छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
है' यह सोचकर मुअज्जम को बहुत बुरा लगा। जोर से हाँफते हुए उसने रुआँसी
आवाज में कहा, "अब्बाजान बहुत तकलीफ हुई। वहाँ की खराब हवा..."
"बेटे तकलीफ तो होगी ही। निश्चित किये गये रास्ते को बदल देने से
खराब हालत तो होंगे ही।"
अपने पिता के व्यंग्य को शहजादे ने पहचान लिया। उसने बड़ी मासूमियत से
कहा, "आपको कोई गलतफहमी..."
"गलतफहती कैसी? हमारा पहला मकसद क्या था? पूना की ओर से
शहाबुद्दीन कोंकण में पहुँच रहा था और आपको राजापुर पोलादपुर से होते हुए
महाड़ पहुँचना था। वहाँ पर आप और शहाबुद्दीन को इकट्ठा होकर रायगढ़ पर
आक्रमण करना था। यही निश्चित किया गया था।"
"अब्बाजान पर्याप्त रसद न मिल पाने से सेना में अकाल पड़ गया। उस
पुर्तगाली कांटसाहब ने हमें फँसाया।"
"मुअज्जम, इन सारी बातों को यहाँ पर बन्द करो।" बादशाह गुर्राया-
"खाली इतना बता दो कि कोंकण के बताये गये रास्ते को छोड़कर आपके पाँव
रामदरा की ओर कैसे मुड़ गये?"
"लेकिन जहाँपनाह...?"
"आप अन्धे तो नहीं थे। फिर आपकी आँखों-पट्टी किसने बाँध रखी थी ?
कौन? कौन था वह जादूगर? रायगढ़ पर रहने वाला? सम्भा?"
औरंगजेब का स्पष्ट प्रश्न सुनकर शहजादा निराश हो गया। उसका मन हुआ
कि बादशाह का पैर पकड़कर वह फूट फूट कर रोये। परन्तु इस समय उसके शरीर
में उतनी भी शक्ति नहीं बची थी। रुआँसी आवाज में वह बोला, "अब्बाजान रहम
कीजिए। हमारी जिन्दगी की यह दुर्दशा देखकर भी ऐसा जानलेवा मजाक न करें।"
"बेटे जहाँ हवा भी नहीं पहुँचती वहाँ भी मेरे जासूस पहुँच जाते हैं। यह
बात शहजादा होने के नाते आपको अवश्य मालूम होगी।" औरंगजेब ने उदासभाव
से कहा, "वहाँ रहते हुए उस सम्भा के जासूस आपको दो-बार मिले थे।"
"कबूल अब्बाजान। राजनीति में अपने दुश्मन को नष्ट करने के लिए हर कोई
ऐसे खेल खेलता है बात इतनी-सी है कि ऐसे किसी लालच का शिकार आपका
शहजादा नहीं हुआ।"
"क्या पता!"
"ऐसा कैसे हो सकता है अब्बाजान?" मुअज्जम की मीठी आवाज सन्तप्त
हो गयी। उसने रुष्ट स्वर में कहा, "यदि सम्भा के दूतों का हमारे डेरे में आना
आपको दिख जाता है तो जब पन्द्रह दिन तक हम रामदरा घाट चढ़ रहे थे, सम्भा के
सैनिक हमारे ऊपर आक्रमण कर रहे थे, हमारी चमड़ी उधेड़ रहे थे, अपने बाणों से
सम्भाजी :. 507
हमारी आँखें फोड़ रहे थे तो बादशाह को क्यों नहीं दिखाई पड़ा?''
क्रोध से अपने ओंठ चबाते हुए गरजा, "लड़ने वाले बहादुर अपने मित्रों के
क्षेत्र में सेना लेकर नहीं जाते। उन्हें कष्ट देना ठीक नहीं। इसी इरादे से आप पहाड़,
पोलादपुर की ओर गये ही नहीं—छोड़ो उस बात को! पहले यह बताओ कि वह
पैसा कहाँ है?''
"अब्बाजान पैसा तो सारा समाप्त हो गया। इसीलिए तो हमारी सेना की यह
दुर्दशा हुई।''
"वह नहीं, कहाँ है सम्भा द्वारा दी गयी रिश्वत?''
मुअज्जम को सूझ नहीं रहा था कि अपने शंकालु पिता के इस प्रश्न क्या उत्तर
दे? इसलिए निराश होकर वह अपने शिविर में चला गया। वहाँ अपनी खिड़कियाँ,
दरवाजे बन्द करके अपने आप से बातें करने लगा। वह एक पागल की भाँति अपने
को कोसने लगा। अपने आप से ही वह बोला, "जाते समय तकलीफ, वहाँ पहुँचने
पर मुसीबत, आते समय जानलेवा मुसीबत, यहाँ लौटने पर ऐसा लांछन। या खुदा!
कैसी फूटी तकदीर है हमारी?''
पाँच
सखूबाई निंबालकर शम्भूमहाराज मे सात वर्ष बड़ी थीं। उन्हें शम्भूमहाराज के प्रति
बड़ी ममता थी। किन्तु अम्बिकाबाई के पति को कर्नाटक की सूबेदारी मिल जाने के
बाद गृह कलह आरम्भ हो गया। एक दिन शम्भूराजा के जीजा महादजी निंबालकर
और सखूबाई जिद करने लगे। युद्धभूमि में हजारों के सामने दृढ़ और अविचल बने
रहने वाले शम्भूमहाराज गृह कलह के कारण विचलित हो गये थे। उनके भीतर
हलचल मची हुई थी।
सखूबाई का यही कहना था, "आपने जो व्यवहार महाड़िक परिवार के साथ
किया है वही हमारे माथ भी होना चाहिए।
"ऐसा क्या दे दिया है हमने उन्हें?'' महाराज ने पूछा।
"जिंजी और कर्नाटक की सूबेदारी।"
"दीदीजी आपको कोई गलतफहमी हुई है! हमने हरजी महाराज को
कर्नाटक की सूबेदारी दी है, जागीर नहीं ? सखूबाई बहुत नाराज नजर आ रही थीं।
उन्होंने झटके से कहा, "शम्भूराजा, रिश्तेदारों के बीच ऐसा भेद-भाव अखिर
508 :: सम्भाजी
क्यों?''
शम्भुमहाराज अत्यन्त गम्भीर हो गये। येसूबाई की समझ में नहीं आ रहा था
कि क्या कहें? तब सखूबाई रुष्ट स्वर में स्वयं को ही दोष देकर कहने लगी, "सारी
भूल मुझसे हुई। मैंने ही निंबालकर को मिन्नत करके रोका। मैंने कहा-छोटा भाई
राजा बन रहा है तो मुगलों की चाकरी क्यों करना?"
"अब अपने किये कराये का फल भोगो..." महादजी ने कहा। "शम्भुमहाराज
यदि आपने महाड़िकों को कुछ न दिया होता तो हम भी अपना मुँह कभी न
खोलते। किन्तु बिना किसी त्याग या सेवा के उन्होंने दक्षिण का सूबा प्राप्त कर
लिया और हम पागल की तरह देखते रहे।"
"दिल्ली के बादशाह से जागीर मिली थी, लेकिन आप हमें भाई के स्वराज्य
में खींचकर ले आयीं। हमारे लिए तो स्वार्थी स्वजनों से वह मुगल ही अच्छा था।"
महादजी ने गुर्राते हुए कहा।
महादजी और बहन सखूबाई की बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। अन्त में
शंभुमहाराज ने कहा, "दीदीजी हमारा हिंदवी स्वराज्य जनता का मन्दिर है। पिताजी
ऐसा ही मानते थे और मैं भी उसी दृष्टि से स्वराज्य की ओर देखता हूँ। आप चाहे
जितना भी हठ करें, हम अलग से कोई जागीर किसी को दे नहीं सकते।"
दीदी सखूबाई और महादजी चुप हो गये। दूसरे दिन उनकी पालकियाँ
रायगढ़ से नीचे उतरकर चली गयीं।
सम्भाजी :: 509
दक्षिण अभियान
एक
एक दिन सुबह-सुबह शहरबानू ने अपने ससुर औरंगजेब से भेंट की इजाजत माँगी।
इससे बादशाह को कुछ आश्चर्य हुआ। शहरबानू ही नहीं किसी भी पुत्रवधू को यदि
किसी चीज की आवश्यकता होती थी तो वह अपनी माँग उदयपुरी बेगम के सामने
रखती थी। वैसे शहरबानू बहुत सुन्दर थी। वह बीजापुर की शहजादी थी। शहजादा
आजम के साथ उसका विवाह हुआ था। छाती तक खिंचे हुए महीन घूँघट में भी
उसकी आँखें विलक्षण रूप से चमकती थीं। इस अचानक भेंट का उद्देश्य स्पष्ट
करते हुए शहरबानू ने धीमे स्वर में कहा—
"जिल्लेसुभानी, आपकी सल्तनत मेरे लिए मक्का-मदीना है फिर भी मुझे
लगता है कि मेरे अब्बाजान की नगरी बीजापुर और मुगलों के बीच किसी प्रकार का
झगड़ा नहीं होना चाहिए। इसके लिए मैंने बुरहानपुर से आगे बढ़ने से पहले ही
सर्जाखान को एक सन्देश भेजा है। मैंने उन्हें समझाया है कि बादशाह की फौज की
मदद करो और काफिरों को मिटा दो।"
"बहुत खूब बेटी!" सहज रूप से बादशाह के मुख से निकला। बादशाह
का स्वर ठंडा था— "तुम्हारा दिल पाक है किन्तु बीजापुर वालों का दिमाग ठिकाने
पर नहीं है।" बादशाह ने बगल की मेज पर रखी कागज की थैलियों की ओर
शहरबानू का ध्यान आकर्षित करते हुए कठोर शब्दों में कहा, "बेटी, ये कुतुबशाह,
आदिलशाह और उस सम्भा के आपसी पत्र हैं जिसे हमारे थानेदारों और जासूसों ने
इकट्ठा किया है। मुझे दक्खन में न घुसने देने का और मदण्णा तथा सम्भा जैसे
काफिरों की औलादों की रक्षा करना इन बेवकूफों का इरादा है। बेटी तुम्हारी
कोशिश के लिए शुक्रिया, लेकिन उस आदिलशाह में तो हमारे पत्रों का उत्तर देने
की भी तमीज नहीं है। एक न एक दिन हमें बीजापुर को खाक करना ही पड़ेगा।"
बादशाह को कोर्निस करते हुए और उसे बिना पीठ दिखाए, रुष्टभाव से वहाँ
510 :: सम्भाजी
चली गयी। बादशाह ने बीजापुर के सम्बन्ध में वजीर से सहज ही पूछा,
"असदखान! काफिरों के मददगार उस आदिल शाह पर कब आक्रमण करना है?"
"पिछले कई दशकों में आक्रमण करने की हिम्मत किसी ने की नहीं, फतह
की बात तो बहुत दूर की है।"
"क्या?" बादशाह का चेहरा तमतमा गया।
"बादशाह सलामत! उस नापाक शहर के चारों ओर अतिशय मजबूत ढाई
मील की तटबन्दी है। उसके साथ बहुत गहरी खाई है। उस तटबन्दी के भीतर एक
और तटबन्दी है जो फौलाद की तरह मजबूत है उनके बुर्जों पर 'मालिक-ए-मैदान'
जैसी बड़ी बड़ी तोपें हैं। ये तोपें बहुत दूर तक मार करने वाली हैं।"
बादशाह ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। केवल आसमान की ओर एक
बार देखा। उसी दोपहर को शहंशाह की बैठक में जुल्फिकारखान दौड़ते हुए आया
और कहने लगा, "जिल्लेसुभानी, बहुत अच्छी खबर है, उस सम्भा के चार बड़े
सरदार विद्रोही हो गये हैं। आपसे मिलने के लिए बाहर इन्तजार कर रहे हैं।"
बादशाह ने हाथ के संकेत से स्वीकृति प्रदान की। तब थोड़ी ही देर में
कान्होजी शिर्के जगदेव राय, अर्जोजी और अचलोजी आकर बादशाह के सामने
खड़े हो गये। उन्होंने जमीन पर माथा टेककर बादशाह को साष्टांग प्रणाम किया।
"क्या चाहते हो?" बादशाह ने सीधा प्रश्न किया।
"माई बाप, हमी नहीं, बहुत से मराठे खानदान उस सम्भाजी से रुष्ट हैं।
उसके पास कोई न्याय व्यवस्था बची नहीं है।" कान्होजी ने अत्यन्त दीन वाणी में
कहा।
"तुम्हारे हिन्दवी स्वराज्य का क्या है?"
"किस स्वराज्य की बात कर रहे हैं माई-बाप? वह तो पानी का बुलबुला
है। किसी भी समय फूट जाएगा। शिवाजी ने काशी से ब्राह्मण बुलाकर अपने ऊपर
फूलों की वर्षा करवाई और राजा बनने का नाटक किया। लेकिन इस तरह का
दिखावा कितने दिन चलेगा?"
"असल में क्या चाहते हो, आप लोग?"
"दूसरा कुछ नहीं हम पहले के वतनदार है। उस जागीर को हमारे और हमारे
बाल बच्चों के नाम कर दीजिए। हम मराठे मालिक नहीं, किसी का मांडलिक बनने
के लिए जन्म लेते हैं।"
"बहुत खूब! शिर्के तुम बहुत चतुर दिखाई पड़ते हो। गणोजी तुम्हारे कौन
लगते हैं?"
"सगे चचेरे भाई।"
उन चारों सरदारों ने कुछ भी न माँगने की होशियारी दिखाई थी। किन्तु
सम्भाजी :: 511
बादशाह मूर्ख नहीं था। उसने सभी को दो दो हजार की मनसबदारी लिख दी।
वजीर से शाही वस्त्र भी दिलवा दिया। चारों ने कृतकृत्य भाव से बादशाह की चरण
वंदना की और बाहर चले गये।
उन चारों के पीछे एक पैंसठ वर्ष का बूढ़ा खड़ा था उसकी छोटी छोटी दाढ़ी,
टोपी और आँखों में लगे काजल से लगता था कि वह हिन्दू नहीं है। बादशाह की
नजर उस पर पड़ते ही जुल्फिकारखान ने कहा, "किब्लाये आलम, ये हैं काजी
हैदर! शिवाजी के समय से रायगढ़ में रहकर मुंसिफ के रूप में काम करते रहे हैं।"
चारों सरदार चले गये थे और काजी हैदर वहाँ अकेले उपस्थित थे। हैदर की
ओर देखते हुए बादशाह ने हँसकर कहा, "दुश्मनों की सेवा करना अपने आप में
बड़ी नाइन्साफी है तो रायगढ़ पर रहकर इतने वर्ष आप कौन सी इन्साफी कर रहे
थे?"
"गुस्ताखी माफ, हुजूर! शिवाजी जैसा राजा हमें सौभाग्य से मिला। उनके
दरबार में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को समान रूप से न्याय मिलता था।"
"काजी पहले यह बताओ कि शिवाजी और सम्भा ने कितनी मस्जिदें
तोड़ीं ?"
"बादशाह सलामत, एक भी नहीं।" काजी हैदर ने अत्यन्त मन्द स्वर में
कहा, "इतना ही नहीं हुजूर! रायगढ़ पर एक छोटी सी मस्जिद बनाने की स्वीकृति
शिवाजी ने मुझे दी थी सरकारी खर्च से मस्जिद खड़ी की गयी। दो महीने पहले
मैंने रायगढ़ छोड़ा तब तक मस्जिद पूरी तरह सलामत थी।"
काजी हैदर को घूरते हुए बादशाह ने प्रश्न किया, "तुम्हारी मूर्खताभरी बातों
को सुनकर लगता है कि रायगढ़ स्वर्ग है तो वहाँ के सुख को छोड़कर तुम हमारे
पास क्यों आना चाहते हो?"
"बादशाह सलामत, आजकल मुझे वहाँ के कर्मचारियों और अधिकारियों में
बहुत भय लगने लगा था। जो लोग अपने अन्नदाता स्वामी को मारने की दो दो बार
कोशिश कर चुके हों, उनका क्या विश्वास और मैं तो था भी अकेला मुसलमान।"
बादशाह ने पुनः एक बार अपनी आँखें बन्द कर लीं। काजी ने अपनी
जपमाला को छाती से छुआया। कुरान की किसी आयत का स्मरण किया। काजी
हैदर की बुद्धि एवं वफादारी की परीक्षा लेने के लिए उसने सीधा प्रश्न किया—
"काजी हमें सच सच बताइए। पाँच लाख की फौज साढ़े तीन लाख घोड़े हम
दक्खन की छाती पर नचा रहे हैं। मेरी इतनी बड़ी फौज के चारों ओर फैले रहने पर
भी एक चूहे का नन्हा सा बच्चा हमारे साथ इतनी धृष्टता कर रहा है उसके पीछे
असली ताकत क्या है?"
बादशाह के इस प्रश्न पर काजी हैदर विहँसते हुए बोला, "बादशाह सलामत
चूहे का बच्चा जिस बिल में रहता है उसे लोग सह्याद्रि पर्वत कहते हैं। वहाँ
512 :: सम्भाजी
आपको ऊपर तो मिट्टी दिखाई देगी लेकिन नीचे कठोर चट्टानें हैं। उस पर सिर
पटके बिना उस पत्थर की जाति कैसे समझ में आएगी? वह जहरीला सह्याद्रि पर्वत
पत्थरों का है, फौलाद का है। "
"और ?"
"और क्या जहाँपनाह—इसके पहले मराठों और बीजापुर के आदिलशाह के
बीच कई लड़ाइयाँ हुईं। किन्तु इस समय गोलकुंडा के कुतुबशाह और बीजापुर के
सिकन्दर आदिलशाह तथा सह्याद्रि के कन्धे पर सवार सम्भाजी, दक्षिण की ये
शक्तियाँ दिल-दिमाग से एक हो गयी हैं। जब तक इन तीनों के आपसी बन्धन
टूटते नहीं या उनमें दरार नहीं पड़ती तब तक आपकी मुराद पूरी नहीं हो सकती।"
दो
26 अप्रैल, 1684 का दिन था। शम्भूमहाराज वीरवाड़ी के किले में रुके हुए थे।
अंग्रेजों और मराठों के बीच बहुत दिनों से विलम्बित एक महत्त्वपूर्ण सन्धि होने
वाली थी। मराठों के वकील प्रह्लाद निराजी और अंग्रेजों के वकील स्मिथ की
भागदौड़ चालू थी। पिछले कुछ महीनों मे मुम्बई के चारों ओर अपनी सेना की
घेरबन्दी करके सम्भाजी ने अंग्रेजों की नाक मे दम कर दिया था। मुम्बई के अंग्रेज
घबरा गये थे। उन्होंने सूरत वाले अंग्रेजों से परामर्श किया। ईस्ट इंडिया कम्पनी को
अपने सूरत के अधिकारियों पर अधिक भरोसा था। इसके साथ ही वसई बिरार से
लेकर गोवा तक सम्भाजी महाराज ने फिरंगियों पर दबाव डालना शुरू कर दिया था।
इसके अतिरिक्त मराठों ने केलवा, दन्तोरा, सारगाँव, माहिम और सोपारा चौकियां
पर क़ब्जा कर लिया था। इससे अंग्रेज बहुत भयभीत हो गये थे।
चाइल्ड और वॉर्ड नामक अधिकारियों के अत्याचार से मुम्बई की जनता
उनके विरुद्ध आन्दोलन कर रही थी। इस विद्रोह के कारण ही कम्पनी सरकार ने
रिचर्ड केजविन की मुम्बई के गवर्नर के रूप में नियुक्ति की थी। 'रिचर्ड' के साथ
सम्भाजी महाराज ने कुछ अच्छे सम्बन्ध बना लिए थे। सम्भाजी महाराज एक ओर
समझौते की बात कर रहे थे किन्तु दूसरी ओर से सेना का दबाव भी बनाए जा रहे
थे।
गवर्नर केजविन ने अपने दो अधिकारियों, कैप्टन गैरी और थामस विल्किन्स
सम्भाजी
को सम्भाजी के पास वीरवाड़ी भेज दिया था। शम्भूराजा का दबाव कम हो और
अंग्रेज चैन की नींद सो सकें इसके लिए वे समझौते के लिए तैयार थे। महाराज ने
किले के वकीली महल में अंग्रेज वकीलों का स्वागत किया। अनेक गाँवों के
अमलदार और सेना के बहुत से लोग वीरवाड़ी में एकत्र हो गये थे। वहाँ पर मेले
जैसी भीड़ एकत्र हो गयी थी।
प्रातःकाल में ही सम्भाजी महाराज ने निराजी को बुलाकर मेहमानों की
व्यवस्था की जानकारी प्राप्त की। उस समय प्रह्लाद निराजी ने धीरे से कहा,
"महाराज आपकी इच्छानुसार सौदे की बात की जाती तो कितना अच्छा होता?"
"कौन-सा सौदा?"
"अंग्रेजों से मुम्बई खरीदने का सौदा।"
महाराज प्रसन्नतापूर्वक हँसकर बोले, "पन्त हमने कुछ कम प्रयास नहीं
किया। मुम्बई के लिए अंग्रेजों को हम चालीस हजार पगोडा रकम देने को हम तैयार
थे। वह रकम आगे चलकर अस्सी हजार तक पहुँच गयी तो ठीक था। मुम्बई की
बन्दरगाह सचमुच कुबेर के खजाने की चाभी है इसे पाने के लिए हमारा मन कब से
व्याकुल हो रहा है।"
"तो महाराज घोड़ा रुक कहाँ गया?"
"गवर्नर केजविन तो मुम्बई को हमारी झोली में डालकर पीछे हटने को
तैयार था। किन्तु उन धूर्त सूरत वालों के कारण सौदा टूट गया। सिद्दियों ने सूरत
वालों से कहा था, "यदि मराठों का कब्जा मुम्बई पर हो गया हमें जलसमाधि लेनी
पड़ेगी।" "पन्त, अब क्या कहें भाग्य ने मेरे साथ एकबार फिर खिलवाड़ किया।"
विचार-विमर्श के लिए बैठक का समय समीप आ रहा था। मसौदे के
कागजों पर महाराज ने एक नजर डाली। उसी समय बैठक के लिए विशेष रूप से
खड़े किये गये तम्बू में दुभाषिया राम शेणवी माहब लोगों को लेकर आ गया। मुख्य
रूप से अंग्रेजों को जगह-जगह पर गोदियाँ बनाने की स्वीकृति सम्भाजी से लेनी
थी। जिंजी और मद्रास की ओर अंग्रेजों का विशेष ध्यान था। यह तटीय प्रदेश मराठों
के अधिकार में था। गोदामें बनाने के लिए महाराज की अनुमति मिलते ही कैप्टन
गैरी बेहद प्रसन्न हो गये। दूसरे ही क्षण उसके उत्साह को कम करते हुए महाराज
ने कहा, "आप प्रसन्नता से अपने व्यापार और उद्योग बढ़ाइए। किन्तु गोदामें बनाने
के नाम पर अपने गढ़ और किले बनाने की कोशिश न करें। कितनी जगह पर आप
गोदाम बनाएँगे इसकी सूचना भी पहले देनी होगी। इसका स्पष्ट उल्लेख इसी
समय इस सन्धिपत्र में होना चाहिए।"
महाराज की बात सुनकर गैरी चुप हो गया। अपने सहकारियों के साथ
विचार-विमर्श करने के लिए उसने महाराज से कुछ समय माँगा। एक घंटे के
514 :: सम्भाजी
अन्तराल से पुनः चर्चा आरम्भ हुई। अपनी पिछली बात को आगे बढ़ाते हुए
शम्भूमहाराज ने कहा, "जिस प्रकार व्यापारी बाजारों में अपनी दुकानें लगाते हैं उसी
तरह गोदामें तैयार कीजिए, किले नहीं।"
"महाराज हमें थोड़ी अधिक सहूलियत दीजिए।" गैरी ने कहा। अन्त में
दोनों पक्षों ने समझौता किया। गोदामों की लम्बाई 60 कोविद चौड़ाई 15 कोविद,
ऊँचाई ढाई कोविद निश्चित की गयी और उसे दोनों पक्षों ने स्वीकार कर लिया।
शम्भूमहाराज ने प्रश्न किया, "आपकी गोदामों की दीवारों की चौड़ाई
कितनी होगी?"
"अब जाने भी दीजिए महाराज।" गैरी साहब ने हँसते हुए कहा।
"गोदामों की दीवारें किलों की तरह नहीं बनतीं। इस सम्बन्ध में भी इसी
समय निश्चित कर लेना चाहिए।"
दीवार की चौड़ाई आधी कोविद निश्चित की गयी। राजापुर की गोदाम बनाते
समय शिवाजी महाराज ने अँग्रेजों से जो कर्ज लिया था। उसे नीति धर्म के अनुसार
देना शम्भूमहाराज ने स्वीकार किया। निश्चित किया गया कि कर्ज की रकम के
बदले अँग्रेज नारियल और सुपारी खरीदेंगे। नागोठणें और पेन में भी गोदाम बनाने
की स्वीकृति अँग्रेजों को दी गयी। किन्तु महाराज ने कैप्टन गैरी से स्पष्ट कहा कि
यातायात और आयात निर्यात पर कर लिया जाएगा। इसमें किसी प्रकार की छूट नहीं
दी जाएगी।
अँग्रेज अपनी गोदामों और दुकानों में यहाँ के कितने लोगों को कार्य के लिए
नियुक्त करेंगे, इसकी सूची स्थानीय सूबेदार या अदलदार को देना अँग्रेजों के लिए
अनिवार्य होगा। यह भी निश्चित किया गया कि जिन लोगों को अँग्रेज काम पर
रखेंगे उसकी पूर्व अनुमति लेना आवश्यक होगा। अन्त में महाराज ने अपने मन की
बात पूछ ली, "कैप्टन गैरी साहब, गुलाम लड़कों का क्या करते हैं?"
"महाराज, अब यह मुद्दा किसलिए उठा रहे हैं? आपके पिता गुलामों के
लिए चौगुना चुंगी लगाते थे, आप छः गुना, आठ गुना ले लें। यहाँ उद्योग या
व्यापार चलाने के लिए गुलाम हमारे लिए आवश्यक होते हैं?"
"गुलाम के नाम पर मनुष्यों के साथ कुत्तों, घोड़ों और गधों जैसा व्यवहार
हमें स्वीकार नहीं। जंजीरे का वह हैवान सिद्दी हमारे कोंकणी लड़कों को भगाकर
ले जाता है और मुँहमाँगी कीमत लेकर मुम्बई में बेच देता है और तुम लोग अपनी
रकम वसूलने के लिए उनकी पीठ की चमड़ी उधेड़ देते हो। बिना नहाये धोये ही
ये बच्चे महीनों का समय गुजार देते हैं। इस प्रकार का अत्याचार हम अपने राज्य में
नहीं चलने देंगे।"
शम्भूमहाराज के शब्दों में इतनी दृढ़ता थी कि कैप्टन गैरी और उनके साथी
सम्भाजी 515
मुँह खोलने की हिम्मत न कर सके। उसी प्रवाह में महाराज ने वह भी कह दिया,
“मेरी दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने धर्म के अनुसार आचरण करने का
अधिकार है।"
"महाराज ! वह तो प्रत्येक के लिए होता ही है।" कैप्टेन गॅरी बोला।
"गॅरी साहब, सच्चाई कुछ अलग है। आपके पादरी लोग हिन्दुओं को
जबरदस्ती ईसाई बनाते हैं। इसी उद्देश्य से मुम्बई और अन्य बाजारों में मनुष्यों की
बिक्री होती है। यह अमानवीय व्यवहार भी बन्द होना चाहिए।"
कैप्टेन गॅरी ने यह भी स्वीकार किया। इस प्रकार अंग्रेजों और मराठों के
सन्धिपत्र के सातवें क्रमांक पर स्पष्ट शब्दों में लिखा गया—'हमारे राज्य में किसी
भी मनुष्य को गुलाम या ईसाई बनाने के लिए अंग्रेजों के द्वारा खरीदा नहीं जाएगा।'
सन्धिपत्र पर मुहर लगा दी गयी। उपहारों का लेन देन हुआ। मुम्बई के
अंग्रेजों की मंडली प्रसन्नतापूर्वक वीरवाड़ी से बाहर निकली। महाराज का
अभिवादन करते हुए प्रह्लाद निराजी ने चिन्तित स्वर में कहा, "महाराज, आपकी
इच्छानुसार यदि मुम्बई मिल गयी होती...।"
"मुम्बई हमें अवश्य मिलेगी, पन्त ! औरंगजेब के साथ जीवन-मरण की इस
लड़ाई से हमें मुक्त होने दीजिए। एक ओर औरंगजेब की कब्र तैयार होगी और
दूसरी ओर मुम्बई पर क़ब्ज़ा होगा।"
शम्भूमहाराज की आँखों में एक नयी चमक दिखाई पड़ी। हाथ की मुट्ठियाँ
बाँधते हुए उन्होंने कहा, "मुम्बई हमारी ही भूमि का हिस्सा है! प्राकृतिक रूप से
हमीं उसके स्वामी हैं। विश्व व्यापार की चाभी हमारे हाथ में होनी चाहिए इसके
लिए अंग्रेजों को हम मुँहमाँगा मूल्य देने को तैयार हैं। किन्तु यदि इस तरीके से वे देने
को तैयार न होंगे तो हमारी तलवार किस दिन के लिए है?"
तीन
शम्भूमहाराज को यह प्रातःकाल बहुत सौभाग्यसूचक लग रहा था। वे बड़े गर्व से
अर्जोजी यादव की ओर देख रहे थे। अर्जोजी ने स्वराज्य में अनेक इमारतों का
निर्माण कर यश कमाया था। किन्तु आज का उनका साहस उनके यश का शीर्ष बिन्दु
बन गया था। हंबीरराव ने अहमदनगर के क़िले की तटबन्दी तोड़कर प्रवेश करने का
516 . सम्भाजी
प्रयास अनेक बार किया था। बहादुरगढ़ की तटबन्दी में सुरंग लगाकर घुसने की
कोशिश अनेक बार की गयी थी। किन्तु शम्भूमहाराज के किसी भी सहयोगी या
सरकार को दुर्गादेवी और राणूबाई तक पहुँचने में सफलता नहीं मिल पायी थी।
साहसी बहुरूपी अर्जॉजी ने वह कार्य कर दिखाया था।
काशी वाले कपड़ा व्यापारी के रूप में अर्जॉजी दुर्गादेवी से जाकर मिले थे।
बहादुरगढ़ से वे सभी साहिबा का एक गुप्त पत्र भी ले आये थे। महाराज ने अधीरता
से दो-तीन बार पढ़ा। फिर दुर्गादेवी, राणू दीदी और अपनी कभी न देखी हुई बेटी
के बारे में पुनः पुनः पूछने लगे। अर्जॉजी भी उसी बात को बार बार दुहरा रहे थे।
किन्तु उसी बात को बार बार सुनने पर भी शम्भूमहाराज और येसूबाई के कान तृप्त
नहीं हो रहे थे।
अर्जॉजी बहुत देर तक बातें करते रहे। महाराज ने लाखों के मूल्य वाले उस
पत्र को एक बार पुनः पढ़ा—
"प्रतिदिन उगते सूर्य के साथ आपकी स्मृति दीप्त होती है किन्तु सूर्य के
डूबने के साथ बुझ जाती है। रात खाने को दौड़ती है मनुष्य के पास यदि दर्पण है तो
वह उसमें अपना प्रतिबिम्ब देखता है। एक दृष्टि से मुझे भाग्यवान कहना चाहिए।
आपकी बेटी राजकुमारी कमलजा का सान्निध्य हमारे सुख का महत्त्वपूर्ण अंश है।
उसके सुन्दर गौररूप की ओर मैं जब भी देखती हूँ तो आपकी कामदेव जैसी
पौरुषेय प्रतिमा मेरी आँखों के सामने खड़ी हो जाती है।
लाखों लाख के वैभव वाले रायगढ़ की राजकुमारी बादशाह के बन्दीखाने में
जन्मी। किन्तु है वह बहुत सुन्दर, हँसमुख, वाचाल और अपने जन्मदाता की भाँति
निर्भीक और साहसी। बादशाह की शहजादी उससे पैंतीस वर्ष बड़ी है। किन्तु
शहजादी को अपनी राजकुमारी से बहुत लगाव है।
स्वामी, यदि आपको स्मरण हो वह रायगढ़ के ऊपर का अनेक रंगों के
कमलों से भरा हुआ वह तालाब। जब स्वामी किले पर होते थे तो बिना भूले हमारे
लिए एक श्वेत रंग का कमल ले आते थे। उसी का स्मरण करके मैंने अपनी बेटी का
नाम 'कमलजा' रखा है।
अपने पर्वत जैसे पिता और हजारों किलों के राजा रायगढ़ को आँख भर देखने
के लिए राजकुमारी बहुत उत्सुक हैं। स्वामी आपसे बिछड़े हमें आठ वर्ष हो गये।
ईश्वर ही जाने कि आपके चरणों का दर्शन कब हो सकेगा। किन्तु कमलजा आपका
और रायगढ़ का स्मरण निरन्तर करती रहती है। हम उस पर नाराज होते हैं। उससे
कहते हैं कि बन्दीखाने में रहकर अधिक अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। पर जानते हैं?
अपनी राजकुमारी क्या कहती है—'माताजी, कृष्ण भगवान हमारी तरह कारागार में
नहीं पैदा हुए थे क्या? भगवान की इस सारी दौलत और सारे संसार से हमें क्या
सम्भाजी 517
लेना-देना है? हमें तो एक बार सिर्फ एक बार अपने पिता की गोद में सिर रखना
है। भगवान शिव की तरह के अपने पितामह के रायगढ़ को देखना है।'
स्वामी, राजकुमारी की देखभाल के लिए मैं और उसकी राणू बुआ पूरी तरह
सक्षम हैं। कभी न कभी इस अन्धकार का पर्दा अवश्य हटेगा। उसकी इतनी क्या
चिन्ता? आप अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। हमारे लिए जान को जोखिम में डालने
की कोई आवश्यकता नहीं है। यहाँ भोजन वस्त्र की कोई कमी नहीं है। राजपरिवार
के बन्दियों को सब कुछ दिया जाता है। पंच पकवान रोज ही बनता है किन्तु अपनी
रसोई की रोटी का स्वाद कुछ और ही होता है। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
तुलजा भवानी की कृपा से आपकी और कमलजा की भेंट कभी-न-कभी अवश्य
होगी।''
उस पत्र को पढ़ते पढ़ते शम्भूमहाराज की आँखें भर आयीं। येसूबाई की
आँखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित थी। उन दोनों को धीरज बँधाते हुए अर्जॉजी
कहने लगे—‘‘एक बात तो सत्य है महाराज, आपके परिवार को उस कारागार में
खाने-पीने, रहने आदि की कोई कमी नहीं है। औरंगजेब राजबन्दियों के बाल-
बच्चों का इतना ध्यान क्यों देता है? मैंने इस बात की बड़ी सूक्ष्मता से पूछताछ की।
मुझे इस सम्बन्ध में जो जानकारी मिली वह कहानी बड़ी अनोखी है।''
‘‘कौन-सी?’’
‘‘औरंगजेब के पिता शाहजहाँ ने अपने पिता जहाँगीर के विरुद्ध बगावत का
ऐलान किया था। उस समय जहाँगीर ने औरंगजेब को उसके भाइयों के साथ अपने
जुन्नर में रखा था। उन दिनों उसकी दशा कुत्ते से भी बदतर हो गयी थी। उसकी
स्मृति बादशाह के दिमाग मे कभी मिटी नहीं। इसीलिए वह राजबन्दियों और उनके
बाल बच्चों का इतना ध्यान रखता है, उन पर दया करता है।''
चार
बादशाह के डेरे में पिछले दो-तीन दिनों से हलचल मची हुई थी। सेना को डेरे डंडे
के साथ बाहर निकलने का आदेश हुआ था। इसलिए कनातों और सामानों से भरी
ऊँट गाड़ियाँ, पीठ पर रसद के बोरे लादे हजारों बैल, अहमदनगर से बाहर निकल
रहे थे। बादशाह ने सेना को दो दिनों के भीतर सोलापुर की दिशा में अभियान करने
518 :: सम्भाजी
४. पुर्तगाली-सिद्दी दमन, कवि कलश मित्रता, संगमेश्वर घटना एवं अमर धर्मवीर बलिदान
का आदेश दिया था। आलमगीर के मन में क्या योजना चल रही थी। इसका अनुमान
किसी को नहीं लग रहा था। इतना स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था कि वे किसी कारण से
बहुत चिन्तित हैं।
दरबार में बैठा बादशाह अपने हरकारों और गुप्तचरों के पत्रों को बड़ी
बारीकी से पढ़ रहा था। शहजादा आजम की सेना बीजापुर क्षेत्र में उधम मचा रही
थी। उसने नागोठणे के किले को घेर लिया था। शेख उल इस्लाम साहब को
दक्षिण के दोनों राजाओं को बादशाह का क्रोध पसन्द नहीं था। शिया हो या सुन्नी,
दोनों अल्लाह के बच्चे हैं। आज बादशाह संतृप्त था फिर भी उसके चेहरे पर चमक
थी। शेख साहब ने यह देखते हुए साहस करके कहा, "किबलाए आलम, आखिर
तो बच्चे ही हैं। उनकी बात को मन पर इतना क्यों लेना?"
"कौन बच्चे हैं?"
जहाँपनाह, वह हैदराबाद का कुतुबशाह एक अय्याश है और बीजापुर के
सिकन्दर आदिलशाह की उम्र अभी पन्द्रह सोलह की"
बौखलाये बादशाह ने शेखसाहब से स्पष्ट शब्दों में कहा "इन दोनों को नष्ट
करने से ही मराठों की कमर हमेशा के लिए टूटेगी। मैसूर का चिक्कदेवराज इस
प्रकार की सूचना मुझे बार बार दे रहा है। इसके अतिरिक्त इन दोनों की उम्र से हमें
कुछ लेना देना नहीं है। उनकी मूर्खता और मूर्खता की राजनीति खुदा को भी
पसन्द नहीं आएगी। हैदराबाद गोलकुंडा का वह शाह भरे दरबार में सारंगी बजाता
है, सुनने वालों से वाहवाही लूटता है। हर शुक्रवार को चारमीनार चौक पर बीस
हजार लड़कियाँ, बाजारू औरतें, नर्तकियों को इकट्ठा करके नचाने गवाने का नंगा
नाच करता है। वह प्रजा की और खुदा की सेवा कैसे करेगा?"
बादशाह को अचानक कुछ याद आया। उसने तुरन्त बरामदखान को
बुलवाया, "बरामद, इसके पहले हमने उस बदमाश आदिलशाह के सामने अपनी
कुछ माँगें रखी थीं। उसका कोई जवाब आया कि नहीं?"
बरामदखान घबरा गया। बादशाह शेख उल इस्लाम की भाव भंगिमा का
निरीक्षण करने लगा। खान से आदिलशाह का कटु जवाब पढ़ा नहीं जा रहा था।
बादशाह की भौंहें टेढ़ी हो गयीं। खान घबराकर पत्र पढ़ने लगा- "बीजापुर के क्षेत्र
में नयी चौकियाँ बनाने की इजाजत क्यों माँग रहे हो? इसके पहले बिना हमारी
इजाजत के तुमने बना ली हैं उन्हें तुरन्त नष्ट कर दो। शाहंशाह को यदि सम्भाजी पर
चढ़ाई करनी है तो खुशी-खुशी अपने या सम्भाजी के क्षेत्र से होकर जाएँ। उसके
लिए हम अपने क्षेत्र की डेढ़ बीता जमीन भी देने वाले नहीं हैं। इसके अतिरिक्त
शिवाजी और सम्भाजी का प्रदेश भी मूलरूप से आदिलशाह का ही है इसलिए
सम्भाजी :: 519
बादशाह को उस पर भी नजर नहीं डालनी चाहिए।"
इस जवाब से वहाँ के सभी लोग चकित हो गये। बादशाह के विरुद्ध किसी
ने इतनी हिम्मत दिखाई हो ऐसा बादशाह को स्मरण नहीं था। बादशाह ने
बरामदखान से पूछा, "हमारी दूसरी माँग क्या थी आदिलशाह से? वह भी
पढ़िए।"
"सर्जाखान नाम के अपने सेनापति को नौकरी से निकालकर उसे बीजापुर से
बाहर निकालिए।"
"हूँ, उस पर उस मूर्ख ने क्या जवाब दिया है?"
"...यह हमारा व्यक्तिगत मामला है। इसके अतिरिक्त सर्जाखान हमारे
सिपाहसालार हैं। यह औरंगजेब साहब को मालूम नहीं है क्या? वे आज जिस पद
पर हैं कल भी उसी पद पर रहेंगे। उल्टे हम उनकी तनख्वाह बढ़ाने का विचार कर
रहे हैं।"
"...बसऽ!" औरंगजेब के धैर्य का बाँध टूट गया। दरबार के सभी लोग चुप
थे। औरंगजेब का सन्ताप उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। तीव्र ज्वर से
ग्रस्त कोई व्यक्ति जैसे बड़बड़ाने लगता है वैसी ही मनःस्थिति औरंगजेब की थी।
वह अपने को न सँभाल पाने के कारण गरजा, "आदिलशाह हो या कुतुबशाह दोनों
ही हरामजादे हैं। यह कुतुबशाह अल्ला की सल्तनत में कभी भी ईमानदार नहीं
रहा। उस नापाक सम्भा के साथ मैसूर वालों से लड़ने के लिए दस हजार की फौज
भेजता है। अपने दरबार में मादण्णा और आकण्णा नाम के दो हिन्दू पंडितों को
प्रधान बनाया है। इस्लामी हुकूमत और हिन्दू प्रधानमन्त्री कैसी बेवकूफ राजनीति है
वह? बोलो शेख साहब?"
"'तौबाऽ तौबाऽऽ'"। बाकी लोगों ने भी बादशाह की हाँ में हाँ मिलाई।
"यह कुतुबशाह तानाशाह इतना मक्कार है कि क्या बताऊँ? कुछ वर्ष पूर्व
वह शिवाजी भोंसला इससे मिलने के लिए गया था। उस समय इसी गधे ने
शिवाजी के घोड़े को रत्नों का हार पहनाया था। घोड़े के गले में रत्नों का हार
पहनाकर उनका स्वागत किया था। साथ ही एक लाख की राशि सालाना तनख्वाह
देना भी स्वीकार किया। उन मादण्णा और आकण्णा जैसे हेलकट वैष्णव ब्राह्मणों के
हाथ में राज्य का सारा कार्यभार सौंपने वाला कुतुबशाह इस्लाम के नाम पर एक
धब्बा है।"
बादशाह के असीम सन्ताप, उसके चढ़ते हुए स्वर को देखकर वजीर
असदखान, बरामदखान और विशेष रूप से शेख उल-इस्लाम सभी चुप थे।
"काफिर सम्भाजी की रक्षा करने वाले दोनों हरामखोर अपना मन नहीं बदलते तो
520 :: सम्भाजी
आलमगीर की तलवार में कितनी धार है ? यह इन जहन्नमियों को दिखाना ही
पड़ेगा।"
बादशाह के इस वक्तव्य से दरबार में सन्नाटा छा गया। इसी समय कोने का
पर्दा हिला। काँच की दंडियों की खनक के साथ एक कोमल और आवाज सुनाई
पड़ी। "लेकिन खाविन्द आज सारी दुनिया में एक ईरान के बादशाह को छोड़कर
आपके अतिरिक्त इस्लाम का रखवाला दूसरा है कौन ?"
"कौन ?"
सभी की दृष्टि उसी ओर घूम गयी। बादशाह की लाडली शहजादी
जीनतउन्निसा वहाँ खड़ी थी। उसके जालीदार घूँघट में उसका गोरा और तेजस्वी
चेहरा दमक रहा था।
बादशाह तुरन्त उठकर खड़ा हो गया। अपने दरबारी कामकाज में घर की
बहू बेगमों और शहजादियों की दखलन्दाजी उसे बिलकुल पसन्द न थी। लेकिन
उसकी प्रिय शहजादी के अचानक ऐसी भूल करने से वह बहुत दुखी हुआ। वह
दरबार में रुका नहीं। क्रोध से पैर पटकते हुए वह अपने निजी कक्ष में पहुँच गया।
शेख काजी जैसे धर्मात्मा को टक्कर देने वाला बादशाह अपनी शहजादी की मूर्खता
से बहुत दुखी हो गया था। उसके पीछे-पीछे जीनतउन्निसा भी घबराई हुई भागी
भागी आयी। उदयपुरी बेगम और औरंगाबादी बेगम के साथ सभी बेगमे घबरा गयी
थीं। बादशाह के चेहरे का रंग एकदम बदल गया था। रात को खाना खाते समय
बादशाह ने पूछा, "बेटी, आज दोपहर को तुम्हें क्या हो गया था ?"
"अब्बाजान, मैं तो अपने मजहब के लिए बोली थी।"
"बेटी जीनत, तुम्हें मालूम है कि नहीं, जेबुन्निसा मेरी कितनी प्रिय शहजादी
थी ? पर उस मूर्ख शहजादा अकबर के बहकावे में आकर हमेशा के लिए उस
सलीमगढ़ की अँधेरी कोठरी में कैद हो गयी। शहजादी होकर भी राजनीति के
कार्यक्षेत्र में दखलन्दाजी क्यों करती हो ?"
किसी अज्ञात भय के कारण बादशाह के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने कातर
स्वर में कहा, "बेटी जीनत, आज मैं सिर्फ इतना बताना चाहता हूँ कि मैं अपनी एक
और शहजादी हमेशा के लिए खोना नहीं चाहता।"
"रहम करो। अब्बा रहम करो।" शहजादी ने हाथ जोड़ लिये।
"मुझे लगा आपको मुहब्बत हो गयी है।"
"कैसी मुहब्बत, अब्बाजान ?"
"उस काफिर के लिए, सम्भा के लिए।" बादशाह ने अपनी नजरें शहजादी
पर गड़ा दीं।
"वह तो मुझसे पन्द्रह-बीस साल छोटा है, मेरे भाई जैसा है।"
सम्भाजी : 521
औरंगजेब ने कुछ अधिक नहीं कहा। किन्तु बादशाह के इस आक्षेप से
शहजादी बहुत पीड़ित हुई। उसने सुबक-सुबक कर रोना शुरू कर दिया। बादशाह
का हृदय द्रवित हुआ। अपनी शहजादी के सिर पर प्रेम से हाथ फेरते हुए उसने
भावुक होकर कहा, "बेटी तुम्हारी सच्ची मुहब्बत अपने अब्बा की तरह अपने
मजहब—इस्लाम—से है। वह मुझे भी अच्छी तरह पता है। लेकिन जिन दो
इस्लामी राज्यों के लिए तुम्हें दया आती है, जिनके लिए हमारे शेख काजी भी
नाराज होते हैं, वे दोनों हुकूमतें काफिर की दोस्त और अल्लाह की दुश्मन हैं।"
जीनतउन्निसा ने कुछ अविश्वास से अपने पिता की ओर देखा। उसी समय
बादशाह ने एक पत्र निकाला। उसे शहजादी के सामने करते हुए बोला, "देख बेटी
यह कुछ दिन पहले हैदराबाद के उस मूर्ख कुतुबशाह द्वारा बीजापुर के आदिलशाह
को लिखा गया पत्र है। इसे हमारे जासूसों ने प्राप्त किया है। इसके मजमून को
पढ़ो।"
शहजादी की दृष्टि पत्र पर घूमने लगी।
'भाईजान सिकन्दर आदिलशाह,
औरंग बादशाह ने शहजादा आजम को आपके राज्य में दबाव डालने के लिए
भेजा है। किन्तु आप उसकी जरा भी चिन्ता न करें। मैं शीघ्र ही चालीस हजार की
कुतुबशाही फौज आपकी सहायता के लिए भेज रहा हूँ। सम्भाजी राजा के हंबीर
मामा, मिरज, अथणी, बारूगढ़, महिमानगढ़ से जत तक के प्रदेश में तहलका मचा
रहे हैं। बादशाह की फौज को हैरान करके आपकी मदद कर रहे हैं, यह हमें भी
मालूम है। दक्खन देश हमारी तीनों हुकूमतों को औरंगजेब को हैरान करके निश्चित
रूप से यमुना के तट पर भगाना है। देखें यह दिल्ली का बूढ़ा हमारे दक्खिनी दिमाग
के आगे कब तक टिकता है? आप जरा भी न घबराएँ। मैं और सम्भाजी राजा पूरी
शक्ति से आपके पीछे खड़े हैं।
आपका भाई
तानाशाह अबुल हसन कुतुबशाह
उस पत्र को पढ़कर शहजादी को असलियत समझ में आ गयी। समय से
अपनी आँख खोल देने के लिए उसने अपने अब्बा बादशाह का आभार माना।
शहजादी के समझ लेने पर बादशाह आनन्दित हुआ और रात को उसे बहुत देर से
नींद आयी। किन्तु वह रात बादशाह के लिए सुखकर नहीं सिद्ध हुई। सवेरे सबेरे
उसका मुख्य जासूस दरवाजे पर दस्तक देने लगा। बादशाह आँख मलते हुए उठा तो
दरवाजे पर असदखान और बरामदखान को खड़ा पाया। बादशाह ने परिस्थिति की
गम्भीरता का अनुमान कर लिया। उनको लेकर वह स्नानगृह में चला गया। घबराया
हुआ वजीर बताने लगा, "बादशाह सलामत, बहुत बुरी खबर है।"
522 :: सम्भाजी
“क्या हुआ?”
“अपना पाँच हजार घुड़सवारों का एक दल, हमारे साथ गद्दारी करके रात को
भाग गया।”
“कहाँ? सम्भा के पास?”
“खबर उतनी बुरी तो नहीं है।” वजीर ने सँभलते हुए कहा।
“वे सभी बैजापुर की ओर से दिल्ली, आगरा की ओर भाग गये।”
“क्यों? उन्हें तनख्वाह नहीं मिली?”
“दक्खन उन्हें आये आज पाँच वर्ष हो गये। उन्हें तनख्वाह मिलती है।
खाने-पीने की भी कोई कमी नहीं है। किन्तु उन पागलों को अपने बाल-बच्चों की
बहुत याद आ रही थी। जहाँपनाह अपनी जिन्दगी में उन्होंने इतनी लम्बी लड़ाई
कभी देखी ही नहीं थी।”
“यह बात ठीक नहीं, वजीर। आज पाँच हजार गये, कल दस हजार जाएँगे,
बाद में पाँच लाख जाएँगे। इस प्रकार एक-एक करके सारी शाही फौज टूट
जाएगी।”
“फिर क्या हुक्म है, मेरे मालिक?”
चाहे तो चौगुनी फौज उनके पीछे भेजो, किन्तु उनकी मुस्कें चढ़ाकर खींचते
हुए उन्हें पीछे ले जाओ।” बादशाह कहते-कहते रुक गया। बहुत गम्भीर होकर
कहने लगा-“राजमहल में सौ खम्भे हैं। उनमें यदि एकाध आड़ा-तिरछा हो गया
तो क्या बिगड़ेगा? ऐसा सोचने की मूर्खता न करो। इस प्रकार के घमंड और ऐसी
मूर्खता का जिन्दगी में कोई उपयोग नहीं है। यह विनाश की शुरुआत है। बुद्धिमान
व्यक्ति को इससे सीख लेनी चाहिए।”
पाँच
औरंगाबाद से दिल्ली की ओर भागती अपनी सेना को पकड़ने में औरंगजेब सफल
हो गया। औरंगजेब उन सभी भगोड़े सैनिकों को समाप्त कर देने का विचार बना
रहा था। किन्तु इस प्रकार के कठोर निर्णय लेने का वह समय नहीं था।
बादशाह बहुत देर तक बेचैनी के साथ बैठा रहा। अन्त में उसने वजीर से
कहा, “शरीर से थकी फौज को नयी रसद पहुँचाकर तरोताजा किया जा सकता है।
सम्भाजी :: 523
किन्तु मन से थकी हुई फौज चिन्ता का विषय बन जाती है। हमें एक बात बताओ,
अनाज, लिबास, तनख्वाह छोड़कर इन मूर्खों को और क्या चाहिए।"
"एक विजय।"
"मतलब!"
"आलमपनाह, पिछले पाँच-छः वर्षों में अपनी फौज ने एक लड़ाई जीती
नहीं है। वह नन्हा-सा रामशेज आज भी हमारे क़ब्जे में नहीं आ रहा है। अगले
कुछ महीने अथवा वर्ष में सम्भाजी पराजित होगा, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। हजरत,
सम्भा के किले सचमुच फौलाद के बने हैं।"
"फिर उसी सम्भा और उसकी फौज की तारीफ?" बादशाह ने घूरा।
"तारीफ नहीं हजरत, यह हकीकत है।" बरामदखान बीच में बोल पड़ा।
"मराठों की फौज एक अद्भुत चमत्कार है, जिल्लेसुभानी। अपनी विजय बिना
निश्चित किये वह सम्भा और हंबीरराव मैदान में आते ही नहीं। हथियार से हथियार
भिड़ाते ही नहीं।"
"तो बड़ी फौज लेकर जाओ।"
"बड़ी फौज की गन्ध पाते ही मराठे छूमन्तर हो जाते हैं। भूतों की तरह पेड़ों
और पहाड़ों में कहाँ अदृश्य हो जाते हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। पीछा करना बन्द
किया कि तूफानी गति से हमारे ऊपर आक्रमण करते हैं। हवा और पानी की लहरों
की तरह उठते हैं।"
"किन्तु आज अपनी फौज की दिमागी हालत बिगड़ी है। उसका क्या?"
औरंगजेब ने महत्त्वपूर्ण मुद्दा उपस्थित किया।
बादशाह के प्रश्न पर सभी ने स्वीकृति में सिर हिलाया। असदखान ने
स्वीकारोक्ति में कहा, "जहाँपनाह, इसमें कोई शक नहीं कि अपनी सेना का दिल
टूट गया है रामदरा घाट में इन मराठों ने खड़ी घास जला दी लेकिन हमारे घोड़ों को
घास-दाना खाने नहीं दिया। हजरत, रामशेज का किला तो भूतखाना ही है।"
दरबार उठ गया। बादशाह के माथे से चिन्ता की लकीरें मिट नहीं रही थीं।
अपना ओंठ चबाते हुए बादशाह ने कहा, "वजीरे आजम, इन सभी बातों का एक
ही मतलब है। सम्भा, गोलकुंडा के कुतुबशाह और बीजापुर के आदिलशाह की
मित्रता को पहले तोड़ना होगा। यदि मराठों के प्रदेश पर जीत सम्भव नहीं हो पाती
तो और कहीं सही। हमारी फौज को विजय की जरूरत है—जरूरत है।"
"जी, जहाँपनाह।"
"इन दोनों इस्लामी हुकूमतो मे मराठों को मिलने वाली गुप्त सहायता तुरन्त
बन्द होनी चाहिए। इसके लिए पहले इन दोनों इस्लामी हुकूमतो को नेस्तनाबूद
करना है। उसके बाद पहाड़ के उस चूहे के बच्चे को पकड़कर कुचल देने के
अलावा हमारे हाथ में बचा ही क्या है?"
524 सम्भाजी
छह
गोलकुंडा और भागानगरी का ऐश्वर्य और वैभव ऐसा था कि उसकी तुलना स्वर्ग से
की जाती थी। पास के हैदराबाद शहर की शानो शौकत भी बेजोड़ थी।
हमेशा की तरह कुतुबशाह अबुल हसन सन्ध्या समय से ही नाच गान
आनन्द में डूबा हुआ था। भरे दरबार में सारंगी बजाना उसे बहुत अच्छा लगाता था।
गुणीजन उसकी प्रशंसा करते थे। किन्तु शुष्क राजनीति में उसका मन जरा भी नहीं
लगता था।
भागानगर के क्षेत्र में असंख्य तालाब थे। उस क्षेत्र में अनेक छोटे मोटे बाँध
बाँधे गये थे। भरपूर फसलों और फलों के बगीचों के कारण गोलकुंडा की
कुतुबशाही में कमाल की समृद्धि आ गयी थी। मूसी नदी के किनारे बसे हैदराबाद
नगर में चौड़ी चौड़ी सड़कें बनी थीं। औरंगजेब को गद्दी पर बैठे तेईस-चौबीस वर्ष
हो चुके थे। इतनी लम्बी अवधि में कुतुबशाही पर कोई भी आक्रमण नहीं हुआ था।
इसलिए यहाँ की समृद्धि निरन्तर बढ़ती गयी।
आज भी महफिल में बड़ी रौनक आयी थी। ऊँची नक्षीदार ईरानी वेशभूषा
और पट्टेदार किमाँश में तानाशाह का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक लग रहा था। उसके
किमाँश के तुर्रे में जड़े माणिक्य के चाँद सितारों की चमक विलक्षण आभा से मंडित
थी। स्वर्ग की अप्सराओं की भाँति सुन्दर युवतियाँ उसके आसन के सामने नृत्य कर
रही थीं। तानाशाह का काल साहित्य, सौन्दर्य, नृत्य आदि की दृष्टि से स्वर्णकाल
लग रहा था। हैदराबाद और भागानगरी में बीस हजार से अधिक गणिकाएँ, तवायफे
और नर्तकियाँ रहती थीं। प्रत्येक शुक्रवार को राजमहल के भव्य चौक में हजार
हजार नर्तकियाँ अपनी कला प्रदर्शित करती थीं। अलिन्द में बैठकर तानाशाह इस
स्वर्ग सुख का आनन्द लूटता था। पूरे हैदराबाद का वातावरण रसीला और नशीला
था। पिछले अनेक वर्षों से तोपों और बन्दूकों की आवाज सुनाई नहीं पड़ी थी। वहाँ
तबले, हारमोनियम की आवाज और घुँघरुओं की छनक रोज सुनाई पड़ती थी।
गन्धक और तोप गोले बारूद के व्यापारी विनाश के कगार पर थे। लेकिन मोगरे की
बेड़ियाँ बेचने वालों ने अपने महल खड़े कर लिये थे।
हर रोज की तरह आज भी तानाशाह राजमहल की सन्ध्या महफिल में नशे
से बेहोश हो रहा था। उसी समय मजबूत कदकाठी के, गौर कान्तियुक्त प्रशस्त
भाल पर चन्दन का तिलक किये मादण्णा ने वहाँ प्रवेश किया। जरीदार वस्त्रों में
सुशोभित मादण्णा हैदराबाद के प्रधानमन्त्री थे। जाति से एक दक्खिनी वैष्णव ब्राह्मण
सम्भाजी 521
होने पर भी वे इस्लामी राज्य के प्रधानमन्त्री बने थे। राज्य में उनका पद यद्यपि दूसरे
क्रम पर था फिर भी व्यवहार में वे कुतुबशाह के सारे अधिकार का उपयोग करते थे।
इसलिए मुसलमान प्रजा उनसे बहुत नाराज रहती थी। अपनी बौद्धिक कुशलता के
कारण ही मादण्णा इतनी ऊँचाई तक पहुँचे थे हिन्दी, तेलगू और पर्शियन भाषाओं
पर उन्हें पूर्ण अधिकार था।
सोने की पालकी में मादण्णा हैदराबाद में घूमते थे। उनकी पालकी को दूर से
ही देखकर, शहर के बड़े व्यापारी, विद्वान हिन्दु और मुसलमान सभी उनके आगे
आदर से झुक जाते थे। तानाशाह ने अपने एक सामान्य किन्तु बहुत होशियार
गेशकार को प्रधानमन्त्री बनाया था। अपने प्रभाव का फायदा उठाकर मादण्णा ने
इस्लामी सल्तनत की आय से अनेक हिन्दू देव देवियों के मन्दिर बनवाये थे।
गोलकुंडा कुतुबशाह से मिलने आये। शिवाजी महराज के साथ अनेक फिरंगी
वकीलों की भी पूरी खातिर की गयी थी। विगत तेरह चौदह वर्षों में भूलकर भी
रंगमहल में पैर न रखने वाले मादण्णा को वहाँ आया देखकर सारी नृत्य सभा स्तब्ध
रह गयी। सारंगियाँ बन्द हो गयीं। सभी नृत्यांगनाओं के छनकते घुँघरू भी मौन हो
गये।
तानाशाह भी कुछ आश्चर्यचकित होकर अपने प्रधान की ओर देखने लगा।
हुक्के की नली मुँह से बाहर निकालते हुए नशे की स्थिति में ही प्रश्न किया—
“क्यों मादण्णा आपको किसलिए प्रधानमन्त्री बनाया है? हमारी नृत्य-संगीत और
इश्कबाजी की गतिविधियों में किसी भी प्रकार की अडचन न आए, इसीलिए न?”
“खाविन्द, यदि इस बन्दे से कोई भूल हुई तो दया करें। परन्तु बिना कोई
बहुत जरूरी काम पड़े मैं आपको कष्ट देने का साहस कैसे करता?”
“बोलो।”
“हजरत, दिल्ली के बादशाह औरंगजेब की ओर से एक जरूरी फरमान
आया है।”
“क्या कहता है वह बुड्ढा?” तानाशाह हड़बड़ी में बोला, “जल्दी
बताइए। ये नटखट शर्मीली लड़कियाँ अपने तोड़े को तोड़कर किस प्रकार रुक गयी
हैं। उधर तबले की लय के साथ मेरे हृदय की लय भी बीच में ही किस प्रकार
बिगड़ गयी है खुद ही देखिए। यह जरूर है कि यहाँ के गायन, वादन और यहाँ की
गमिकता वह औरंगजेब क्या समझेगा?”
“हुजूर! हुजूर! उनका कहना है कि—बीजापुर के आदिलशाह की मदद
करने का गुनाह आपने यदि किया, तो...”
“तो? ऐसे घबराते क्यों हैं? बताइए।”
“अगर बीजापुर वालों की थोड़ी-सी भी मदद करोगे तो आपका तख्त और
526 सम्भाजी