छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 620, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज को धूप से बचाने के लिए किलेदार ने वहीं चट्टान पर एक कनात खड़ी कर
दी थी। उसमें बैठे शम्भूराजा की नजर सामने बुर्ज के निर्माण कार्य पर लगी हुई थी।
पिछले तीन दिनों में मजदूरों और सिपाहियों ने विलक्षण पराक्रम दिखाया था। बुर्ज
का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा हो चुका था। परन्तु शेष कार्य आज की रात तक पूरा
हो जाना चाहिए था। राजा ने पक्का बन्दोबस्त किया था। यदि मुगल सेना दूसरे दिन
भी विशालगढ़ पर आक्रमण करती तो भी छह महीने तक के लिए रसद और
गोला बारूद जमा कर लिया गया था।
शम्भूराजा बोझिल स्वर में बोले, “कविराज संगमेश्वर के विचार विमर्श में
दिशा निश्चित हो जाय, बस! फिर दुश्मन को महीना भर में गाड़ देंगे। चाहे कुछ भी
हो जाये उस जालिम अजगर की फाँस से महाराष्ट्र को एक दो महीने में मुक्त कर
लेने का हमारा पक्का इरादा है।”
“बिल्कुल राजन!”
“परन्तु कविराज, सात आठ वर्षों की लगातार लड़ाई से प्रजा की बड़ी
दुर्गति हुई है। उन्हें बोने के लिए बीज दें। सरकार की ओर कुआँ-बावड़ी खोदने के
लिए द्रव्य दें। किन्तु कविराज मुझे विश्वास है—”
“किस बात का राजन?”
“यही कि जैसे ही इस औरंग्या को हम समाप्त करेंगे, बहुत अच्छी वृष्टि हो
जाएगी, एकदम मूसलाधार वर्षा होगी। आगामी दशहरा दीपावली में हमारे स्वराज्य
में खेती की ऐसी उपज होगी कि हमारे खेत खलिहान अनाज से भर जाएँगे।”
“अवश्य राजन! किन्तु आपको इतनी चिन्ता क्यों है?”
शम्भूराजा ने ऊपर की ओर देखा। ऐसा लगा मानो उन्होंने सफेद बादलों को
अपनी आँखों में भर लिया। वे गहरी साँस लेकर बोले, “कविराज! हम कभी भी
चिन्तित या नाराज नहीं हुए। आज तक अनेक भयानक हमें निगलने के लिए आते
रहे, किन्तु भवानी की कृपा से हम उनसे उबरते रहे। फिर भी आखिर मनुष्य ही हूँ,
कभी-कभी ठिठककर रह जाता हूँ। मन में बार बार एक ही प्रश्न उठता है कि
ईश्वर इस सम्भाजी के साथ हमेशा टेढ़ी चाल क्यों चलता है। कोई बड़ा निवाला
मुँह में जाने से पहले ही नीचे क्यों गिर जाता है?”
“राजन!” कहकर कविराज अभिभूत होकर शम्भूराजा की ओर देखते रह
गये। एक ठंडी साँस लेकर शम्भूराजा फिर बोले, “कविराज याद है वह जंजीरा का
घेराव? कोंडाजी बाबा जैसे स्वराज्य प्रेमियों ने अपने प्राणों को पूजा-पुण्य की तरह
अर्पित कर दिया। अन्ततः प्रभु रामचन्द्र का नाम लेकर भरी खाड़ी में सेतु निर्माण का
कार्य आरम्भ करना पड़ा। थोड़े समय का अवसर मिल गया होता तो हम आक्रमण
618 :: सम्भाजी