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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

भी तो कहाँ?''
“महाराज यह तो जगत की रीति है। बूढ़ों को तो एक न एक दिन जाना ही
है। अब हमारे पास खंडो बल्लाल, धनाजी, सन्ताजी जैसे नये तरुण हैं। इन्हीं में से
एकाध नया हंबीरराव...'' येसाजी बाबा ने कहा।
पहाड़ जैसे अनेक कठिन काम सामने पड़े थे। औरंगजेब जैसा बहुरूपिया
शत्रु, नये नये जाल बिछा रहा था। शोक मनाने के लिए भी समय नहीं था। शम्भू
महाराज उठे। नये जोश के साथ कमर कसकर तैयार हो गये। उन्होंने उसी दिन
म्हालोजी बाबा घोडपड़े को नये सेनापति के रूप में नियुक्त करके उन्हें राजसी वस्त्र
पहनाये। अपने पिता के उचित सम्मान से तरुण सन्ताजी घोडपड़े बेहद प्रसन्न
दिखाई दे रहा था।
सम्भाजी

कबड्डी-कबरी
एक
सैनिक कार्यवाही शीघ्रता से आरम्भ हो गयी। अलग अलग मोर्चों पर शम्भू
महाराज के सरदार लड़ रहे थे। उन्हें पर्याप्त शस्त्रों, रसद और घोड़ों की पर्याप्त
आपूर्ति हो रही है या नहीं, इसकी जाँच की जा रही थी। उसी समय बगल की
तगाई कचहरी पर भी खूब भीड़ बढ़ रही थी। अलग अलग क्षेत्रों से माँगें आ रही
थीं। जाँच पड़ताल के बाद किसानों को खेती के लिए कर्ज बाँटा जा रहा था। बीज
आदि के लिए सरकार की ओर से धन दिया जा रहा था। दरबार में सैनिक और
कृषिकार्य का काम साथ-साथ चल रहा था। शम्भू महाराज महारानी येसूबाई और
कवि कलश कठिन परिश्रम कर रहे थे। प्रत्येक गाँव के मुखिया एवं सरदार को
बुलाकर शम्भू महाराज ने सभी को समझाया, "स्वयं को जीवित रखते हुए अपने
पशुओं को भी जीवित रखिये। अस्तबल और तबेले उजड़ जाएँगे तो भविष्य में
बड़ी समस्या होगी। खेतों में अनाज पैदा नहीं होगा, तो हमारी सीमाओं की रक्षा
कौन करेगा?"
हमेशा की भाँति आज भी काम की भाग दौड़ जारी थी। उसी समय द्वारपाल
दौड़ते हुए भीतर आया। उसने गणोजी शिर्के के आने की सूचना दी। द्वारपाल के
पीछे पीछे महाराज की आज्ञा की बिना प्रतीक्षा किये गणोजी अन्दर आ गये। उनके
आते ही दरबार की स्थिति बदल गयी। यह समझकर कि कोई गम्भीर समाचार
लेकर गणोजी आये हैं, अन्य लोग बाहर चले गये।
महारानी येसूबाई ने गणोजी की ओर देखा। गणोजी कल से ही आकर
पाचाड़ के महल में रुके हैं। इसकी सूचना महारानी को मिल गयी थी। किन्तु उन्हें
इस बात का अनुमान नहीं था कि वे इतने सवेरे गढ़ चढ़कर ऊपर आएँगे। गणोजी
को देखकर महाराज और महारानी सावधान होकर बैठ गये। कवि कलश उठे और
अपने हाथ के काग़ज पत्र पास की मेज पर रखकर बाहर जाने लगे। उनकी ओर
568 सम्भाजी

देखते हुए गणोजी शिर्के ने कहा, "कविराज, आपके बाहर जाने से कैसे चलेगा?"
"'नहीं, ऐसे ही जाकर आता हूँ।'"
"'ऐसे कैसे कविराज ? जा कहाँ रहे हैं? रायगढ़ के महाराज आपके बिना
पानी तक नहीं पीते, श्वास भी नहीं लेते।'"
"'ठीक कह रहे हो गणोजीराव ! राजा को ईमानदार व्यक्ति अपने समीप
रखने पड़ते हैं और इसी प्रकार नालायकों को दस हाथ दूर ही रखना पड़ता है।'"
शम्भू महाराज के इस उद्गार से येसूबाई का चेहरा खिल गया। महाराज ने
तत्काल पूछा, "कहिये गणोजी, कैसे हैं?"
गहरी साँस लेते हुए गणोजी ने कहा, "हमारे सगे जीजा स्वराज्य के छत्रपति
हैं। इतने बड़े साम्राज्य के मालिक हैं। मेरी छोटी बहन रायगढ़ की साम्राज्ञी है।
किन्तु यह सब व्यर्थ है। हमारे जीजाजी ने हमें कभी अपना माना ही नहीं। क्यों येसू
सच है, कि गलत?"
"किसलिए बहन को साक्षी बना रहे हैं, गणोजीराव?" सम्भाजी राजा का
चेहरा तमतमा गया। वे अपने दाँतों से ओंठ चबाते हुए बोले, "दूर की बात क्यों
करें ? पिछले तीन महीने में आप स्वयं छुप-छुपकर औरंगजेब से कितनी बार मिले
हैं इसका पक्का सबूत दूँ आपको ? वे सारे प्रमाण और आपके हाथ के लिखे पत्रों को
महारानी ने भी अपनी आँखों से देख लिया है।'"
महाराज के सीधे आक्रमण से गणोजी कुछ घबराये अवश्य किन्तु दूसरे ही
क्षण अपना मूल स्वर पकड़ते हुए आवेश में बोले, "मैं कहता हूँ, ठीक है। मैं मिला
औरंगजेब से। किन्तु कोई व्यक्ति इतनी दूर तक क्यों चला जाता है इसका विचार
राजमुकुट धारण करने वाले व्यक्ति को करना चाहिए या नहीं?"
"जागीर के लिए ही न?" शम्भू महाराज ने गणोजी पर दृष्टि टिका दी।
"वही कह रहा हूँ महाराज, आपके तीर्थस्वरूप पिता शिवाजी महाराज ने
वचन दिया था कि मुझे यदि पुत्ररत्न प्राप्त होगा तो दाभोल की जागीर उसके नाम
कर देंगे। अब हमारे चिरंजीव आठ वर्ष के हो गये हैं। कब दे रहे हैं आप हमें हमारी
जागीर?" गणोजी उखड़ गये।
"गणोजीराव आप समझते क्यों नहीं? समय बहुत खराब आया है।
औरंगजेब जैसा शत्रु गर्दन पर सवार है। यदि आप अकेले को जागीर दी तो दूसरों
को भी देनी पड़ेगी। अराजकता फैल जाएगी। इसीलिए कहता हूँ, थोड़ा धीरज
रखिये।" सम्भाजी ने समझाते हुए कहा।
बैठक में गणोजी और सम्भाजी की बातचीत चल रही थी। बातचीत की गर्म
हवा बाहर भी पहुँच रही थी। बैठक की बातचीत समाप्त करने के लिए महाराज
और महारानी प्रयत्न कर रहे थे कि भोजन के बहाने उठें और भीतर चले जायें।
सम्भाजी :: 569

किन्तु सन्ताप से उफनते गणोजी राव रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बीच में राजा
के हित की चिन्ता प्रकट करते हुए गणोजी बोले, "शम्भू महाराज चाहे आप मुझे
कुछ भी न दें, किन्तु कलश नाम के इस काल सर्प को पहले बाहर निकाल दें। हमारे
ससुर के पुण्यप्रताप से प्राप्त इस राज्य को बचाइये।"
"गणोजीराव आपकी बात ठीक है। किन्तु कवि कलश को निकालकर मैं
अपने सिर को किसके कन्धे से विश्वासपूर्वक टिकाऊँ? आपके? कौन है कविराज
की जगह लेने वाला? हमारा दुर्दिन देखकर अर्जुन भोसले जैसा चचेराभाई साथ
छोड़कर चला गया। सगे बहनोई महादजी निंबालकर आज वहाँ खान की फौज में
हैं। हरजीराजा बहादुर हैं किन्तु लोभी हैं। बचे गणोजीराव। आप केवल शरीर से
यहाँ हैं, मन से बादशाह के तम्बू में। माँ भवानी! कैसा कठिन समय आया है?
स्वराज्य की नौका डूबे नहीं, इसके लिए हम एक-एक व्यक्ति को जोड़ने की
कोशिश कर रहे हैं। किन्तु वहाँ शिवाजी महाराज का सगा जामाता औरंगजेब की
वन्दना कर रहा है।"
शम्भू महाराज की स्पष्टोक्ति से गणोजीराव कुछ विचलित हुए। वे नितान्त
अपमानित मुद्रा में लम्बी साँस लेते हुए बोले, "देखा येसू? तुम्हारे पतिदेव का मुझ
पर कितना भरोसा है? और कोई बात नहीं है। उस कलश नाम के कालसर्प ने राजा
के दिमाग में ऐसा जहर घोल दिया है कि उन्हें यह पता ही नहीं चल रहा है कि
कौन अपना है और कौन पराया? मेरे जैसा पराक्रमी व्यक्ति भी उन्हें ठीक से दिखाई
नहीं दे रहा है।"
"छोड़िए भी अब गणोजी शिर्के! वह कलश तो जाति का ब्राह्मण है, फिर
भी जिस समय शहाबुद्दीनखान ने रायगढ़ पर अचानक आक्रमण किया था, उस
समय कवि कलश ने साहसपूर्वक अपनी शिखा में गाँठ बाँध ली थी। हाथ में
तलवार लेकर साहसपूर्वक मुकाबला किया था। घोड़े को नचाते हुए रायगढ़ को
बचाया था।"
"मतलब! इसका मतलब हमने कुछ भी नहीं किया।"
"यह बात आप अपनी आत्मा से पूछें। हमने इतनी लड़ाइयाँ लड़ीं। उनमें से
क्या किसी भी युद्ध का नाम आप बता सकते हैं, जिसमें गणोजीराव शिर्के नाम के,
शम्भू महाराज के सगे साले ने हाथ में तलवार लेकर पहली पंक्ति में लड़े हों? पीछे
रहकर कपड़े सँभालने वाले बच्चों में भी आप कभी नहीं थे।"
इस तीखे प्रश्न से गणोजी सकपका गये। वे छटपटाकर बोले, "इसका
मतलब आप मुझे उस कलश की पंक्ति में बिठा रहे हैं?"
"बिल्कुल नहीं। इस गलतफहमी में आप न रहें। उनकी पंक्ति में बैठने के
लिए आप किसी तरह से योग्य नहीं हैं। शम्भुराजा की मित्रता के लिए वह जमीन
570 सम्भाजी

पर रक्त का सैलाब फैलाने में भी आगा पीछा नहीं देखेगा।''
शम्भू महाराज और येसूबाई ने दोपहर का भोजन समाप्त किया। उसी समय
एक दासी ने दौड़ते हुए आकर सूचित किया कि गणोजी राजा पुनः बैठक में आ गये
हैं। यह सुनकर शम्भू महाराज विचित्र तरह हँसे। पति से झगड़कर कोई झगड़ालू
औरत अपनी गठरी उठाकर गाँव की सीमा तक जाती है और फिर लौटकर पैर
पटकते हुए दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती है। यही स्थिति गणोजीराव की हुई
थी। हो सकता है कि अपनी बहन पर उनका प्रेम फिर उमड़ आया हो। यह भी हो
सकता है कि जगदम्बा की कृपा से उन्हें अपने किये पर पश्चाताप हुआ हो। ऐसे ही
कुछ महाराज ने सोचा।
किन्तु दूसरे दिन भी गणोजी अपनी ही हठ पर कायम थे। अन्त में गणोजी के
भीतर का जहर आखिर बाहर निकल पड़ा। शिर्के बेचैन होकर बोले, "सम्भाजी
महाराज अभी विचार कीजिए, सीधे सीधे हमारी जागीर हमें दे दीजिए, नहीं तो
इस रायगढ़ को मैं एक दिन बेंचिराग कर दूँगा।''
गणोजी के मुख से ये शब्द सुनकर शम्भू महाराज झट से खड़े हो गये और
गणोजी का गला घोंटने के लिए झपटे। किन्तु बिजली की तेजी से येसूबाई बीच में
आ गयीं। उन्होंने अपने भाई के लिए महाराज के सामने आँचल फैला दिया। बड़े
भाई के लिए उनकी आँखों में आँसू उमड़ आये। वे अपने भाई के प्राणों की भीख
माँगने लगीं। महारानी के आँसुओं में ऐसी विलक्षण शक्ति थी कि महाराज का
प्रलयंकर क्रोध पिघलकर तरल हो गया।
विवाद आगे न बढ़े और कोई अघटित न घटित हो इसलिए येसूबाई अपने
भाई को लेकर अन्दर के दालान में चली गयीं। वहाँ भी गणोजी वही रट लगाए थे।
उन्होंने पक्का निर्णय ले लिया था इस बार जागीर के सम्बन्ध में फैसला कर लेना
है। अपने स्वार्थ के लिए गणोजी ने महाराज पर जो आरोप किये थे उससे महारानी
भी रुष्ट थीं। उन्होंने अपने भाई से चिल्लाकर कहा, "भाई साहब पिताजी के न
रहने पर आपकी जबान बहुत तेज चलने लगी है क्यों?"
"हाँ येसू, पिताजी के दबाव के कारण ही मैं इतने दिन चुप बैठा रहा। परन्तु
उन्हें भी इस बात की कल्पना कहाँ थी कि समय इस तरह बदल जाएगा। इसलिए
येसू एक बात मैं बहुत साफ साफ कह देता हूँ।"
"कौन सी?"
"रायगढ़ के सिंहासन पर आज कोई राजा बैठा ही नहीं है।"
"तो दूसरा कौन बैठा है?"
"एक अविचारी उल्लू।"
सम्भाजी 571

गणोजी के इस वाक्य से येसूबाई की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। उस
विचारशील नारी से अपने पति का यह अपमान सहन नहीं हो पाया। वे शीघ्रता से
आगे बढ़ीं। किसी को घटना का अनुमान लग सके इसके पूर्व ही उन्होंने गणोजी
राजा को एक चाँटा जमाया। इस विषबाण से गणोजी घबरा गये। वे हाथ पैर झाड़ते
हुए उठकर खड़े हो गये। आसपास के नौकर-चाकर, बहन भाई के इस झगड़े को
अवाक् होकर देख रहे थे। क्रोध से विह्वल गणोजी ने अपनी छोटी बहन के गौर
भाल की ओर देखा। उसके माथे पर कुंकुम था और आँखों से अंगारे बरस रहे थे।
अपने ओंठ और दाँत चबाते हुए गणोजी ने धीमे स्वर में केवल इतना कहा, "अपने
माथे का कुंकुम पोंछकर जिस दिन तू विधवा होगी, उसी दिन मैं पचास गाँवों में
मिठाई बाँटूँगा, दीवाली मनाऊँगा।"
"खामोश, गणोजी! पहले अपना मुँह काला करके रायगढ़ से बाहर
निकलिए।"
येसूबाई की आँखों में क्रोधाग्नि फूट रही थी। अपना ओंठ दाँत से चबाते हुए
उन्होंने कहा, "अरे, पुण्यवान माता पिता से जन्म लेकर हम धन्य हुए। किन्तु जैसे
कल्पवृक्ष के साथ विषवृक्ष पैदा हो जाये या कालसर्प पैदा हो जाये उसी प्रकार पवित्र
शिर्के कुल में आप जन्मे हैं।"
"येसू मैं देख लूँगा। इसका परिणाम बहुत बुरा होगा।" पैर पटकते हुए
गणोजी गरजे।
"औरंगजेब के कुत्ते। जाओ अपने बादशाह के पास। तुम्हारे मुँह में स्वराज्य
की बासी रोटी का टुकड़ा भी नहीं जाएगा।"
दो
"युवराज्ञी आपके भाई गणोजी की झोली में हमने जागीरदारी नहीं डाली तो वे
नाराज होकर मुगलों को निमन्त्रित करने दौड़े चले गये। निमन्त्रण भी कैसा? शत्रु को
हमारे स्वराज्य में फौजी चौकी खड़ी करने का। कितना उल्टा कार्य करने के लिए
वहाँ भागा है, यह शिर्केकुलभूषणऽऽ।"
दरबार में अत्यन्त असन्तोष के साथ महारानी से कहा, "उन्हें बुद्धि ही
नहीं है, अपने-पराये की समझ ही नहीं है।" महारानी का स्वर अपराध भाव से भर
572 :: सम्भाजी

गया था।
"तो क्या औरंगजेब जैसे भयंकर जानवर को दरवाजा खोलकर भीतर आने
दिया जाय? मैंने तो कविराज से स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि बादशाह के गुलाम
सालेराजा का ऐसा अशिष्ट बर्ताव मैं कभी सह नहीं सकता। इसलिए प्रभावली में
औरंगजेब के चौकी बनाने से पहले ही शिर्के को यहाँ से निकाल दिया जाय।"
आजकल कवि कलश कभी कभी ही महाराज के सामने दिखाई पड़ते थे।
महाराज ने उन्हें मलकापुर प्रान्त की जिम्मेदारी सौंपी थी। वहाँ से समीप अंबाघाट
का संरक्षण भी उन्हीं के जिम्मे था। महाराज ने उन्हें आदेश दिया था कि जो भी हो,
उस रास्ते से शत्रु के आदमी तो क्या एक चींटी भी कोंकण में उतरने न पाए।
पन्हाला, मलकापुर, विशालगढ़ से अम्बाघाट भावी युद्ध की दृष्टि से अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण था। इसलिए कवि कलश अपने घोड़े पर उस क्षेत्र को छान रहे थे।
उनकी बेचैनी और उनके जोश का प्रभाव वहाँ की प्रजा पर भी पड़ रहा था।
गड़ेड़ियों के लड़के भी कविराज की प्रशंसा में कहते थे, "बड़ी जिद वाला है यह
हिन्दुस्तानी ब्राह्मण।"
राजा की आज्ञानुसार, पिछले महीने से कविराज ने शिर्के का पीछा करना
आरम्भ कर दिया था। अपने साथ एक बड़ी फौज लेकर क्रुद्ध कविराज घूम रहे थे।
पहले पन्द्रह दिनों में उन्होंने शिर्के और उनके सम्बन्धियों की रीढ़ तोड़ दी थी।
किन्तु पिछले दस दिनों से कविराज का कोई समाचार नहीं मिल पाया था। इसलिए
महाराज चिन्तित थे।
दोपहर को किले पर चढ़कर कविराज के सचिव कृष्णाजी कोन्हेरे दरबार में
आ पहुँचे। कुछ विश्राम करने या भोजन करने के चक्कर में न पड़कर वे सीधे
महाराज के सामने उपस्थित हुए। उनकी चिन्तित मुखाकृति को देखकर महाराज
और महारानी एक दूसरे की ओर देखने लगे। शम्भू महाराज कुछ रुष्ट होकर बोले,
"पिछले दस दिनों से आपकी ओर से कोई समाचार नहीं। यह क्या चल रहा है,
कृष्णाजी पन्त? शम्भुराजा का आदेश कवि कलश भी भूल गये?"
"नहीं, नहीं, वैसा नहीं है।" कृष्णाजी पन्त ने बड़ी आत्मीयता से कहा,
"कविराज की तलवार की अपेक्षा गणोजी की जीभ बहुत अधिक विषैली है
महाराज। उन्होंने अपनी विषैली जीभ से स्वराज्य में आपके विरुद्ध गलतफहमियों
का बड़वानल भड़का रखा है।"
"क्या कहता है वह?"
पन्त ने अपनी जीभ दबा ली। अपने गालों पर हल्की सी चपत लगाते हुए वे
क्षमा माँगने लगे। इस पर महाराज ने ज्यों की त्यों बात कहने का आदेश दिया। तब
सम्भाजी :. 573

मन को कड़ा करके पन्त व्यग्र स्वर में बोले, "गणोजी कहते हैं, रायगढ़ का राजा
पागल हो गया है। उसका दिमाग फिर गया है। सन्तुलन बिगड़ गया है। इसीलिए
उन्होंने धर्मभ्रष्ट और शाक्तपन्थी कलश के अधिकार में स्वराज्य दे दिया है। यह
कलश देव, धर्म और देश का घोर शत्रु है। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि अनेक
मराठे और ब्राह्मण सरदार और सम्मानित लोग इसका विश्वास कर रहे हैं।"
इस समाचार को सुनकर शम्भू महाराज बड़ी देर तक अपने आसन पर
चिन्ताग्रस्त बैठे रहे। खंडो बल्लाल कागज पत्रों से सिर उठाकर चिन्तित मुद्रा में
महाराज और महारानी की ओर देख रहे थे। येसूबाई ने कृष्णाजी पन्त से पूछा,
"अपना काम छोड़कर कविराज का विशालगढ़ की ओर जाने का क्या कारण था?"
"नहीं महारानी जी, शिर्के के दुष्प्रचार ने सारा वातावरण ही उलट दिया है।
लोग यह भी भूलने लगे हैं कि असली संघर्ष शम्भू महाराज और औरंगजेब के बीच
है। इसके विपरीत यह सिद्ध किया जा रहा है कि कवि कलश ही असली धर्म
संकट हैं। इसलिए भ्रमित होकर कवि कलश पीछे आ गये हैं।"
बीच में हस्तक्षेप करते हुए महारानी ने कहा, "मुझे लगता है कि इसी समय
रायगढ़ छोड़ देना ही अच्छा है।"
"महारानी, यह आप कह रही हैं?"
सम्भाजी राजा ने महारानी की ओर चकित होकर देखा। महारानी ने अपनी
पलकें बन्द करके हुकारी भरी। शम्भू महाराज ने खंडो बल्लाल को आदेश दिया,
"खंडो जी, अभी इसी वक्त कविराज को पत्र भेजिये। उनके कहिये कि वे दो दिन
के भीतर संगमेश्वर पहुँचें।"
खंडो बल्लाल ने तत्काल पत्र लिखना आरम्भ किया। शत्रु से मिल जाने के
कारण शम्भू महाराज शिर्के को नेस्तनाबूद करने के लिए निकलने वाले थे। किन्तु वे
यह भी नहीं भूल पा रहे थे कि वह क्षेत्र उनकी प्रिय रानी का मायका है। दरबार में
चक्कर काटते हुए वे बीच बीच में येसूबाई की ओर देखते थे। येसूबाई अपना
आँचल सँभालते हुए राजा के सामने आ गयीं और दृढ़ स्वर में बोलीं, "महाराज,
अब कोई पछतावा या दुख अपने मन में न आने दें। आप अपने निर्णय के अनुसार
कार्य करें। यदि राजा की ससुराल किसी दुश्मन बादशाह का मायका बन गया है तो
ऐसी ससुराल की होली जला देने से क्या बिगड़ेगा?"
महाराज कुछ कहें इससे पहले ही अपने मन का गुबार निकालते हुए महारानी
ने कहा, "महाराज, पिछले आठ वर्षों की गर्मी और वर्षा को आपने झेला है। यह
झेलते हुए आप अपने शत्रु के विशाल सेना सागर से जूझते रहे हैं। इस बीच परायों
की कौन कहे कितने अपने भी पराये हो गये। शरीर पर पहाड़ टूटने जैसा हंबीरमामा
574 :: सम्भाजी

की मृत्यु का संकट भी आपने सहन कर लिया। किन्तु महाराज आपके चेहरे पर
निराशा की एक भी रेखा नहीं उभरी। शेर जैसी हिम्मत ही आपका असली सामर्थ्य
है। तुलजा भवानी से एक ही प्रार्थना है कि आपके इस दुर्दम साहस और आपकी
वीरवृत्ति को किसी की नजर न लगे।''
येसूबाई के धैर्यपूर्ण उद्गार से सम्भाजी महाराज का मन भर आया। उन्होंने
कातर स्वर में पूछा, "येसू, क्या आपको लगता है कि इस भयपर्वत को यह
शम्भुराजा पार कर सकेगा?"
"बेशक! इतने संकट आये फिर भी आपने सह्याद्रि के मजबूत किलों में से
एक भी शत्रु के हाथ नहीं लगने दिया। आपके डरने या पीछे हटने का कोई कारण
ही नहीं है। जब भी बड़े महाराज स्वर्ग से अपने स्वराज्य की ओर देखते होंगे, वे
सन्तोषपूर्वक यही कहते होंगे कि 'मेरे शम्भुराजा, मेरा हिन्दवी स्वराज्य तुम्हारे
फौलादी हाथों में सुरक्षित है'।"
तीन
खंडो बल्लाल की ओर देखते हुए शम्भू महाराज ने कहा, "खंडोजी, गोवा के
वाइसराय को सन्देशा भेजिए। उनसे कहिये, कि हम आपसे गोला बारूद नहीं माँग
रहे हैं किन्तु चावल का उत्तम किस्म का बीज हमें आपसे चाहिए।"
खंडो बल्लाल और येसूबाई महाराज की ओर देखते रह गये। महाराज ने
बड़े उत्साह से कहा, "महारानी इस बार तो हमारे राज्य में अच्छी फसल होनी
चाहिए। पिछले सात-आठ वर्षों में कितनी लड़ाइयाँ हुईं फौजों की खेतों में भाग
दौड़, फसलों की बर्बादी। कितना बुरा हाल हुआ हमारा और हमारी फौज का।"
"सच है महाराज।"
"शीघ्र ही इस युद्ध पर्व का अन्त होने वाला है। औरंगजेब अपनी फौज के
साथ डूबने वाला है। उसके बाद दूसरा काम ही क्या है? किसान अपनी फसलें
बोयें, सोने मोती-सी फसल पैदा करें। उत्तम फसल हम उत्तम बीज की आपूर्ति
करेंगे।
उस रात महाराज ने जगदीश्वर के मन्दिर में वहाँ की ठंडी हवा का आनन्द
लेने का मन बनाया था। जीवन में पहली बार महाराज पालकी में मन्दिर गये। दर्शन
सम्भाजी :. 575

किये। नौकरों ने बाहर बैठक की व्यवस्था की थी। वहाँ पर वे जोत्याजी केमकर
और निलोपन्त के साथ बहुत देर तक बात करते हुए बैठे रहे। उसी समय मन्दिर के
द्वार पर किसी के घोड़े की टाप सुनाई पड़ी। घोड़े से एक स्त्री उतरी। मशाल के
उजाले में चेहरा स्पष्ट दिखाई दिया। महाराज ने आश्चर्य से पूछा, "गोदू तुम?"
"हाँ!"
"इधर कैसे आयी?"
"महल में महारानी ने बताया कि आप यहाँ हैं और यहाँ पर आपको विलम्ब
होगा, इसलिए—"
"ठीक है। आ गयी, अच्छा किया।"
महाराज के मन में कुछ असमंजस हुई। महाराज ने सोचा, शीघ्र ही औरंगजेब
के साथ जीवन मरण का युद्ध छिड़ने वाला है। फिर कौन जाने गोदू जैसे आत्मीय
व्यक्ति से कब मिलना हो पाए। महाराज बैठक मे उठ गये गोदू भी यन्त्र की भाँति
उनके पीछे मन्दिर की सीढ़ियाँ उतरने लगी। अँधेरे में वे दोनों काली हौद की दिशा
में दूर तक चलते गये।
"गोदूऽ, अपने शिवाजी महाराज और उनके स्वराज्य के लिए तुमने अपनी
जिन्दगी बर्बाद कर दी, किन्तु तुम्हें हमसे क्या मिला? केवल वनवास।"
"महाराज भगाई गयी स्त्रियों के भाग्य में और होता भी क्या है? इसके
पहले स्वराज्य पर अनेक खानों ने आक्रमण किया, भेड़िया जैसे बकरियों को उठाता
है, उसी प्रकार हमारी बहू बेटियों को उठाकर ले गये। कुछ को छोड़ दिया। ऐसी
गरीब और अभागी लड़कियों पर एक बार बदनामी का सिक्का लग गया कि बस!
उन्हें न तो ससुराल वाले स्वीकारते हैं और न मायके वाले ही अपनाते हैं। ऐसी
अनेक स्त्रियों ने पानी में डूबकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। किन्तु
महाराज!"
"किन्तु हमारे स्वराज्य के लिए तुम्हारा मायका छूट गया।"
"किन्तु महाराज मैं तो न सधवा हूँ न विधवा। भाग्यशाली अवश्य हूँ इसलिए
महाराज आपकी और महारानी की परछाईं मे मुझे अपने जीवन का पुण्य मिल
गया।"
गोदू का मन भर आया था। कितने दिनों के बाद महाराज के ऐसे मुक्त
साहचर्य का अवसर मिला था। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे और क्या
न कहे। वह बोली, "महाराज जब मैं पहली बार आपसे मिली तब मैं जवानी के
उफान पर थी। जवानी के उस मादक आकर्षण में यदि कोई निर्दयी राजा मिला होता
तो? तो उसने सहज ही मुझे बर्बाद कर दिया होता। उसे टोकने वाला कौन था?
576 :: सम्भाजी

किन्तु महाराज मेरे प्रति आपका व्यवहार कितना आत्मीय और मर्यादापूर्ण रहा।"
"गोदू, मैं भी जब तुम्हारे समीप आया था तब तुम्हारे इस सुन्दर और निर्मल˙
रूप को देखकर मेरे भीतर का विकार कब का नष्ट हो गया था। गोदू, हमारे बीच
ऐसा कौन-सा रिश्ता है जिसे मैं कोशिश करने पर भी व्यक्त नहीं कर पाता। किन्तु-
किन्तु क्या दिया मैंने तुम्हें? जीवन भर जलते रहने की सजा।"
"सभी अपने स्वार्थ के लिए भगवान की पूजा नहीं करते। अनजाने में ही मैं
आपकी ओर आकर्षित हो गयी थी। संयोग से मुझे महारानी का साहचर्य मिला।
उनमें जब मैंने अपनी बड़ी बहन का रूप देखा तो आपके प्रति आकर्षण के पंख
अपने आप टूट गये।"
"तुम पागल हो! किसी और के साथ विवाह के लिए तैयार भी नहीं हुई।"
"उसके लायक दूसरा कोई व्यक्ति मिला ही नहीं और मिलने वाला भी नहीं
था। क्योंकि मेरे दिल का मन्दिर मेरे भगवान, केवल आपके लिए बना था।"
"अब तुम्हें क्या चाहिए, गोदू?"
गोदू ने आगे बढ़कर महाराज के पाँव पकड़ लिये। बड़ी अधीरता से वह
बोली, "आपसे एक ही प्रार्थना है, जब मेरी मृत्यु हो तो मेरी चिता को आप ही
आग दें।"
"चिता को अग्नि? सिर्फ अपनों की चिता को अग्नि दी जाती है, गोदू।"
महाराज सहज भाव से बोले।
"तो आप मेरे कौन हैं?" यह प्रश्न करते हुए गोदू की आँखों से अश्रुपात हो
रहा था।
शम्भू महाराज ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। हाथ का यह स्पर्श
अत्यन्त सान्त्वनादायक था।
उसी रात जिंजी से केसो त्रिमल का सन्देश प्राप्त हुआ। उन्होंने लिखा था—
"हरजीराजा काबू में आ गये हैं। उनकी महत्त्वाकांक्षा के अश्व को लगाम लगाने में
हम सफल हो गये हैं। इसके बाद यहाँ से नियमित रूप से रसद कैसे भेजी जाये
इसकी व्यवस्था हम कर रहे हैं। महाराज अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें।" यह
सन्देश पाकर महाराज को प्रसन्नता हुई।
सवेरे जल्दी उठकर शिरकाण की ओर निकलना था। किन्तु शम्भू महाराज
की धार्मिक वृत्ति भीतर जग गयी। उन्होंने प्रभावली की ओर जाने से पहले पाली के
बल्लालेश्वर का दर्शन करने का प्रस्ताव महारानी से किया। दूसरे दिन पचीस
विशिष्ट पालकियाँ और पाँच-छह सौ घुड़सवार पाली की ओर जाने के लिए
निकले। खंडो बल्लाल भी साथ में थे। पाचाँड के बीच वाले रास्ते से आगे बढ़ने के
पूर्व महाराज रायगढ़वाड़ी के मैदान में गये। वहाँ उन्होंने 'निश्चलगिरि स्वामी' की
सम्भाजी :: 577

समाधि के दर्शन किये। वहाँ से उनके पैर जीजामाता की समाधि की ओर मुड़ गये।
जीजामाता की समाधि से हटने का उनका मन ही नहीं हो रहा था। उन्हें लगा जैसे
दादीजी उनसे बात कर रही हों। अपने भातुल परदादा लखोजी जाधवराव ने
दौलताबाद के अजेय किले पर कैसे झंडा फहराया था? वह दादीजी की बताई हुई
कहानी उन्हें याद आने लगी।
आगे का सफर तय करना था। इसलिए सहयोगीगण व्यग्र होने लगे।
महाराज उठे और समाधि पर अपना सिर रखकर बहुत समय तक वैसे ही बैठे रहे।
ऐसा लगा जैसे कोई नन्हा-सा पोता अपनी दादी की गोद में सिर रखकर प्यारी-
प्यारी बातें कर रहा हो। वहाँ से चलने से पूर्व महाराज ने अपनी दादी से केवल
इतना कहा, “दादीजी, उस औरंगजेब का सिर ऊपर रायगढ़ पर ले जाने मे पहले
आपके चरणों में लाकर रखूँगा।”
सन्ध्या समय महाराज और महारानी ने बल्लालेश्वर का अभिषेक किया।
मन्दिरों को महाराज ने भरपूर दान दिया। सरसगढ़ की तलहटी में डेरे डंडे खड़े
किये गये थे। महाराज ने किसी प्रकार एक दो घंटों की नींद ली। आधी रात को
उन्होंने खंडो बल्लाल को बुलाया। महाराज ने कहा, "हमें आसरा में वीरेश्वर के
दर्शन करने हैं।" सवेरे-सवेरे आसरा के मन्दिर परिसर में घोड़े पहुँच गये।
महाराज को वीरेश्वर के परिसर में बड़ी प्रसन्नता हुई। यहाँ से थोड़ी ही दूरी
पर औढ़ा का मैदान था। बालाजी पन्त की अकारण हत्या का स्मरण महाराज को
निरन्तर दुखी करता था। उसी से मुक्त होने के लिए महाराज ने वहाँ पर महादेव का
मन्दिर बनाने के लिए अर्जोजी यादव को आदेश दिया था। महाराज ने मन्दिर और
पीछे बनाये गये तालाब का निरीक्षण किया। भोर में ही वे मन्दिर के भीतर गये।
उन्होंने सपत्नीक देवता के दर्शन किये। शिव की पिंडी के ऊपर स्वर्णपात्र से
अमृतधार प्रवहमान थी। महाराज ने पुजारियों को आदेश दिया, “वहाँ पिंडी पर
अखंड जलधार चालू रखिये।” मन्दिर के गर्भगृह से बाहर निकलते समय महाराज
ने पुनः पिंडी की ओर देखा। वे अत्यन्त भाव विह्वल होकर बोले, “बालाजी
काका इस पात्र से वीरेश्वर की पिंडी पर सतत गिरने वाली जलधारा, आपकी स्मृति
में इस शम्भु द्वारा आँसुओं से किया जाने वाला आपका अभिषेक है।”
महाराज जब मन्दिर से बाहर निकल रहे थे तो उन्हें मूर्च्छा-सी आ गयी। उस
समय उनका एक हाथ खंडो बल्लाल ने थाम रखा था और दूसरे हाथ से वे आँसू
पोंछ रहे थे।
घोड़े महाड़ की दिशा में वेग से दौड़ने लगे। चाम्भार खाटी के पास से
महाराज ने रानी को विदा कर दिया। शिर्के को सबक सिखाने के लिए उनके घोड़े
और लोग शिरकाण की ओर टूट पड़े।
578 :: सम्भाजी

चार
पिछले आठ वर्षों के जैसे भयंकर दिन महाराज और महारानी ने देखे नहीं थे। आने
वाला प्रत्येक दिन अशुभ का सूचक बन रहा था। अब्दुल्लाखान ने सरमगढ़ के
किलेदार को लालच देकर किले को मुगलों के क़ब्जे में ले लिया था। किन्तु शम्भू
महाराज ने तत्काल फौज भेजकर उस पर पुनः क़ब्ज़ा कर लिया। किन्तु इस युद्ध में
लगभग डेढ़ सौ मराठा वीरों को जान गँवानी पड़ी। धन जन की हानि हुई। नासिक
और बागलाण के क्षेत्र में एक के बाद एक किला मुगलों के अधिकार में जा रहा था।
यह संकट निरन्तर बढ़ता हुआ रायगढ़ की ओर आ रहा था। एक ओर राज्य का
खजाना खाली होता जा रहा था, दूसरी ओर शत्रु की अपेक्षा भीतर के गद्दार घातक
सिद्ध हो रहे थे।
नरभक्षक पक्षियों की तरह रोज संकट अपना आहार ग्रहण कर रहे थे। शम्भू
महाराज बिस्तर पर लेटते थे तब भी उनका शरीर वेदनाग्रस्त रहता था। नींद उड़
गयी थी। दरवाजे पर किसी की पदचाप सुनाई दी। येसूबाई बाहर निकल आयीं।
द्वारपाल दो हरकारों को लेकर आया था। महारानी ने समझ लिया कि समाचार
आपात कालिक ही होगा। हरकारे शृंगारपुर-प्रभावली क्षेत्र आये थे। येसूबाई ने
समाचार वाली थैली खोली। पत्र को पढ़ा। उनकी साँस घुटने लगी। इन दिनों
दरवाजों के पर्दे हिले नहीं कि शम्भू महाराज अचकचाकर उठ जाते थे।
"येसू, क्या है वह?" अपनी बगल में खड़े शम्भू महाराज की आवाज
सुनकर येसूबाई चकित हो गयीं। महाराज कब आकर बगल में खड़े हो गये, उन्हें
पता ही नहीं चला। उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा, "महाराज एक भयंकर समाचार
आया है।"
"कौन-सा?"
"जितना सोचा गया था उससे कहीं भयंकर है। शेख मुकर्रबखान और
गणोजी भाईसाहब का पन्हाला के पास एक समझौता हुआ है। उसके अनुसार
संगमेश्वर और शृंगारपुर के आसपास का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र गणोजी मुगलों को देंगे।
इसके साथ ही घोड़ों से भरे हुए अपने दो-तीन तबेले भी मुगलों को देंगे। वह दुष्ट
खान वहाँ पर हमारे राज्य में दो फौजी चौकियाँ बनाने वाला है।"
"कहाँ, कहाँ?"
"इधर शृंगारपुर के पास मैदान में और कौंडभैरव तथा मालेश्वर की ओर
सम्भाजी .: 579

'तामनाले' गाँव में।"
इस समाचार से महाराज के होश उड़ गये। वे घायल शेर की तरह वहीं पर
चक्कर काटने लगे। वे अत्यन्त बेचैन थे। वे अत्यधिक क्रोध से बोले, "नहीं, नहीं
येसू ! प्रलय आ जाये तो भी ऐसी बात नहीं होनी चाहिए। नहीं तो आठ वर्षों तक
हमने जो युद्ध किया, रात-दिन एक कर दिया, जिस उद्देश्य से हमारे हजारों वीर
और जानवर मिट्टी में मिल गये, उन सभी के वीरत्व और बलिदान पर पानी फिर
जाएगा।"
"सच है, महाराज !"
"सह्याद्रि के घाट को पार करके मुगलों को अन्दर आने देना मृत्यु को
निमन्त्रण देना है। उन्हें बुलाते हुए अपनी गुफा में ले आना किसी प्रकार अच्छा नहीं।
यह सम्भव नहीं है। मुगलों की फौज की तो बात ही क्या? उनके भूले भटके दो
चार घोड़ों का सह्याद्रि के इस क्षेत्र में पहुँचना उचित नहीं है।"
कविराज का महल महाराज के महल के इतना समीप था कि बुलाने पर भी
सुना जा सके। उन्हें तत्काल सूचित किया गया। वे तुरन्त तैयार होकर महाराज के
सम्मुख उपस्थित हुए। प्रतिदिन की समस्याओं और संकटपूर्ण स्थितियों ने, शम्भू
महाराज, कविराज और महारानी को इतना समीप ला दिया था कि अनेक बार उनकी
झपकने वाली पलकें, रुकी हुई साँसें और व्यंजक दृष्टियाँ ही पूरा संवाद कर लेती
थीं। अनेक बार प्रत्यक्ष संवाद की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी।
महाराज ने पूछा, "कविराज, अपने कलेजे में तेज कटार भोंककर क्या किसी
का जिन्दा रहना सम्भव है? उसी तरह कल यदि सह्याद्रि को पारकर कोंकण में
मुगलों की चौकी बन गयी तो ?—तो इस हिन्दवी स्वराज्य का टिक पाना सम्भव है
क्या ?"
"कौन, कौन दुस्साहसी निकला है ऐसी चौकी बनाने ?" कविराज ने
प्रतिप्रश्न किया।
शम्भू महाराज ने वह गुप्त पत्र कविराज को दिया। उस पर नजर घुमाते ही
कविराज चिन्तित हो गये। महाराज ने उसी क्षण प्रश्न किया, "कविराज अपना
मलकापुर के पास का तबेला कैसा है ?"
"महाराज, एकदम चिन्ता न करें। मलकापुर के पास की व्यवस्था पक्की है।
वहाँ पर पेरीड और कड़वा के मैदान में दस हजार तगड़े घोड़ों को मैंने तैयार रखा
है।"
इस चर्चा से महाराज को सान्त्वना मिली। कविराज को भी अच्छा लगा।
किन्तु येसूबाई ने चिन्तित स्वर में कहा, "केवल मलकापुर के रास्ते पर ही सारी
580 :: सम्भाजी

फौज न रखिये। मुगलों ने चाहा तो किसी दूसरे रास्ते से भी प्रभावली में प्रवेश कर
सकते हैं।"
हरकारे से प्राप्त नये समाचार से तीनों की नींद उड़ गयी थी। मामला बहुत
गम्भीर बन गया था। मुगलों का आक्रमण केवल दरवाजे तक पहुंचा ही नहीं था
बल्कि दरवाजे को जोर-जोर से ठोक रहा था। कोल्हापुर, इस्लामपुर, कराड,
शिखल, चाकण जैसी मुगल चौकियों में शस्त्रों और गोलाबाहूद को जमा किया जा
रहा था। सह्याद्रि का गला घोंटने के लिए अनेक दल तैयार किये गये थे। जागीर के
लोभ में अनेक प्रतिष्ठित मराठे और ब्राह्मण प्रतिदिन मुगलों से मिल रहे थे।
बीजापुर से औरंगजेब अकलूज की ओर तेजी से बढ़ रहा था।
समय अब बदल गया था। गोलकुंडा की कुतुबशाही और बीजापुर की
आदिलशाही को औरंगजेब समाप्त कर चुका था। इन दो राज्यों को निगलकर
अजगर चुस्त हो गया था। आठ वर्ष तक अपरिचित क्षेत्र में रहकर सवार सैनिक ऊब
गये थे। प्लेग जैसी बीमारी से जर्जर मन को धीरज बँधाना कठिन था। सैनिकों का
मनोबल समाप्त हो चुका था। अब आक्रमण के अतिरिक्त उनके पास कोई विकल्प
ही नहीं था। हीरे और मोती से सजे आगरा और दिल्ली जैसे नगरों को छोड़कर,
कंकड़ों-पत्थरों की इस भूमि पर कब तक रहते। किसी भी तरह से आठ वर्ष की
इम लम्बी बीमारी का अन्त तो करना ही था। इसके साथ ही शिवाजी महाराज के
जामाता के साथ अनेक मराठा सरदार गद्दारी करके औरंगजेब का साथ दे रहे थे। इन
गद्दारों को अपने अधीन करके अजगर का जोश बहुत बढ़ गया था। अपना मनपसन्द
खाद्य भक्षण करने के लिए उसके दाँत बेताब हो रहे थे। शम्भू महाराज गम्भीर स्वर
में कविराज से पूछने लगे, "अब किया क्या जाये, कविराज?"
"आप जो कह रहे हैं वही सच है। प्रभावली क्षेत्र में मुगलों की चौकी बनने
देना उसी तरह है जैसे किसी जहरीले मणियार साँप को रस्सी समझकर पेट के पास
रखकर सोना।"
महाराज अत्यन्त उद्विग्न अवस्था में पलंग पर बैठ गये। वे हताश और दुखी
स्वर में बोले, "औरंगजेब को हमारे आँगन चौकी बनाने का निमन्त्रण हमारे सगे
साले गणोजीराव ने ही क्यों दिया? गद्दारी और धोखेबाजी के लिए शिर्के खानदान
पहले से ही विख्यात है।"
"महाराज जरा धीरे-" अपने मायके के इस पर्दाफाश से येसूबाई बहुत
विचलित हो गयी थीं।
"क्या मैं झूठ कह रहा हूँ?" शम्भू महाराज ने पूछा।
"किन्तु-"
"जाने दो, येसू, सम्भव है कि हम भूल जायें, शायद तुम भी भूल जाओ।
सम्भाजी :: 581

किन्तु तीन सौ वर्ष पूर्व इसी संगमेश्वर और विशालगढ़ की कठिन पहाड़ियों में घटी
घटना को इतिहास कभी नहीं भूल सकता। आज भी यहाँ की पहाड़ियों, घाटियों
और जंगली हवाओं को तीन सौ वर्ष पूर्व के प्रसंग का स्मरण होता है तो वे पागल
कुत्ते की तरह भौंकने लगते हैं।"
शम्भू महाराज ने पुराना प्रसंग छेड़ा तो कवि कलश भी उनका मुँह देखने
लगे। शम्भू महाराज बहमनी साम्राज्य के सेनापति मलिक उत्तुजार की कहानी बताने
लगे— मलिक उत्तुजार जिस समय अपनी सात हजार की सेना लेकर इस जंगल में
आया था। उस समय खेलणा उर्फ विशालगढ़ किले पर शंकरराय मोरे का अधिकार
था। उसी पर मलिक को आक्रमण करना था। उस समय मलिक अपनी सहायता के
लिए श्रृंगारपुर के शिर्के से मिला। शिर्के ने बहमनी के सेनापति से खूब धन वसूला।
विशालगढ़ का रास्ता दिखाने की शर्त स्वीकार की। किन्तु मलिक उन्हें ठीक समझ
नहीं पाया था।
आरम्भ में दो दिन शिर्के ने बहुत कठिन रास्ते में उन्हें भरमाया यह जंगल
इतना घना था कि शेर भी इसमें घुसने से डरते थे। यहाँ के ऊँचे पर्वत और यहाँ की
गहरी खाइयाँ इतनी भयानक कि भूत और राक्षस भी वहाँ जाने से घबराते थे। तीसरे
दिन शिर्के ने मलिक उत्तुजार को ऐसा रास्ता दिखाया कि मुसलमान सैनिकों को नानी
याद आ गयी। इस जंगल की विषैली हवा अजगर की फुफकार जैसी थी। ऊँची
ऊँची घासों में मानो साँप के दाँत निकल आये थे। तीन ओर आसमान को छूते हुए
पहाड़। रास्ता काँटों से भरा और पथरीला। कोस कोस तक मनुष्य की बस्ती का
नामोनिशान नहीं। बहमनी सेना को ठीक से अनाज नहीं मिल पा रहा था। रात में
मलिक के सैनिकों को तम्बू गाड़ने तक की जगह नहीं मिली। सैनिक जंगल की
पत्तियाँ खाकर जान बचा रहे थे। थके माँदे सैनिक रास्ते पर लकड़ी के लट्ठे की तरह
पड़े थे। अन्न पानी के अभाव मे सूखे अभागे सैनिक जब विश्राम कर रहे थे उसी
समय दगाबाज शिर्के ने जाकर शंकरराय को सूचना दी, "कितने कठिन प्रयास से
मैंने मलिक की फौज को आपके जबड़े में लाकर रख दिया है। अब जैसा चाहें वैसा
बर्ताव उनके साथ करें।" अपनी सुसज्ज फौज के साथ उस जंगल में शीघ्रता से
पहुँच गया। जैसे सूखने के लिए कपड़े फैलाए जाते हैं, उसी प्रकार थके माँदे,
भूखे प्यासे सैनिक रास्ते पर अंग समेटे सोये पड़े थे। रात में ही मोरे की फौज ने
ठंड से कुड़कड़ाते सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। जैसे किसी मेले में हजारों बकरों
को एक साथ काट दिया जाता है उसी प्रकार सात हजार सैनिकों को हलाल कर
दिया गया। जिस समय अर्द्धजागृत सैनिकों की करुण चीत्कार हो रही थी उस समय
हवा उल्टी बह रही थी। इसलिए उनकी आवाज किसी को सुनाई नहीं पड़ी।
582 .: सम्भाजी

इस भीषण कथा को जब महाराज ने सुनाया तो कविराज और महारानी दोनों
उदास हो गये। शम्भू महाराज ने दुखी स्वर में कहा, "बताइए येसूबाई, शिर्के की
औलाद पर कोई कैसे भरोसा करे?"
येसूबाई उदास भाव से हँसकर बोली, "हमारे मायके को ही आप क्यों दोष
दे रहे हैं? मेरी ससुराल की बात भी कुछ अलग नहीं है। आज आपके सगे चचेरे
भाई अर्जुन जैसे कुलभूषण किसके लिए लड़ रहे हैं? उस औरंगजेब के लिए ही न?
शिवाजी जीजामाता आज किसकी सेवा में हैं? औरंगजेब की ही न?"
"फिर भी येसू- "
"महाराज जाति का महत्त्व नहीं होता। धर्म भी महत्त्वपूर्ण नहीं है। मनुष्य
का कर्म ही महत्त्वपूर्ण होता है, यह आप जैसे संस्कृत पंडित को बताने की
आवश्यकता नहीं है। ईश्वर ने मुझे गणोजी जैसा कृतघ्न भाई दिया है, फिर भी मैंने
पिलाजीराव जैसे पुण्यवान पिता के घर जन्म लिया है। आज पिलाजी शिर्के की पुत्री
येसूबाई रायगढ़ की महारानी बनी है। यह येसूबाई अपने कुल का नाम उज्ज्वल
किये बिना नहीं रहेगी।"
शम्भू महाराज ने पुनः अपना रुख कवि कलश की ओर किया। उन्होंने कहा,
"इससे पहले भी शत्रुओं ने अनेक बार आक्रमण किया था। रायगढ़ में प्रवेश करने
का प्रयास किया था। उन्हें सबसे पहले प्रभावली का ही मार्ग दिखा।"
कवि कलश बीच में ही बोल पड़े, "हमने रायगढ़ की कालनदी के किनारे
कभी शत्रुओं की दाल गलने नहीं दी।"
"किन्तु कविराज, उस समय हमारे किसी गाँव वाले या जमींदार दुश्मन को
आश्रय नहीं दिया था। आज तो हमारे सगे साले शत्रु की उँगली पकड़कर उसे अपने
राजमन्दिर की ओर ले आ रहे हैं।"
"गणोजी को कौन पूछता है?" येसूरानी ने कहा।
"नहीं येसू, शत्रु और धोखेबाज को नज़रअन्दाज नहीं करना चाहिए। महल
की रक्षा प्राचीर में थोड़ी भी दरार रहने से विषैले साँप की तरह शत्रु प्रवेश कर
सकता है, हानि पहुँचा सकता है।"
"तो महाराज रंचमात्र भी शिथिलता न करें। शिर्केवंश पर आक्रमण का
दायित्व आप मुझे दें। मैं स्वयं जाऊँगी प्रभावली।"
"महारानी?" महाराज ने तिरछी नजर से देखा।
"महाराज, यह येसूबाई शिवाजी महाराज की पुत्रवधू है। इसके साथ ही
तलवार चलाने की शिक्षा मेरे पिता पिलाजीराव ने बचपन में दे दी है।"
सम्भाजी महाराज विचारमग्न हो गये। उन्होंने कहा, "येसू, आपका विचार
सम्भाजी :: 583

बुरा नहीं है। गणोजी आज नीचता की हद पर पहुँच गया है। उसका मुँह तोड़ने के
अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। किन्तु यदि आप वहाँ जाएँगी तो
रायगढ़ का राजकीय कार्यभार कौन सँभालेगा?''
''क्या मतलब महाराज?''
''आज मराठा राज्य की महारानी की अपेक्षा मुख्य दीवान का दायित्व आप
पर अधिक है। इसके अतिरिक्त राजकीय कार्यभार सँभालने वाला कोई समर्थ और
भरोसेमन्द व्यक्ति बचा भी तो नहीं है।''
येसूबाई कुछ बोली नहीं। तब सम्भाजी महाराज ने आशाभरी दृष्टि से
कविराज की ओर देखा। कविराज के चेहरे का रंग बदल गया। महाराज ने दुख से
कहा, ''क्षमा करें कविराज, सभी अप्रिय कार्य करने की जिम्मेदारी दुर्दैव से आपके
ही ऊपर आती है। इससे पहले हंबीरराव जैसे आत्मीय व्यक्ति पहाड़ की तरह हमारे
पीछे खड़े होते थे। किन्तु दुष्ट काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। कोंडाजी बाबा जैसे
रत्न को हमने जंजीरे के लिए खो दिया। धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल जैसे
तरुण योद्धा किसी न किसी मोर्चे पर स्वराज्य के लिए लड़ रहे हैं। इसलिए आपके
अतिरिक्त और कोई भरोसे का आदमी बचा ही नहीं है।''
महाराज के विषण्ण सुर से कविराज उत्साहित हो गये। वे शम्भू महाराज के
सामने झुककर, उनका वन्दन करते हुए बोले, ''आज्ञा करें, राजन, केवल आज्ञा
करें।''
''कल सवेरे पाचाड़ से निकालिए। पन्द्रह हजार की सेना लेकर औरंगजेब
और गणोजी के फौजी समझौते होने से पहले ही प्रभावली पहुँच जाइये। शिर्के के
बचे खुचे तबेले और महल बेचिराग कर दीजिए। हिन्दवी स्वराज्य का गला घोंटने
से पहले ही, शिर्के के सारे षड्यन्त्र को ध्वस्त कर दीजिए। शिर्के का सारा इलाका
आग के हवाले कर दीजिए।''
पाँच
लालबारी की दशा अत्यन्त शोचनीय हो गयी थी। बहुत से शाही हकीम और हिन्दू
वैद्य वहाँ से दबे पाँव लौट रहे थे। बादशाह का दल ही नहीं पूरी लालबारी
कराहती-सी प्रतीत हो रही थी। बुखार के ऐसे रूप का मुगल सेना ने कभी अनुभव
584 :: सम्भाजी

ही नहीं किया था। फौज के कुछ फिरंगी तोपची इस रोग को प्लेग कहते थे।
लालबारी के पास का आकाश दीप भी रोग के साथ ही अन्धे की भाँति टिमटिमाता
हुआ रातभर इधर-उधर देखता रहता था।
बादशाह को भी थोड़ा ज्वर आ गया जिससे सभी परेशान हो गये। अब तक
करीब सत्तर हजार मुगल सैनिक इस रोग की-चपेट में आ गये थे। हवा में चारों ओर
दुर्गन्ध फैल गयी। सैनिकों के कराहने की आवाज इतनी बढ़ गयी कि वहाँ रहना
कठिन हो गया। मृत्यु का भय या उसकी भयानकता का अनुभव अब किसी को
होता ही नहीं था। लोग इतने भावनाशून्य हो गये थे कि मृत्यु पर भी कोई शोक नहीं
करता था। किया भी तो कौन किसकी सुनता? प्रत्येक तम्बू में खुली जगह में,
तम्बुओं की आड़ में सभी जगह दुर्गन्ध फैल गयी थी। मृत्यु की काली छाया सभी
ओर पहुँच गयी थी। चार-छह दिनों में ही पूरा क्षेत्र एक बड़े कब्रिस्तान में बदल
गया था। मृत्यु की छाया एक पागल बन्दर की तरह औरंगजेब के पीछे पड़ी थी।
बादशाह के दो पोतों की मृत्यु हो गयी। असदखान भी प्लेग के बुखार में तड़पते
हुए अपने डेरे में पड़ा था। बादशाह ने एक महीने में चार बार अपनी जगह बदली
थी।
पिछले सप्ताह से औरंगजेब बहुत बेचैन हो गया था। एक ओर मैदान में
हजारों लाशें पड़ी थीं और दूसरी ओर लाशों को खाने वाले गीदड़ और कुत्ते भी
वहाँ फटक नहीं रहे थे। इस शैतानी बीमारी का कोई इलाज भी नहीं था। अपने मन
को सान्त्वना देने के लिए लोग हकीम से किसी वनौषधि का पत्ता माँगकर ले जाते
थे। उसे चूसते हुए ठनकती गाँठों को काँख या जाँघ में दबाकर सो जाते थे। दो-चार
दिन में मौत आ जाती थी। तम्बू में यदि कोई समीपी व्यक्ति हुआ तो शव को
खींचकर ले जाता था। कब्र के नाम पर कहीं पर सिर्फ मिट्टी ढक देता था। किन्तु
दफनाने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी। मुर्दों को खींचकर ले जाने के लिए
भी कोई नहीं मिलता था। मुर्दा ढोने वाले भी मुर्दा ढोते-ढोते महामारी से ग्रस्त
होकर मर रहे थे। भिश्ती समाप्त हो चुके थे।
बादशाह अपने शाही डेरे की कनात की खिड़की से दूर देख रहा था।
महामारी से टूटा हुआ बीजापुर साफ दिखाई पड़ रहा था। उस नगर के सामर्थ्य और
अभिमान का प्रतीक गोलगुम्बद भी काला पड़ गया था। औरंगजेब को बहुत सूनेपन
और अकेलेपन का अनुभव हो रहा था। उसकी दोनों प्यारी बेगमें उदयपुरी और
औरंगाबादी घबराकर उसके सिरहाने बैठी थीं। बादशाह को बुखार आ गया था।
किन्तु महामारी की गाँठ बादशाह को न आये इसके लिए अल्लाह से दुआ माँग रही
थीं।
सम्भाजी :: 585

बादशाह बहुत टूट गया था। महीने-डेढ़ महीने में सत्तर हजार फौज समाप्त
हो चुकी थी। दुखी औरंगजेब ने आकाश की ओर देखा। गहरी साँस लेते हुए उसने
कहा, "उदयपुरीऽ इतनी बड़ी लड़ाइयाँ हमने जीतीं। गोलकुंडा के उस मूर्ख
तानाशाह को एक बार नहीं दो बार पराजित किया। वहाँ खाई में आधे हैदराबाद को
गाड़ दिया। बीजापुर की अभिमानी तटबन्दी को ध्वस्त कर दिया। वहाँ का खजाना
हासिल किया। कुतुबशाह और आदिलशाह दोनों गीदड़ के बच्चे की तरह आज
हमारी कैद में पड़े हैं। किन्तु इस आसमान जैसी बड़ी विजय का फायदा क्या?"
"हजरत आप अधिक बात न करें। आराम करें—" उदयपुरी बेगम ने हाथ
जोड़कर कहा।
"बेगम, आज दो बड़ी सल्तनतों की मिली विजय पर हँसें या प्लेग द्वारा
कमर तोड़ दिये जाने पर रोयें?"
बादशाह को किसी तरह समझाया गया। किन्तु उसी समय जुल्फिकारखान
वहाँ आ गया। उसने रोज की तरह मरने वालों की संख्या का आँकड़ा प्रस्तुत किया।
"किब्लाए आलम आज केवल दो हजार।"
"लड़ाई के मैदान में दो हजार सिपाही बिना लड़े मर जायें तो यह कोई
मामूली संख्या नहीं होती, बेवकूफ नौजवान!" बादशाह ने क्रोधावेश में कहा,
"जुल्फिकारखान तुम अपने परवरदिगार से पूछो कि हमारी छावनी में हजारों सैनिक
मक्खियों की तरह मर रहे हैं फिर वहाँ उस जहन्नमी सम्भा को मौत क्यों नहीं
आती?"
कमजोरं और बीमारी से जर्जर फौज को लेकर आगे बढ़ना सम्भव नहीं था।
प्लेग मानो सम्पूर्ण मानवजाति को समाप्त करने के लिए ही आया था। लोगों को
दो तीन दिन तक ज्वर आता था। उससे कुछ भाग्यशाली बच भी जाते थे। किन्तु
काँख की गाँठ के साथ सारे शरीर में फैलने वाला विचित्र बुखार सचमुच जानलेवा
था। जो भाग्य से बच गया तो भी उसके शरीर की सारी शक्ति निकल जाती थी।
वह व्यक्ति इतना क्षीण और शक्तिहीन हो जाता था कि वह चलती-फिरती लाश
बन जाता था। मैदान में हजारों लोग कराहते हुए पड़े थे।
इस विचित्र अवस्था ने बादशाह को पागल बना दिया था। किन्तु बादशाह इस
बात को क्षणमात्र के लिए भी नहीं भूला था कि इस अवस्था से बाहर निकलकर
सबसे बड़े तीसरे शत्रु को विनष्ट करना है। इसलिए अपने कार्यव्यापार और पत्राचार
से उसका ध्यान जरा भी नहीं हटता था। असदखान डेरे में बीमार होकर पड़ा था।
उसका काम जुल्फिकार सँभाल रहा था।
अपने मौसेरे भाई को सामने बैठने का संकेत करते हुए औरंगजेब ने कहा,
586 :: सम्भाजी