को नहीं।"
बातों बातों में ही नागोजी ने कब इन भाइयों के दिमाग में भेद का जहर
घोल दिया, उन्हें पता ही नहीं चला। वे दोनों निराश हो गये। गिरोजो जी निराशा के
स्वर में बोला, "जाने दो सूबेदार जी, हमारी किस्मत ही खराब है, हमारी राशि में
ही दोष है।"
"क्यों रे?"
"पिछली बार पक्का फैसला होने वाला था कि उन्हीं दो दिनों में बड़े
महाराज चल बसे—" अर्जोजी ने निवेदन किया।
उन दोनों की ओर देखकर व्यंग्य से हँसते हुए नागोजी ने कहा, "अब छोटे
महाराज चल बसें, इससे पहले ही अपने कागज रँगवा लो।"
"सरकार, ऐसी अशुभ बात क्यों कहते हैं?" यादव बन्धुओं ने पूछ लिया।
नागोजी की जबान सूख गयी। उसने अनुभव किया अचानक उसके मुँह से
गलत बात निकल गयी है। अपने को सँभालते हुए उसने कहा, "समय किसी से
पूछकर तो नहीं आता है न? अरे भाई जब तक शम्भू जीवित हैं जागीरी अपने पल्ले
से बाँध लो। जो चीज गणोजी को एड़ियाँ रगड़कर भी नहीं मिल रही है वही जमाई
की कृपा से तुम्हें सहज ही मिल जाएगी। इसलिए बाकी के सभी काम छोड़कर इसे
पूरा कर लो। छोटे महाराज कहाँ हैं आजकल? पन्हालगढ़, विशालगढ़ या
श्रृंगारपुर? खैर जहाँ भी हों वहीं पर जाकर उनके पैरों में गिर पड़ो। नहीं तो
पछताना पड़ेगा। तब यही कहोगे कि भाग्य ने तो दिया था किन्तु कर्म ने खो
दिया।"
सम्भाजी :: 611
तीन
"खानसाहब अब चाहे जो हो उस सम्भा की बोटी बोटी कर डालो और उस
धोखेबाज कलुशा की मुंडी छाँटकर अलग कर दो।" गणोजी अत्यन्त उतावला हो
उठा था।
चोट खाया गणोजी तो विक्षिप्त-सा हो ही गया था, मुकर्रबखान के भी बहुत
बुरे दिन चल रहे थे। उसकी भी शामत आ गयी थी। सवेरे सवेरे बादशाह की ओर
से एक बड़ा लिफाफा आ गया था। बादशाह ने बड़े क्रोध से लिखा था, "कितनी
उम्मीद से हम तुम पर नजर लगाये हुए थे ? पर जैसे अल्लाह के बन्दे से फतह
किया गया पन्हाला किला हाथ से निकल गया और सलामी के समय ही तुम्हारी
शिकस्त हो गयी। इससे हमें बहुत दुख पहुँचा है। कहीं ऐसा न हो कि हमें ऐसी
खबर सुनने को मिले कि उस सम्भा ने तुम्हें ही अपनी गिरफ्त मे ले लिया है।"
मुकर्रबखान ने दोपहर का भोजन नहीं लिया। वह आपे से बाहर हो गया था।
पन्हाला की नाकामी से वह पहले ही बहुत दुखी था। वह जब भी घोड़ा दौड़ाते
अपने साथियों के साथ बाहर निकलता तो उसकी क्रुद्ध आँखों को पन्हाला की
पहाड़ी अवश्य दिख जाती। एक क्षण में अपनी सफलता के हाथ से सरक जाने की
स्मृति उसे कुपित कर देती थी।
शेख मुकर्रब के शरीर का दखिनी रक्त उसे चैन नहीं लेने दे रहा था। वह
गोलकुंडा की कुतुबशाही में अपने परिश्रम से प्यादा से लेकर सेनापति तक का भार
संभाला था। उसके शरीर में एक बलशाली सैनिक और कुशल योद्धा का निरन्तर
वास था। वह केवल गणोजी और नागोजी जैसे जागीरदारों पर निर्भर नहीं था। उसने
पहले से ही थैलियों की गाँठें खुली रखकर विपुल धन राशि को बाँटा था।
मुकर्रबखान ने अपने चारों ओर सह्याद्रि के पहाड़ों, उसकी दुर्गम घाटियों और घने
जंगलों में तेजी से दौड़ने वाले विश्वसनीय जासूसों को फैला रखा था। गणोजी के
जासूसों से प्राप्त खबरों की वह अपने जासूसों से जाँच पड़ताल करवाता था। वह
अपने विश्वसनीय जासूसों द्वारा पुष्ट की गयी सूचनाओं पर ही विश्वास करता था।
एक सुबह मुकर्रबखान ने गणोजी को बुलाकर कहा, "क्यों गणोजी, सुना है
कि सम्भाजी और कलश ने तुम्हारे उस संगमेश्वर में बड़े खूबसूरत महल बनवाये
हैं ? सुन्दर सुन्दर बगीचे भी तैयार किये हैं। वहीं पर बगीचे के झूले पर हवा खाते
७१ सम्भाजी
हुए सम्भा को गिरफ्तार कर लें तो?''
''यह कैसे सम्भव है, सरकार?'' गणोजी ने हँसते हुए कहा, ''अजी वह
सम्भा हवा का एक तेज झोंका ही है।''
''लेकिन सुना है कि पिछले साल उसका पड़ाव एक महीने तक संगमेश्वर में
ही था।''
''इस वर्ष सम्भव नहीं लगता। सम्भाजी एक चक्कर खाता हुआ पखेरू है
जिसकी चोंच तेज आरी की तरह धारदार है।''
गणोजी द्वारा अनजाने में शम्भुराजा की प्रशंसा की उपेक्षा करते हुए
मुकर्रबखान ने पूछा, ''जब कभी वह सम्भा कोंकण मे विशालगढ़ की ओर जाता है
तो उस ओर जाने वाला रास्ता किस गाँव से होकर जाता है?''
''जाहिर है, संगमेश्वर से होकर ही।''
मुकर्रबखान मन ही मन हँसा, बोला, ''गणोजी, तुम पहाड़ी लोगों को सीधा
सा व्यवहार भी नहीं आता? कोई राहगीर जब एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता है
तो मार्ग में किसी गाँव की सराय में लोटाभर पानी पीने के लिए तो रुकता ही होगा?
दोपहरी में किसी पेड़ के नीचे घड़ी भर के लिए आराम तो करता ही होगा?''
''क्या मतलब?''
''तुमने ही तो बताया कि सगमेश्वर में सम्भा और कलश के बड़े बड़े
महल हैं।''
गणोजी धीमे और शान्त स्वर में बोला, ''मुकर्रब मियाँ हाथ में मुझे तलवार
पकड़ने का भले ही अच्छा अभ्यास न हो किन्तु हमारी खोपड़ी कमजोर नहीं है।
जानते हैं? आपकी खुफिया खबरों की जानकारी हमें भी रहती है। यह सम्भा
आपके बादशाह की लाख कोशिश के बावजूद मिल नहीं रहा है। इसी दुख से
बादशाह अपने सिर पर मुकुट नहीं पहनता। अब तो सम्भा के न मिलने के अपयश
से उसकी हिम्मत भी पस्त हो चुकी है। ये सारी बातें हम अच्छी तरह जानते हैं।
माता शिरकाई एक बुरी घटना से बचा ले तो बेहतर है।''
''कौन-सी घटना?''
''तुम्हारा खीझा हुआ, हिम्मतपस्त नाकाम बादशाह किसी दिन अचानक
दिल्ली की ओर कूच न कर जाय, बस।''
मुकर्रबखान की स्थिति ऐसी हो गयी मानो सावन की कोमल धूप को पराजित
करके उसके ऊपर काले बादल उमड़ आये हों। गणोजी को पास खींचकर उसकी
पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए वह उसके कान में कुछ बुदबुदाया।
''यह तो अच्छा हुआ जो बात तुमने छेड़ी। सच कहता हूँ। बादशाह मुझ पर
सम्भाजी · 613
भी सिर्फ कुछ ही दिन विश्वास रखेगा। उसके बाद—उसके बाद दिल्ली की ओर
निकल जाएगा।''
मुकर्रबखान की बातें सुनकर गणोजी एकदम रुआँसा हो गया। वह खान के
पैर पर गिरते हुए बोला, "आप लोगों के दिल्ली की ओर रुख करते ही हमारी तो
मौत ही हो जाएगी। उधर वारणें के दर्रे में बच्चे मकाई के भुट्टे कैसे खाते हैं? उसे
तो आप जानते ही हैं। हरे भरे पत्तों के साथ भुट्टों को तोड़ते हैं फिर साफ करके उसे
दहकते अंगारों में भूजते हैं, उस पर नमक लगाते हैं, फिर मजे से खाते हैं। उसी
तरह सम्भा हम खानदानी जागीरदारों को बड़े मजे से निगल जाएगा। हमने उसे
बहुत सताया है।''
"फिर करना क्या होगा?"
"उसे लगे हाथों किसी भी तरह से ले जाइये, जिन्दा या मुर्दा। यदि आपने
ऐसा नहीं किया तो हमें मरना होगा।''
मुकर्रबखान किसी प्रकार हँसकर बोला, "गणोजी, तुम हमारी कितनी मदद
करते हो? उसी पर हमारी सफलता निर्भर करेगी।''
आसपास की पहाड़ियों पर आक्रमण करने अथवा शिकार के लिए बाहर
निकलना पड़ सकता है। इसलिए मुकर्रबखान ने गणोजी और नागोजी को आदेश दे
रखा था कि हर जगह पर उनके विश्वसनीय लोगों और सम्बन्धियों तथा उनके
जानवरों को तैयार रखा जाय।
यह अफवाह भी चारों ओर फैली हुई थी कि दक्षिण के दीर्घ प्रवास में
निरन्तर असफलताओं के कारण औरंगजेब तंग आ गया है। निकट भविष्य में किसी
भी समय दिल्ली की ओर कूच कर जाएगा। इस खबर से गणोजी और नागोजी जैसे
जागीरदारों की धोती गीली होने को आ गयी थी। सभी बेचैन हो गये थे।
गणोजी और नागोजी ने आसपास गाँवों के जमींदारों को गुप्त पत्र भेजे थे। ये
पत्र सीधे देशमुख और देशपांडे लोगों के हाथ लग गये थे।
"तुम लोग मराठे हों या ब्राह्मण। भगवान ने सभी को पेट दिया है। पेट के
साथ साथ अपने पेट से उत्पन्न सन्तान की भी चिन्ता करनी होती है। आगामी पीढ़ी
के हित के लिए जमींदारी जरूरी है। हम सभी परम्परा से सम्मानित जागीरदार हैं।
जागीरदार का कोई राजा नहीं होता। हम स्वयं अपनी जागीर के राजा होते हैं।
पिछली बारह पीढ़ियों से बारह प्रदेशों के बादशाहों ने हमें 'जागीरें' प्रदान की थीं।
शिवाजी, सम्भाजी और उनका स्वराज्य तो अभी कल की चीजें हैं। इसके पहले तो
सारा देश हमारे ही बाप दादों का था। इतना ही क्यों? आज के रायगढ़ पर ही नहीं
कल की रायरी पर भी हमारा ही अधिकार था। हमारा ही स्वामित्व था। इसलिए
सभी जागीरदारो एक हो जाओ, नेक हो जाओ। खान की मदद करके अपनी
614 : सम्भाजी
खानदानी शान को बचा लो।''
मुकर्रबखान का तकाजा लगातार जारी था। अभियान की निश्चित दिशा का
पता नहीं लग रहा था, किन्तु उसका उद्देश्य समझ में आ रहा था। खान के
आदेशानुसार, पन्हालगढ़ के उस पार योगावती की घाटी, विशालगढ़ के पार
अणुस्कुरा घाट, वारणा की बस्ती में पेटलोड ही नहीं श्रृंगारपुर के पास शिर्कों के
जले हुए प्रदेश में भी गुप्त सन्देश पहुँचा दिए गये थे। ऊपर से शिवाजी और
सम्भाजी की जयकार करने वाले पुराने जागीरदार भीतर से जमीन के टुकड़ों के लिए
छटपटा रहे थे। उन्हें गुप्त रूप से सन्देश भेजा गया था, "अपने घोड़ों को तैयार
रखें। शायद सागर की ओर किसी सौदागर की तलाश में निकलना पड़े। हट्टे कट्टे
मजबूत घोड़े और रसद तैयार रखें।''
कोल्हापुर से कराड़ तक मुग़ल सेना के रास्ते से नागोजी माने का दस्ता
लगातार भाग दौड़ कर रहा था। नागोजी जैसा अनुभवी और मँजा हुआ जागीरदार
समझ चुका था कि बादशाह की सेवा का यह सुअवसर स्वयं चलकर आया है।
इसलिए वह मुकर्रबखान की चाटुकारिता में खूब भाग दौड़ कर रहा था। अपने
मित्रों और निकट सम्बन्धियों को भी सावधान कर रहा था।
चार
"मल्हारराव कृष्णाजी इस बुर्ज की जोड़ाई का काम हमारी आँखों के सामने दो
दिन के भीतर पूरा होना चाहिए। इसके पूरा होने के पहले मैं विशालगढ़ नहीं छोड़
सकता।" सम्भाजी ने कहा।
"सरकार, हम पर भी थोड़ा भरोसा कीजिए।"
"मेरा भरोसा तुम पर तो है किन्तु उस औरंगजेब पर नहीं है।" सम्भाजी
राजा बोल पड़े, "अपने सभी किले, परकोटे इतने मजबूत बनाएँगे कि एक एक
किले की ओर देखते देखते औरंगजेब की जिन्दगी समाप्त हो जाय।"
जैसे कि ऊँची, हट्टी कट्टी घोड़ी के पास खड़ा बछेड़ा शोभित होता है उसी
तरह सह्याद्रि की एक प्रचंड चोटी की उँगली पकड़कर विशालगढ़ सुशोभित हो
रहा था। सह्याद्रि की पहाड़ी के पास टूटे हुए किले की सँकरी लम्बोतरी खाई ने एक
छोटी सी पगडंडी बना दी थी। ग्यारहवीं शताब्दी में भोजराज ने प्रथमतः इस
सम्भाजी :: 615
जंगली किले का निर्माण किया था। सामरिक गतिविधियों की दृष्टि से इस किले का
विशेष महत्त्व था। यहीं से कोंकण में उतरने के लिए, प्रभावली और देवड़ा की ओर
जाने वाली जंगल की सँकरी और भयावह पगडंडियाँ थीं। यहाँ से अंबा घाट और
अनुस्कुरा घाट के आवागमन पर भी अच्छी तरह नियन्त्रण रखा जा सकता था।
जिस प्रकार प्रचंड आँधी के आने से घर के दरवाजे-खिड़कियाँ खुलकर
जोर-जोर से टकराने लगते हैं, उसी प्रकार औरंगजेब का आखिरी आक्रमण दरवाजे
पर पहुँच गया था। चाकण, शिखण, सतारा, कराड़, इस्लामपुर से कोल्हापुर तक की
सारी मुस्लिम चौकियाँ, मराठों के स्वराज्य की ओर क्रुद्ध नजरों से देख रही थीं।
काबुल, कन्दहार से बंगाल तक और मालवा से बुरहानपुर तक औरंगजेब का कोई
शत्रु बचा नहीं था। अब औरंगजेब घमंडी और उद्दंड हो गया था। उसने दक्षिण के
मित्र राज्यों में बीजापुर, गोलकुंडा को नेस्तनाबूद कर दिया था। अब उसने अपना
रुख सम्भाजी और उनके पीछे खड़े सह्याद्रि की ओर किया। दक्खन की मिट्टी
आहट पा चुकी थी कि महायुद्ध का अन्तिम चरण शीघ्र ही आरम्भ होने वाला है।
यह भी कि इस युद्ध का अन्त औरंगजेब अथवा शम्भुराजा में से किसी एक की मृत्यु
से होना निश्चित है।
मुंढा दरवाजे के पास सम्भाजी राजा और कवि कलश खड़े थे। उनके साथ
विशालगढ़ के अधिकारी मल्हार रंगनाथ और कृष्णाजी कोंडा भी उपस्थित थे।
पहले 'खेलणा' नाम से विख्यात विशालगढ़ अब जीर्ण शीण हो चला था। मुंढा
दरवाजे की पीठ से लगकर खड़ा पुराना बड़ा बुर्ज, पिछले महीने अपने आप ही ढह
गया था। यदि कभी किसी की सेना बीच की लम्बोतरी खाई पार करके आ जाये तो
बुर्ज के ढहने से बने गम्ते से बारूदखाने तक बड़ी आसानी से पहुँच सकती थी।
वर्तमान युद्ध संकट को देखते हुए इस धोखाधायक स्थिति को नजरअन्दाज नहीं
किया जा सकता था। इस किले का शत्रु के हाथ में जाने का सीधा अर्थ था मुगलों को
दक्षिण कोंकण में घुसने का राजमार्ग प्राप्त होना।
चार दिन पूर्व ही शम्भुराजा ने यहाँ की हवेली में राजगीरों और कारीगरों की
बैठक बुलाई थी। उन्होंने पूछा था, "बुर्ज के निर्माण में कितना समय लगेगा?"
"कम से-कम दो महीने।"
उत्तर सुनते ही सम्भाजी जलती मशाल के समान भभक उठे। वे गरजकर
बोले, "इस गति से होने वाला काम नहीं चलेगा। केवल दो दिन और दो रातों में
यह बुर्ज बनकर खड़ा हो जाना चाहिए। राजा के आदेशानुसार अण्स्कुरा से आंबा
और साखरप्पा तक हर गाँव के लिए अश्वारोही दौड़ाये गये। वे जितने मिल सके
उतने मजदूर, राजगीर और थवई लेकर वापस लौटे। गढ़ की कुछ तीन हजार की
सेना भी अपना फौजीपन भूल गयी। स्वराज्य के संकट का अनुमान कर उन्होंने
616 :: सम्भाजी
अपनी तलवारें एक ओर रख दी थीं। फावड़ा, कुदाल, बेल्चा आदि उठा लिए थे।
चारों ओर भीड़ जमा हो गयी और काम की जल्दी मची हुई थी। पत्थर पर पत्थर
चढ़ रहा था। गीले चूने को पीसते-पीसते बैलों की अनेक जोड़ियाँ थककर झुकती
जा रही थीं।
दो ही दिन में बुर्ज को खड़ा करने का कार्य अत्यन्त कठिन है। इसका ज्ञान
महाराज को भी था। इसलिए बैठक समाप्त होने पर उन्होंने कवि कलश से धीरे-से
पूछा, "कविराज, सच बताइये, कितने दिनों में यह कार्य पूर्ण होगा?"
कवि कलश जैसे तैसे हँसते हुए बोले, "राजन! किसी उफनती नदी पर बाँध
बनाना भी सम्भव हो सकता है किन्तु इस गढ़ की ढालू चट्टान पर पत्थर चढ़ाना
बहुत कठिन है। दो दिन में यह कार्य पूरा करना ईश्वर के लिए भी सम्भव नहीं।"
"क्यों अशुभ बोलते हो, कविराज?" राजा झल्ला उठे।
"राजन! आगे सुन तो लीजिये। यदि आप स्वयं ही रात-दिन इसी तरह
पहरा देते रहेंगे तो यह कठिन कार्य चार दिन और चार रातों में पूर्ण हो जाएगा।"
शम्भुराजा बहुत चिन्तित दिखाई पड़ रहे थे। उन्होंने कहा, "कविराज, हमारे
शत्रु को पंख लग गये हैं। महायुद्ध शुरू होने से पहले हमें अपने सेनापतियों और
सरदारों को अनेक महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ देनी हैं, रणनीति निश्चित करनी है।"
"उसकी चिन्ता न करें, राजन! आपके आदेशानुसार चार दिनों बाद रायगढ़
लौटते समय संगमेश्वर में जो विचार विमर्श करना है, उसकी पूरी तैयारी हो
चुकी है।"
"क्या हरकारे चारों ओर जा चुके हैं?"
"बिल्कुल।"
"यों ही सभी को अपनी अपनी चौकियाँ छोड़कर मत बुला लेना। अन्यथा
हम अपनी मसलहत में मग्न रहेंगे और उधर हमारा शत्रु बाजी मार ले जाएगा।"
"ऐसा नहीं होगा, राजन! आपके आदेशानुसार बिलकुल चुनिन्दा सरदारों को
ही संगमेश्वर में बुलाया गया है। पाचाड़ से सेनापति म्हालोजी घोडपड़े आएँगे।
इसके अतिरिक्त आपके सुझाव के अनुसार धनाजी और सन्ताजी नामक जवान
लड़कों को विशेष रूप से बुलाया गया है।"
"बहुत अच्छा! हमलोगों ने शिर्कों के क्षेत्र को बर्बाद कर दिया है। तब से
गणोजी और उसके भाई, पूँछ जले सियार की तरह बेकाबू हो गये हैं। परसों की
पन्हालगढ़ की घटना याद है न?"
राजा को अच्छी सफलता और यश की प्राप्ति हो, औरंगजेब जैसे कराल
काल का संकट दूर हो इस समर्थ रामदास के शिष्य रंगनाथ स्वामी भी उन्हें
आशीर्वाद देने के लिए आने वाले थे। उनसे संगमेश्वर में भेंट होने वाली थी।
सम्भाजी :: 617
महाराज को धूप से बचाने के लिए किलेदार ने वहीं चट्टान पर एक कनात खड़ी कर
दी थी। उसमें बैठे शम्भूराजा की नजर सामने बुर्ज के निर्माण कार्य पर लगी हुई थी।
पिछले तीन दिनों में मजदूरों और सिपाहियों ने विलक्षण पराक्रम दिखाया था। बुर्ज
का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा हो चुका था। परन्तु शेष कार्य आज की रात तक पूरा
हो जाना चाहिए था। राजा ने पक्का बन्दोबस्त किया था। यदि मुगल सेना दूसरे दिन
भी विशालगढ़ पर आक्रमण करती तो भी छह महीने तक के लिए रसद और
गोला बारूद जमा कर लिया गया था।
शम्भूराजा बोझिल स्वर में बोले, “कविराज संगमेश्वर के विचार विमर्श में
दिशा निश्चित हो जाय, बस! फिर दुश्मन को महीना भर में गाड़ देंगे। चाहे कुछ भी
हो जाये उस जालिम अजगर की फाँस से महाराष्ट्र को एक दो महीने में मुक्त कर
लेने का हमारा पक्का इरादा है।”
“बिल्कुल राजन!”
“परन्तु कविराज, सात आठ वर्षों की लगातार लड़ाई से प्रजा की बड़ी
दुर्गति हुई है। उन्हें बोने के लिए बीज दें। सरकार की ओर कुआँ-बावड़ी खोदने के
लिए द्रव्य दें। किन्तु कविराज मुझे विश्वास है—”
“किस बात का राजन?”
“यही कि जैसे ही इस औरंग्या को हम समाप्त करेंगे, बहुत अच्छी वृष्टि हो
जाएगी, एकदम मूसलाधार वर्षा होगी। आगामी दशहरा दीपावली में हमारे स्वराज्य
में खेती की ऐसी उपज होगी कि हमारे खेत खलिहान अनाज से भर जाएँगे।”
“अवश्य राजन! किन्तु आपको इतनी चिन्ता क्यों है?”
शम्भूराजा ने ऊपर की ओर देखा। ऐसा लगा मानो उन्होंने सफेद बादलों को
अपनी आँखों में भर लिया। वे गहरी साँस लेकर बोले, “कविराज! हम कभी भी
चिन्तित या नाराज नहीं हुए। आज तक अनेक भयानक हमें निगलने के लिए आते
रहे, किन्तु भवानी की कृपा से हम उनसे उबरते रहे। फिर भी आखिर मनुष्य ही हूँ,
कभी-कभी ठिठककर रह जाता हूँ। मन में बार बार एक ही प्रश्न उठता है कि
ईश्वर इस सम्भाजी के साथ हमेशा टेढ़ी चाल क्यों चलता है। कोई बड़ा निवाला
मुँह में जाने से पहले ही नीचे क्यों गिर जाता है?”
“राजन!” कहकर कविराज अभिभूत होकर शम्भूराजा की ओर देखते रह
गये। एक ठंडी साँस लेकर शम्भूराजा फिर बोले, “कविराज याद है वह जंजीरा का
घेराव? कोंडाजी बाबा जैसे स्वराज्य प्रेमियों ने अपने प्राणों को पूजा-पुण्य की तरह
अर्पित कर दिया। अन्ततः प्रभु रामचन्द्र का नाम लेकर भरी खाड़ी में सेतु निर्माण का
कार्य आरम्भ करना पड़ा। थोड़े समय का अवसर मिल गया होता तो हम आक्रमण
618 :: सम्भाजी
करके जंजीरा बुलन्द परकोटा ध्वस्त कर देते। किन्तु उसी समय महाराष्ट्र में मुगल
सेना बाढ़ के पानी की तरह गरजती हुई पहुँच गयी। नतीजा यह हुआ कि हाथ में
आयी सफलता से मुँह मोड़कर दूसरी ओर दौड़ना पड़ा। हमारे साथ अन्तिम क्षण में
ऐसा क्यों घटित होता है? सफलता के मुट्ठी में आने पर भी हम खाली हाथ क्यों रह
जाते हैं?"
बात करते-करते शम्भुराजा की दृष्टि बुर्ज के कार्य की ओर जाती थी। उनकी
दृष्टि के उस ओर जाते ही मजदूर, राजगीर, सिपाही सभी हड़बड़ा जाते थे। इसी
समय कृष्णाजी कोंडा ने महाराज का अभिवादन करते हुए कहा, "महाराज! आज
रात तक कार्य समाप्त करने की जिम्मेदारी हमारी है। किन्तु आपके यहाँ पर धरना
देकर बैठे रहने से काम करने वाले नाहक ही बार-बार हड़बड़ाते रहते हैं। कल
प्रातः संगमेश्वर की ओर आपके कूच करने के पहले वह कार्य पूरा हो जाएगा।"
कविराज और शम्भुराजा ने हँसते हुए एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों कनात
की छाया से बाहर निकले। राजा ने कहा, "कविराज! यहाँ आने के बाद से मन में
एक बेचैनी है, पावन घाटी को एक बार देखने की बड़ी इच्छा हो रही है।"
"अवश्य राजन् !"
वे तत्काल मुढा दरवाजे से दाहिनी ओर गंजी के पठार की तरफ बढ़ गये।
वहाँ से दो परिचित चेहरे गढ़ पर चढ़कर आते हुए दिखाई पड़े। उनके आगे-पीछे
उनके नौकर-चाकर दौड़ रहे थे। राजा के कदम ठिठक गये। उन्होंने पुनः ढलान पर
चढ़ते मेहमानों को घूर कर देखा। उन्होंने देखा कि अर्जोजी और गिरजोजी यादव आ
रहे हैं। दोनों यादव बन्धुओं ने पाचाड़ के राजमन्दिर और स्वराज्य के अनेक निर्माण
कार्य पूरे किये थे। इसलिए उनके प्रति राजपरिवार में बड़ी आत्मीयता थी। उन
लोगों को अचानक आया देखकर शम्भुराजा ने मुस्कराकर पूछा, "यादवजी आप
लोगों को कैसे पता चला कि यहाँ पर बुर्ज का निर्माण कार्य चल रहा है?"
"महाराज आपके सभी कार्य पूरी निष्ठा और प्रयत्न के साथ पूरे किये हैं,
किन्तु हमारा एक काम आपके पास वर्षों से अटका पड़ा है।"
"कहिएऽऽ?"
"पूजनीय बड़े महाराज के समय यह तय हो गया था कि कगड़ और औंध
की जागीरदारी हमारे नाम कर दी जाएगी। किन्तु दुर्भाग्य से महाराज स्वर्गवासी हो
गये और कागजात तैयार नहीं हो पाए।" अर्जोजी यादव ने निवेदन किया।
"तो यादव ! इसमें ऐसी जल्दी की क्या बात है?"
"क्षमा करें! ऐसी कोई भी बात नहीं है, सरकार ! गलती आपकी नहीं है,
हमारी किस्मत ही खराब है। जब-जब हमारे काम का अवसर आता है तब कुछ न
सम्भाजी :: 619
कुछ अप्रत्याशित घटित हो जाता है।"
"कैसे?"
"बड़े महाराज हमारे नाम से कागज तैयार करने वाले थे दुर्देव से बीमार पड़
गये और फिर कभी उठ नहीं पाए। इस समय भी वैसी ही परिस्थितियाँ हैं।"
गिरजोजी के मुँह से निकल गया। किन्तु अपनी भूल का ध्यान आते ही उसने अपनी
जीभ दबा ली।
"आप कहना क्या चाहते हैं, यादव?"
"ऐसा कुछ भी नहीं है। किन्तु शिर्के लोगों के नाते-रिश्ते के लोग भला बुरा
कहते रहते हैं। वे कहते हैं कि राजा और राज्य सलामत है तब तक लिखा-पढ़ी
करवा लो।" गिरजोजी ने कहा।
शम्भूराजा यह सुनकर अवाक् रह गये। उन्होंने केवल इतना कहा, "कल रात
या परसों प्रातःकाल में संगमेश्वर पहुँच जाइये। वहाँ खंडो बल्लाल भी आएँगे।
उनकी उपस्थिति में आपका सारा काम निपटा देंगे।"
दोपहर में राजा और कविराज घोड़ घाटी में जा पहुँचे। घोड़ घाटी पांढरपाणी
और गजापुर के बीच में थी। 14 जुलाई, 1660 को वीर लड़ाकू बाजीप्रभु देशपाण्डे
ने मूसलाधार वर्षा में इस घाटी की रक्षा करते हुए, अपने प्राण अर्पित किये थे।
आक्रमणकारी सिद्दी जोहार को रोकने के लिए बहादुर बाजीप्रभु घोड़ घाटी में दीवार
बनकर खड़े हो गये थे।
अपने चुनिन्दा साथियों के साथ वह महायोद्धा अपने शत्रु से अन्तिम समय
तक लड़ता रहा। शत्रु की सहायता के लिए दो बार सेना दस्ते आये किन्तु बाजीप्रभु
अपनी जगह पर अडिग बना रहा। बाजी और उसका भाई फूलाजी दोनों अद्भुत
पराक्रम से जूझते रहे। अन्त में जब शिवाजी महाराज के गढ़ में सुरक्षित पहुँचने की
सूचना तोप की आवाज से मिली तब दोनों भाइयों ने अपने प्राण निछावर किये।
वही ऐतिहासिक घोड़ घाटी अब पावनघाटी के नाम से जानी जाती है। वहीं
करवी और करौंदे के जंगल में बाजी और फूलाजी की पत्थर की समाधियाँ बनाई
गयी थीं। अट्ठाइस उन्तीस वर्ष पुरानी वह घटना शम्भूराजा के भीतर तरंगें उत्पन्न
कर रही थी। उन प्रभु-देशपाण्डे बन्धुओं की समाधि पर पुष्प अर्पित करते हुए
शम्भूराजा का मन भर आया।
सूर्य पश्चिम की ओर झुकने लगा तब भरे मन से शम्भूराजा गढ़ की ओर
लौटे। फिर गढ़ से उतरकर खाई को पार किया और चट्टान की चोटी पर चढ़ गये।
उस ऊँचाई से आसपास की गहरी घाटियाँ दिखाई पड़ रही थीं। घाटियों में अँधेरा
गहरा रहा था। शम्भूराजा की निगाह सामने के किले की ओर बरगद के पठार पर
गयी। उस पठार की एक चट्टान नीचे की ओर झुकी थी। उसकी ओर शम्भूराजा ने
620 :: सम्भाजी
कवि कलश का ध्यान आकर्षित किया। वहाँ के बड़े पत्थरों और वहाँ ढलानदार
चट्टानों ने भिन्न-भिन्न रूप धारण किये थे। एकदम सामने का कुछ हिस्सा घोड़ों के
आकार का था। उसके पीछे की ढलान ने हाथी का आकार ले लिया था। पीछे की
टूटी चट्टान ने कुछ मनुष्यों के आकार ले लिए थे। कहा जाता है कि बहुत पहले
कभी किसी अज्ञात शक्ति ने वहाँ से एक पूरी बारात गायब कर दी थी। इसीलिए
उस पर्वतीय जंगल की चट्टानों को हाथी, घोड़ों और ऊँटों का आकार प्राप्त हो गया
था। लोगों ने उस टीले का नाम बारात टीला रख दिया था। अस्ताचलगामी सूर्य की
कुछ किरणें बारात टीले के शरीर पर बकरी के छागलों के समान खेल-कूदकर लुप्त
हो गयीं।
आसपास के जंगल में घना अँधेरा छा गया था। शम्भुराजा की दृष्टि मुंढा
दरवाजे की ओर गयी। वहाँ सैकड़ों मशालें और पलीते जल रहे थे। रात के अँधेरे
में भी बुर्ज को जोड़ने का कार्य चल रहा था। शम्भुराजा के सधे कदम किले की
ढाल पर चढ़ने लगे। उन्हें दूसरे दिन प्रातःकाल ही संगमेश्वर के लिए निकलना था।
वहाँ आगे की राजनीति और नियोजन उनकी प्रतीक्षा में थे।
पाँच
भोजन का समय बहुत पहले बीत चुका था। सिपहसालार सो चुके थे। जानवर खूँटे
से गर्दन खुजलाते या जुगाली करते निश्चिन्त पड़े थे। रात की हवा में विलक्षण गति
थी। तम्बू-डेरों की रस्सियों में बहुत खिंचाव था। मुकर्रबखान को किसी भी करवट
नींद नहीं आ रही थी। पिछले दो-तीन दिनों से गणोजी लगातार उसके पास चक्कर
लगा रहा था। दोनों एक दूसरे के निकट घंटों बैठे रहते थे। खान अनेक प्रकार की
शंकाओं-कुशंकाओं के सम्बन्ध में पूछता रहता था। गणोजी शिर्के शर्त लगाकर
कहता था, "सियार मलकापुर से विशालगढ़ के बीच निश्चित रूप से कहीं है। वहाँ
के किले का काम समाप्त करके वह जहाँ भी जाना चाहे, संगमेश्वर होकर ही
जाएगा।"
मुकर्रबखान ने गर्म उसाँसें भरते हुए पूछा, "रसद-पानी का क्या प्रबन्ध है?"
"यह तो पहले से ही हमारा ही प्रदेश है। मैंने अपने सम्बन्धियों से पहले ही
सन्देश भेजकर कह दिया है कि महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए तैयार रहो।"
गणोजी खान को खबरें देता और बदले में खान से द्रव्यों की थैलियाँ लेकर
सम्भाजी :: 621
जाता।
गणोजी धीरे-धीरे बता रहा था, "आज या कल, शाम में या दिन में किसी
भी समय निकलना होगा।" सारी बातों को याद करके खान ने बेचैनी से करवट
ली। उसने कनात की खिड़की से बाहर देखा। बाहर की खिड़की से चाँदनी में
पन्हालगढ़ की पहाड़ी दिख रही थी। वह आँखों में सालने लगी, इसलिए उसने
अपनी आँखें बन्द कर लीं। आँखें बन्द हुईं तो उसे पहले कभी भी न देखी हुई
सम्भाजी राजा की निर्भीक और निर्द्वन्द्व दिनचर्या आँखों में नाचने लगी। उसके मन
को न शान्ति थी और न ही शरीर को विश्राम।
इसी समय खान की छावनी के बाहर घोड़ों की टापें सुनाई पड़ने लगीं।
मुकर्रबखान तुरन्त उठकर अपने डेरे के दरवाजे के बाहर देखने लगा। सामने से दो
हरकारे दौड़ते हुए उसके पास पहुँचे। बोलने में जरा भी समय नष्ट न करके हरकारों
ने एक लिफाफा खान के सुपुर्द किया। मशाल के प्रकाश में खड़े-खड़े ही पत्र का
वाचन किया गया। पत्र का आशय समझते ही खान के सिर के बाल खड़े हो गये।
वजीरे आजम असदखान के पत्र को खान ने एक बार पुनः पढ़ा-
"प्यारे शेख निजाम मुकर्रबखान।
बादशाह सलामत का आपके लिए अतिआवश्यक सन्देश है। इसे शीघ्रता से
भेजा जा रहा है। आपकी आँखों में हमेशा धूल झोंकने वाला वह जागीरदार रायगढ़
छोड़कर विशालगढ़ में घूम रहा है। यह पक्की खबर बादशाह को मिल चुकी है।
वह बहुत लापरवाह है। भविष्य के हमलों के लिए अपने किले की बुर्जों की
मरम्मत कराने में व्यस्त है। उसके साथ फौज भी बहुत कम है। अतः यह पैगाम
मिलते ही शीघ्रता से निकल पड़ो। आपके हाथों अल्लाहताला की खिदमत होना
निश्चित है। इसलिए अपनी जान की परवाह न करके थोड़ा साहस दिखाएँ। उस
दुष्ट जमींदार को तत्काल गिरफ्तार कर लें। उस काफिर से किसी भी तरह प्रतिशोध
लेना है। मुकर्रबखान आपकी बहादुरी और अल्लाहताला की मेहरबानी की ओर
बादशाह की रात-दिन उम्मीद बँधी है। इस बात को आप एक क्षण के लिए भी न
भूलें।"
इस साहसी अभियान की कल्पना मात्र से ही मुकर्रबखान की मुद्रा मशाल की
तरह चमक उठी। आवेश में आकर वह पागल की तरह अपनी छावनी की भेड़-
बकरियों से लिपटने लगा। बेचैन होकर वहीं पर चहलकदमी करने लगा। उसने
अपने सभी बहादुर सिपहसालारों को एकत्र होने का हुक्म दिया। खान की उम्र
पचपन वर्ष की थी, किन्तु उसका शरीर चुस्त, मजबूत और छरहरा था। अपने पेट
और पार्श्वभाग पर उसने चर्बी नहीं चढ़ने दी थी। उसने अपने को सबल और
फुर्तीला बनाये रखा था। वह तत्काल डेरे से बाहर निकल पड़ा। दबी हुई किन्तु
622 :: सम्भाजी
स्पष्ट आवाज में दूसरों को जगाने लगा, "जागोऽऽ, जागो।"
थोड़े ही समय में इखलासखान के साथ मुकर्रब के सभी बेटे, सिपहसालार,
यार दोस्त, रिश्तेदार, फौजी सब मिलकर लगभग तीन हजार की भीड़ मुकर्रब के
डेरे के सामने एकत्र हो गयी। गणोजी शिर्के और नागोजी माने को अन्दर बुलाया
गया। मुकर्रबखान ने गणोजी को बाँहों में भरते हुए, प्रेमपूर्वक व्यग्रता से कहा,
"गणोजी तुम हमारे भाई बन्धु ही लगते हो। तुम्हारी खबर पक्की है। बादशाह का
पत्र भी आ चुका है। मेरे गुप्तचरों ने भी खबर दी है। चलोऽ! आज रात में ही
आक्रमण कर दें।"
थोड़ी देर में ही विचार-विमर्श कर लिया गया। मुकर्रबखान ने नागोजी से
कहा, "नागो मराठा, आप अभी, इसी वक्त शीघ्रता से कराड़ की ओर कूच करो।
कराड़ के थानेदार को जगाओ और वहाँ आसपास की सारी चौकियों की फौज एकत्र
करो। कम से कम दस से पन्द्रह हजार की फौज तैयार रखो। समय सूचना देकर
नहीं आता।" इस स्थिति में मुकर्रबखान के चेहरे पर सफलता की कल्पना से
प्रसन्नता झलक रही थी।
मुकर्रब ने अपने सभी प्रमुख सरदारों को शामियाने के अन्दर बुला लिया।
सभी को वजीरे आजम के पत्र की जानकारी दी। उसने बड़ी अधीरता से कहा,
"यारोऽ अब नींद, अन्न-पानी के जैसी सारी बातों को भूल जाओ। अब मेरे साथ
तुरन्त चल पड़ो। वक्त बुरा है। रास्ता तो बहुत ही कठिन है। अन्दर की नदी की
धारा में बड़े बड़े मगरमच्छ नंगा नाच कर रहे हैं। इस बात की पूरी जानकारी होते
हुए भी हमें जानबूझकर उफनती नदी में छलांगें लगानी हैं।"
"खान साहब, जोश में होश मत खोइये-" एक जोरदार भारी भरकम
आवाज कानों में पड़ी।
"कौन? कौन है वह?" मुकर्रब भड़क उठा।
बीजापुर का एक अनुभवी सरदार उठकर खड़ा हो गया और खान से स्पष्ट
शब्दों में कहने लगा, "खानसाहब, आपकी बहादुरी और बुलन्द इरादों के बारे में
हममें से किसी को कोई शक नहीं है। किन्तु बीजापुर वालों की चाकरी में रहते हुए
इधर की पहाड़ियों में मैंने अनेक बार सफर किया। जिस समय पन्हाला से शिवाजी
का पीछा करते हुए सिद्दी जौहर की फौज विशालगढ़ तक गयी थी, तब मैं एक
अदना सा घुड़सवार सिपाही था। उस समय मेरी उम्र केवल बीस वर्ष थी। मैंने उस
भयानक पहाड़ी को अपनी आँखों से देखा है।"
"आप कहना क्या चाहते हैं?"
"इतना ही कि यह पहाड़ी नहीं पाताल है।" वह बूढ़ा सरदार बताने लगा,
"खान साहब उस रास्ते में आंबा घाटी के पास मे जाने वाली ढालू चट्टान और टीले
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