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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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पृष्ठ 583

फौज न रखिये। मुगलों ने चाहा तो किसी दूसरे रास्ते से भी प्रभावली में प्रवेश कर
सकते हैं।"
हरकारे से प्राप्त नये समाचार से तीनों की नींद उड़ गयी थी। मामला बहुत
गम्भीर बन गया था। मुगलों का आक्रमण केवल दरवाजे तक पहुंचा ही नहीं था
बल्कि दरवाजे को जोर-जोर से ठोक रहा था। कोल्हापुर, इस्लामपुर, कराड,
शिखल, चाकण जैसी मुगल चौकियों में शस्त्रों और गोलाबाहूद को जमा किया जा
रहा था। सह्याद्रि का गला घोंटने के लिए अनेक दल तैयार किये गये थे। जागीर के
लोभ में अनेक प्रतिष्ठित मराठे और ब्राह्मण प्रतिदिन मुगलों से मिल रहे थे।
बीजापुर से औरंगजेब अकलूज की ओर तेजी से बढ़ रहा था।
समय अब बदल गया था। गोलकुंडा की कुतुबशाही और बीजापुर की
आदिलशाही को औरंगजेब समाप्त कर चुका था। इन दो राज्यों को निगलकर
अजगर चुस्त हो गया था। आठ वर्ष तक अपरिचित क्षेत्र में रहकर सवार सैनिक ऊब
गये थे। प्लेग जैसी बीमारी से जर्जर मन को धीरज बँधाना कठिन था। सैनिकों का
मनोबल समाप्त हो चुका था। अब आक्रमण के अतिरिक्त उनके पास कोई विकल्प
ही नहीं था। हीरे और मोती से सजे आगरा और दिल्ली जैसे नगरों को छोड़कर,
कंकड़ों-पत्थरों की इस भूमि पर कब तक रहते। किसी भी तरह से आठ वर्ष की
इम लम्बी बीमारी का अन्त तो करना ही था। इसके साथ ही शिवाजी महाराज के
जामाता के साथ अनेक मराठा सरदार गद्दारी करके औरंगजेब का साथ दे रहे थे। इन
गद्दारों को अपने अधीन करके अजगर का जोश बहुत बढ़ गया था। अपना मनपसन्द
खाद्य भक्षण करने के लिए उसके दाँत बेताब हो रहे थे। शम्भू महाराज गम्भीर स्वर
में कविराज से पूछने लगे, "अब किया क्या जाये, कविराज?"
"आप जो कह रहे हैं वही सच है। प्रभावली क्षेत्र में मुगलों की चौकी बनने
देना उसी तरह है जैसे किसी जहरीले मणियार साँप को रस्सी समझकर पेट के पास
रखकर सोना।"
महाराज अत्यन्त उद्विग्न अवस्था में पलंग पर बैठ गये। वे हताश और दुखी
स्वर में बोले, "औरंगजेब को हमारे आँगन चौकी बनाने का निमन्त्रण हमारे सगे
साले गणोजीराव ने ही क्यों दिया? गद्दारी और धोखेबाजी के लिए शिर्के खानदान
पहले से ही विख्यात है।"
"महाराज जरा धीरे-" अपने मायके के इस पर्दाफाश से येसूबाई बहुत
विचलित हो गयी थीं।
"क्या मैं झूठ कह रहा हूँ?" शम्भू महाराज ने पूछा।
"किन्तु-"
"जाने दो, येसू, सम्भव है कि हम भूल जायें, शायद तुम भी भूल जाओ।
सम्भाजी :: 581