छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 612, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंशम्भूराजा किले में प्रवेश किये। सम्भाजी और कविराज दोनों युद्ध में कूद पड़े।
किले पर चढ़कर बुर्ज की ओर भागने वाली मुगल सेना को उन्होंने काटकर गिरा
दिया। इस प्रकार पुनः किले को अधिकार में कर लिया। यह ऐसा ही कार्य था जैसे
अजगर के मुँह में चले गये आधे से अधिक भक्ष्य को उसका दाँत तोड़कर बाहर
निकाल लिया गया हो। रात में गद्दार राजद्रोहियों की तलाशी ली गयीं। प्रह्लादपन्त
को बन्दी बना लिया गया। राजद्रोही येसाजी और शिदोजी फर्जन्द को दंड के रूप में
खड़ी चट्टान से नीचे फेंक दिया गया। शम्भूराजा ने अपने बाहुबल से खोये हुए
किले को फिर से अपने अधिकार में कर लिया।
कवि कलश ने कहा, "राजन! हम बाल-बाल बच गये। भूख-प्यास
भूलकर आप विशालगढ़ से तीर की तरह दौड़कर पन्हालगढ़ आ गये अन्यथा
मुकर्रबखान तो किले को निगल ही चुका था।"
"कविराज पन्हाला की विजय से आज हमें कोई प्रसन्नता नहीं हो रही है।
हमारी जरा-सी चूक से वह नीच गणोजी शिर्के हमारे हाथ से बच निकला। इसी
पश्चाताप की आग से मेरा मन झुलस रहा है।"
"सत्य है राजन! उस धूर्त कुटिल सियार ने अँधेरे का लाभ उठा लिया और
बगल करौंदी के झुरमुट से चम्पत हो गया। यह हमारा दुर्भाग्य है, और क्या?"
"कविराज, मनुष्य के हाथ से कभी कभी ऐसी चूक हो जाती है जिसके
प्रायश्चित का भार उसे आजीवन ढोना पड़ता है। जिसको अपना समझकर हमेशा
सँभाला, रक्षा की, उसी ने ही कलेजा छलनी कर दिया।" शम्भूराजा ने व्यथित स्वर
में कहा, "रायगढ़ पर पिछली भेंट के समय गणोजी की जीभ में नागफनी के काँटे
उग आये थे। इसे येसूरानी सहन न कर सकीं और मेरी ही म्यान से तलवार खींच
ली थी। भाई के टुकड़े टुकड़े कर देने के लिए वे दौड़ पड़ी थीं। उस दिन यदि मैंने
उसे जीवन-दान न दिया होता तो क्या आज ये दिन देखने पड़ते?"
"सच है राजन! आज एक गणोजी बहुत महँगा पड़ रहा है।"
"नहीं, ऐसी बात नहीं है कविराज! स्वराज्य में आज अकेला गणोजी ही
नहीं है। वह तो एक जंग लगा मुखौटा भर है जिसकी आड़ में अनेक बेचैन
जमींदार, बाल-बच्चों की चिन्ता से ग्रस्त जागीरदार और न जाने कितने लोग मेरे
विरुद्ध एकत्र हो गये हैं। यह व्याधि आज की नहीं बहुत पुरानी है।
"ये धूर्त जागीरदार पिताजी के समय में भी भीतर से बहुत दुखी थे। वे
वस्तुतः केवल मेरे पिताजी की मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब तक वे जीवित थे
तब तक उनके स्वाभिमानी और कट्टर स्वभाव के सामने जागीरदारों की एक न
चलती थी। चुपचाप रहने के अतिरिक्त उनके पास कोई चारा भी नहीं था।"
"फिर ?"
610 :: सम्भाजी