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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 793 में से

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पृष्ठ 522

बादशाह को उस पर भी नजर नहीं डालनी चाहिए।"
इस जवाब से वहाँ के सभी लोग चकित हो गये। बादशाह के विरुद्ध किसी
ने इतनी हिम्मत दिखाई हो ऐसा बादशाह को स्मरण नहीं था। बादशाह ने
बरामदखान से पूछा, "हमारी दूसरी माँग क्या थी आदिलशाह से? वह भी
पढ़िए।"
"सर्जाखान नाम के अपने सेनापति को नौकरी से निकालकर उसे बीजापुर से
बाहर निकालिए।"
"हूँ, उस पर उस मूर्ख ने क्या जवाब दिया है?"
"...यह हमारा व्यक्तिगत मामला है। इसके अतिरिक्त सर्जाखान हमारे
सिपाहसालार हैं। यह औरंगजेब साहब को मालूम नहीं है क्या? वे आज जिस पद
पर हैं कल भी उसी पद पर रहेंगे। उल्टे हम उनकी तनख्वाह बढ़ाने का विचार कर
रहे हैं।"
"...बसऽ!" औरंगजेब के धैर्य का बाँध टूट गया। दरबार के सभी लोग चुप
थे। औरंगजेब का सन्ताप उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। तीव्र ज्वर से
ग्रस्त कोई व्यक्ति जैसे बड़बड़ाने लगता है वैसी ही मनःस्थिति औरंगजेब की थी।
वह अपने को न सँभाल पाने के कारण गरजा, "आदिलशाह हो या कुतुबशाह दोनों
ही हरामजादे हैं। यह कुतुबशाह अल्ला की सल्तनत में कभी भी ईमानदार नहीं
रहा। उस नापाक सम्भा के साथ मैसूर वालों से लड़ने के लिए दस हजार की फौज
भेजता है। अपने दरबार में मादण्णा और आकण्णा नाम के दो हिन्दू पंडितों को
प्रधान बनाया है। इस्लामी हुकूमत और हिन्दू प्रधानमन्त्री कैसी बेवकूफ राजनीति है
वह? बोलो शेख साहब?"
"'तौबाऽ तौबाऽऽ'"। बाकी लोगों ने भी बादशाह की हाँ में हाँ मिलाई।
"यह कुतुबशाह तानाशाह इतना मक्कार है कि क्या बताऊँ? कुछ वर्ष पूर्व
वह शिवाजी भोंसला इससे मिलने के लिए गया था। उस समय इसी गधे ने
शिवाजी के घोड़े को रत्नों का हार पहनाया था। घोड़े के गले में रत्नों का हार
पहनाकर उनका स्वागत किया था। साथ ही एक लाख की राशि सालाना तनख्वाह
देना भी स्वीकार किया। उन मादण्णा और आकण्णा जैसे हेलकट वैष्णव ब्राह्मणों के
हाथ में राज्य का सारा कार्यभार सौंपने वाला कुतुबशाह इस्लाम के नाम पर एक
धब्बा है।"
बादशाह के असीम सन्ताप, उसके चढ़ते हुए स्वर को देखकर वजीर
असदखान, बरामदखान और विशेष रूप से शेख उल-इस्लाम सभी चुप थे।
"काफिर सम्भाजी की रक्षा करने वाले दोनों हरामखोर अपना मन नहीं बदलते तो
520 :: सम्भाजी