छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
तालाब सूख गये थे। स्वराज्य के अनेक भागों की दशा अत्यंत शोचनीय हो गयी
थी। अकाल के कारण चिंचवड़ हवेली क्षेत्र के लोगों ने अपने गाँवों को छोड़ दिया
था। वे पानी की खोज में अन्यत्र चले गये थे। घरों में ताले लगाकर दरवाजों पर
बबूल और करौंदे के झाँखर रूँध दिये थे। बारह बलूतेदारों और अठारह प्रजावर्ग के
निम्नलोगों की स्थिति तो कुत्तों से भी बदतर थी। कुछ लोग जंगलों में चूहे
पकड़कर उन्हें भूनकर खाते थे। कहीं कोई चूहे की बिल में पड़े अनाज को
निकालकर खाता था।
अपने राज्य में महाराज जब घोड़े पर निकलते थे तो प्रजा की दुर्दशा देखकर
उनका मन कराह उठता था। ग्रामपंचायत में सरकार की ओर से थोड़ा बहुत अनाज
मिल जाता था। किन्तु राज्य का भंडार भी समाप्त हो रहा था। शम्भूमहाराज गाँव के
देशमुख देशपाण्डे लोगों को एकत्र करके उनसे कहते थे, "जिनके पास जो भी
अनाज है उसे बाहर निकालो। अपने कोठारों में चुराकर अनाज मत रखिए।"
महाराज बहुत व्याकुल हो रहे थे।
महाराज, हमारी गोठें खाली हो गयीं। हमारे पशु नहीं रहे "
"बाबा, मुझे सब कुछ मालूम है। यह सच है कि हमें पशुओं को भी बचाना
चाहिए। परन्तु उसके पहले मनुष्यों को बचाओ। किसी प्रकार अपनी रक्षा कीजिए।
समय हमेशा ऐसा ही नहीं रहने वाला है।" शम्भूमहाराज घूम घूमकर लोगों का
धीरज बँधा रहे थे।
अनेक स्थानों पर ब्राह्मण अनुष्ठान कर रहे थे। बहुत से लोग महादेव के
मन्दिर में मूर्ति को घेरकर बैठे थे। कुछ लोग सहायता के लिए हनुमानजी की प्रार्थना
कर रहे थे। "कुछ भी कीजिए। जो मुट्ठीभर अनाज मिलता है उसके साथ घास
पात खाइए। किन्तु मनुष्यों को किसी प्रकार बचाइए।" इस प्रकार की घोषणा
महाराज कर रहे थे। एक ओर मराठी सेना बीजापुर और गोलकुंडा की सहायता के
लिए जा रही थी। उसके लिए शम्भूमहाराज और कवि कलश को पन्हाला और
मलकापुर में ठहरना पड़ता था। औरंगजेब गोलकुंडा और बीजापुर की ओर था।
कुछ समय के लिए उसका संकट टल गया था। किन्तु भीषण अकाल से प्रजा की
रक्षा करना अत्यन्त आवश्यक हो गया था।
रसद और अनाज जुटाने के उपाय खोजे जा रहे थे। हिन्दवी स्वराज्य के सभी
अच्छी पैदावार देने वाला केवल जिंजी का क्षेत्र था। वहाँ की समृद्धि निरन्तर बढ़
रही थी। अपना विश्वस्त मानकर ही महाराज ने हरजी को वहाँ नियुक्त किया था।
इस समय स्वराज्य की सहायता जिंजी और कर्नाटक से ही हो सकती थी।
अकाल ने मनुष्यों और पशुओं का भाग्य फोड़ दिया था। चारा पानी के
अभाव में घोड़े अपनी जगह पर ही प्राणहीन होकर गर्दन लटका दिये थे। महाराष्ट्र
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की मिट्टी स्वराज्य पर आये घोर संकट को जानती थी। पिछले सात वर्षों से उसका
लाड़ला युवराज कलिकाल से जूझ रहा था। इस व्यथा का उसे पूरा ज्ञान था। अकाल
की भीषणता ने सामान्य व्यक्तियों की कमर तोड़ दी थी। किन्तु षड्यन्त्रकारी
कर्मचारी उत्साहित थे। महाराष्ट्र के जमींदार जागीरदार औरंगजेब से मिल रहे थे।
उन्हें सिर पर उठाकर औरंगजेब नाच रहा था। जिनमें कोई पात्रता नहीं थी, उन्हें भी
बड़ा सम्मान दे रहा था। जागीर के झूठे कागजपत्र बनाने में उसके बाप का क्या
बिगड़ता था ?
राजधानी रायगढ़ पर भी पानी का संकट उपस्थित हो गया था। पहले ही
किले पर नीचे से परवालों में ढोकर पानी लाया जाता था। किले की विशेष जरूरत
के लिए कुछ घोड़े छोड़कर शेष घोड़े पाचाड़, रायगढ़वाड़ी और छत्री निजामपुर ले
जाये गये थे। समीप की काल नदी भी पूरी तरह सूख गयी थी। उसकी बीच धारा
में बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर उसमें अपने अपने घड़े और मसकें भरकर लोग ले जाते
थे। पानी भरी पखाल लेकर सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते भिश्तियों की कमर टेढ़ी हो रही
थी। काला हौद, पुष्करिणी और गंगासागर भी सूख गये थे।
शम्भूमहाराज और महारानी येसूबाई बहुत चिन्तित थे। चिन्ता के कारण
महाराज का शरीर सूखता जा रहा था। व्याकुल होकर महारानी ने कहा, "हे
भगवान, हे जगदीश्वर, हे माँ भवानी, कब बदलेगा यह दिन?"
लोगों की दशा देखकर महाराज का कलेजा विदीर्ण हो रहा था। भारी मन से
उन्होंने कहा, "येसूरानी हमारी जनता छः-सात वर्ष तक मुगलों का सामना करती
रही किन्तु उससे बच गयी। वह लड़ाई भी जानलेवा थी। आज हमारे सामने कितना
बुरा दिन आया है। लोगों के तबेले नष्ट हो रहे हैं। स्वराज्य में पानी नहीं। अब तो
हमारी आँखों का पानी भी सूखता जा रहा है। अब एक बूँद आँसू भी नहीं निकलते,
माँ भवानी अपने बच्चों की कैसी परीक्षा ले रही हैं?"
"महाराज थोड़ा धैर्य धारण करें। जिंजी से हरजाँ राजा की अनाज मे भरी
गाड़ियाँ आ जाएँगी।" येसूबाई ने धीरज बँधाते हुए कहा।
"किन्तु महारानी, बार-बार स्मरण कराने पर भी उनकी ओर से सहायता
क्यों नहीं आ रही है?"
"दूर की यात्रा है रसद आने में देर तो लगेगी।"
"नहीं येसूरानी, मुझे सन्देह हो रहा है। अकाल तो अब आया है किन्तु हमारे
अपने घर के लोगों ने तो मुझे कब से पराया समझ लिया है। हमारे दो बहनोइयों ने
जो किया है, हरजी राजा भी वही करेंगे।"
"धीरज रखें महाराज! ऐसी कुशंका मन में क्यों ले आना?"
चार ही दिन में राजा के विश्वस्त सहयोगी का पत्र आया। दुर्दैव से महाराज
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की शंका ठीक निकली। शम्भुमहाराज ने येसूबाई पर रुष्ट होते हुए कहा, “रसद
की गाड़ियाँ तो दूर ही रहीं, अपने बहनोई हरजी पन्त तो अब स्वयं को जिंजी-
कर्नाटक का सार्वभौम राजा मानने लगे हैं। वे स्पष्ट रूप से कहने लगे हैं कि
'रायगढ़ की मुख्य सत्ता से हमारा कुछ लेना देना नहीं है'।”
येसूबाई ने सिर नीचे झुका लिया। उन्होंने कहा, “अम्बिका दीदी के भरोसे
पर मैंने उनकी सिफारिश की थी। मुझे क्षमा करें।”
हरजी राजा की ओर से आये असहयोगात्मक समाचार से महारानी बहुत
बेचैन हो गयी थीं। वे महाराज से पूछने लगीं, “महाराज दो चार महीने पहले
आपने स्वयं यहाँ की कठिनाइयों को हरजी राजा से बताया था। हरजी राजा कुशाग्र
बुद्धि, शूरवीर, पराक्रमी व्यक्तियों के कुशल संग्राहक हैं। हमारे राज्य के कठिनाई में
होने पर भी उन्हें ऐसी दुर्बुद्धि कैसे आयी?”
“याद रखिये रानी साहिबा, एक मराठा दूसरे मराठा को कभी अच्छा नहीं
लगता। यदि कोई कष्ट उठाकर यश प्राप्त करता भी है तो उसका श्रेय उसकी झोली
में डालने की उदारता भी हममें नहीं होती। अन्यथा जब एक ओर औरंगजेब जैसा
अजगर हमारे स्वराज्य के पास कुंडली मार कर बैठा हो और दूसरी ओर अकाल की
भट्ठी में प्रदेश जल रहा हो तो ऐसे समय में हरजी राजा जैसे समझदार पुरुष के मन
में ऐसे विचार क्यों आने चाहिए?”
खंडो बल्लाल, निलोपन्त पेशवा आदि सभी बड़े तनाव से गुजर रहे थे। येसू
महारानी ने एक दूसरी शंका व्यक्त की, “महाराज अकाल और अभाव से निपटने के
लिए जिंजी हमारी एकमात्र आशा है। वहाँ से सहायता नहीं आएगी तो अनर्थ हो
जाएगा।”
“आएगी, जरूर आएगी, महारानी! आखिर हमारी धमनियों में भी शिवाजी
महाराज का रक्त है। जो ईमानदारी से परिश्रम करता है उसे धन्यवाद देना और जो
टेढ़े चलते हैं उन्हें ठीक रास्ते पर ले आना हम अपने पिताजी से सीख चुके हैं।”
मोरोपन्त पिंगले के छोटे भाई केसो त्रिमल पिंगले कुछ समय पहले ही
रामसेज किले से रायगढ़ आये थे। उन्हें शम्भूमहाराज ने पुराने और अनुभवी सरदार
के रूप में सहायता के लिए बुलाया था। केसो त्रिमल का आदर-सत्कार करते हुए
महाराज ने कहा, “केसो काका, उधर जिंजी में यानी हमारे ही राज्य के एक प्रदेश
में ऐश्वर्य की गंगा बह रही है और यहाँ अकाल की छाया में हमारे लोग और
जानवर तड़प तड़पकर मर रहे हैं।”
“महाराज आज्ञा करें।” केसो त्रिमल ने सिर झुकाकर कहा।
“किले के नीचे मैदानी जमीन पर अठारह हजार घोड़े खड़े हैं। उन्हें साथ
लेकर रात-दिन चलते हुए जल्दी से-जल्दी जिंजी पहुँच जाइए।”
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“हरजी राजा ने विरोध किया तो?”
“केसो काका, हम आपसे और अधिक क्या कहें? आप शिवाजी महाराज के
साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने वाले बुजुर्ग हैं। आपको क्या ममझाना?
शीघ्रातिशीघ्र निकल जाइए। अकाल के जबड़े में फँसे लोगों को आपको ही बचाना
है। इसलिए आप वही कीजिए जो शिवाजी महाराज के सहयोगी को शोभा दे।”
आयु की सत्तर सीढ़ियों पर पहुँचे केसो पन्त झट से खड़े हो गये। उन्होंने
महाराज को नमन किया। महाराज ने केसो पन्त के साथ तरुण मन्ताजी को भेजने का
निश्चय किया था। वे दोनों शीघ्रता से किले से नीचे उतरने लगे।
दस
गत हो गयी। अन्धकार फैल गया। कल आगे निकली शाही फौज ने पानी की
मुविधा देखकर लालबारी के डेरे डंडे खड़े किये थे। मशालों से धुआँ निकल रहा
था। बादशाह के लाल तम्बू में चिराग जल उठे। वजीर ने आलमगीर के सामने
बीजापुर परिसर का नक्शा फैला रखा था। बीजापुर पर घेरा डाले बारह तेरह महीने
हो गये थे। खजाने के द्रव्य से भरी चमड़े की थैलियाँ खाली हो चुकी थीं। खाली
थैलियों के ढेर लगे थे। हजारों ऊँट और घोड़े मर चुके थे। किन्तु अपेक्षित सफलता
मिल नहीं रही थी। इससे बादशाह बहुत सन्तप्त हो गया था।
नक्शे पर बारीकी से दृष्टि डालते हुए बादशाह ने कहा, “वजीरे आजम,
बीजापुर की यह तटबन्दी कैसे पत्थरों की बनी है कि डेढ़ वर्ष होने को आया फिर
भी गिरने को तैयार नहीं?”
बीजापुर नगर के चारों ओर ढाई मील की पत्थरों की मजबूत दीवार बनाई
गयी थी। इसकी ऊँचाई तीम से पचास हाथ और चौड़ाई मामान्यतः बीम हाथ थी।
जगह जगह पर बुर्ज और चबूतरे बनाए गये थे। बीच बीच में लम्बी नली की
बन्दूकों को बाहर निकालने की व्यवस्था की गयी थी।
दीवार के बाहर चालीस से पचास हाथ चौड़ी गहरी खाई खोदी गयी थी।
उसे पहले पार करने पर दीवार तक पहुँचा जा सकता था। छानवे बुर्जों में से शेरजी
नामक भव्य बुर्ज पर मालिक ई-मैदान नाम की बहुत दूर तक मार करने वाली तोप
रखी थी। शहजादा आजम ने दीवार के मामने ऊँच चबूतरे तैयार किये थे। वहीं से
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तटबन्दी की दीवार पर तोपें दागी जा रही थीं। खाई पार करने के लिए उसे पाटना
आवश्यक था। लगभग तीन-चार महीनों से हजारों मजदूर और कुली यही काम
कर रहे थे। उस भयानक खाई को पाटकर उस पर से रास्ता बनाने की कोशिश कर
रहे थे। उसके लिए शहजादे को खजाने का बहुत सा धन खर्च करना पड़ रहा था।
नक्शे का निरीक्षण करते हुए जुल्फिकारखान ने कहा, "बादशाह सलामत
मुझे लगता है कि सबसे पहले यहाँ के बुलन्द दरवाजे को हिलाना चाहिए।"
"बेवकूफ हो दुश्मन के दिल पर प्रहार किया जाय तो सफलता मिल सकती
है। पर इसे मत भूलो कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो हमारे सिर भी काटे जा सकते
हैं।"
"जो आज्ञा जहाँपनाह" जुल्फिकार आज्ञाकारी सेवक के रूप में खड़ा रहा।
"मैंने आजम से पहले कह दिया था। शक्तिशाली दरवाजों को तोड़ने में
अपनी शक्ति व्यर्थ मत करो। दीवार के कमजोर हिस्से को खोजकर उस पर वार
करो।"
बीजापुर हमले के आरम्भ में ही बादशाह बहुत सावधान था। बीजापुर की
सहायता के लिए हैदराबाद से एक बड़ी फौज आने वाली थी। इसके लिए औरंगजेब
[
आदेशानुसार स्वयं कवि कलश सात हजार की फौज लेकर जत की ओर से युद्ध में
सम्मिलित हुए थे। वे पिछले कई महीने से अचानक छापे मार-मारकर मुगल सेना
को हैरान कर रहे थे। हंबीरराव मोहिते भी पन्द्रह हजार की घुड़सवार सेना लेकर
रात-दिन छापे मार रहे थे और मुगलों की रसद को लूट रहे थे।
सोलापुर से बादशाह हैदराबाद की गतिविधियों पर अपनी बारीक नजर रखे
हुए था। इसे बादशाह का भाग्य ही कहेंगे कि कुतुबशाही फौज में आन्तरिक कलह
आरम्भ हो गया। उनके दो सेनाधिकारियों—मुहम्मद इब्राहिम और शेख मिनाज के
बीच झगड़ा हो गया। परिणाम यह हुआ कि कुतुबशाही फौज रात में ही डेरे-डंडे
बटोर कर भाग गयी।
बरामदखान ने बादशाह को खुशखबरी दी, "कुतुबशाही फौज भाग गयी।
तानाशाह उसे संभालने की जगह स्वयं गोलकुंडा के किले में चला गया है। काफिर
मादण्णा पंडित उसका मुख्य सलाहकार है।"
"बरामदखान तुमने अच्छी याद दिलाई। तुम ऐसा करो, इस कुतुबशाह की
बेगम और उसकी माँ को हमारा पैगाम भेजो। उनसे कहो कि तुम्हारे राज्य की यह
दुर्दशा उस काफिर के कारण ही हुई है। कुछ भी करके उसका कत्ल करवा दो।"
"जी हुजूर!"
हैदराबाद लुटेरों के क़ब्जे में आ गया है, ऐसी खबरें आ रही थीं। सभी ओर
लूटमार, भाग दौड़ का हंगामा मचा हुआ था। अच्छे घरों के खिड़कियाँ-दरवाजे तक
चोर उठा ले जा रहे थे। मुगल फौज भी उसका लाभ उठा रही थी। बादशाह ने
अपने विश्वस्त सरदारों को यह निगरानी रखने के लिए कि "मुअज्जम लूट का
माल कहीं और नहीं रख रहा है?"
एक दिन बादशाह के पास एक और खुशी की खबर आयी। बेगमों ने
हमलावर भेजकर मादण्णा और आकण्णा की हत्या करवा दी। हैदराबाद के बीच
रास्ते पर दिनदहाड़े दोनों की हत्या की गयी। इसप्रकार शम्भूमहाराज और कुतुबशाह
के बीच का एक मजबूत सेतु टूट गया।
मार्च 1686 में हैदराबाद के दूत बादशाह के पास आये। वे अपने साथ
प्रधानमन्त्री मादण्णा का सूखा हुआ सिर भी लेकर आये थे। उस पर हाथ फेरते हुए
बादशाह को बड़ा आनन्द आया। औरंगजेब और कुतुबशाह में तात्कालिक समझौता
हो गया। उसके अनुसार कुतुबशाह को एक करोड़ बीस लाख का जुर्माना देना पड़ा।
मालखेड़ और सेरम जैसे उपजाऊ प्रदेश भी बादशाह को मिले। कुतुबशाह ने सौ
हाथियों का नजराना भी बादशाह को दिया।
हैदराबाद के काफिरों को जड़ से समाप्त करने की सफलता से बादशाह बहुत
प्रसन्न था। समझौते के कुछ समय बाद बादशाह ने अपनी शक्ति बीजापुर पर
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केन्द्रित की। उसने मुअज्जम को हैदराबाद से बीजापुर बुला लिया। विगत डेढ़ वर्षों
की कोशिश के बावजूद बीजापुर की तटबन्दी में दरारें नहीं पड़ पायीं। किन्तु
बादशाह को तो उसे हर हालत में तोड़ना ही था।
ग्यारह
शहजादे मुअज्जम और आजम दोनों के मन में दिल्ली के तख्त को हथियाने के
सपने पल रहे थे। उन्हें विश्वास था कि आज नहीं कल उनका बूढ़ा हुआ बाप
दिल्ली की सत्ता उनकी झोली में डाल देगा। इसलिए कोई बड़ा पराक्रम करके
बादशाह को दिखाने की स्पर्धा दोनों के भीतर चल रही थी। कुछ वर्ष पूर्व बड़ा
शहजादा मुअज्जम गोवा के पास सम्भाजी महाराज से पराजित होकर खाली हाथ
लौट आया था। किन्तु यहाँ यदि अपराजित आदिलशाह को नेस्तनाबूद करके
दिल्लीपति बनने की कामना से शहजादा आजम बीजापुर में घनघोर युद्ध कर रहा
था।
किन्तु शहजादे का भाग्य साथ नहीं दे रहा था। उसकी निरंतर असफलता और
बिगड़ती हालत देखकर उसके पास बादशाह ने पत्र भेजा, "जितना नुकसान अब
तक हो चुका उतना बहुत है। अब सब कुछ छोड़कर वापस आ जाओ।" बादशाह
के इस फरमान को सुनकर शहजादा आजम फूट-फूटकर रोया था। कोई पराक्रम
दिखाने का अवसर उसके हाथ से निकलता जा रहा था। शहजादा आजम ने अपने
पिता को तुरन्त पत्र लिखा, "यदि आपकी बची हुई फौज मेरे साथ लड़ने को तैयार
नहीं है तो मैं अपनी बेगम और अपने बच्चों के साथ अन्तिम साँस तक लड़ता
रहूँगा। अन्तिम क्षण तक शत्रु का सामना करूँगा। शाहंशाह हमारी लाश को बीजापुर
की सीमा में ही दफना दें।"
इस पत्र को पढ़कर बादशाह आश्चर्यचकित रह गया। ऐसे दृढ़ उत्तर की उसे
आशा न थी। उसे आशा नहीं थी कि उसका कोई शहजादा इतनी जिद दिखाएगा।
वह अपने इस शहजादे को दाद देने का इच्छुक हो गया। उसने फिरोजजंग के नेतृत्व
में पाँच हजार बैलों का दल तैयार किया। बैलों की पीठ पर पर्याप्त रसद लादी
गयी। साथ में बादशाह ने गश्ती की सेना भी बीजापुर भेजी। नयी रसद को पाकर
आजम की जान में जान आ गयी। उसने बीजापुर का घेरा और भी कसना शुरू
सम्भाजी :: 543
किया।
बादशाह को सारी पुरानी बातें याद आने लगीं। बादशाह बहुत उद्विग्न हो
गया। उसकी आँख की आग वजीर को स्पष्ट दिखाई पड़ी। औरंगजेब ने क्रोध से
कहा, "वजीरे आजम और कब तक चलेगा यह बीजापुर का घेरा? दक्खिन की
इस कठोर और धोखेबाज मिट्टी के साथ कितने दिन बीत गये? इसका हिसाब
कीजिए। छः सात साल। मेरी जगह कोई दूसरा बादशाह होता तो केवल युमना के
पानी को याद करके पागल हो गया होता।"
बादशाह की वह मनोदशा देखकर वजीर चुप हो गया। अन्य सरदार और
सेवकों ने सिर नीचे झुका लिया। कुछ दिनों से बादशाह की गर्दन कुछ हिलने लगी
थी। अपनी गर्दन को हिलने से रोकने की कोशिश की। वह यह दिखाने की कोशिश
कर रहा था कि अभी बूढ़ा नहीं हुआ है या पका नहीं है। उसने कहा, "असदखान
बीजापुर की इस जालिम जंग में बड़े शहजादे मुअज्जम को भी शामिल होने का
फरमान मैंने भेजा है।"
"बड़ा शहजादा वहाँ जाएगा तो छोटे शहजादे को यह बहुत अच्छा नहीं
लगेगा। हुजूर इसीलिए कर रहा था" वजीर ने लड़खड़ाते हुए कहा।
शहंशाह के चेहरे पर विषादपूर्ण हँसी आयी, फिर भी उसने अपने अन्दर की
भड़ास निकालते हुए कहा, "अब किसी का क्या अच्छा लगता है, यह महत्त्वपूर्ण
नहीं है, असदखान। इस समय सबसे महत्त्वपूर्ण दक्खिन की इस मिट्टी में फँसी हुई
अपनी तकदीर को बाहर निकालना। नहीं तो मेरी कब्र के लिए आपको यहीं कहीं
पर जगह ढूँढनी पड़ेगी।"
544 सम्भाजी
खंड-तीन
सम्भाजी २५१
546 :: सम्भाजीं
हंबीरगढ़
एक
1686 का जुलाई महीना चल रहा था। बादशाह का डेरा रसूलपुर में खड़ा किया
गया था। वहाँ से बीजापुर की दूरी इतनी ही थी कि दूर तक मार करने वाली तोप
वार कर सकें। देखते-देखते दिन बीतते गये। बादशाह को बीजापुर आये साठ दिन
बीत चुके थे। फिर भी सामने की दीवार गिर नहीं रही थी। बादशाह अपने डेरे के
पास खड़े होकर सन्तप्त दृष्टि से बीजापुर की ओर देखता था। तब उसे अनुभव
होता था कि गन्धक और तोप के धुएँ में डूबे शहर की ऊँची मीनार उसकी ओर
टकटकी लगाए देख रही है। गोल गुम्बद की भव्य इमारत बादशाह के कलेजे में
काँटे की तरह चुभती थी।
शहर के चारों ओर दो सशक्त तटबन्दियाँ ही बीजापुर की शक्ति थी। किन्तु
गोलकुंडा और शम्भू महाराज का पन्हाला, बीजापुर की प्रच्छन्न रक्तवाहिनियाँ थीं।
यद्यपि कुतुबशाह ने समझौता कर लिया था कि बादशाह को उस पर विश्वास नहीं
था। इसलिए उसने कुतुबशाह को एक चेतावनी भरा पत्र लिखा था, "यदि तुम्हें
अपने तख्त को बचाने की चिन्ता है तो बीजापुर के किसी मामले मे दखलन्दाजी
करने का व्यर्थ प्रयास नहीं करना।"
उसी समय मुगलों की रसद लूटने वाले हंबीरराव मोहिते का मुकाबला करने
के लिए बादशाह ने एक विशेष फौज तैयार की थी।
वजीर का अनुमान सही निकला। बड़े शहजादे मुअज्जम का बीजापुर आना
छोटे शहजादे आजम को अच्छा नहीं लगा। पहले ही दिन "अब यह आया है मंडी
लूटने के लिए।" इस आशय से उसने अपने बडे भाई की ओर घूर कर देखा।
बड़ा भाई मुअज्जम भी छोटे भाई से उतना ही द्वेष करता था। यदि बीजापुर
वाले आत्मसमर्पण करते तो उसका श्रेय आजम को मिलने वाला था। मुअज्जम के
लिए यह सम्भव नहीं था। समय के साथ मुअज्जम ने भी अपनी अकल दौड़ानी
सम्भाजी 547
शुरू की। स्वयं बादशाह और आजम के लड़ने से बीजापुर पर क़ब्ज़ा नहीं हो पाया।
यदि अपनी किसी युक्ति से बीजापुर पर कब्ज़ा हो जाये तो उसका सेहरा मेरे माथे
पर ही बँधेगा। मुअज्जम को विश्वास था कि भावी सम्राट वही होगा। उसने
शहाकुली जैसे अनेक विश्वस्त सेवक अपनी सहायता के लिए गुप्त रूप से लगा
रखे थे।
"लेकिन शहजादे, अपने सारे पयत्नों की सूचना बादशाह को दी है या
नहीं?" उसके मित्र भयभीत होकर पूछने लगे।
"अभी क्यों? सारा काम एकबार हो जाये तो इकट्ठे ही अब्बाजान को सब
बताऊँगा।"
मुअज्जम ने गुप्त रूप से अपनी योजना आरम्भ की। उसकी सिकन्दरशाह के
साथ पहले से जान-पहचान थी। इसलिए उसका विश्वस्त नौकर शहाकुली सामने
की दीवार के दरवाजे से बीजापुर में आने-जाने लगा। समझौते की बातचीत भी गुप्त
रूप से होने लगी। दुर्दैव से शहाकुली मदिरा का व्यसनी था। उसके ऊपर एक
महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने के कारण उसका अभिमान और भी बढ़ गया। वह
पहले की अपेक्षा अधिक मदिरापान करने लगा। उसका नियन्त्रण छूट गया। एक रात
को वह शराब के नशे में चूर बीजापुर के तोपची गोलन्दाजों से चिल्लाकर कहने
लगा, "भाई जान इस मोर्चे पर ज्यादा गोलाबारी न करो। यहाँ पर सभी अपने ही
यार-दोस्त हैं।"
शहाकुली की बातों का जो परिणाम होना था वही हुआ। शहजादा आजम के
सेवकों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। रात में ही उसे शाहंशाह के सामने खड़ा किया
गया। उसकी पीठ और शरीर के अन्य अंगों को लोहे की तपती सरिया से दागा
गया। उसका शराब का नशा पूरी तरह उतर गया। उसने मुअज्जम का नाम लेकर
सारी बात उगल दी।
बादशाह के मैदानी डेरे में शहाकुली घायल कुत्ते की तरह पड़ा था। वहाँ पर
मुअज्जम को बुलाया गया। सारी बात का अन्दाज लेकर बड़ा शहजादा झूठी दलीलें
देने लगा। अपने बाप के हाथ-पाँव पकड़कर वह रोते हुए कहने लगा, "जहाँपनाह,
यह सब जाहन है, आपकी नजरों से मुझे गिराने का षड्यन्त्र है। मेरी जिन्दगी को
बर्बाद करने का यह कुटिल कुचक्र है। इस शराबी व्यक्ति से मेरा कोई सम्बन्ध
नहीं।"
बादशाह ने अपने चेहरे पर क्रोध या लोभ को कोई झलक नहीं आने दी।
उसने शान्त स्वर में केवल इतना ही कहा, "शहजादे मुअज्जम, कितना भी झटका
दिया जाए, किन्तु पाप कुछ मनुष्यों का पीछा नहीं छोड़ता। शहजादे, आज नहीं तो
कल तुम्हें इसकी सजा भुगतनी ही होगी।"
548 सम्भाजी
दूसरे दिन मुअज्जम के हाथ से युद्ध सम्बन्धी सारे अधिकार छीन लेने का
शाही फरमान जारी किया गया। अब मुअज्जम लकड़ी के लट्ठे की तरह डेरे में ही
बैठा रहने लगा।
युद्ध का संचालन अपने हाथ में लिये बादशाह को दो महीने बीत चुके थे।
दिन भी बहुत बुरे आये थे। 1686 की वर्षा ऋतु का आषाढ़ महीना सूखा चला गया।
बादशाह के भिश्ती चारों ओर घूमकर कहीं न कहीं से पखाल में भरकर पानी
ढोकर ला रहे थे। मनुष्य और पशु किसी प्रकार जीवन रक्षा कर रहे थे। तटबन्दी के
भीतर बीजापुर वालों की स्थिति भी अत्यन्त शोचनीय थी। बीजापुर वालों की शक्ति
का पता बादशाह ने लगा लिया था। तटबन्दी के पीछे हैदराबाद और मराठों की ओर
से कोल्हापुर तथा अथणी के रास्ते रसद की सहायता आ रही थी। रसद के उन सभी
रास्तों को आलमगीर ने पूरी तरह बन्द कर दिया था।
अब बिना अन्न-पानी के बीजापुर वालों की दशा बहुत बिगड़ने लगी थी।
जानवर पैर पटकते हुए तड़पकर मरने लगे। तबेले खाली होने लगे। इसलिए रात-
बेरात रसद को लूटकर ले आने की शक्ति घोड़ों में बची नहीं। अन्न के अभाव में
सैनिक घोड़ों और ऊँटों को काटकर खाने लगे। इस प्रकार किसी तरह जान बचाने
का प्रयास करने लगे। पान-फूल से सुसज्ज बीजापुर नगरी उजड़ी हुई दिखाई पड़ने
लगी।
एक दिन सवेरे सामने वाला दरवाजा खुला। वहाँ से हाथ में सफ़ेद निशान
लेकर निकलने वाले लोगों को बादशाह ने देखा। वह तीस चालीस लोगों का
समूह था। उनके हाथों में कोई शस्त्र नहीं था। वे सैनिक भी नहीं थे। छाती तक
लम्बी दाढ़ियाँ, गोल कफनी बाँधे, ढीली लुंगी पहने वे कोई और ही लोग थे।
उनका समूह ज्यों-ज्यों समीप आने लगा बादशाह की पारखी नजर ने उन्हें देखा
और पहचाना। वे सामने की नगरी के काजी, उलेमा, फकीर जैसे इस्लाम के बन्दे
थे।
मुख्य न्यायाधीश शेख-उल इस्लाम हरकत में आ गये। बादशाह को शेख
की यह बेचैनी बनावटी और अनावश्यक लगी। बादशाह ने उन्हें तुरन्त डेरे में
बुलाया। उन्हें तीखी नजर से देखा। शेख साहब बहुत नाराज थे। लगभग हाँफते
हुए उन्होंने हाथ हिलाकर कहा, "कुरान के पवित्र आदेशानुसार बीजापुर पर आपका
यह आक्रमण गैरकानूनी है।"
बादशाह ने शेख उल-इस्लाम को सिर से पैर तक ध्यान से देखा।
"ठीक है, जैसा आप कहते हैं वैसा हो भी सकता है। इस सम्बन्ध में हम
बाद में विचार करेंगे। परन्तु आज आपकी तबीयत बहुत खराब हो गयी है। जाकर
आराम करें। मैं देखता हूँ।"
बादशाह ने अपने रक्षकों को इशारा किया। रक्षक उनकी बाँहें पकड़कर
सम्भाजी :: 549
लगभग खींचते हुए वहाँ से दूर ले गये। वह सारा दल बादशाह के सामने घुटने
टेककर प्रार्थना करने लगा, "बादशाह सलामत ! आप एक पाक मुसलमान हैं। एक
जीवित पीर मानकर लोग आपका गौरव करते हैं। कुरान के हुक्म के बिना आपकी
पलकें भी नहीं झपकतीं।"
"आपको क्या चाहिए ? उतनी ही बात करो, काजी।" बादशाह ने गिने चुने
शब्दों में कहा।
"शहंशाह, गुस्ताखी माफ, यह युद्ध नापाक है। इतने बड़े दिल्ली के
बादशाह, एक छोटे से इस्लामी राज्य और वहाँ की गरीब प्रजा का इतना नुकसान
क्यों कर रहे हैं? हजरत हम सब आपके भाई हैं।"
"काजी, कौन किसका भाई?" सन्तप्त औरंगजेब की आँखों की पुतलियाँ
सुई की नोक की तरह नाचने लगीं। सभी की नजरें नीचे झुक गयीं।
"आप सभी इस्लाम के रखवाले दिखाई पड़ते हैं। एक बात बताइए, वह
शिवाजी का बदमाश लौंडा, वह काफिर सम्भा तुम्हारा भाईबन्द कब से बन गया?"
"लेकिन जहाँपनाह - ?" सभी हड़बड़ा गये।
"तुम दक्षिण के सभी लोग जानते हो। पहले कहाँ था मरगठों का हिन्दवी
स्वराज्य ? उस जमींदार शिवा ने और उसके मूर्ख लड़के ने, सम्भा ने आदिलशाह के
राज्य का कुछ हिस्सा निकालकर, थोड़ा निजामशाही से निकालकर मरगठों की
नापाक सल्तनत कायम कर ली।"
"हजरत, गनीमों की वह कार्यवाही हमें कभी मंजूर न थी।" उलेमा
ने कहा।
"ऐसा है तो मराठों की फौज को पिछले दिनों बीजापुर के रास्ते पर गाजे-
बाजे के साथ क्यों लेकर गये। उनका बारात की तरह सम्मान क्यों करते हो?"
"सिकन्दर आदिलशाह नासमझ है हुजूर। उसे माफ करें।"
"यह कैसी नासमझी ? वह सम्भाजी और कुतुबशाह के साथ गुप्त समझौते
करता है। हमारे कहने पर भी सर्जाखान को अपनी फौज से निकालने से साफ इंकार
करता है। ऐसा बेमुरव्वत जवाब हिन्दुस्तान के बादशाह को देता है। इस सारे
बेवकूफी वाले व्यवहार को आप नासमझी कहते हैं ? उधर पन्हाला पर जाइए। अपने
बाप उस सम्भा के पैर पर सिर पटकिए।"
"लेकिन हजरत फिर भी हमारी एक प्रार्थना है। सारा कुरान शरीफ तो
जिल्लेसुभानी की जबान पर है। हम मुल्ला-मौलवियों का अध्ययन भी उतना नहीं
है जितना आपका है। आप मेहरबानी करके एक ही सवाल का जवाब दें।"
बादशाह ने उनकी ओर प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा। "बताइये जहाँपनाह, एक
इस्लामी सत्ता को दूसरी इस्लामी शासन व्यवस्था पर हथियार उठाना कुरान शरीफ
550 :: सम्भाजी
के किस नियम के तहत आता है?"
"आपका शब्द-शब्द सच्चाई से भरा है। आपकी हुकूमत गिराने का हमारा
इरादा भी नहीं है। किन्तु एक काफिर का बच्चा आपके साथ खड़ा है। उसके आपके
रिश्ते किस मजहबी आचरण के तहत आते हैं? इसे पहले बताइये। उस काफिर के
बच्चे को हमारे सामने लाकर खड़ा कीजिए। दूसरे क्षण ही हम बीजापुर का घेरा
उठा लेते हैं।"
मुल्ला मौलवी निकलकर चले गये। उसी समय असदखान घबराया हुआ
वहाँ आया। उसने अपने हाथ हुकुमनामा बादशाह के सामने कर दिया। बादशाह ने
गुर्राते हुए पूछा, "क्या है? पढ़िए—"
"हुजूर यह अपने सरकाजी, शेख उल इस्लाम का हुक्म है—
उन्होंने उन्होंने "
"पढ़िएऽऽ" बादशाह चिल्लाया।
"उन्होंने हमारा बीजापुर के विरुद्ध , एक इस्लामी सल्तनत का दूसरी
इस्लामी सल्तनत पर किया गया हमला गैर कानूनी और नापाक बताया है।"
बादशाह ने वह खत माँग लिया। उसके टुकड़े टुकड़े करके, डेरे के बाहर
बँधे घोड़ों के पैरों में फेंक दिया। सरकाजी को गिरफ्तार करके अथणी की ओर ले
जाने और किसी अनजान बन्दीखाने में फेंक देने का हुक्म तत्काल जारी किया गया।
बादशाह की इच्छानुसार, रायगढ़ की नौकरी छोड़कर आये काजी हैदर को
बुलाया गया। बादशाह ने हैदर से पूछा, "काजी मियाँ, सच्चा मजहब क्या होता
है?"
"राजा की इच्छा। सुल्तान की मर्जी। इसके अलावा इस दुनिया में कोई धर्म
हो सकता है, मेरे मालिक?"
काजी हैदर की जी हुजूरी बादशाह को बहुत अच्छी लगी। वह देर तक
जोर जोर से हँसता रहा। अन्त में काजी की तारीफ करते हुए बादशाह ने कहा,
"आप जैसे वफादार इनसान पर हमें नाज होता है। इसी तरह के हकीकतपरस्त
इनसान की हर सियासत को जरूरत होती है। शिवा का रायगढ़ हो या शहंशाह
ओरंगजेब का दरबार, आप जैसे इनसान हर जगह उपयुक्त होते हैं। एक बार कोई
कुशल दर्जी कमीज की माप लेने में कहीं चूक कर सकता है किन्तु बदलती
परिस्थिति को ठीक ठीक माप लेने वाला आप जैसा इनसान मिलना खुदा की
मेहरबानी है।"
उसी दिन लालबाग के दरबार में एक शाही जश्न मनाया गया। उसी में काजी
हैदर को सरकाजी पद का लिबास दे दिया गया।
सम्भाजी :: 551
दो
काजियों का जत्था मिलकर चला गया। अगले तीन महीने तक बीजापुर का घेरा
चलता रहा। बादशाह ने बड़ी मेहनत से नगर के किनारे की खाई को भर दिया। वर्षा
शुरू हो गयी थी। शहर में अकाल कहर ढाने लगा। तटबन्दी के भीतर रसद समाप्त
हो गयी थी। इसके पहले रात-बेरात बीजापुर के घोड़े बाहर झटके से निकलते थे
और कहीं न कहीं से रसद ले आते थे। किन्तु अब बादशाह ने घेरे पर कड़ी नजर
रखी थी। पहले पन्हाला से कवि कलश और हंबीरराव के घोड़े बीजापुर की मदद
के लिए दौड़े आते थे। किन्तु अब कृष्णा नदी में बाढ़ आ जाने के कारण वह सम्भव
नहीं था। मिरज-अथणी से कोल्हापुर जाने के रास्ते बन्द हो गये थे।
औरंगजेब को अपनी सल्तनत पन्द्रह बीस सूबों में से कहीं न कहीं से रसद
मिल सकती थी। किन्तु दक्षिण की तीनों शक्तियों के बुरे दिन आये थे। अन्त में
बादशाह ने खाई पार कर अपने घोड़े बीजापुर में भेज दिये। अब तक वह शहर
श्मशान बन गया था। 26 सितम्बर 1686 को सोलह वर्षीय सुकुमार सिकन्दर ने
आत्मसमर्पण कर दिया। आदिलशाह के कैद होते ही बीजापुर में शोक की लहर
फैल गयी।
घोर विषाद के वातावरण में भी कुछ हिम्मतबाज अपना उल्लू सीधा कर लेते
हैं। आदिलशाह के आत्मसमर्पण के समय बादशाह की आँख सर्जाखान पर लगी
हुई थी। डूबते जहाज को छोड़कर मोटे चूहे ने उछाल मारकर दूसरी ओर शरण ले
ली थी। सर्जाखान मुगलों का बड़ा मनसबदार बन गया था।
औरंगजेब का महत्त्वाकांक्षी मन बीजापुर में रुका नहीं। वह अपनी फौज
लेकर पुनः गोलकुंडा की ओर चला आया। वहाँ का किला, वहाँ की तटबन्दी और
खाई बहुत मजबूत थे। द्रव्य से उनके तलघर भरे पड़े थे। तानाशाह अब भी
शरणागत नहीं हो रहा था। बादशाह ने उसे गद्दार घोषित किया और गोलकुंडा पर
घेरा डाल दिया। गोलकुंडा के घेरे के समय बादशाह को धूप, वर्षा और ठंडी
हवाओं का सामना करना पड़ रहा था। अड़सठ वर्ष के इस बूढ़े के लिए एक हल्का
झूलता सिंहासन बनाया गया था। कहार उसे कन्धे पर रखकर देर सबेर घुमाते थे।
शाहंशाह अपनी फौज को आदेश देता था। एक बार तोप का गोला लगने से उसके
अंगरक्षक का हाथ टूट गया। औरंगजेब से सिर्फ चार हाथ की दूरी से मौत आकर
चली गयी थी।
552 . सम्भाजी
शहंशाह ने मुकर्रबखान जैसे हैदराबादी सरदार को फोड़ लिया। अबदुल्ला
फन्नी नाम के एक अधिकारी ने सवेरे तीन बजे किले का द्वार खोल दिया।
कपटनीति और दगाबाजी की जीत हुई। 29 सितम्बर 1687 को गोलकुंडा पराजित
हुआ। वहाँ बादशाह को सात करोड़ रुपये का खजाना मिला। सालाना तीन करोड़
आय का प्रदेश मिला। केवल पचास हजार रुपये की तनख्वाह पर सिकन्दर
आदिलशाह और कुतुबशाह को देवगिरि के किले के बन्दीखाने में भेज दिया गया।
जिस समय हैदराबाद जीतकर बादशाह बीजापुर की ओर लौट रहा था, उस
समय विजय की प्रसन्नता के साथ उसका एक विशिष्ट विषाद से भरा हुआ था।
कुछ महीने पहले हैदराबाद के घेरे के समय एक घटना घट चुकी थी। इसके पहले
शहजादा मुअज्जम के पास शम्भू महाराज के पत्र पकड़े गये थे। किन्तु उस रात को
शहजादा आजम के द्वेष के अथवा किसी अन्य कारण से या महत्त्वाकांक्षा की ललक
में मुअज्जम ने एक दुस्साहसी कदम उठाया। अपने बाप से बगावत करके उसी रात
वह कुतुबशाह से मिलकर लड़ाई की घोषणा करने वाला था। उसे केवल इस बात
का डर था कि उसके जाने के बाद उसका बाप उसके बीवी, बच्चों की दुर्गति करके
हत्या कर देगा। इसलिए उसने रात में ही अपने बीवी बच्चों को लालबारी से
लड़ाई के मैदान में आगे ले गया। वहाँ से छलाँग लगाना सरल था।
मुअज्जम के इन कारनामों से बादशाह को बगावत का शक हुआ। उसने तुरन्त
सेना भेजकर शहजादे मुअज्जम और उसके बीवी, बच्चों को हमेशा के लिए
गिरफ्तार कर लिया।
वृद्ध बादशाह का काफिला आगे निकल रहा था। उसकी दृष्टि पश्चिम की
ओर न जाकर बार-बार सह्याद्रि की ओर घूम रही थी। पिछले सात वर्षों से उसे
सम्भाजी मिल नहीं पा रहे थे। अविजित रामशेज और हैवतीगढ़ आज भी अबाधित
थे। जो कुछ पाया उसकी अपेक्षा जो खोया उसका बादशाह को बड़ा दुख था।
बादशाह का स्वाभिमानी मन बहुत सन्तप्त हो रहा था। प्रवास के समय ही
असदखान बादशाह के समीप आकर कहने लगा, "बादशाह सलामत, कुछ राहत
देने वाली खबर है।"
"कौन-सी?"
"अपना प्रिय शहजादा अकबर ईरान चला गया। सम्भा ने उसकी मदद की।
राजापुर के बन्दरगाह में उन्होंने एक निजी जहाज तैयार किया। अन्ततः वह चला
गया।"
"कहाँ, ईरान को?"
"जी मेरे मालिक।"
सम्भाजी :: 553
बादशाह एक विषंड हँसी हँसा। कभी आसमान की ओर तो कभी धरती की
ओर देखते हुए उसने कहा, "किसकी किस्मत और किसकी बदकिस्मत किस
जंगल या किस पहाड़ में लिखी है? इसे तो खुदा ही जाने।"
तीन
एक दिन हंबीरराव ने महाराज से महज ही कहा, "शम्भू महाराज, स्वराज्य की
स्थिति बिगड़ती जा रही है। जागीरों की लालच में अच्छे-अच्छे लोगों का दिमाग
बदलता जा रहा है। इसको रोका भी जाये तो कैसे?"
"मामा साहब, समय ही बहुत कठिन आ गया है।"
"परन्तु महाराज, जैसा आपने कहा, इस कठिन समय को निभाना पड़ेगा।
इसके लिए जैसे वह औरंगजेब जागीरें बाँट रहा है, वैसे हम भी नकली कागजातों
पर कुछ लोगों को जागीरें दे दें।"
"ऐसा कैसे हो सकता है, हंबीरमामा ?"
हंबीरराव के सुझाव पर शम्भू महाराज अत्यन्त गम्भीर होकर बोले, "जागीरों
को बाँटना पिताजी के द्वारा दिए गये आदेशों के विरुद्ध है। पिताजी कहते थे
देवताओं को भी जागीर मत दो। उन्हें भ्रष्ट न करो।" शम्भू महाराज ने विनोद में
आगे कहा, "मामा साहब आपको जागीर की आशा कब से लगी ?"
विनोद के भाव को न समझने के कारण यह सीधा सा विनोदी प्रश्न
हंबीरराव के कलेजे में तीर की तरह चुभ गया। कुछ क्षणों के लिए उन्हें कुछ समझ
में नहीं आया। फिर भी उन्होंने हँसते हुए कहा, "शम्भू महाराज, आपने अपने मामा
को क्या समझा है ?"
वह विनोद का प्रसंग वहीं पर समाप्त हो गया। किन्तु हंबीरराव के भीतर
शम्भू महाराज का प्रश्न चुभता रहा। उनका चेहरा अपमान के बोध से फीका पड़
गया। मानहानि के बोध से उनका कलेजा टूटने लगा। उन्होंने कहा, "शम्भू
महाराज इस हंबीरराव को जागीर की जरूरत ही क्या है ? यदि मुझे सत्ता या राजपद
की भूख होती तो अपने सगे भांजे राजाराम को रायगढ़ के सिंहासन पर बिठाकर
आधे राज्य का मालिक बन गया होता। राजाराम को राजा बनाने के लिए हमारे बुजुर्ग
554 सम्भाजी
अधिकारी बेताब हो रहे थे। मुझे तो उसमें कोई कठिनाई नहीं थी। ' '
' 'हंबीरमामा! कृपया इस बात को इतनी गम्भीरता से न लें मैंने तो विनोद में
कहा था।' ' शम्भू महाराज ने उन्हें मनाने के स्वर में कहा।
शम्भू महाराज मनाने की पूरी कोशिश कर रहे थे किन्तु सेनापति हंबीरमामा
पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। उन्होंने कहा, ' 'हमारी वफादारी की परीक्षा लेने
औरंगजेब के दूत भी आये थे। हमने उनकी दाढ़ी मूँछें मुड़वाकर उन्हें भगा दिया।
फिर भी आपने आज हमारी ऐसी परीक्षा ली।' ' हंबीरराव का स्वाभिमानी मन
विनोद में किये गये आरोप को सह नहीं पा रहा था। वे आवेश में ही वहाँ से उठकर
चले गये। इस प्रसंग से येसूबाई भी आश्चर्यचकित रह गयीं। शम्भू महाराज के लिए
अब वहाँ रुक पाना सम्भव नहीं हो रहा था। वह भी उठकर अपने कक्ष में चले
गये।
इस छोटे से वाद विवाद से रायगढ़ का रंग ही बदल गया। अपने कक्ष में
उदास बैठे शम्भू महाराज के पास येसूबाई गयीं। उन्होंने शान्त स्वर में बड़ी
सावधानी से कहा, ' 'जो भी हुआ अच्छा नहीं है। राजा और सेनापति के बीच
अनबन से सल्तनत का विनाश हो जाता है। इस घटना की भनक औरंगजेब को
लगने की देर है। आप दोनों में दरार पैदा करने के लिए वह जी जान से कोशिश
करेगा।' '
' 'आखिर मैंने ऐसा क्या कह दिया था, युवराज्ञी?' '
' 'महाराज, हंबीरमामा ने जो कुछ कहा वह भी गलत नहीं था।' ' येसूबाई ने
बड़े विवेक से कहा, ' 'चलिए उठिए उन्हें सम्मान के साथ पुनः बुलाकर ले आयें।
आप उम्र में छोटे हैं। उनकी मान मर्यादा की रक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।' '
' 'हम तो बच्चे हैं। हम क्यों जाएँ उनके पास? वे बड़े हैं इसलिए उन्हें ही
हमें मनाने आना चाहिए।' '
इस घटना से उत्पन्न सन्ताप के कारण महाराज ने रात को भोजन में कुछ भी
ग्रहण नहीं किया। बिस्तर में आधी रात तक तड़पते रहे। दूसरे दिन देव पूजन भी
नहीं कर सके। विगत अनेक वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। दोपहर को महारानी
के आग्रह के कारण किसी प्रकार आधा प्याला दूध लिया।
दूसरी रात महारानी येसूबाई बेचैन हो गयीं। किले पर शीतल हवा चल रही
थी। इस छोटी सी घटना को लोगों ने बहुत बड़े झगड़े के रूप में प्रचारित कर दिया
था। यह सब कुछ न सह पाने के कारण महारानी जाकर महाराज के सामने खड़ी हो
गयीं। वे अपने भीतर का रोष छुपा न सकीं। उन्होंने कहा, ' 'बस, अब बहुत हो
चुका। महाराज! आपको पता है? पिछले दो दिनों में मामा ने अन्न का एक दाना
सम्भाजी :: 555
ग्रहण नहीं किया है।"
शम्भू महाराज झट से उठकर खड़े हो गये। उनका गला भर आया। उन्होंने
कहा, "क्या कह रही हो येसू? आपने दोपहर को ही मुझे यह क्यों नहीं बताया?
हमारे हंबीरमामा को आप क्या समझती हैं। पिछले पाँच छह वर्षों में पिताजी के
पुण्य की छाया और हंबीरमामा का साथ के अतिरिक्त क्या किसी और ने हमारा
साथ दिया है?"
शम्भू महाराज ने अपने वस्त्र ठीक किये, सेवकों ने जो रत्नाभूषण सामने किये
उन्हें पहन लिये। शम्भू महाराज और महारानी दोनों हंबीरमामा के घर जाने के लिए
दरवाजे से बाहर निकले। महाराज ने मशाल की रोशनी में देखा तो बाहर मन्द पवन
का सेवन करते हंबीरमामा स्वयं खड़े थे। वे स्वयं महाराज से मिलने आये थे।
महाराज कुछ पूछें उससे पहले सत्तर वर्ष की आयु पूरा कर चुके, मजबूत कदकाठी
वाले हंबीरमामा ने बड़ी व्यग्रता के साथ कहा, "शम्भू बेटे, आपने यह क्या चला
रखा है? पिछले दो दिनों से आपने कुछ भोजन ही नहीं लिया।"
"मेरी बात जाने दीजिए। परन्तु मामा आपने उपवास क्यों रखा है?"
"हम तो पीले पत्ते हैं। हमारी इतनी चिन्ता क्यों करते हैं? आपको तो
हिन्दवी स्वराज्य का भविष्य गढ़ना है। हम तो आज हैं, कल हों न हों।"
आगे बढ़ते हुए महाराज बोले, "हंबीरमामा, ऐसी अशुभ बात मुँह से न
निकालें। आपके न होने की कल्पना मात्र से हमें ऐसा लगता है जैसे हमारे ऊपर
पहाड़ टूट पड़ा हो।"
बाहर शीतल हवा चल रही थी। राजमहल के बन्द वातावरण में जाने का
किसी का मन नहीं हो रहा था। मामा-भांजे साथ-साथ पश्चिम की ओर चलते रहे।
कुछ दूरी पर कातीव छोर था और दूसरी ओर हिरकणी बुर्ज। वहीं पर एक समतल
पत्थर पर दोनों बैठ गये। पास ही एक पत्थर पर बैठकर येसूबाई दोनों के मनोमिलाप
को बड़े कुतूहल से देख रही थीं। आधी रात के समय स्वयं महाराज के बुर्ज पर आने
से पहरेदारों में हलचल मच गयी थी। वहीं पर राजमहल से भोजन मँगवाया गया।
महाराज और सेनापति ने वहीं पर भोजन किया।
चर्चा के दौरान कई बातें निकलीं। हंबीरमामा ने कहा, "हमारे सगे भांजे और
जवाई राजाराम को राजा बनाने के लिए राज कर्मचारी हठ कर रहे थे, इसका पता है
शम्भू महाराज?"
महाराज ने सिर्फ मामा की ओर देखा।
"महाराज, उन संकट के दिनों में मैंने आपको शिवाजी के पुत्र के नाते नमन
नहीं किया था बल्कि यह मानकर कि आप हमारे शिवाजी के स्वप्नों के सच्चे
उत्तराधिकारी हैं इसलिए आपके सामने हमारी गर्दन झुकी थी।"
"आपके उन उपकारों को यह हिन्दवी स्वराज्य कभी भी भूल नहीं पाएगा,
556 :: सम्भाजी