छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
किये। नौकरों ने बाहर बैठक की व्यवस्था की थी। वहाँ पर वे जोत्याजी केमकर
और निलोपन्त के साथ बहुत देर तक बात करते हुए बैठे रहे। उसी समय मन्दिर के
द्वार पर किसी के घोड़े की टाप सुनाई पड़ी। घोड़े से एक स्त्री उतरी। मशाल के
उजाले में चेहरा स्पष्ट दिखाई दिया। महाराज ने आश्चर्य से पूछा, "गोदू तुम?"
"हाँ!"
"इधर कैसे आयी?"
"महल में महारानी ने बताया कि आप यहाँ हैं और यहाँ पर आपको विलम्ब
होगा, इसलिए—"
"ठीक है। आ गयी, अच्छा किया।"
महाराज के मन में कुछ असमंजस हुई। महाराज ने सोचा, शीघ्र ही औरंगजेब
के साथ जीवन मरण का युद्ध छिड़ने वाला है। फिर कौन जाने गोदू जैसे आत्मीय
व्यक्ति से कब मिलना हो पाए। महाराज बैठक मे उठ गये गोदू भी यन्त्र की भाँति
उनके पीछे मन्दिर की सीढ़ियाँ उतरने लगी। अँधेरे में वे दोनों काली हौद की दिशा
में दूर तक चलते गये।
"गोदूऽ, अपने शिवाजी महाराज और उनके स्वराज्य के लिए तुमने अपनी
जिन्दगी बर्बाद कर दी, किन्तु तुम्हें हमसे क्या मिला? केवल वनवास।"
"महाराज भगाई गयी स्त्रियों के भाग्य में और होता भी क्या है? इसके
पहले स्वराज्य पर अनेक खानों ने आक्रमण किया, भेड़िया जैसे बकरियों को उठाता
है, उसी प्रकार हमारी बहू बेटियों को उठाकर ले गये। कुछ को छोड़ दिया। ऐसी
गरीब और अभागी लड़कियों पर एक बार बदनामी का सिक्का लग गया कि बस!
उन्हें न तो ससुराल वाले स्वीकारते हैं और न मायके वाले ही अपनाते हैं। ऐसी
अनेक स्त्रियों ने पानी में डूबकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। किन्तु
महाराज!"
"किन्तु हमारे स्वराज्य के लिए तुम्हारा मायका छूट गया।"
"किन्तु महाराज मैं तो न सधवा हूँ न विधवा। भाग्यशाली अवश्य हूँ इसलिए
महाराज आपकी और महारानी की परछाईं मे मुझे अपने जीवन का पुण्य मिल
गया।"
गोदू का मन भर आया था। कितने दिनों के बाद महाराज के ऐसे मुक्त
साहचर्य का अवसर मिला था। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे और क्या
न कहे। वह बोली, "महाराज जब मैं पहली बार आपसे मिली तब मैं जवानी के
उफान पर थी। जवानी के उस मादक आकर्षण में यदि कोई निर्दयी राजा मिला होता
तो? तो उसने सहज ही मुझे बर्बाद कर दिया होता। उसे टोकने वाला कौन था?
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किन्तु महाराज मेरे प्रति आपका व्यवहार कितना आत्मीय और मर्यादापूर्ण रहा।"
"गोदू, मैं भी जब तुम्हारे समीप आया था तब तुम्हारे इस सुन्दर और निर्मल˙
रूप को देखकर मेरे भीतर का विकार कब का नष्ट हो गया था। गोदू, हमारे बीच
ऐसा कौन-सा रिश्ता है जिसे मैं कोशिश करने पर भी व्यक्त नहीं कर पाता। किन्तु-
किन्तु क्या दिया मैंने तुम्हें? जीवन भर जलते रहने की सजा।"
"सभी अपने स्वार्थ के लिए भगवान की पूजा नहीं करते। अनजाने में ही मैं
आपकी ओर आकर्षित हो गयी थी। संयोग से मुझे महारानी का साहचर्य मिला।
उनमें जब मैंने अपनी बड़ी बहन का रूप देखा तो आपके प्रति आकर्षण के पंख
अपने आप टूट गये।"
"तुम पागल हो! किसी और के साथ विवाह के लिए तैयार भी नहीं हुई।"
"उसके लायक दूसरा कोई व्यक्ति मिला ही नहीं और मिलने वाला भी नहीं
था। क्योंकि मेरे दिल का मन्दिर मेरे भगवान, केवल आपके लिए बना था।"
"अब तुम्हें क्या चाहिए, गोदू?"
गोदू ने आगे बढ़कर महाराज के पाँव पकड़ लिये। बड़ी अधीरता से वह
बोली, "आपसे एक ही प्रार्थना है, जब मेरी मृत्यु हो तो मेरी चिता को आप ही
आग दें।"
"चिता को अग्नि? सिर्फ अपनों की चिता को अग्नि दी जाती है, गोदू।"
महाराज सहज भाव से बोले।
"तो आप मेरे कौन हैं?" यह प्रश्न करते हुए गोदू की आँखों से अश्रुपात हो
रहा था।
शम्भू महाराज ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। हाथ का यह स्पर्श
अत्यन्त सान्त्वनादायक था।
उसी रात जिंजी से केसो त्रिमल का सन्देश प्राप्त हुआ। उन्होंने लिखा था—
"हरजीराजा काबू में आ गये हैं। उनकी महत्त्वाकांक्षा के अश्व को लगाम लगाने में
हम सफल हो गये हैं। इसके बाद यहाँ से नियमित रूप से रसद कैसे भेजी जाये
इसकी व्यवस्था हम कर रहे हैं। महाराज अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें।" यह
सन्देश पाकर महाराज को प्रसन्नता हुई।
सवेरे जल्दी उठकर शिरकाण की ओर निकलना था। किन्तु शम्भू महाराज
की धार्मिक वृत्ति भीतर जग गयी। उन्होंने प्रभावली की ओर जाने से पहले पाली के
बल्लालेश्वर का दर्शन करने का प्रस्ताव महारानी से किया। दूसरे दिन पचीस
विशिष्ट पालकियाँ और पाँच-छह सौ घुड़सवार पाली की ओर जाने के लिए
निकले। खंडो बल्लाल भी साथ में थे। पाचाँड के बीच वाले रास्ते से आगे बढ़ने के
पूर्व महाराज रायगढ़वाड़ी के मैदान में गये। वहाँ उन्होंने 'निश्चलगिरि स्वामी' की
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समाधि के दर्शन किये। वहाँ से उनके पैर जीजामाता की समाधि की ओर मुड़ गये।
जीजामाता की समाधि से हटने का उनका मन ही नहीं हो रहा था। उन्हें लगा जैसे
दादीजी उनसे बात कर रही हों। अपने भातुल परदादा लखोजी जाधवराव ने
दौलताबाद के अजेय किले पर कैसे झंडा फहराया था? वह दादीजी की बताई हुई
कहानी उन्हें याद आने लगी।
आगे का सफर तय करना था। इसलिए सहयोगीगण व्यग्र होने लगे।
महाराज उठे और समाधि पर अपना सिर रखकर बहुत समय तक वैसे ही बैठे रहे।
ऐसा लगा जैसे कोई नन्हा-सा पोता अपनी दादी की गोद में सिर रखकर प्यारी-
प्यारी बातें कर रहा हो। वहाँ से चलने से पूर्व महाराज ने अपनी दादी से केवल
इतना कहा, “दादीजी, उस औरंगजेब का सिर ऊपर रायगढ़ पर ले जाने मे पहले
आपके चरणों में लाकर रखूँगा।”
सन्ध्या समय महाराज और महारानी ने बल्लालेश्वर का अभिषेक किया।
मन्दिरों को महाराज ने भरपूर दान दिया। सरसगढ़ की तलहटी में डेरे डंडे खड़े
किये गये थे। महाराज ने किसी प्रकार एक दो घंटों की नींद ली। आधी रात को
उन्होंने खंडो बल्लाल को बुलाया। महाराज ने कहा, "हमें आसरा में वीरेश्वर के
दर्शन करने हैं।" सवेरे-सवेरे आसरा के मन्दिर परिसर में घोड़े पहुँच गये।
महाराज को वीरेश्वर के परिसर में बड़ी प्रसन्नता हुई। यहाँ से थोड़ी ही दूरी
पर औढ़ा का मैदान था। बालाजी पन्त की अकारण हत्या का स्मरण महाराज को
निरन्तर दुखी करता था। उसी से मुक्त होने के लिए महाराज ने वहाँ पर महादेव का
मन्दिर बनाने के लिए अर्जोजी यादव को आदेश दिया था। महाराज ने मन्दिर और
पीछे बनाये गये तालाब का निरीक्षण किया। भोर में ही वे मन्दिर के भीतर गये।
उन्होंने सपत्नीक देवता के दर्शन किये। शिव की पिंडी के ऊपर स्वर्णपात्र से
अमृतधार प्रवहमान थी। महाराज ने पुजारियों को आदेश दिया, “वहाँ पिंडी पर
अखंड जलधार चालू रखिये।” मन्दिर के गर्भगृह से बाहर निकलते समय महाराज
ने पुनः पिंडी की ओर देखा। वे अत्यन्त भाव विह्वल होकर बोले, “बालाजी
काका इस पात्र से वीरेश्वर की पिंडी पर सतत गिरने वाली जलधारा, आपकी स्मृति
में इस शम्भु द्वारा आँसुओं से किया जाने वाला आपका अभिषेक है।”
महाराज जब मन्दिर से बाहर निकल रहे थे तो उन्हें मूर्च्छा-सी आ गयी। उस
समय उनका एक हाथ खंडो बल्लाल ने थाम रखा था और दूसरे हाथ से वे आँसू
पोंछ रहे थे।
घोड़े महाड़ की दिशा में वेग से दौड़ने लगे। चाम्भार खाटी के पास से
महाराज ने रानी को विदा कर दिया। शिर्के को सबक सिखाने के लिए उनके घोड़े
और लोग शिरकाण की ओर टूट पड़े।
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चार
पिछले आठ वर्षों के जैसे भयंकर दिन महाराज और महारानी ने देखे नहीं थे। आने
वाला प्रत्येक दिन अशुभ का सूचक बन रहा था। अब्दुल्लाखान ने सरमगढ़ के
किलेदार को लालच देकर किले को मुगलों के क़ब्जे में ले लिया था। किन्तु शम्भू
महाराज ने तत्काल फौज भेजकर उस पर पुनः क़ब्ज़ा कर लिया। किन्तु इस युद्ध में
लगभग डेढ़ सौ मराठा वीरों को जान गँवानी पड़ी। धन जन की हानि हुई। नासिक
और बागलाण के क्षेत्र में एक के बाद एक किला मुगलों के अधिकार में जा रहा था।
यह संकट निरन्तर बढ़ता हुआ रायगढ़ की ओर आ रहा था। एक ओर राज्य का
खजाना खाली होता जा रहा था, दूसरी ओर शत्रु की अपेक्षा भीतर के गद्दार घातक
सिद्ध हो रहे थे।
नरभक्षक पक्षियों की तरह रोज संकट अपना आहार ग्रहण कर रहे थे। शम्भू
महाराज बिस्तर पर लेटते थे तब भी उनका शरीर वेदनाग्रस्त रहता था। नींद उड़
गयी थी। दरवाजे पर किसी की पदचाप सुनाई दी। येसूबाई बाहर निकल आयीं।
द्वारपाल दो हरकारों को लेकर आया था। महारानी ने समझ लिया कि समाचार
आपात कालिक ही होगा। हरकारे शृंगारपुर-प्रभावली क्षेत्र आये थे। येसूबाई ने
समाचार वाली थैली खोली। पत्र को पढ़ा। उनकी साँस घुटने लगी। इन दिनों
दरवाजों के पर्दे हिले नहीं कि शम्भू महाराज अचकचाकर उठ जाते थे।
"येसू, क्या है वह?" अपनी बगल में खड़े शम्भू महाराज की आवाज
सुनकर येसूबाई चकित हो गयीं। महाराज कब आकर बगल में खड़े हो गये, उन्हें
पता ही नहीं चला। उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा, "महाराज एक भयंकर समाचार
आया है।"
"कौन-सा?"
"जितना सोचा गया था उससे कहीं भयंकर है। शेख मुकर्रबखान और
गणोजी भाईसाहब का पन्हाला के पास एक समझौता हुआ है। उसके अनुसार
संगमेश्वर और शृंगारपुर के आसपास का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र गणोजी मुगलों को देंगे।
इसके साथ ही घोड़ों से भरे हुए अपने दो-तीन तबेले भी मुगलों को देंगे। वह दुष्ट
खान वहाँ पर हमारे राज्य में दो फौजी चौकियाँ बनाने वाला है।"
"कहाँ, कहाँ?"
"इधर शृंगारपुर के पास मैदान में और कौंडभैरव तथा मालेश्वर की ओर
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'तामनाले' गाँव में।"
इस समाचार से महाराज के होश उड़ गये। वे घायल शेर की तरह वहीं पर
चक्कर काटने लगे। वे अत्यन्त बेचैन थे। वे अत्यधिक क्रोध से बोले, "नहीं, नहीं
येसू ! प्रलय आ जाये तो भी ऐसी बात नहीं होनी चाहिए। नहीं तो आठ वर्षों तक
हमने जो युद्ध किया, रात-दिन एक कर दिया, जिस उद्देश्य से हमारे हजारों वीर
और जानवर मिट्टी में मिल गये, उन सभी के वीरत्व और बलिदान पर पानी फिर
जाएगा।"
"सच है, महाराज !"
"सह्याद्रि के घाट को पार करके मुगलों को अन्दर आने देना मृत्यु को
निमन्त्रण देना है। उन्हें बुलाते हुए अपनी गुफा में ले आना किसी प्रकार अच्छा नहीं।
यह सम्भव नहीं है। मुगलों की फौज की तो बात ही क्या? उनके भूले भटके दो
चार घोड़ों का सह्याद्रि के इस क्षेत्र में पहुँचना उचित नहीं है।"
कविराज का महल महाराज के महल के इतना समीप था कि बुलाने पर भी
सुना जा सके। उन्हें तत्काल सूचित किया गया। वे तुरन्त तैयार होकर महाराज के
सम्मुख उपस्थित हुए। प्रतिदिन की समस्याओं और संकटपूर्ण स्थितियों ने, शम्भू
महाराज, कविराज और महारानी को इतना समीप ला दिया था कि अनेक बार उनकी
झपकने वाली पलकें, रुकी हुई साँसें और व्यंजक दृष्टियाँ ही पूरा संवाद कर लेती
थीं। अनेक बार प्रत्यक्ष संवाद की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी।
महाराज ने पूछा, "कविराज, अपने कलेजे में तेज कटार भोंककर क्या किसी
का जिन्दा रहना सम्भव है? उसी तरह कल यदि सह्याद्रि को पारकर कोंकण में
मुगलों की चौकी बन गयी तो ?—तो इस हिन्दवी स्वराज्य का टिक पाना सम्भव है
क्या ?"
"कौन, कौन दुस्साहसी निकला है ऐसी चौकी बनाने ?" कविराज ने
प्रतिप्रश्न किया।
शम्भू महाराज ने वह गुप्त पत्र कविराज को दिया। उस पर नजर घुमाते ही
कविराज चिन्तित हो गये। महाराज ने उसी क्षण प्रश्न किया, "कविराज अपना
मलकापुर के पास का तबेला कैसा है ?"
"महाराज, एकदम चिन्ता न करें। मलकापुर के पास की व्यवस्था पक्की है।
वहाँ पर पेरीड और कड़वा के मैदान में दस हजार तगड़े घोड़ों को मैंने तैयार रखा
है।"
इस चर्चा से महाराज को सान्त्वना मिली। कविराज को भी अच्छा लगा।
किन्तु येसूबाई ने चिन्तित स्वर में कहा, "केवल मलकापुर के रास्ते पर ही सारी
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फौज न रखिये। मुगलों ने चाहा तो किसी दूसरे रास्ते से भी प्रभावली में प्रवेश कर
सकते हैं।"
हरकारे से प्राप्त नये समाचार से तीनों की नींद उड़ गयी थी। मामला बहुत
गम्भीर बन गया था। मुगलों का आक्रमण केवल दरवाजे तक पहुंचा ही नहीं था
बल्कि दरवाजे को जोर-जोर से ठोक रहा था। कोल्हापुर, इस्लामपुर, कराड,
शिखल, चाकण जैसी मुगल चौकियों में शस्त्रों और गोलाबाहूद को जमा किया जा
रहा था। सह्याद्रि का गला घोंटने के लिए अनेक दल तैयार किये गये थे। जागीर के
लोभ में अनेक प्रतिष्ठित मराठे और ब्राह्मण प्रतिदिन मुगलों से मिल रहे थे।
बीजापुर से औरंगजेब अकलूज की ओर तेजी से बढ़ रहा था।
समय अब बदल गया था। गोलकुंडा की कुतुबशाही और बीजापुर की
आदिलशाही को औरंगजेब समाप्त कर चुका था। इन दो राज्यों को निगलकर
अजगर चुस्त हो गया था। आठ वर्ष तक अपरिचित क्षेत्र में रहकर सवार सैनिक ऊब
गये थे। प्लेग जैसी बीमारी से जर्जर मन को धीरज बँधाना कठिन था। सैनिकों का
मनोबल समाप्त हो चुका था। अब आक्रमण के अतिरिक्त उनके पास कोई विकल्प
ही नहीं था। हीरे और मोती से सजे आगरा और दिल्ली जैसे नगरों को छोड़कर,
कंकड़ों-पत्थरों की इस भूमि पर कब तक रहते। किसी भी तरह से आठ वर्ष की
इम लम्बी बीमारी का अन्त तो करना ही था। इसके साथ ही शिवाजी महाराज के
जामाता के साथ अनेक मराठा सरदार गद्दारी करके औरंगजेब का साथ दे रहे थे। इन
गद्दारों को अपने अधीन करके अजगर का जोश बहुत बढ़ गया था। अपना मनपसन्द
खाद्य भक्षण करने के लिए उसके दाँत बेताब हो रहे थे। शम्भू महाराज गम्भीर स्वर
में कविराज से पूछने लगे, "अब किया क्या जाये, कविराज?"
"आप जो कह रहे हैं वही सच है। प्रभावली क्षेत्र में मुगलों की चौकी बनने
देना उसी तरह है जैसे किसी जहरीले मणियार साँप को रस्सी समझकर पेट के पास
रखकर सोना।"
महाराज अत्यन्त उद्विग्न अवस्था में पलंग पर बैठ गये। वे हताश और दुखी
स्वर में बोले, "औरंगजेब को हमारे आँगन चौकी बनाने का निमन्त्रण हमारे सगे
साले गणोजीराव ने ही क्यों दिया? गद्दारी और धोखेबाजी के लिए शिर्के खानदान
पहले से ही विख्यात है।"
"महाराज जरा धीरे-" अपने मायके के इस पर्दाफाश से येसूबाई बहुत
विचलित हो गयी थीं।
"क्या मैं झूठ कह रहा हूँ?" शम्भू महाराज ने पूछा।
"किन्तु-"
"जाने दो, येसू, सम्भव है कि हम भूल जायें, शायद तुम भी भूल जाओ।
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किन्तु तीन सौ वर्ष पूर्व इसी संगमेश्वर और विशालगढ़ की कठिन पहाड़ियों में घटी
घटना को इतिहास कभी नहीं भूल सकता। आज भी यहाँ की पहाड़ियों, घाटियों
और जंगली हवाओं को तीन सौ वर्ष पूर्व के प्रसंग का स्मरण होता है तो वे पागल
कुत्ते की तरह भौंकने लगते हैं।"
शम्भू महाराज ने पुराना प्रसंग छेड़ा तो कवि कलश भी उनका मुँह देखने
लगे। शम्भू महाराज बहमनी साम्राज्य के सेनापति मलिक उत्तुजार की कहानी बताने
लगे— मलिक उत्तुजार जिस समय अपनी सात हजार की सेना लेकर इस जंगल में
आया था। उस समय खेलणा उर्फ विशालगढ़ किले पर शंकरराय मोरे का अधिकार
था। उसी पर मलिक को आक्रमण करना था। उस समय मलिक अपनी सहायता के
लिए श्रृंगारपुर के शिर्के से मिला। शिर्के ने बहमनी के सेनापति से खूब धन वसूला।
विशालगढ़ का रास्ता दिखाने की शर्त स्वीकार की। किन्तु मलिक उन्हें ठीक समझ
नहीं पाया था।
आरम्भ में दो दिन शिर्के ने बहुत कठिन रास्ते में उन्हें भरमाया यह जंगल
इतना घना था कि शेर भी इसमें घुसने से डरते थे। यहाँ के ऊँचे पर्वत और यहाँ की
गहरी खाइयाँ इतनी भयानक कि भूत और राक्षस भी वहाँ जाने से घबराते थे। तीसरे
दिन शिर्के ने मलिक उत्तुजार को ऐसा रास्ता दिखाया कि मुसलमान सैनिकों को नानी
याद आ गयी। इस जंगल की विषैली हवा अजगर की फुफकार जैसी थी। ऊँची
ऊँची घासों में मानो साँप के दाँत निकल आये थे। तीन ओर आसमान को छूते हुए
पहाड़। रास्ता काँटों से भरा और पथरीला। कोस कोस तक मनुष्य की बस्ती का
नामोनिशान नहीं। बहमनी सेना को ठीक से अनाज नहीं मिल पा रहा था। रात में
मलिक के सैनिकों को तम्बू गाड़ने तक की जगह नहीं मिली। सैनिक जंगल की
पत्तियाँ खाकर जान बचा रहे थे। थके माँदे सैनिक रास्ते पर लकड़ी के लट्ठे की तरह
पड़े थे। अन्न पानी के अभाव मे सूखे अभागे सैनिक जब विश्राम कर रहे थे उसी
समय दगाबाज शिर्के ने जाकर शंकरराय को सूचना दी, "कितने कठिन प्रयास से
मैंने मलिक की फौज को आपके जबड़े में लाकर रख दिया है। अब जैसा चाहें वैसा
बर्ताव उनके साथ करें।" अपनी सुसज्ज फौज के साथ उस जंगल में शीघ्रता से
पहुँच गया। जैसे सूखने के लिए कपड़े फैलाए जाते हैं, उसी प्रकार थके माँदे,
भूखे प्यासे सैनिक रास्ते पर अंग समेटे सोये पड़े थे। रात में ही मोरे की फौज ने
ठंड से कुड़कड़ाते सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। जैसे किसी मेले में हजारों बकरों
को एक साथ काट दिया जाता है उसी प्रकार सात हजार सैनिकों को हलाल कर
दिया गया। जिस समय अर्द्धजागृत सैनिकों की करुण चीत्कार हो रही थी उस समय
हवा उल्टी बह रही थी। इसलिए उनकी आवाज किसी को सुनाई नहीं पड़ी।
582 .: सम्भाजी
इस भीषण कथा को जब महाराज ने सुनाया तो कविराज और महारानी दोनों
उदास हो गये। शम्भू महाराज ने दुखी स्वर में कहा, "बताइए येसूबाई, शिर्के की
औलाद पर कोई कैसे भरोसा करे?"
येसूबाई उदास भाव से हँसकर बोली, "हमारे मायके को ही आप क्यों दोष
दे रहे हैं? मेरी ससुराल की बात भी कुछ अलग नहीं है। आज आपके सगे चचेरे
भाई अर्जुन जैसे कुलभूषण किसके लिए लड़ रहे हैं? उस औरंगजेब के लिए ही न?
शिवाजी जीजामाता आज किसकी सेवा में हैं? औरंगजेब की ही न?"
"फिर भी येसू- "
"महाराज जाति का महत्त्व नहीं होता। धर्म भी महत्त्वपूर्ण नहीं है। मनुष्य
का कर्म ही महत्त्वपूर्ण होता है, यह आप जैसे संस्कृत पंडित को बताने की
आवश्यकता नहीं है। ईश्वर ने मुझे गणोजी जैसा कृतघ्न भाई दिया है, फिर भी मैंने
पिलाजीराव जैसे पुण्यवान पिता के घर जन्म लिया है। आज पिलाजी शिर्के की पुत्री
येसूबाई रायगढ़ की महारानी बनी है। यह येसूबाई अपने कुल का नाम उज्ज्वल
किये बिना नहीं रहेगी।"
शम्भू महाराज ने पुनः अपना रुख कवि कलश की ओर किया। उन्होंने कहा,
"इससे पहले भी शत्रुओं ने अनेक बार आक्रमण किया था। रायगढ़ में प्रवेश करने
का प्रयास किया था। उन्हें सबसे पहले प्रभावली का ही मार्ग दिखा।"
कवि कलश बीच में ही बोल पड़े, "हमने रायगढ़ की कालनदी के किनारे
कभी शत्रुओं की दाल गलने नहीं दी।"
"किन्तु कविराज, उस समय हमारे किसी गाँव वाले या जमींदार दुश्मन को
आश्रय नहीं दिया था। आज तो हमारे सगे साले शत्रु की उँगली पकड़कर उसे अपने
राजमन्दिर की ओर ले आ रहे हैं।"
"गणोजी को कौन पूछता है?" येसूरानी ने कहा।
"नहीं येसू, शत्रु और धोखेबाज को नज़रअन्दाज नहीं करना चाहिए। महल
की रक्षा प्राचीर में थोड़ी भी दरार रहने से विषैले साँप की तरह शत्रु प्रवेश कर
सकता है, हानि पहुँचा सकता है।"
"तो महाराज रंचमात्र भी शिथिलता न करें। शिर्केवंश पर आक्रमण का
दायित्व आप मुझे दें। मैं स्वयं जाऊँगी प्रभावली।"
"महारानी?" महाराज ने तिरछी नजर से देखा।
"महाराज, यह येसूबाई शिवाजी महाराज की पुत्रवधू है। इसके साथ ही
तलवार चलाने की शिक्षा मेरे पिता पिलाजीराव ने बचपन में दे दी है।"
सम्भाजी महाराज विचारमग्न हो गये। उन्होंने कहा, "येसू, आपका विचार
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बुरा नहीं है। गणोजी आज नीचता की हद पर पहुँच गया है। उसका मुँह तोड़ने के
अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। किन्तु यदि आप वहाँ जाएँगी तो
रायगढ़ का राजकीय कार्यभार कौन सँभालेगा?''
''क्या मतलब महाराज?''
''आज मराठा राज्य की महारानी की अपेक्षा मुख्य दीवान का दायित्व आप
पर अधिक है। इसके अतिरिक्त राजकीय कार्यभार सँभालने वाला कोई समर्थ और
भरोसेमन्द व्यक्ति बचा भी तो नहीं है।''
येसूबाई कुछ बोली नहीं। तब सम्भाजी महाराज ने आशाभरी दृष्टि से
कविराज की ओर देखा। कविराज के चेहरे का रंग बदल गया। महाराज ने दुख से
कहा, ''क्षमा करें कविराज, सभी अप्रिय कार्य करने की जिम्मेदारी दुर्दैव से आपके
ही ऊपर आती है। इससे पहले हंबीरराव जैसे आत्मीय व्यक्ति पहाड़ की तरह हमारे
पीछे खड़े होते थे। किन्तु दुष्ट काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। कोंडाजी बाबा जैसे
रत्न को हमने जंजीरे के लिए खो दिया। धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल जैसे
तरुण योद्धा किसी न किसी मोर्चे पर स्वराज्य के लिए लड़ रहे हैं। इसलिए आपके
अतिरिक्त और कोई भरोसे का आदमी बचा ही नहीं है।''
महाराज के विषण्ण सुर से कविराज उत्साहित हो गये। वे शम्भू महाराज के
सामने झुककर, उनका वन्दन करते हुए बोले, ''आज्ञा करें, राजन, केवल आज्ञा
करें।''
''कल सवेरे पाचाड़ से निकालिए। पन्द्रह हजार की सेना लेकर औरंगजेब
और गणोजी के फौजी समझौते होने से पहले ही प्रभावली पहुँच जाइये। शिर्के के
बचे खुचे तबेले और महल बेचिराग कर दीजिए। हिन्दवी स्वराज्य का गला घोंटने
से पहले ही, शिर्के के सारे षड्यन्त्र को ध्वस्त कर दीजिए। शिर्के का सारा इलाका
आग के हवाले कर दीजिए।''
पाँच
लालबारी की दशा अत्यन्त शोचनीय हो गयी थी। बहुत से शाही हकीम और हिन्दू
वैद्य वहाँ से दबे पाँव लौट रहे थे। बादशाह का दल ही नहीं पूरी लालबारी
कराहती-सी प्रतीत हो रही थी। बुखार के ऐसे रूप का मुगल सेना ने कभी अनुभव
584 :: सम्भाजी
ही नहीं किया था। फौज के कुछ फिरंगी तोपची इस रोग को प्लेग कहते थे।
लालबारी के पास का आकाश दीप भी रोग के साथ ही अन्धे की भाँति टिमटिमाता
हुआ रातभर इधर-उधर देखता रहता था।
बादशाह को भी थोड़ा ज्वर आ गया जिससे सभी परेशान हो गये। अब तक
करीब सत्तर हजार मुगल सैनिक इस रोग की-चपेट में आ गये थे। हवा में चारों ओर
दुर्गन्ध फैल गयी। सैनिकों के कराहने की आवाज इतनी बढ़ गयी कि वहाँ रहना
कठिन हो गया। मृत्यु का भय या उसकी भयानकता का अनुभव अब किसी को
होता ही नहीं था। लोग इतने भावनाशून्य हो गये थे कि मृत्यु पर भी कोई शोक नहीं
करता था। किया भी तो कौन किसकी सुनता? प्रत्येक तम्बू में खुली जगह में,
तम्बुओं की आड़ में सभी जगह दुर्गन्ध फैल गयी थी। मृत्यु की काली छाया सभी
ओर पहुँच गयी थी। चार-छह दिनों में ही पूरा क्षेत्र एक बड़े कब्रिस्तान में बदल
गया था। मृत्यु की छाया एक पागल बन्दर की तरह औरंगजेब के पीछे पड़ी थी।
बादशाह के दो पोतों की मृत्यु हो गयी। असदखान भी प्लेग के बुखार में तड़पते
हुए अपने डेरे में पड़ा था। बादशाह ने एक महीने में चार बार अपनी जगह बदली
थी।
पिछले सप्ताह से औरंगजेब बहुत बेचैन हो गया था। एक ओर मैदान में
हजारों लाशें पड़ी थीं और दूसरी ओर लाशों को खाने वाले गीदड़ और कुत्ते भी
वहाँ फटक नहीं रहे थे। इस शैतानी बीमारी का कोई इलाज भी नहीं था। अपने मन
को सान्त्वना देने के लिए लोग हकीम से किसी वनौषधि का पत्ता माँगकर ले जाते
थे। उसे चूसते हुए ठनकती गाँठों को काँख या जाँघ में दबाकर सो जाते थे। दो-चार
दिन में मौत आ जाती थी। तम्बू में यदि कोई समीपी व्यक्ति हुआ तो शव को
खींचकर ले जाता था। कब्र के नाम पर कहीं पर सिर्फ मिट्टी ढक देता था। किन्तु
दफनाने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी। मुर्दों को खींचकर ले जाने के लिए
भी कोई नहीं मिलता था। मुर्दा ढोने वाले भी मुर्दा ढोते-ढोते महामारी से ग्रस्त
होकर मर रहे थे। भिश्ती समाप्त हो चुके थे।
बादशाह अपने शाही डेरे की कनात की खिड़की से दूर देख रहा था।
महामारी से टूटा हुआ बीजापुर साफ दिखाई पड़ रहा था। उस नगर के सामर्थ्य और
अभिमान का प्रतीक गोलगुम्बद भी काला पड़ गया था। औरंगजेब को बहुत सूनेपन
और अकेलेपन का अनुभव हो रहा था। उसकी दोनों प्यारी बेगमें उदयपुरी और
औरंगाबादी घबराकर उसके सिरहाने बैठी थीं। बादशाह को बुखार आ गया था।
किन्तु महामारी की गाँठ बादशाह को न आये इसके लिए अल्लाह से दुआ माँग रही
थीं।
सम्भाजी :: 585
बादशाह बहुत टूट गया था। महीने-डेढ़ महीने में सत्तर हजार फौज समाप्त
हो चुकी थी। दुखी औरंगजेब ने आकाश की ओर देखा। गहरी साँस लेते हुए उसने
कहा, "उदयपुरीऽ इतनी बड़ी लड़ाइयाँ हमने जीतीं। गोलकुंडा के उस मूर्ख
तानाशाह को एक बार नहीं दो बार पराजित किया। वहाँ खाई में आधे हैदराबाद को
गाड़ दिया। बीजापुर की अभिमानी तटबन्दी को ध्वस्त कर दिया। वहाँ का खजाना
हासिल किया। कुतुबशाह और आदिलशाह दोनों गीदड़ के बच्चे की तरह आज
हमारी कैद में पड़े हैं। किन्तु इस आसमान जैसी बड़ी विजय का फायदा क्या?"
"हजरत आप अधिक बात न करें। आराम करें—" उदयपुरी बेगम ने हाथ
जोड़कर कहा।
"बेगम, आज दो बड़ी सल्तनतों की मिली विजय पर हँसें या प्लेग द्वारा
कमर तोड़ दिये जाने पर रोयें?"
बादशाह को किसी तरह समझाया गया। किन्तु उसी समय जुल्फिकारखान
वहाँ आ गया। उसने रोज की तरह मरने वालों की संख्या का आँकड़ा प्रस्तुत किया।
"किब्लाए आलम आज केवल दो हजार।"
"लड़ाई के मैदान में दो हजार सिपाही बिना लड़े मर जायें तो यह कोई
मामूली संख्या नहीं होती, बेवकूफ नौजवान!" बादशाह ने क्रोधावेश में कहा,
"जुल्फिकारखान तुम अपने परवरदिगार से पूछो कि हमारी छावनी में हजारों सैनिक
मक्खियों की तरह मर रहे हैं फिर वहाँ उस जहन्नमी सम्भा को मौत क्यों नहीं
आती?"
कमजोरं और बीमारी से जर्जर फौज को लेकर आगे बढ़ना सम्भव नहीं था।
प्लेग मानो सम्पूर्ण मानवजाति को समाप्त करने के लिए ही आया था। लोगों को
दो तीन दिन तक ज्वर आता था। उससे कुछ भाग्यशाली बच भी जाते थे। किन्तु
काँख की गाँठ के साथ सारे शरीर में फैलने वाला विचित्र बुखार सचमुच जानलेवा
था। जो भाग्य से बच गया तो भी उसके शरीर की सारी शक्ति निकल जाती थी।
वह व्यक्ति इतना क्षीण और शक्तिहीन हो जाता था कि वह चलती-फिरती लाश
बन जाता था। मैदान में हजारों लोग कराहते हुए पड़े थे।
इस विचित्र अवस्था ने बादशाह को पागल बना दिया था। किन्तु बादशाह इस
बात को क्षणमात्र के लिए भी नहीं भूला था कि इस अवस्था से बाहर निकलकर
सबसे बड़े तीसरे शत्रु को विनष्ट करना है। इसलिए अपने कार्यव्यापार और पत्राचार
से उसका ध्यान जरा भी नहीं हटता था। असदखान डेरे में बीमार होकर पड़ा था।
उसका काम जुल्फिकार सँभाल रहा था।
अपने मौसेरे भाई को सामने बैठने का संकेत करते हुए औरंगजेब ने कहा,
586 :: सम्भाजी
"आज सवेरे अपनी मेवाती और मुल्तानी फौज के मुखिया मुझसे मिलने आये थे।
उन्हें दो महीने से तनख्वाह क्यों नहीं दी गयी? तनख्वाह के लिए फौजियों को
कितने दिन इन्तजार करना चाहिए?"
"हुजूर अब तक आधा खजाना खाली हो चुका है-अभी आगे-?"
"क्या बकते हो? जुल्फिकार, अरे दक्षिण के दो विख्यात राज्यों को हमने
जीता। उनका खजाना लूटकर ले आये। फिर भी खजाना खाली ?"
"जहाँपनाह, पिछले दो महीने से बंगाल से आने वाली वसूली आयी ही
नहीं। अपना सूबेदार खुर्शीद कुलीखान वहाँ टालमटोल कर रहा है। बाकी के हमारे
सारे हिन्दुस्तानी सूबेदार भी नियमित रूप से गशि भेज नहीं रहे हैं। उन्हें लगता
है-उन्हें"
"हाँ, बोलो, बोलो। अपने मन की बात साफ-साफ कहो।"
"हुजूर उन्हें लगता है कि बीजापुर, गोलकुंडा जीत लिया तो भी बीच में
अभी मराठे हैं। उस जहन्नमी सम्भा की फौज को पार करके अपनी शाही फौज का
दिल्ली पहुँचना इतना सरल नहीं है।" यह कहते हुए जुल्फिकार का चेहरा भय के
कारण पसीने से भीग गया।
बादशाह ने क्रोध से अपनी आँखें घुमाईं। अपने क्रोध को उसी तरह दबा
लिया जैसे विष का प्याला सहज रूप से पी लिया हो। उसने जुल्फिकार की
सहायता से एक बड़ा षड्यन्त्र रचा था। यह षड्यन्त्र था रायगढ़ से राजाराम को
उठाकर ले आने का। उनका नाम सामने रखकर मराठा राज्य की दूसरी गद्दी स्थापित
करने की योजना थी। बादशाही का संरक्षण देकर पूना के आसपास दूसरी राजगद्दी
बनानी थी। अनुमान था कि इससे औरंगजेब की शरण में पहले ही आ चुके गद्दार
और सम्भाजी से असन्तुष्ट मराठे और ब्राह्मण एकत्र हो आएँगे। वे भी प्रसन्न होंगे।
सम्भाजी की शक्ति कम हो जाएगी। हिन्दवी स्वराज्य अपने आप ध्वस्त होने
लगेगा।
किन्तु फौलादी सुरक्षा वाले रायगढ़ से राजाराम को उठा ले आना,
गुलबकावली के फूल प्राप्त करने जितना ही कठिन था। फिर भी निर्भीक सीने वाले
बीस पठान और तुर्की फौजी रायगढ़ की ओर चले गये थे। उनका स्मरण करते हुए
औरंगजेब ने पूछा, "वहाँ की कुछ खबर ?"
"जहाँपनाह, योजना आपके दिमाग की उपज है। उसकी तामील हम बड़ी
सावधानी और होशियारी से कर रहे हैं। हमारा जैनुद्दीन गोलकुंडा का सरदार
खवासखान के रूप में कभी का चला गया है। उसके साथ उन्नीस बहादुर सिपाही
हैं।"
"उस सम्भा को सन्देह हो गया तो-?"
सम्भाजी ·· 587
"सम्भा की गैरहाजिरी में हमारा जैनुद्दीन राजाराम से भेंट करेगा। वह भी
नीचे पाचाड़ के महल में। क्योंकि रायगढ़ पर षड्यन्त्र करके नीचे आ पाना बहुत
कठिन है। सम्भा किले पर रहता ही नहीं। इसी का फायदा उठाना है।"
"हर कदम फूँक-फूँककर रखो।"
"जहाँपनाह, उसकी फिक्र न करें। महादजी निंबालकर के पास बैठकर
पाचाड़ का नक्शा बनाया गया है। वहाँ पर उस काफिर सम्भा ने अपनी दादी की
याद में मन्दिर बनवाया है। खुली हवा का सेवन करने राजपरिवार कभी-कभी वहाँ
आता है। महादजी उनका जमाई है। उसने सभी बारीक बारीक बातें नक्शे में दिखा
दी हैं।"
निजी बैठक समाप्त हो गयी। बादशाह उठकर बड़े उत्साह से चलता हुआ
सामने कचहरी के डेरे में पहुँच गया। वह जुल्फिकार के साथ कागज पत्र देखने
लगा। इसी समय एक पत्र को सामने करते हुए जुल्फिकार ने कहा, "जहाँपनाह यह
देखिए, सम्भाजी के साले गणोजी शिर्के का यह पत्र-"
पत्र पढ़ने से पहले ही बादशाह ने पूछा, "वह गणोजी कोंकण के जंगलों में
हमारे लिए दो चौकियाँ बनाने में मदद करने वाला था। उसका क्या हुआ?"
"हजरत गणोजी तो बहुत चाहता था। किन्तु उस कवि कलश एवं सम्भा ने
उसे बहुत परेशान कर दिया है। उसने लिखा है-"
"हाँ, पढ़ो-"
"सारी धरती के बादशाह,
आलमगीर औरंगजेब बहादुर
बालक गणोजी नतसिर अभिवादन।
बादशाह सलामत! अब मेरे जैसे खानदानी मराठा की आप अधिक परीक्षा न
लें। कृपा करके हमारी सहायता कीजिए। इस पत्र से हुजूर को स्पष्ट कर देना चाहते
हैं कि हमारा मराठों का राजा सम्भाजी एकदम पागल हो गया है। उसे समाप्त
कीजिए। हमारे राजा ने कवि कलश नाम के मूर्ख को आत्मीय मित्र बना लिया है।
ये दोनों हमारे शिर्के प्रदेश का नाश कर रहे हैं। उन्होंने आगजनी और लूटपाट करके
हमारा जीना हराम कर दिया है। रोज हमारे घर जल रहे हैं, फसलें राख हो रही हैं,
तबेले आग के हवाले हो रहे हैं। जंजीरे का सिद्दी हमारा मित्र है इसलिए हमारी
स्त्रियों और हमारे बच्चों को उनके किले में सुरक्षा मिल गयी है। नहीं तो इस दुष्ट
सम्भा ने हमें जन्मभर बिना जागीर के रखा। हमारे लिए यहाँ न घर न द्वार। शिवा
सम्भा ने हमें जंगली जानवरों की तरह दर दर भटकने के लिए विवश कर दिया
है।"
588 :: सम्भाजी
पत्र पढ़ लिया गया। औरंगजेब ने आँखें ऊपर उठाकर जुल्फिकार से पूछा,
“जुल्फिकार, इस गणोजी की सेना कितनी बड़ी है?''
“गणोजी की फौज—फौज” जुल्फिकारखान रुकते हुए बोला, “होगी
हजार-बारह सौ की लाठी-लकड़ियों वाली भीड़। फौज कहने लायक कोई भी
चीज उनके पास नहीं है।''
“हूँ, जुल्फिकार इस प्लेग की चपेट से मुक्त होते ही हमें सम्भा की ओर
कूच करना है।''
“जी, हुजूर।”
बादशाह बैठक में ही था कि भीतर बदहवास नौकर दौड़ते हुए आये। नौकरों
के भयभीत चेहरे को देखकर बादशाह घबरा गया। तुरन्त उठकर भीतर की ओर
चलता बना। उसे जानना था कि गाँठ का ज्वर उदयपुरी को आया है या औरंगाबादी
महल को। बादशाह ने भीतर जाकर देखा। औरंगाबादी बेगम को भयंकर ज्वर चढ़ा
था। उसकी काँख के नीचे सुर्ख गाँठ फूल आयी थी। औरंगाबादी बेगम असह्य पीड़ा
से बिस्तर में छटपटा रही थीं। जुल्फिकार ने शाही हकीम के पास सन्देश भेजा।
किन्तु बहुत समय बीत जाने पर भी हकीम नहीं आया।
तब फौलादखान ने सिर नीचा करके कहा, “हुजूर कल रात को शाही हकीम
इस जालिम रोग से अल्लाह को प्यारे हो गये।''
“उसके बेटे को बुलाइये।”
“हुजूर वह सवेरे ही अपने बाप को दफनाकर वापस आया। अब उसकी भी
जाँघ में गाँठ उठ गयी है। बेचारा अपने डेरे में मुर्गी की तरह छटपटा रहा है।”
अन्त में जो होना था हो गया। गाँठ के इस दानवी रोग ने काला-गोरा,
हिन्दू-मुसलमान, राजा-रंक जैसा कोई भेद किया ही नहीं था। उसने अपने जबड़े में
बादशाह की लगभग पचहत्तर हजार सेना निगल ली थी। उसी में औरंगाबादी बेगम
के रूप में एक और का इजाफा हुआ।
दूर देश की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर औरंगाबादी बेगम को दफन किया
गया। कब्र की एक मुट्ठी गीली मिट्टी लेकर औरंगजेब खूब रोया। सभी को लगा कि
बेगम के वियोग ने उसे विकल कर दिया है। किन्तु बादशाह अपने भीतर की घोर
वेदना को बाहर निकाल रहा था। पिछले छह-सात वर्षों में की गयी बादशाह की
सारी कोशिश, उसकी प्रचंड महत्त्वाकांक्षा और झोली में आयी नगण्य सफलता।
दैवी शक्ति के सामने मनुष्य की विवशता, दुःख, विफलता, निराशा आदि का वह
सारतत्त्व था।
दस-पन्द्रह दिन और बीते। महामारी धीरे-धीरे समाप्ति पर आयी। सौभाग्य
सम्भाजी : 589
से वजीर असदखान उसकी चपेट से बच गया। किन्तु फिरोजजंग हमेशा के लिए
अन्धा हो गया। किसी को अन्धा, किसी को बहरा करके और हजारों को सदा के
लिए अपने साथ लेकर महामारी चली गयी।
बादशाह के पास प्रतिदिन नये समाचार आ रहे थे। सम्भाजी भी अकाल की
बाधा से बाहर निकल रहे थे। किन्तु उनके खंडो बल्लाल, निलोपन्त पेशवा, केसो
त्रिमल और सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े के कार्यों में गति नहीं आ रही थी। मराठों
ने सावधानी और आक्रामक तरीके से सर्जाखान को कब्जे में कर रखा था। ऐसे संकेत
मिल रहे थे कि सम्भाजी बादशाह के विरुद्ध कोई बड़ी योजना बना रहे हैं।
सम्भाजी की आक्रामकता से बूढ़े बादशाह में नया जोश आ गया। 14 सितम्बर,
1688 के दिन कूच के नगाड़े बज गये। लाखों जानवरों और मनुष्यों के साथ
औरंगजेब, नयी आशा से महाराष्ट्र के पठार की ओर बढ़ने लगा।
छह
जत के मैदान में बादशाह का डेरा पड़ा था। लगभग बीस मील तक शाही फौज के
डेरे-डंडे फैले थे। मध्यभाग में बादशाह का लालरंग का तम्बू अधिक मटमैला दिख
रहा था। लम्बी यात्रा के कारण ऊँट हड़बड़ा गये थे, घोड़े शिथिल पड़ गये थे।
भरपूर पानी न मिलने के कारण हाथी भी त्रस्त दिखाई पड़ रहे थे। दो सौ से अधिक
फौजी बाजार सूने-सूने लग रहे थे। शाही फौज का पहले वाला उत्साह, जोश, शान
आदि कुछ भी शेष नहीं था। जैसे किसी सुन्दर पुरुष की कान्ति पर चेचक के दाग
पड़ गये हों और बुढ़ापे के कारण उसका चेहरा सूख गया हो, उसी तरह शाही फौज
का सारा उत्साह सूख चुका था।
प्रतिदिन की तरह सवेरे अपना नियमित नमाज अदा करके, कपड़े पहनकर,
बादशाह शिविर के दरबार की ओर जाने के लिए निकला। उसी समय उदयपुरी
बेगम वहाँ पर आ गयीं। उन्होंने बादशाह के उड़ते बालों को 'हाथ से सँवारते हुए
कहा, "हजरत, आज आपने आईना नहीं देखा क्या?"
इन शब्दों को सुनते ही औरंगजेब ने उदयपुरी के हाथ को झटककर पीछे कर
दिया। उसके इस रूप को देखकर उदयपुरी बेगम घबरा गयीं। वह हाथ जोड़कर
थरथर काँप रही थीं। तब बादशाह क्रोध में ही गुर्राया, "बेगम साहिबाऽ आप कैसा
590 :: सम्भाजी
सवाल कर रही हैं? पिछले पाँच वर्षों में इस आलमगीर ने कभी आईना देखा? ऐसा
कोई दिन याद है आपको?''
''हजरत क्षमा करें।''
''बेगम साहिबा, कैसे और किस मुख से आईने मे अपना चेहरा देखूँ?''
विफलता के विषाद से तडपते हुए बादशाह ने कहा, ''आज सारी दुनिया में शायद
ही किसी के पास मेरी जितनी बड़ी हुकूमत हो। फिर भी यह शहंशाह बिना
राजमुकुट के पिछले पाँच वर्षों से दक्खिन की इस नादान धरती पर दर दर भटक
रहा है। कैसा शहंशाह और कैसी सल्तनत? राज्य होने पर भी सिर पर मुकुट पहनने
का अवसर नहीं। तो भी बेशर्म की तरह आईने में अपना मुँह देखना चाहिए?''
''मेरे आका मुझे माफ कर दो ऐसी गलती आगे नहीं होगी।''
बादशाह ने स्वयं को सँभाल लिया। वह उदास भाव से कुछ धीमे स्वर में
बोला, ''बेगम साहिबा, आईने में देखते हुए काफिर हिन्दुओं की स्त्रियाँ जब अपने
माथे पर कुंकुम नहीं देखतीं और अनुभव करती हैं कि उनका पति जिन्दा नहीं है तो
उन्हें अत्यन्त दुख होता है। मेरी स्थिति भी उन्हीं काफिर स्त्रियों जैसी हो गयी है।
बिना मुकुट के अपने सिर को देखते हुए मुझे भी बड़ी ग्लानि होती है।''
खिन्न बादशाह धीरे धीरे चलते हुए, बैठक में आकर बैठ गया। असदखान ने
महामारी से अपनी आँखों को किसी प्रकार बचा लिया था। किन्तु आज वह बहुत
नाराज दिखाई पड़ रहा था। मेंहदी लगी अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए और
असदखान पर नजरें टिकाए, बादशाह ने कहा, ''वजीरे आजम आप साफ-साफ
क्यो नहीं कहते कि उस काफिर सम्भा से आज भी हमारी फौज घबराती है।''
''जी हाँ जहाँपनाह, सभी घबराते हैं उस सम्भा से और वह जिस पहाड़ी पर
रहता है उस सह्याद्रि पर्वत से।''
आप भी तो आजकल फौज की सारी खबरें मुझ तक कहाँ पहुँचाते हो, वजीरे
आजम?
ऐसा कैसे होगा जहाँपनाह? आपको कुछ गलतफहमी-''
''फिर बताइये-ये क्या है-कबड़ी और कबरी?''
अब तो वजीर की जबान रुक गयी। उसे इस बात का आश्चर्य हुआ कि
इतनी छोटी छोटी बाते भी बादशाह के कान तक पहुँचती हैं। उसे स्वप्न में भी
इसकी कल्पना नहीं थी। वजीर पर अपनी कड़ी नजर डालते हुए बादशाह ने कड़े
स्वर में पूछा, ''क्या है यह कबड़ी और कबरी?''
वजीर का चेहरा ऐसा हो गया जैसे भट्ठी मे तपता हुआ कोई हथियार पकड़
लिया हो। घबराकर वजीर बताने लगा, ''जहाँपनाह हमारे फौजी विश्राम के समय
में एक खेल खेलते हैं। हाथ की छड़ी से धूल में छोटे-छोटे गोले बनाते हैं। हर
सम्भाजी 591
गोले की दक्षिणी दिशा को नदी का नाम दिया जाता है। कौड़ियों को इकट्ठा करके
गोले में फेंकते हैं। सिपाहियों का विश्वास है कि जिस सिपाही की कौड़ी गोले में
पड़ेगी, उसकी कब्र उसी नदी के किनारे बनेगी। क्या बताऊँ आलम पनाह? हमारी
सारी फौज भयाक्रान्त है। हर एक भीतर ही भीतर तड़प रहा है। सभी एक दूसरे से
पूछते रहते हैं कि 'हम गंगा-यमुना की ओर जिन्दा लौटेंगे या यहीं कहीं लावारिस
की तरह हमारी लाश गिरेगी'?"
"वजीर यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। तुम्हारे फौजी यह भी जानने का
खेल खेलते हैं कि बादशाह की कब्र कहाँ खोदी जाएगी? क्यों? बोलो! बोलो!!"
हताश बादशाह व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसकर बोला, किन्तु उसके क्रोध के पीछे जो वेदना
थी उसे छुपा पाना सम्भव नहीं था। विषय को बदलते हुए बादशाह ने वजीर से
पूछा, "वजीर, नासिक और बागलाण की क्या खबर है?"
"जहाँपनाह, आपके वफादार महावतखान ने वहाँ पर बड़े जोश से काम
किया है। त्र्यंबक के किले पर पिछले छह महीने से घेरा डाल रखा है। रसद का
एक दाना भी किले पर नहीं पहुँच रहा है। किले पर मराठे भूख से छटपटा रहे हैं।
दो दिनों में ही किला कब्जे में आ जाएगा।"
इसी बीच बादशाह का तीस वर्षीय पोता मोमिन खान दौड़ते हुए आया और
बड़े उत्साह से कहने लगा, "मुबारक हो जहाँपनाह। बहुत अच्छी खबर-"
"क्यों, क्या हुआ?" अपने पोते पर दृष्टि खड़ाते हुए बादशाह ने पूछा, "ओ
जहन्नमी सम्भा अल्लाह को प्यारा हुआ या पकड़ा गया?"
"नहीं, नहीं, वैसा नहीं, लेकिन दादाजान-" पोता हकलाया।
"वैसा नहीं तो तुरन्त अपना मुँह काला करके निकल जाओ। इस किले पर
घेरा डाला, उस किले पर घेरा डाला, ऐसी बकवास अब बन्द करो। बेवकूफो, उस
पापी शिवा और सम्भा के तीन सौ से भी अधिक किले हैं। तुम्हारी इन फिजूल की
बातों को सुनते-सुनते जिन्दगी समाप्त हो गयी, शैतानो।"
मोमिन खान उल्टे पैर भाग गया। क्रोधित बादशाह उखड़ते हुए फिर वजीर
से बोला, "पाँच लाख की फौज और पिछले आठ-नौ वर्षों का समय? हमारे
तैमूरवंश में बाबर हुए, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, इतने खुदा के बन्दे आकर गये।
पिछले दो सौ वर्षों से हमने हिन्दुस्तान पर राज्य किया। परन्तु इस तरह की आठ-
नौ वर्षों की जालिम लड़ाई देखी थी किसी ने?"
"बादशाह सलामत थोड़ा धीरज धारण करें।" असदखान ने आत्मीयता
से कहा।
"वजीर, आपको मालूम नहीं, हमारी सारी फौज को पागल होना ही बाकी
है। पिछले आठ वर्षों से हमारे सैनिकों को घर मकान, बाले-बच्चे, किसी भी बात
592 :: सम्भाजी
का कुछ पता नहीं है। फौज ने रास्ते में मिली कितनी औरतों और बाजारू वेश्याओं
को बर्बाद कर दिया। बहुत-सी मर गयीं। बहुत से फौजियों को असाध्य रोग ने
जकड़ लिया है। रात के अँधेरे में पुरुष ही पुरुषों पर अत्याचार कर रहे हैं। यहाँ
शैतानी बारिश, महामारी और यहाँ के भयानक अकाल से सारी फौज जर्जर हो गयी
है। उनका मनोबल टूट चुका है। यदि समय पर इस स्थिति से सँभाला न गया तो
एक दिन ये सारे सैनिक सन्तप्त होकर बादशाह को ही जिन्दा दफन कर देंगे।"
अल्लाह ने बादशाह को बड़े जटिल चक्कर में फँसा दिया था। उसकी फौज
में निरन्तर विवाद बढ़ रहे थे। अमदखान पहले शहंशाह से बड़े अदब से बोलता
था। किन्तु परिस्थिति के कारण वह भी बदल गया था। वह फौज की समस्या को
बादशाह से कह रहा था।
"मेरे आका, अब ज्यादा समय तक फौज को रोके रखना कठिन है।"
"हम किसी भी युक्ति से उस सम्भा को सह्याद्रि पर्वत से बाहर निकालेंगे।"
"उसकी भी सारी कोशिशें बेकार हो गयीं। सम्भा बाहर आता ही नहीं। वहाँ
पर फौजी चौकियाँ बनाने में भी कोई हमारी सहायता नहीं कर रहा है। वह गणोजी
शिर्के भी डरपोक निकला, किबला ए आलम।"
"इसे कितनी बड़ी बदकिस्मती कहा जाय, वजीरे आजम? वर्षों से उस
शिवाजी के दो जामाता हमारे साथ हैं। तीसरा भी हमें ही चाहता है। उसके दस-
बारह बड़े सरदार भागकर हमारे साथ आ गये हैं। फिर भी उसका लौंडा सम्भा
हमारी पकड़ में नहीं आ रहा है?"
बादशाह ने कड़कते हुए कहा, "कुछ भी करो, साम, दाम, दंड, भेद किसी
भी हथियार का इस्तेमाल करो किन्तु शिकार हाथ में आना चाहिए।"
दंड भेद नीति की बात करते करते बादशाह को अचानक स्मरण हुआ,
"जुल्फिकार, क्या हुआ उस खवासखान का?"
"जहाँपनाह, वह पाचाड़ के करीब पहुँच गया है।"
"आगे की बात कर, कमबख्त।" एकाएक बादशाह की आँखें चमकीं।
"सम्भा को छोड़ो, कम से कम राजाराम को तो हाथ में आने दो। वह छोकरा
मुट्ठी में आ जाये तो मराठों का दूसरा राजसिंहासन स्थापित करूँ। तब हम गुर्राने
वाले उस सम्भा को भी ठिकाने लगाएँगे।"
दो दिन में ही बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर और पन्हाला से गणोजी
शिर्के आकर मिलने वाले थे। सचमुच उन्हें तुरन्त मिलने का आदेश बादशाह ने ही
दिया था। बादशाह अपने समीपी सहयोगियों से बार-बार कह रहा था कि,
"रामशेज के किले ने हमें यह सबक सिखा दिया है कि मराठों का यह मूर्ख
महाराष्ट्र तोपों के गोलों से नहीं झुकता। झुकेगा भी नहीं। किन्तु षड्यन्त्रों और
सम्भाजी :: 593
धोखों से उनकी कमर तोड़ी जा सकती है।''
एक बार फिर बादशाह की नींद उड़ गयी। वह महाराष्ट्र के अनेक जमींदारों
और जागीरदारों को पत्र लिख रहा था— "खानदानी मराठो! हमारे पास आओ।
हम आपका सम्मान करते हैं। मुगलों की सल्तनत आपके लिए परायी नहीं है। यह
आलमगीर आपको पराया क्यों लगता है? अपने मन के सन्देह को मिटा दीजिए।
भाइयो आइये और अपनी जागीरों को लिखवाकर ले जाइये। आपके शिवाजी के
साथ हमारी इतनी जानी दुश्मनी थी, वह सब हमने भुला दिया। शिवाजी के जमाई
राजा इस औरंगजेब के दल में ऐशोआराम भोग रहे हैं। निंबालकर को हमने
बहादुरगढ़ की थानेदारी सौंपी है। जहाँ पर हमारी जनानियों का आवास, रसद भंडार
और बड़े बड़े बारूदखाने हैं—ऐसी महत्त्वपूर्ण चौकी हमने महादजी को सौंपी है।
महाड़िक जेधे, माने, जगदाले जैसे अनेक नेक मराठे, अनेक गाँवों के मुखिया,
बुद्धिमान ब्राह्मण सभी यहाँ पर आनन्द से जी रहे हैं। शिवा का बच्चा सम्भा ही कैसे
ऐसा सिरफिरा निकला, पता नहीं। चाहे तो उस बेचारे को भी लेकर आइये। प्रेम से
समझाकर और तत्काल पकड़कर यहाँ ले आइये। मुगलों की सल्तनत क्या और
आपका स्वराज्य क्या ? हम सब एक हैं।''
बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर आये। उन्होंने बादशाह को एक सुन्दर
उपहार भेंट किया। उनके बलिष्ठ शरीर, चौड़े भुजदंड, मजबूत गर्दन और तेजस्वी
व्यक्तित्व देखकर औरंगजेब बहुत प्रसन्न हुआ। बड़े आदर से अपने घुटनों तक झुके
महादजी के सिर को हाथ से ऊपर उठाते हुए बादशाह बोला, "महादजी आपकी तो
तकदीर खुल गयी है। बहादुरगढ़ की थानेदारी करने की जगह हमने आपको रायगढ़
का सिंहासन देने का निश्चय किया है।''
"जहाँपनाह, रायगढ़ की उस पहाड़ी से आपके चरणों के पास की जमीन
कहीं अधिक पवित्र है।''
"महादजी, बड़ी फौज दे रहा हूँ आपकी सहायता के लिए। शिवाजी का
जमाई सेना लेकर रायगढ़ पर चढ़ाई कर रहा है, यह खबर कितनी बहादुरी की मानी
जाएगी। ''
महादजी ने बादशाह के पैर पकड़ लिये। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार
किया, "ऐसी बहादुरी मुझसे नहीं हो पाएगी!'' उसने अधीरता से कहा, "हुजूर
आपके पास रहते हुए ही मैं वहाँ का कार्य सम्पन्न करता हूँ।''
"वह कैसे?''
महादजी ने महाराष्ट्र के पठार के अनेक जमींदारों को पत्र लिखा था। उनकी
प्रतिलिपियाँ उन्होंने बादशाह को दिखाईं। बाड़ी के खेमसावन्त को लिखा गया पत्र
इस प्रकार था— "औरंगजेब बादशाह के समान बहादुर दूसरा कोई नहीं है। उन्होंने
594 :: सम्भाजी
गोलकुंडा को ध्वस्त कर दिया। बीजापुर के आदिलशाह की नाक में पानी भर दिया।
अब उनकी तलवार के नीचे पापी और घमंडी सम्भाजी का भी बेड़ा गर्क होने वाला
है। इसलिए इस खानदानी मराठा महादजी की शिवाजी के जामाता की आप सभी से
प्रार्थना है कि आप सभी अपने औरंगजेब की सेवा में प्रस्तुत हो जायँ और अपनी
सात पीढ़ियों का उद्धार करें।''
सीधे युद्ध में जाने से महादजी घबरा रहे थे। इसलिए बादशाह कुछ रुष्ट
हुआ। रात को उसने असदखान से गम्भीर होकर बोला, "असदखान, पिछले अनेक
वर्षों से मैं इस दक्षिण में जड़ जमाकर बैठा हूँ। मैंने मराठों को अच्छी तरह पहचाना
है। वजीरे आजम बताइये, इन मराठों की कितनी जातियाँ हैं?"
"जहाँपनाह! छियानबे या बानबे, ऐसा कुछ ये लोग बकते रहते हैं।"
"नहीं असदखान, मेरे विचार से मराठों की सिर्फ दो ही जातियाँ हैं—एक
मांडलिक मराठा, दूसरे मर्द मराठा। जिन्होंने पहले से कुतुबशाह, निजामशाह जैसा
मालिक खोज लिया, उनकी सहायता से जागीर, महल संस्थान बनाकर, शानशौकत
की जिन्दगी बिताते आ रहे हैं, वे मांडलिक मराठे हैं। किन्तु जो जागीर के लिए नहीं
बल्कि अपने देश धर्म के लिए वर्षा धूप सहकर अपनी जिन्दगी दाव पर लगाते हैं,
वे मर्द मराठे हैं। ये शिवा और सम्भा मर्द मराठों के सरताज हैं।"
"जहाँपनाह, जो अपने दोस्त बने हैं उनकी तारीफ करने की जगह आप
उन्हीं को दोष दे रहे हैं?"
"वजीरे आजम, वे काहे के हमारे दोस्त? वे जागीर के टुकड़ों के दोस्त हैं।
उनमें हमारा फायदा हो रहा है। यह अलग बात है?"
"तो क्या जहाँपनाह सम्भा से दोस्ती करना चाहते हैं?" असदखान ने आँखों
को सिकोड़ते हुए सीधा प्रश्न किया।
"वजीरे आजम एक डेढ़ वर्ष पहले, जब गोलकुंडा का कुतुबशाह पूरी तरह
हमारे कब्जे में आ गया था, उस समय उसकी और सम्भा की गुप्त दोस्ती का हमें
पता था। कुतुबशाह की सहायता से मैंने सम्भा के पास दोस्ती का पैगाम भेजा था।
सोचा लाखों की फौज लेकर इस बुढ़ापे में कितने वर्षों तक भटकता रहूँ?"
असदखान ने अपने मन की बात भीतर ही दबाकर पूछा, "हजरत आपने
सम्भा से क्या माँगा था?"
"उसके सभी बड़े किले। उसके बदले में हम सम्भा को जितनी चाहिए
उतनी जागीर देने वाले थे, लेकिन मैदानी भाग की।"
"सम्भा ने क्या जवाब दिया?"
"क्या देगा?" बादशाह का स्वर कटु हो गया, उसने कहा, "समझौते का
पैगाम लेकर गये वकील के मुँह पर इतने जोर से थूका कि वकील बहुत देर तक
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