सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

सात
गोवा की उस लाल धरती पर जोरदार लड़ाई चल रही थी। माष्टी और बारदेश में
मराठा फौज डटकर लड़ रही थी। नारियल सुपारी के वनों से धुआँ उठ रहा था।
अपने बलवान और बहादुर सैनिकों को महाराज ने पणजी के चारों ओर फैला दिया
था।
एक महीने के बाद भी मराठा फौज डटकर लड़ रही थी उधर बेंगुर्ला मे
औरंगजेब ने अपनी जहाजो का लंगर डाल दिया था। गोवा के समुद्र में रसद उतारने
की अनुमति उन्हें वाइसराय कांट नहीं दे रहा था। जिन मुगलों के साथ उन्होंने
समझौता किया था उनसे भी फिरंगी डरने लगे थे। मराठों का शक्तिशाली विरोध
देखकर उन्होंने मुगलों की सहायता का आश्वासन दिया था। परन्तु वे यह भी
सोचते थे कि परिस्थिति का लाभ उठाकर मुगलों ने ही गोवा पर कब्जा कर लिया
तो क्या होगा ?
शम्भूमहाराज बहुत अस्वस्थ दिख रहे थे। पाखरा घोड़े पर वे मांडवी के दोनो
ओर चक्कर लगाते रहते थे। पणजी की तटबन्दी उसके बड़े बुर्ज बुर्जो पर लगी
बड़ी-बड़ी तोपें, समुद्र और खाडी में निरन्तर गश्त लगाती जहाजें वे निरन्तर देखते
रहते थे। पणजी पर अधिकार करने का उत्साह उनमें बार-बार आता था। साथ-साथ
चलने वाले कवि कलश, दुर्गादास, शहजादा अकबर से वे कहते थे-
"कुछ भी कीजिए। कोई-न-कोई योजना बनकर हमें पणजी को अपने
अधिकार में लेना ही है। यदि शहर में हमारे पाँच सात सौ लोग घुसकर उपद्रव
मचा सकें तो बाद में बाहर कैसे सहायता की जाये तो काम बन सकता है इसे हम
बहुत अच्छी तरह जानते हैं।"
शहजादा अकबर का वाइसराय आल्होर के साथ पत्राचार चल रहा था।
शहजादा अकबर ने पणजी के पास एक जहाज के निर्माण की अनुमति माँगी थी।
फिरंगियों से अनुमति मिलते ही, इस ओर के तट पर लुहार-बढ़ई आदि की
आवाजाही आरम्भ हो गयी। उनकी संख्या बढ़ती देखकर वाइसराय को आशंका
हुई। उसने इस भीड़ और भीड़ के पणजी में आवास पर प्रतिबंध लगा दिया।
समझौता करने के उद्देश्य से अकबर एक बार अपने छः सौ सैनिकों के साथ
निकला। उस समय फिरंगियों ने उनका विरोध किया। एक ओर शम्भूमहाराज गोवा
को अपने अधिकार में लेने के लिए बेचैन हो रहे थे तो दूसरी ओर वाइसराय अपने
राज्य की रक्षा का जी-जान से प्रयास कर रहा था।
महाराज आज कुछ तनावग्रस्त दिखाई पड़ रहे थे। दो दिन पहले ही उनकी
सम्भाजी 481

दो हजार की स्थल सेना और एक हजार की अश्व सेना मड़गाँव मे प्रवेश कर चुकी
थी। महाराज ने गोवा के अपने सभी सेनानायकों और अधिकारियों को आदेश भेजा,
"पुर्तगालियों की सम्पत्ति अवश्य लूटो किन्तु किसी भी व्यक्ति को आघात पहुँचाने
का कोई उपयोग नहीं है। चर्चों के साथ सभी धर्मों के प्रार्थना स्थलों का सम्मान
करो।"
डिचोली के महल में शम्भूमहाराज फिरंगियों पर किये आक्रमण का समाचार
ले रहे थे। उसी समय कवि कलश ने महाराज से पूछा—"पणजी पर किया गया
आक्रमण अभी और कितने दिन चालू रखना है? पुर्तगालियों का वकील साराइव्ह् दे
अल्बुकर्क, सुलह के लिए आपके पास बहुत चक्कर काट रहा है।"
"उससे कहिये कि सूरत से औरंगजेब ने तो रसद भेजी है उसकी आधी
रसद हमारे हवाले कर दो फिर समझौते की शतरंज बिछाओ।"
कवि कलश दिल खोलकर हँसे। उन्होंने बड़े उत्साह से कहा, "राजन! एक
दूसरी बात के लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है।"
"हुआ क्या? हमें भी तो कुछ बताइये।"
"गोवा पर अपने जोरदार हमले से वाइसराय इतना डर गया है कि राजधानी
पणजी को पीछे मार्मा गोवा ले जाने का निर्णय ले लिया। अपना खजाना और
काग़जपत्र भी वहीं ले जाकर रख रहा है।"
शम्भूमहाराज ने प्रसन्न होकर कहा, "कविराज इतने से काम नहीं चलेगा।
अगले दो-चार दिनों में हम साष्टी और बारदेश पर पूर्ण अधिकार कर लेंगे। उसके
बाद मांडवी को पार करके गोवा के शिखर पर अपना भगवा ध्वज फहराएँगे।"
यह चर्चा चल ही रही थी कि बाहर किसी के चिल्लाने की आवाज आयी।
वह कह रहा था—"महाराज न्याय कीजिए। हमारी व्यथा-कथा सुनिये।"
एक ही ताल-सुर में असंख्य आवाजें एक साथ भीतर आने लगीं। बाहर
हजार पाँच सौ लोग एकत्र हो गये थे। कार्य में व्यस्त होने के कारण महाराज ने
कवि कलश की ओर संकेत किया। कवि कलश तत्काल उठकर बाहर चले गये।
शम्भूमहाराज आक्रमण सम्बन्धी किसी कागज को पढ़ रहे थे। किन्तु बाहर
का शोर बढ़ता ही जा रहा था। महाराज ने अपने एक कर्मचारी से पूछा, "इतना हो
हल्ला किसलिए हो रहा है?"
"ये लोग साष्टी से आये हैं, महाराज! वहाँ के उत्साही लोग हाथ में मशालें
लेकर वहाँ की चर्च को जलाने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु हमारे अधिकारी राणोजी
मोरे ने उन्हें पीट-पीटकर भगा दिया। इसी कारण से वे लोग बहुत रुष्ट हैं और
किसी भी बात सुनने को तैयार नहीं हैं।"
यह समाचार सुनते ही महाराज उठकर उन लोगों के पास पहुँचे। महाराज को
देखते ही चिल्ला रहे लोग शान्त हो गये। कुछ समय तक लोग आँखें फाड़कर
482 :: सम्भाजी

महाराज को देखते रहे। उसके बाद उनके कंठ फूटे—
“महाराज आपने फिरंगियों का जो दुर्दशा की उसे देखकर हमें अत्यन्त
आनन्द हुआ। किन्तु आज भी उनका गुरूर कम नहीं हुआ है।”
एक बूढ़ा आगे आकर अपने हाथों को नचाते हुए बोला, “वहाँ रायगढ़ पर
रहकर आप क्या जान पाएँगे कि हम हिन्दू इन फिरंगियों के शासन में कैसे जीते हैं ?
हमारे मन्दिरों में देवता अब नहीं रह गये है। फिरंगियों ने बलपूर्व हिन्दुओं को
धर्मान्तरण के लिए विवश किया। हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ तालाबों में फेंक दीं।
इन लोगों ने कुँओं की जगत पर सामान्य पत्थर के रूप में मूर्तियों को गाड़ रखा है।
पानी खींचते हुए रस्सियों की रगड़ से ये मूर्तियाँ अब टूटने लगी हैं। आप स्वयं ही
चलकर देख लें।”
“मुझे सब पता है। गोवा में शान्ता, दुर्गा, महालक्ष्मी, मंगेशी जैसे देवस्थलों
को भी अपने चारों ओर तटबन्दी और लोहे के मजबूत दरवाजों की आवश्यकता
होती है। फिरंगियों के अत्याचार से यहाँ के देवी देवताओं को भी पसीना छूटता
है।”
“वही हम भी कह रहे हैं, महाराज ! जब हमारे देवताओं की ऐसी दशा है तो
हम लोगों की क्या होगी ? फिरंगियों से बदला लेने का यही अच्छा अवसर है, आप
हमें रोके नहीं।” पाँच-छः लोग एक साथ बोल उठे।
सामने जमी भीड़ में लोग अपने भाले और लाठियाँ ऊपर उठाकर अपना
आवेश व्यक्त करने लगे। किन्तु शम्भूमहाराज ने डाँटते हुए कहा—
“खामोश ! किसी तरह का शोरगुल न करो। इस बात को कभी न भूलो कि
गोवा पर आक्रमण शिवाजी के पुत्र का हो रहा है, औरंगजेब के किसी शहजादे का
नहीं।”
महाराज की कठोर वाणी से सभी लोग सन्न रह गये, तब महाराज ने कहा,
“आप लोगों की पीड़ा को मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ। हिन्दुओं का राजा होने
के नाते आप मेरे सामने अपनी हर माँग रख सकते हैं। हम आपकी हर माँग पूरी
करेंगे। किन्तु इस बात का हमेशा स्मरण रखो कि किसी के द्वेष की नींव पर बनाए
गये हमारे मन्दिर टिकने वाले नहीं हैं।”
कवि कलश को महाराज ने कुछ नये आदेश तैयार करने के लिए बुलाया।
उन्होंने जिन हिन्दू मन्दिरों को फिरंगियों ने ध्वस्त कर दिया था, उनके लिए अपने
खजाने से धन देने की व्यवस्था की जिससे उनका पुनर्निर्माण हो सके। धर्म की रक्षा
के लिए कुछ योजनाएँ भी बनाई गयीं।”
सभी लोग प्रसन्न हो गये। किन्तु मडगाँव का वह वृद्ध जो अभी-अभी
महाराज से बातें कर रहा था, सन्तुष्ट नहीं लग रहा था। महाराज ने उसे छेड़ते हुए
उसके सामने हाथ जोड़ दिये। उसने बड़े प्रेम से कहा, “सरकार आपने हमारे
सम्भाजी :: 483

बारदेश के चारों किलों पर अपना अधिकार कर लिया। फिरंगियों के शासन से हमें
मुक्त किया। पर महाराज आपसे एक और प्रार्थना है। "
"कहिए।"
"महाराज यहाँ के पादरी हम पर बहुत अत्याचार करते रहे हैं। आपका कहना
है कि किसी की धार्मिक भावना पर ठेस न लगने दें। परन्तु महाराज, ये पादरी यीसु
का नाम लेकर हमारे साथ जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं। धर्मान्तरण कराने के लिए
इन्होंने हमारे घर-परिवार को जलाकर रख दिया। ईसाइयों के इन पादरियों का चरित्र
भी कहाँ ठीक है? यीशु का नाम लेकर इन पादरियों ने बहुत धन इकट्ठा किया है।
इनके सफेद वस्त्रों में मोमबत्तियाँ नहीं, धारदार कटारियाँ रखी हैं।"
"बाबा! आपको क्या चाहिए?"
"हम किसी को उँगली से भी नहीं छुयेंगे। पर कल मडगाँव के अत्याचारी
पादरियों के चोंगे उतारकर उनके सिर पर बाँधेंगे और उनका जुलूस निकालेंगे। बस
और कुछ नहीं।"
बूढ़े व्यक्ति की यह माँग सुनकर महाराज के साथ सभी लोग जोर-जोर से
हँसने लगे। महाराज ने उनके आक्रोश को ठीक-ठीक समझा। मडगाँव में सचमुच
धर्म के नाम पर बहुत अत्याचार हुआ था। महाराज ने जुलूस की अनुमति दे दी।
किन्तु अनुमति देने के साथ ही उन्होंने कवि कलश को आदेश दिया—
"इस खतरे की जवाबदारी आप पर है। जुलूस के साथ सेना की एक विशेष
टुकड़ी भेजिए। किसी चर्च की इमारत अथवा किसी धर्मगुरु के प्राणों की कोई क्षति
नहीं होनी चाहिए।" लोग सन्तुष्ट होकर वहाँ से चले गये। दूसरे दिन समाचार
आया कि मडगाँव के पादरियों ने मराठों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। चर्चों के
साथ ही उन्होंने सम्पत्ति को भी मराठों के हवाले कर दिया। चर्च पर क़ब्ज़ा लेते
समय चर्च के बाहर कम से कम दो हजार फिरंगी वहाँ एकत्र हुए थे। मराठों ने सभी
को शान्तिपूर्वक बाहर जाने दिया।
आठ
वाइसराय की पसलियों का घाव अब भी उसे पीड़ित कर रहा था। मांडवी के दूसरे
किनारे पर 'हरऽ हरऽ महादेव' के नारे गूँज रहे थे। उस किनारे पर शम्भूमहाराज का
घोड़ा निरन्तर घूम रहा था। रात में मराठा घुड़सवारों की तलवारें नारियल और सुपारी
484 . : सम्भाजी

के बगीचों में चमकती दिखती थीं। कांट द आल्होर के साथ सम्पूर्ण पणजी शहर
दहशत में आ गया था। पुर्तगाली सेना की भूख-प्यास बन्द हो गयी थी। पादरी
भीतर ही भीतर बहुत भयभीत हो गये थे।
वाइसराय की स्थिति ऐसी हो गयी थी जैसे कोई सियार अपनी माँद में बैठकर
शिकारियों का हांका और शिकारी कुत्तों की आवाज सुनकर भय के मारे भीतर ही
भीतर मरा जा रहा हो। थोड़ी-सी सेना और उससे कहीं अधिक अपनी कुशाग्र बुद्धि
के बल पर उसने अब तक पणजी पर अपना अधिकार जमा रखा था। किन्तु पणजी
वासियों का दबाव निरन्तर बढ़ रहा था। इसकी सूचना वाइसराय ने पुर्तगाल को भी
दे दी थी। हिन्दुस्तान में पुर्तगालियों का शासन समाप्ति पर आ रहा था। चारों ओर
वाइसराय और उसकी नीतियों को अन्यायपूर्ण ठहराया जा रहा था।
थाना से लेकर गोवा तक फिरंगियों की प्रत्येक चौकी पर मराठों के आक्रमण
हो रहे थे। उसी बीच चौल के गवर्नर फ्रांसिस द कोश्त का सन्देश आया—
"यहाँ पर अँग्रेजों ने खुलेआम सम्भाजी की सहायता करनी आरम्भ कर दी
है। वे मराठों को बन्दूकें तोपें, गोले, बारूद सब कुछ दे रहे हैं। दुगुना दाम देने पर
भी हमें चुटकी भर भी बारूद नहीं मिल रही है। यदि समय से हमारी सहायता न
की गयी तो हम मारे जायेंगे।"
वाइसराय की पसलियों का घाव अभी भी भरा नहीं था। शम्भूमहाराज के
भय से पणजी छोड़कर भाग रहे थे। वाइसराय और उसकी सेना से फिरंगियों का
विश्वास उठ गया था।
उस रात कांट ने दूरबीन से देखा। डरे हुए लोग बड़ी संख्या में दूसरी दिशा
की ओर जा रहे थे। उसने अपने सचिव से पूछा, "मूर्खों की तरह वे लोग कहाँ जा
रहे हैं?"
"बॉमगेसू चर्च की ओर।"
"इतनी रात को?"
"जी सर, सेंट जेवियर पर इनकी अगाध श्रद्धा है। इनका विश्वास है कि इस
भयानक संकट से इन्हें सेंट जेवियर ही बचा सकते हैं। सर मुझे भी लगता है..."
सचिव कुछ डर गया। उसका वाक्य अधूरा ही छूट गया।
"क्या?"
"आप भी वहाँ जाकर सेंट जेवियर के सामने अपनी झोली फैलाएँ। सेंट
जेवियर से की गयी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी।"
इस समय सेंट जेवियर की पुरानी चर्च फिरंगियों की शरणस्थली बन गयी
थी। वहाँ पर एकत्र लोग दबी आवाज में सेंट जेवियर का नाम जप रहे थे। रात-दिन
प्रार्थनाएँ चल रही थीं। फिरंगियों की आँखों के साथ मोमबत्तियाँ जल रही थीं।
सम्भाजी :: 485

प्रार्थना के बीच-बीच में साष्टी और बारदेश से समाचार भी आ रहे थे। कभी
'शापोरा' किले के हाथ से जाने की तो कभी पुर्तगालियों के 'जिये' और 'पिये'
किलों पर मराठों के जोरदार आक्रमण के समाचार आ रहे थे। आक्रमणों के समाचार
सुनकर वहाँ के लोग और भी भयभीत हो रहे थे।
एक दिन सवेरे सवेरे राजभवन के काले घोड़े चर्च के परिसर में आकर रुके।
शाही घोड़ागाड़ी से कांट साहब नीचे उतरे। उनकी हालत बहुत शोचनीय थी। रात
में जागते रहने से आँखें लाल हो गयी थीं। आँखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये थे।
दाढ़ी कुछ अधिक सफेद लग रही थी। शरीर उत्साहहीन होने के कारण चाल में
शिथिलता आ गयी थी। इस दशा में इस सद्गृहस्थ को वाइसराय के रूप में
पहचानना कठिन था। उसे देखकर लगता था जैसे वह चोर डाकुओं से लुटा हुआ
और बहुत मार खाया हुआ मुसाफिर हो।
कांट आल्होर के साथ फ्रांसिस द साँज, आर्क बिशप, प्रिमज दौ मान्युअल,
मिगेल द आल्मेदा, जैसे शहर के अनेक पादरी और उमराव वहाँ पर एकत्र हुए थे।
भयत्रस्त उन सभी अधिकारियों एवं वरिष्ठ लोगों ने मशालें जला लीं। बगल की
अँधेरी सीढ़ियों से मशाल के सहारे नीचे उतरे। उस तलघर में सेंट जेवियर का शव
रखा गया था। वहाँ के पत्थर के चबूतरे से एक बड़ी पेटी बाहर निकाली गयी।
सेंट जेवियर का शव एकदम सुरक्षित था। इसे भी एक चमत्कार माना जा रहा
था। सभी ईसाई सेंट जेवियर के नाम का जाप करने लगे। वे सभी रो रोकर कहने
लगे-“सम्भाजी की आफत से हमें मुक्त करो।”
उस महापुरुष के दर्शन-से वाइसराय भी चकित हो गया था। मोमबत्ती के
पिघलते मोम की तरह वाइसराय के आँसू उसके लाल कपोलों पर लगातार गिर रहे
थे। उसने सेंट जेवियर के सामने पूर्णतया समर्पण कर दिया। भारत में पुर्तगाली
शासन के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। उस प्रार्थना के
साथ एक आदेशपत्र भी सेंट जेवियर के पैरों के पास रख दिया। वह पुर्तगाल के राजा
द्वारा वाइसराय के रूप में नियुक्त होने का असली दस्तावेज था। कांट की आँखों से
धारासार अश्रुपात हो रहा था। उसने अपने हाथ की स्वर्ण खड्ग, अपना मुकुट,
राजदण्ड जैसी सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ और राजचिह्न सेंट जेवियर के पैरों के पास
रख दिया। रोते हुए उसने कहा-
"फादर जेवियर, आज से मैं यहाँ का गवर्नर नहीं आपका गुलाम हूँ। अपना
हिन्दुस्तान का राज्य हम आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। हे दया सागर, हे
महामानव ! हमारी रक्षा करनी है या नहीं ? इसका निर्णय अब आप ही करें।"
वाइसराय, सारे पादरी और प्रजाजन कई दिनों तक उसी तरह प्रार्थना करते
रहे। वहीं पर सोना और जो कुछ मिल जाये भोजन वहीं पर होता रहा।
486 .. सम्भाजी

एक दिन वाइसराय ने अपने सचिव से कहा, "बन्दीखाने के दरवाजे खोल
दो। मराठों के उस वकील येसाजी गम्भीरराव को मुक्त कर दो। उसे सम्भाजी के
पास भेज दो। सम्भाजी को सन्देश भेजो कि 'सन्धि की शर्तों को आप स्वयं
निश्चित करें, जैसा चाहें मसौदा तैयार कर लें। हम उस पर हस्ताक्षर करने को तैयार
हैं। परन्तु हमें इस विपत्ति से छुटकारा देने की कृपा करें। अब हमें और अधिक न
सताएँ'।"
गोवा पर शम्भू महाराज का दबाव बढ़ता जा रहा था। माष्टी और बारदेश पर
मराठों का अधिकार हो गया था। इसके साथ आग्वाद, रोशमाग़ोश, शापूरा जैसे
फिरंगियों के छोटे मोटे किले भी मराठों के अधिकार में आ गये थे। मडगाँव में
मराठों की एक हजार की थल सेना प्रवेश कर गयी थी। सांमिगेल और सांत
क्रिस्टोहांव आदि सभी किलों पर आक्रमण हो रहे थे।
गोवा की चर्चों में अब मोमबत्तियों की भी कमी होने लगी थी। वाइसराय
आने वाले एक एक दिन को गिन गिन कर काट रहा था। किसी प्रकार से इस
विपत्ति से मुक्त होने के लिए वह छटपटा रहा था। फिरंगियों के वकील बार बार
आकर अपने लम्बे हाथों से शम्भू महाराज को सलाम कर रहे थे। किन्तु महाराज
किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं थे।
बाईस दिन बीत चुके थे। फिरंगियों की कमर टूट चुकी थी। सेंट जेवियर चर्च
में बैठे बैठे वाइसराय का दम घुटने लगा था। उसकी पसलियों का घाव अब कुछ
कुछ भर गया था। परेशान होकर कांट द आल्होर ने अपने राजा को आखिरी सन्देश
भेजा, "प्रलय की स्थिति बन गयी है। हमारा इससे उबर पाना असम्भव है। तोपों
को चलाने वाले बहादुर सैनिक बच नहीं पाये और गोला बारूद भी लगभग समाप्त
हो चुका है। जिस प्रकार टूटा हुआ जहाज पानी में गोते लगाता है, उसी तरह
फिरंगीराज हिन्दुस्तान में अपनी अन्तिम साँसें गिन रहा है।"
एक दिन चमत्कार हुआ। सबेरे सबेरे चर्च में समाचार आया कि रात में
मराठों ने अपना मोर्चा उठा लिया। किसी को बिना कोई हानि पहुँचाए वे अपनी
फौज के साथ एकाएक चले गये।
यह समाचार सुनते ही सभी लोग सेंट जेवियर के चरणों में अपना माथा
झुकाने लगे। आनन्दातिरेक से सभी फिरंगी नाचने लगे। फिर भी फिरंगियों के मन
में मराठों का डर बना हुआ था। 10 जनवरी, 1684 को गोवा राज्य सलाहकार
मंडल की बैठक बुलाई गयी। गोवा पर मराठों के आक्रमण की सम्भावना से उन्होंने
अपनी राजधानी को मार्मा गोवा में स्थानान्तरित कर दिया।
शम्भू महाराज को मिला हुआ समाचार सच था। शहजादा मुअज्जम एक
लाख की फौज लेकर रामदरा घाट पार करते हुए आगे बढ़ रहा था। फौज गोवा के
सम्भाजी :: 487

रास्ते में पहुँच जाती तो मराठों का फिरंगियों और मुगलों के बीच फँस जाना
निश्चित था। इसलिए सावंतवाड़ी की ओर जल्दी-जल्दी निकल जाना आवश्यक
था।
नौ
बड़े परिश्रम से फौज पहाड़ की घाटी पार करके आगे बढ़ी। महाराज की सेना
चांभार घाटी पार करके रायगढ़ की ओर मुड़ गयी। नाते गाँव के खेतों में अंग्रेजों का
एक दल रुका हुआ था। उन्होंने उस जंगल में ही अपने दस-बारह तम्बू खड़े कर
लिए थे। वकीलों के साथ आये पाँच सौ बन्दूकधारी सैनिक उनके चारों ओर पहरा
दे रहे थे। मुम्बई में पैदा हुए आलीशान घोड़ों पर गहरे लाल रंग के टोप लगाए,
कम्पनी सरकार के सैनिक डटकर पहरा दे रहे थे।
शम्भू महाराज की विशाल सेना पहुँचते ही अंग्रेजों का वकील स्मिथ साहब
झट से बाहर आया। अपने हाथ में टोपी को पंखे की तरह हिलाकर उसने शम्भू
महाराज का झुककर अभिवादन किया। पिछले कई दिनों से वह शम्भू महाराज की
प्रतीक्षा कर रहा था।
स्मिथ के आग्रह पर शम्भू महाराज कुछ समय के लिए वहाँ रुके। स्मिथ के
डेरे में विचार-विमर्श आरम्भ हुआ। रामचन्द्र शेणवी दुभाषिये का कार्य कर रहे थे।
स्मिथ साहब ने कहा, "महाराज, आप गोवा में अटक गये और हमें मुम्बई में
अटका दिया।"
"सो कैसे?"
"अब क्या सब कुछ मुझे ही कहना पड़ेगा महराज? आपके दरिया सारंग,
भयानक भंडारी और निलोपन्त पेशवा ने कई जहाजों के साथ एक बड़ी नौ सेना
खड़ी कर ली है। आप तो इस समय मुम्बई पर भी आक्रमण करने की बात सोच रहे
हैं।"
"इस बात का मुझे कुछ भी पता नहीं है।" ऐसा कहकर महाराज ने बात को
टालना चाहा।
"महाराज! आपसे पूछे बिना वे एक भी कदम समुद्र में नहीं बढ़ सकते।
वकील होने के नाते इसकी थोड़ी बहुत कल्पना तो है। हमारे मालिक कमिश्नर
488 :. सम्भाजी

चाइल्ड और वॉर्ड को भी इसकी जानकारी है। महाराज हम आपसे विनती करते
हैं—प्रार्थना करते हैं—"
महाराज कुछ समय के लिए चुप हो गये। फिर उन्होंने रुष्ट होकर स्मिथ से
कहा, "हमसे कैसी प्रार्थना? आपके स्वामी तो सिद्दी हैं जो जंजीरे पर बैठे हैं।
उन्हीं के चरणों पर अपना माथा टेक दो।"
"सिद्दी के पास जाकर हम क्या करेंगे? वहाँ तो सिर्फ पत्थर ही पत्थर है।
धन धान्य और रसद की फसल तो आपके स्वराज्य में ही पकती है।"
"फिर भी, ये सिद्दी हमारे ही बच्चों को उठा ले जाते हैं और आप उन्हें
ऊँची कीमत पर खरीदते हैं। इतने पर भी आप समझौते के लिए हमारे पास आने
हैं?"
"माफ करें हुजूर, भविष्य में ऐसी कोई भूल हमसे नहीं होगी। हम सिद्दियों
की कोई सहायता नहीं करेंगे।"
"हम भी आक्रमण कहाँ करना चाहते हैं?" कवि कलश की ओर संकेत
करते हुए महाराज ने कहा।
"ऐसा कैसे हो सकता है? आपने थाना की खाड़ी से ही अपनी फौजें लगा
दी हैं। शिव बन्दरगाह पर अधिकार कर लिया है। इससे हमारे साहब लोग बहुत
घबरा गये हैं। सूरत के अँग्रेजों का भी हमारे साहबों पर दबाव बढ़ रहा है। वे भी
आग्रह कर रहे हैं कि शम्भू महाराज से समझौता करो। हमें अरबों से भी कठिनाई
हो रही है।" स्मिथ ने कहा।
"मैंने भी सुना है कि उन्होंने आपके 'प्रेसिडेंट' या ऐसे ही किसी जहाज को
डुबाने का प्रयास किया था।"
महाराज की बात सुनते ही स्मिथ और रामचन्द्र शेणवी हँसने लगे। किन्तु
महाराज चकित हुए। स्मिथ ने कहा, "सम्भाजी महाराज, जिस समय उस जंगेखान
ने हमारे शक्तिशाली जहाज को डुबोने का प्रयास किया था उस समय आपने ही
उसकी सहायता की थी। यह बात हमें मालूम है।"
वकील की बात सुनकर महाराज और कवि कलश को हँसी आयी। किन्तु
तत्काल स्मिथ ने कहा, "महाराज अब हमारी अधिक परीक्षा न लेकर मुम्बई के
चारों ओर फैली अपनी जहाजों को पीछे हटा लें। समझौता आपके अनुसार होगा।
हम अपनी गोदियों में केवल व्यापार करते हुए बैठे रहेंगे। हमारे कमिश्नर ने भी हमें
ऐसी ही हिदायत दी है।"
चर्चा समाप्त हो गयी। महाराज ने कोई स्पष्ट निर्णय नहीं सुनाया। उन्होंने
स्मिथ को फटकारते हुए कहा, "हमारे निर्णय की प्रतीक्षा कीजिए और अपनी
सम्भाजी :. 489

सीमाओं का उल्लंघन न करना।"
सन्ध्या समय किले पर ऊपर चढ़ते हुए कविराज ने महाराज से पूछा—
"राजन! तैयारी हो गयी है तो मुम्बई पर आक्रमण ही क्यों न कर दिया
जाय?"
"कविराज मेरी भी हार्दिक इच्छा यही थी। परन्तु एक औरंगजेब जैसा
शक्तिशाली शत्रु स्वराज्य का काल बनकर आगे बढ़ रहा है। बीच बीच में हमारे
अपने लोग भी धोखा देने के लिए सिर उठाते रहते हैं। हमारी स्थिति तो आप जानते
ही हैं। बाहर के शत्रुओं ने तो परेशान कर ही रखा है, कम-से कम घर वालों ने तो
छोड़ दिया होता—तो...तो हमने अँग्रेजों के गर्वनर को कब का रायगढ़ बुला लिया
होता और रोजन्दारी पर उससे सेवा करवाता।"
490 :: सम्भाजी

घमासान युद्ध
एक
अहमदनगर के किले में औरंगजेब बहुत बेचैन था। कोंकण में पहुँचे शहाबुद्दीनखान
और गोवा की ओर गये मुअज्जम दोनों के रास्ते में उसकी आँखें टकटकी लगाए
थीं। घोड़ों और साँड़िनियों के सवार जल्दी जल्दी समाचार ले आ रहे थे। उद्विग्न
बादशाह अपने महल के ऊपरी छत के पास की दालान में बैठा रहता था। वहाँ से
किले का सिंहद्वार दिखाई पड़ता था। जब कोई हरकारा या साँड़नी द्वार पर आये
और तब उसका सन्देशा ऊपर पहुँचाया जाय, इतनी प्रतीक्षा का धैर्य बादशाह में नहीं
था। इसलिए बादशाह के नौकर आये हुए हरकारों को तत्काल ऊपर भेजने के लिए
नीचे दौड़ते हुए जाते थे।
बादशाह को दृढ़ विश्वास था कि इस तीसरे आक्रमण में शहाबुद्दीन अवश्य
ही विजयी होगा।
रात में बादशाह ने बहुत देर से खाना खाया। उससे पहले दूर दूर से आये
गुप्तचरों से प्राप्त समाचारों पर सूक्ष्मता से चिन्तन करता रहा। अपने मुलायम बिस्तर
पर लेटते ही वह गहरी नींद में सो गया। वह बहुत देर से अचानक उठा। निचली
मंजिल से कुछ शोरगुल सुनाई पड़ा। बादशाह बड़ी चपलता से छोटे बच्चे की तरह
बिस्तर से नीचे कूदा और पास में रखी धारदार नंगी तलवार लेकर घबराया हुआ
झरोखे से नीचे देखने लगा।
हाथ में कोई बहुत महत्त्वपूर्ण लिफाफा लिये असदखान खड़ा था। वह मुख्य
दरवान से बादशाह का जगाने का आग्रह कर रहा था।
“यह कैसे मुमकिन है, वजीरे आजम ? बादशाह के इतने शहजादे पैदा हुए,
उस समय भी यह खुशखबरी देने के लिए उनकी नींद खराब करने की हिम्मत
किसी ने नहीं दिखाई—और आप ....?”
“क्या बात है वजीरे आज़म ?” बादशाह ने कड़कते हुए पूछा।
सम्भाजी :: 491

"एक बहुत महत्त्वपूर्ण सन्देश-शहाबुद्दीन के पास से।"
"आवो, ऊपर आ जावो।"
बादशाह का संकेत पाते ही वजीर शीघ्रता से बादशाह के शयनकक्ष में पहुँच
गया। तब तक बेगम उदयपुरी और दूसरी बहू बेटियाँ वहाँ पहुँच गयी थीं।
बादशाह की दृष्टि जल्दी-जल्दी पत्र पर घूम गयी। वह खुशी से हँसा। उसने सोचा
कि इस समाचार को राजपरिवार के अन्य लोगों को बताने में कोई हर्ज नहीं है।
इसलिए उसने पत्र वजीर को दे दिया। वजीर ऊँची आवाज में पढ़ने लगा-"मेरे
आका यह केवल बादशाह और खुदा की रहमत है। मैं सह्याद्रि की कठिन घाटी
देवघाट को पार करने में सफल हो गया हूँ। रास्ते में सम्भाजी की गश्त लगाने वाली
सेना की टुकड़ियों को मैंने जलाकर खाक कर दिया है। सैकड़ों मरगट्ठों और उनके
जानवरों का कूर्मा बना दिया है। राहेरी की वाड़ी में यह शैतान सम्भा छुपा है, यह
खबर मुझे मिली। तुरन्त मैं उस जहन्नमी का पीछा करते हुए उस ओर बढ़ा। मराठों
के किले की तलहटी में बसी बस्ती को मैंने दिन में ही जला दिया। यह मुसीबत
उसका अन्त कर देगी यह मूर्ख सम्भा के ध्यान में आ गया। वह काफिर तुरन्त
बनबिलाव की तरह उछलकर भाग गया। अपनी जान किसी तरह बचाते हुए सम्भा
रायगढ़ किले पर भाग गया है।"
बादशाह को बड़ा सन्तोष मिला। इस सन्दर्भ में उसने अपने शाही बावर्ची को
सभी के लिए शर्बत और ठंडाई ले आने के लिए आदेश दिया। यह इस तरह के
पेयपान का समय नहीं था। किन्तु शहंशाह की खुशी ही तो खुदा की मेहरबानी थी।
सभी ने शर्बत ग्रहण किया। बांदशाह की आँखें आनन्द से चमक रही थीं। उनमें
नशा छाया हुआ था। उसके मन की आँखों के आगे कुहरे में ढके रायगढ़ की कठिन
चढ़ाई और साहसपूर्वक चढ़ते हुए शहाबुद्दीन के बहादुर सिपाही दिखाई देने लगे।
उसने प्रसन्न होकर सभी को सम्बोधित किया-"शहाबुद्दीन हमारे खजाने का रत्न
है। उसको हम इसी समय 'फिरोजजंग' अर्थात् 'युद्धरत्न' की उपाधि देते हैं।"
बादशाह की इस घोषणा से सभी प्रसन्न हो गये।
अगले चार-पाँच दिनों में शहाबुद्दीन का दूसरा पत्र आया। "मैंने पाचाड़,
रायरी आदि पर आक्रमण करके अब रायगढ़ से केवल दो कोस की दूरी पर डेरा
डाल दिया है। सम्भा ने शक्तिशाली सरदार रूपा भोसले और हंबीरराव को बहुत
बड़ी फौज के साथ भेजा था। बाण और बन्दूकों की भयंकर लड़ाई हुई। हमारे
जोरदार आक्रमण से शत्रु सेना भाग खड़ी हुई। हमने सात कोस तक उनका पीछा
किया। अन्त में बादशाह की फतह हुई।"
इस पत्र को सभी के सामने पढ़ा गया। बादशाह ने सभी को इस खुशी का
आनन्द मनाने दिया। बादशाह ने तकलीया' कहकर बैठक समाप्त की और सभी को
492 :. सम्भाजी

जाने का संकेत किया। केवल असदखान को रुकने का संकेत किया।
"वजीरे-आज़म आपको क्या लगता है?"
"हजरत, आने वाली खबरें इतनी अच्छी हैं कि मुझे भी लग रहा है कि यदि
हम इसी गति चलते रहे तो पन्द्रह दिनों में हम अगली बैठक रायगढ़ पर ही
बुलाएँगे।"
बादशाह की कठोर मुद्रा और आशंकित भाव को देखकर वजीर ने अपनी
जीभ काट ली। औरंगजेब ने बेचैन होकर कहा, "तुम लोग मुझ पर हमेशा इल्जाम
लगाते हो कि बादशाह को खुशखबरी पर भी शंका होती है। इस सारे मामले में मुझे
दो शंकाएँ हो रही हैं।"
"हजरत ?"
"हाँ, पागल शहाबुद्दीन कहता है कि रायगढ़ से दो कोस की दूरी पर डेरा
डाल रखा है। उसी खत में यह भी कहता है कि दुश्मन का सात कोस तक पीछा
किया। कभी कहता है राहेरी गाँव जलाया कभी पाचाड़। अगर वह रायगढ़ के द्वार
पर पाचाड़ जला रहा था तो रायगढ़ में मराठों की फौज क्या ढोल तासे बजा रही
थी?"
"हाँ, और वह हंबीर मोहिते! वह तो किसी दूसरे ही इलाके में है। ऐसी
खबर मिली थी। यह खबर पक्की है। मुझे तो कुछ दाल में काला लग रहा है।
वजीरे आज़म आप इन बातों की फिक्र छोड़ दीजिए। इस पहेली को मैं अपने ढंग
से सुलझाना चाहता हूँ।"
चार दिनों के अन्दर ही अबूमुहम्मद, रात-दिन एक करके, रायगढ़ के इलाके
में घूमकर आया था। वह बादशाह से मिलने के लिए बेताब हो रहा था। औरंगजेब
की आँखें भी उसी के रास्ते पर अटकी हुई थीं। अबूमुहम्मद आते ही बादशाह के
महल में पहुँच गया। एक साँस में ही उसने बता दिया, "हजरत, आपके बहुत से
शक एकदम सही हैं। खुशी से पागल होने जैसा अभी वहाँ कुछ हुआ ही नहीं है।"
"वह शहाबुद्दीन तो बार-बार कह रहा है कि उसने रायगढ़ की तलहटी में
अनेक गाँव जला दिये!" बादशाह ने कहा।
"जहाँपनाह! वह रायगढ़ किला बहुत मजबूत है। उसकी रक्षा पर्वत और
नदियों की विस्तीर्ण घाटियाँ करते हैं। कम-से-कम तीन दिशाओं से ऐसा दिखता है
जैसे अपने मजबूत पैरों को मोड़कर, सूंड़ को आसमान की ओर उठाए कोई ब्राह्मी
हाथी बैठा हो। इसलिए आसपास दस कोस तक के गाँवों को लगता है कि वे उसके
पास ही बसे हैं।"
"और वह रायगढ़वाड़ी?"
"किले के नीचे है। वहाँ संभा के अठारह कारखाने हैं। वहाँ बगल के मैदान
सम्भाजी :: 493

में मराठों के दस बारह हजार की सेना हमेशा तैयार खड़ी रहती है। इस सेना पर
राजधानी की रक्षा की जिम्मेदारी है। इसलिए वे कभी भी अपनी जगह से हटते नहीं
हैं।'"
"‘लेकिन शहाबुद्दीन तो कहता है—पाचाड़ जला दिया, वाड़ी को खाक कर
दिया।’"
"‘पाचाड़ की सीमा में दूर के जंगलों में बनाये गये जानवरों के कुछ तबेलों
को उन्होंने लूटा, जलाया। उनकी फौज निजामपुर से गांगोली और पाचाड़ की सीमा
तक स्वतन्त्रता से विचरण कर रही है, यह बात सच है। लेकिन अगर सम्भाजी की
बात करें तो वे अभी तो गोवा की ओर ही हैं।’"
इन बातों को सुनकर बादशाह को आश्चर्य हुआ। उसने क्रुद्ध होकर कहा,
"‘यह शहाबुद्दीन इतना पागल निकला ? और काफिर मरगट्ठों ने उसे इतने दिन
जीवित कैसे रहने दिया ?’"
"‘जहाँपनाह ! कोलाड गाँव के ऊपरी हिस्से में देवघाट पर पहरा देने वाली
मराठों की सेना को खानसाहब ने तलवार के घाट उतार दिया, निजामपुर को भी
भस्म कर दिया। यह सारी बातें सच हैं। किन्तु निजामपुर के पास ही ताम्हिणी नाम
का बड़ा घाट है। वहाँ घनी झाड़ियाँ, गहरी नदियाँ और भयानक घाटियाँ हैं। इसी
ताम्हिणी के पीछे खानसाहब ने अपना डेरा डाल रखा है। उनकी फौज दिन में
निजामपुर का फेरा लगाकर रात में ताम्हिणी में आकर छुप जाती है। इतनी ही सच्चाई
है। रायगढ़ और मराठों का शेष भाग पूरी तरह स्वतन्त्र है।’"
"‘बेवकूफ, कमीना कहीं का।।’" शहाबुद्दीन के बड़बोलेपन पर बादशाह को
बहुत क्रोध आया। उसने गुर्राकर कहा, "‘उस कमबख्त का आज ही तबादला कर
देता हूँ। युद्धभूमि से उसे वापस बुलाता हूँ।’"
"‘नहीं मालिक ऐसी भूल न करें।’" अबूमुहम्मद कहने लगा, "‘जहाँपनाह,
शिवाजी और सम्भा के इस इलाके में गढ़ और किले बहुत मजबूत हैं लेकिन वहाँ
के सभी लोग बहादुर और ईमानदार नहीं हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जो अपने छोटे से
स्वार्थ के लिए अपना देश भी बेचने के लिए तैयार हैं ऐसे गद्दार भी बहुत हैं।’"
"‘बेटे कहना क्या चाहते हो ?’" बादशाह ने शान्त स्वर में पूछा।
शहाबुद्दीन साहब ने चाकड़ से लेकर पूना तक के सभी सरदारों और
जमींदारों को अपने पास बुलाया है। वे उन्हें धन एवं अन्य अनेक प्रकार का लालच
देकर अपनी ओर मिलाने का प्रयास कर रहे हैं। वे बड़े-बड़े मरगट्ठों को अपने
जाल में फँसाने की कोशिश कर रहे हैं। मेरे आका, एक बार ये खानदानी गद्दार
जहाँपनाह के हाथ में आ जाएँ तो किलों को मिटाने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।’"
"‘बस ! बस ! क्या तो तुम्हारा दिमाग और क्या ही गहरी सोच।’" बादशाह ने
494 :: सम्भाजी

शान्त स्वर में कहा।
बाघोली घाटी से बीच के रास्ते कवि कलश की सेना रायगढ़ की ओर जा
रही थी। सामने दूरी पर रायगढ़ के पीछे की बुर्ज दिखाई पड़ रही थी। उस तरफ
कर्मचारियों के आवास थे। अष्ट प्रधानों के आवास से कवि कलश की दृष्टि पोतले
घाटी की ओर मुड़ी, गोवा और दक्षिण कोंकण की ओर बहुत दिनों तक रहकर
घोड़े, हाथी आदि राजधानी की ओर आ रहे थे। स्पष्ट रूप से रायगढ़ दिखाई पड़ते
ही सैनिकों और जानवरों की गति मन्द पड़ गयी। पाँच हजार की यह बड़ी फौज
घूमते-घूमते आगे बढ़ रही थी। शम्भू महाराज दो दिनों में ही वहाँ पहुँचने वाले थे।
राजधानी पर मुगलों के आक्रमण की भी आशंका थी। इसलिए महाराज ने कविराज
को आगे भेज दिया था।
कवि कलश ने सामने अचानक सामने धूल का गुबार देखा, तीन चार सौ
घुड़सवारों का एक दल अतिशय वेग से सामने आकर पहुँच गया। कवि कलश
शिलेदार मुरारी डाँगे दौड़ते हुए सामने आया और अपने घोड़े की लगाम खींचते हुए
चिल्लाया, "कविराज, जल्दी कीजिए रायगढ़ पर मुगलों ने आक्रमण कर दिया
है।"
इन शब्दों के कान पर पड़ते ही कवि कलश का अलसाया हुआ शरीर
एकाएक स्फूर्त हो गया। पीठ पर बिखरे अपने बालों को समेटकर उन्होंने गाँठ
बाँधी। दूसरे ही क्षण अपने पाँव रिकेब में डालते हुए कविराज ने अपनी फौज के
सम्मुख गर्जना की- 'चलोऽऽ आगे बढ़ोऽऽ हरऽहर महादेव'। एक के पीछे एक
जानवर दौड़ने लगे। देखते-देखते पानी की लहर की तरह उस फौज ने पोतले की
घाटी को पार कर लिया। घाटी के मुखद्वार पर आते ही दूसरी ओर का प्रदेश स्पष्ट
दिखाई पड़ने लगा। उसी समय कवि कलश ने अपने घोड़े को एड़ लगाई। एक
क्षण में ही उनकी दृष्टि पाचाड़ और हिरकणी बुर्ज से होती हुई रायगढ़ के भव्य
किले तक पहुँच गयी। किन्तु किले की तलहटी या प्रवेशद्वार के पाचाड़ के पास
किसी प्रकार की गड़बड़ दिखाई नहीं पड़ रही थी। फिर कलश जी ने दूर गांगोली
गाँव की ओर देखा। उस ओर आग की ऊँची लपटें दिखाई दे रही थीं। घास के
गट्ठों और पुआलों के साथ-साथ घरों को जलाया जा रहा था। पूरे आसमान में धुआँ
छा गया था। इसी समय मुरारी का घोड़ा दौड़ते हुए कवि कलश के घोड़े के पास
पुनः आ गया। कलश ने कठोर स्वर में पूछा, "कौन है? कौन है वह शैतान?"
"औरंगजेब का सरदार शहाबुद्दीन। पिछले चार पाँच दिनों से उसने मार
काट और आगजनी शुरू कर रखी है।"
"इतने दिन? रायगढ़ के इतने समीप पहुँचने की उसने हिम्मत कैसे की?
चलो शत्रु को अभी अभी यहाँ से भगाएँगे।"
सम्भाजी :: 495

"हर हर महादेवऽऽ"
"छत्रपति सम्भाजी महराज की जयऽऽ"
"जय शिवाजीऽऽ, जय सम्भाजीऽऽ"
कवि कलश के शरीर में द्वेष, हठ, क्रोध, प्रतिशोध आदि का एक रसायन बन
गया था। वे घोड़े की पीठ पर न बैठकर रिकेबों में, पाँव टिकाए, खड़े-खड़े ही घोड़े
की लगाम खींचते हुए आगे की ओर झुक रहे थे और तेज आवाज में गर्जना कर रहे
थे— 'चलऽऽ अरे तेज दौड़ऽऽ चलऽऽ।' घोड़ों की टापों और सेना की रणगर्जना से
आकाश प्रतिध्वनित होने लगा। बादलों की भाँति गरजती वह फौज थोड़ी ही देर में
गांगोली के मैदान में पहुँच गयी। सेना के आने से वहाँ के लोगों को ऐसा लगा जैसे
कोई बहुत बड़ी लहर सूखी नदी के पाट में आ गयी हो। इस प्रकार किसी आक्रमण
के प्रति असावधान मुगल सैनिक, 'अरे सम्भाऽऽ आया भागोऽऽ' ऐसा चिल्लाते हुए
अपने घोड़ों की ओर भागने लगे। आग लगाने का काम छोड़कर मुगल झटपट अपने
घोड़ों पर सवार होने लगे। तलवारें निकल गयीं। घोड़ों से घोड़े भिड़ने लगे मनुष्य
मनुष्यों का गला काटते हुए आगे बढ़ने लगे।
गांगोली, पानोसे और जोरगाँव से लेकर निजामपुर तक के खेतों खलिहानों में
लड़ाई छिड़ गयी। कवि कलश की तलवार इतने वेग से सपासप चलने लगी, एक
के बाद दूसरा सिर काटने लगी कि उनका घोड़ा देखते ही मुगल सिपाही उनके
सामने से भागने लगे। अखाड़े में पोषित उनका गठीला शरीर बहुत शक्तिशाली था।
वे बड़े जोश के साथ शत्रुओं का सामना कर रहे थे। अपने स्वामी की अनुपस्थिति में
रायगढ़ की लाज रखना उन्हीं का दायित्व है। इस भावना से वे बहुत उत्तेजित हो
गये थे। कविराज की वीरता देखकर मराठा वीरों में बहुत उत्साह आ रहा था। वे
कहने लगे— "कलम चलाने वाला बहादुर कवि दाडपट्टे की तरह सर सर तलवार
चला रहा है तो क्या हमें पीछे रहना चाहिए।"
पिछले चार-पाँच दिनों से लूटपाट कर रहे मुगलों को ऐसे भयंकर प्रतिकार
का अनुभव नहीं था। इसी असावधानी का लाभ उठाकर कवि कलश ने मैदान मार
लिया। मुगलों की यह दुर्दशा देखकर, जंगलों में छुपी निवासियों की टोली बाहर
आ गयी। वे कवि कलश की सेना की सहायता करने लगे।
सन्ध्या के चार बजे तक मुगलों ने सामना किया। तब तक मुगलों के लगभग
तीन हजार सैनिक मारे जा चुके थे। दो-तीन सौ मराठा भी शहीद हुए। सन्ध्या समय
के बढ़ते अन्धकार, कवि कलश के बढ़ते दबाव और घने जंगलों की भयानकता से
शहाबुद्दीन डर गया। वह जोर से चिल्लाया—"चलो कुछ देर के लिए वापस
चलो!" शत्रु सेना के मुख मोड़ते ही मराठों का उत्साह और भी बढ़ने लगा। पिछले
कई दिनों से जंगलों में छुपे गाँव के सन्तप्त लोग भी बाहर निकल आये और मुगलों
496 : सम्भाजी

का पीछा करने में मराठों के साथ हो गये। गाँव के सामान्य कुत्तों के साथ गड़ेरियों
के पालतू कुत्ते भी मुगलों के पीछे दौड़ पड़े। खेतों की ऊँची नीची जमीन में दौड़ते
हुए मुगलों के घोड़े भी जगह जगह पर गिरने लगे। मुगलों के एक के बाद एक
सिर कटने लगे।
'अल्लाऽऽ' 'खुदाऽऽ' 'भागोऽऽ' ऐसी चिल्लाहट सुनाई पड़ने लगी।
मराठा सेना मुगलों का पीछा करते करते ताम्हिणी घाट की तलहटी तक
पहुँच गयी। मुगलों की बची-खुची सेना घने जंगलों में छिप गयी। थके हुए मराठा
सैनिक रुक गये। घोड़े सूखी घास खाने लगे। साईसों ने घोड़ों को चने खिलाने शुरू
किये। घुड़सवारों ने चने के साथ गुड़ और मूँगफलियाँ खड़े खड़े ही खाया और
पास के झरने से पानी पीकर पूरी तरह तृप्त हो गये।
तब तक कविराज ने कुछ सूचनाएँ प्राप्त कर ली थीं। कुशल सैनिकों ने अपने
हाथों में मशालें लीं और सामने के घने जंगल में घुसने का निर्णय लिया। आसपास
के ग्रामीण, दर्शक और कुछ राहगीर भी मराठों के साथ हो लिये। जिस प्रकार
शिकारी हाँका लगाकर बाघ को उठाते और फँसाते हैं, उसी प्रकार मराठा सेना आगे
बढ़ रही थी। कवि कलश की दृष्टि कुछ खोज रही थी। उन्होंने एक नाले में पानी
का बहता प्रवाह देख लिया। मशाल के प्रकाश में उन्होंने मार्ग ढूँढ़ा। काफी दूर जाने
पर नाले का एक विस्तृत क्षेत्र मिला। वहाँ पानी की धारा की बगल में मुगलों का
रसद भंडार था। उसमें अनाज की बोरियाँ, जानवरों के चारे और बारूद के भंडार थे।
उन सभी को कलश जी ने अपने क़ब्जे में ले लिया। मुगल ऊपर के घने जंगल में
छुप गये थे।
लूटी हुई रसद के साथ सेना निजामपुर के समीप आ गयी। अब तक रात
बहुत हो चुकी थी। चौकी पर एकत्र होकर सभी ने निर्णय लिया कि दूसरे दिन घाट
में जाएँगे। पास की एक घाटी को पार करके कविराज की सेना मैदान में आ गयी।
किसी ने चिल्लाकर कहा, "कविराज! उधर देखिए।" सभी की निगाहें एकाएक
मुड़ गयीं। ताम्हिणी घाट की ऊँची पहाड़ियाँ वहाँ से स्पष्ट दिखाई पड़ रही थीं।
सितारों की छाया में मुगलों के घोड़े दबे पाँव आगे बढ़ते दिखाई दे रहे थे। एक ने
कहा, "कविराज, वह देखिए! खान डरकर घाट पर चला गया।"
"जाएगा ही! उसकी सारी रसद हमारे क़ब्जे में आ गयी है, तो वह रुकेगा
कैसे?" सभी लोग कविराज की प्रशंसा करने लगे, "कविराज, आज आपके शरीर
में भवानी का संचार हो गया था क्या?" ऐसा पूछकर, उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा
करने लगे। उस समय अखाड़ेबाजी से मजबूत बनी अपनी भुजाओं और छाती को
गर्व से फुलाते हुए कविराज ने गर्व से कहा, "साथियो, किसी पागल हाथी को काबू
में करना आसान है किन्तु किसी क्रुद्ध ब्राह्मण पर काबू पाना बहुत कठिन है।"
सम्भाजी .. 497

कविराज का घोड़ा निजामपुर पहुँच गया। ग्रामवासियों और घुड़सवारों की
बड़ी भीड़ लग गयी थी। दूसरी ओर की एक घाटी में कलश की सेना को एक
जीवित व्यक्ति मिला था। यह औरंगजेब का सरदार था। उसके हाथ-पैर बाँधकर
ग्राम पंचायत में खम्भे से बाँधा गया था। वहाँ पर सभी लोग कविराज की प्रतीक्षा
कर रहे थे। उनके आते ही लोग चिल्लाने लगे-
"कविराज, इस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दीजिए। शीघ्र ही इसका
खात्मा कीजिए।"
घबराये हुए लगभग पैंतीस वर्ष के गोरे चिट्टे खान की ओर कलश जी ने
देखा। गरजते हुए उससे पूछा, "तेरा नाम क्या है?"
"दुखलास खान हुजूर ऽऽ।"
शिकार बड़ा था और नामचीन भी। कवि कलश ने उसके हाथ-पैर खोलने
का आदेश दिया। मुक्त हुए खान ने कविराज के पैर पकड़ लिये। अपने प्राण बचाने
के लिए वह दया की याचना करने लगा।
"कविराज ऽ मारिए, मारिए इस शैतान को, नहीं तो हमीं इसके रक्त से
अपनी तलवार लाल करेंगे।" घुड़सवार सैनिकों को बहुत क्रोध आ रहा था।
कलश ने हाथ के संकेत से सभी को शान्त रहने को कहा। उन्होंने दुखलास
खान से कहा, "चल उठ भाग, भाग जा अपनी फौज की ओर।"
दुखलास खान अविश्वास मे और मराठा सैनिक असन्तोष मिश्रित आश्चर्य से
कविराज की ओर देखने लगे। तब कविराज ने कड़ककर कहा, "केवल एक काम
के लिए तुम्हें मुक्त कर रहा हूँ। बादशाह के पास तुम्हें जीवित भेज रहा हूँ।"
"हुजूर, हुजूर हुक्मऽऽ"-पैर पकड़ते हुए दुखलास खान पूछने लगा।
कविराज ने डाँटते हुए कहा, "जाओ, जाकर कहो अपने उस मूर्ख बादशाह
से-तैमूरलंग के ग्यारहवें वंशज होने का अभिमान न करे। आक्रमण के नाम पर
'बैं-बैं' करती मामूली भेड़-बकरियों को सह्याद्रि के बब्बर शेरों के पास न भेजें।
हमारे शम्भुमहाराज जब तक रायगढ़ के सिंहासन पर बैठे हैं, उसी समय में
औरंगजेब को रायगढ़ के आस पास आकर लौट जाने के लिए कहो। केवल एक
बार उसे यहाँ आने को कहो।"
498 :: सम्भाजी

दो
गोवा की सीमा पर बाँदा गाँव में बड़ी अशान्ति फैली थी। शहजादा मुअज्जम की
विशाल फौज ने वहाँ डेरा डाल रखा था। इसलिए उस गाँव का स्वरूप ही बदल
गया था। शहजादा कांट द आल्होर की राह देख रहा था। वाइसराय को तत्काल
आकर मिलने के लिए उसने सन्देशा भेजा था। चार दिन तक प्रतीक्षा करने के बाद
भी वाइसराय का आगमन नहीं हुआ। अन्ततः उसने अपने वकील अल्बुकर्क को
भेज दिया। किसी मामूली वकील के साथ औरंगजेब के शहजादे का समझौता
करना असंभव था। मुअज्जम बहुत रुष्ट हुआ। किन्तु समय ऐसा था कि शिकायत
करें भी तो किससे ?
अल्बुकर्क कन्धे झुकाए सामने खड़ा था। उसकी लाल शेरवानी और लम्बी
टोपी की ओर शहजादे ने क्रोध से देखा। मुअज्जम गुर्राया, “तुम्हारा वाइसराय अपने
आप को क्या समझता है ? उसको कुछ शिष्टाचार, अदब, तमीज है कि नहीं ?”
“माफी हो सरकार ! वाइसराय बीमार हैं।”
“ये झूठे बहाने बन्द करो। वह सम्भा बीस हजार की फौज लेकर तुम्हारी
गर्दन पर सवार था, तब जहाज मे बैठकर भागना पड़ा था, तुम्हारे इस कांट साहब
को। चर्च के तलघर में बाप दादो के मुर्दों के सामने फूट-फूटकर रोना पड़ा था तुम
लोगो को। वे दिन तुम लोगो को भूल गये हैं क्या ?”
“हुजूर माफी चाहता हूँ।”
“उस सारे संकट से किसने बचाया ? मुगल फौज ने ही न ?”
“हुजूर नाराज न हों। पुर्तगालियों और मुगलों की यारी दोस्ती आगे भी
पहले जैसी ही रहेगी। बताइए हमें मुगलों की क्या सेवा करनी है ?”
“सूरत से आये हमारे जहाज कितने दिनों से समुद्र मे खड़े हैं ? समझौते के
अनुसार हमारी नौसेना के लिए पणजी में तत्काल व्यवस्था कीजिए।”
“जगह की व्यवस्था बाद में देख लेंगे हुजूर। पहले जहाजों पर लदे रसद को
तो उतरवाइए।” अल्बुकर्क ने समझाते हुए कहा।
“ठीक है। हम कल ही अपनी जहाजों को माडवी में उतरने का हुक्म देते
हैं।”
“सरकार, सरकार—मांडवी के इतने चौड़े पाट में क्यों जाते हैं ? कांट साहब
की इच्छा है कि आप अपनी जहाजों को कायसूव नदी में उतारें।”
पुर्तगाली वकील के उस स्वार्थपूर्ण कथन से शहजादा उत्तेजित हो गया।
अपने पतले ओठों को दाँतों से दबाते हुए वह ऊँची आवाज में बोला, “तुम्हारा
सम्भाजी :: 499

वाइसराय मुझे बदमाशों का सिरताज दिखता है। मांडवी में जहाजों को उतारने से
तुम्हारे मालिक को पणजी शहर के लिए खतरा लग रहा है? गिरगिट की तरह रंग
बदलने और साँप की तरह समय आने पर पलट जाने में माहिर है तुम्हारा वाइसराय।
मुझे तो लगता है कि हमारे अब्बाजान औरंगजेब साहब को भी वाइसराय से बहुत
कुछ सीख लेना चाहिए। "
जिनकी सहायता के लिए मुगल इतनी दूर आए, उन फिरंगियों द्वारा ऐसा
स्वागत किया जाएगा, ऐसी कल्पना शहजादे को नहीं थी। रामदरा को पार करके
सावंतवाड़ी में प्रवेश करते ही मराठा फौज ने उसे जगह-जगह पर बहुत परेशान
किया था। उसका बदला लेने के लिए ही वह सावंतवाड़ी, बाँदा, वंगुर्ला तक गोवा
और हिन्द स्वराज्य की सीमा के गाँवों को जलाता हुआ आ रहा था।
सम्भाजी महाराज की दहशत से भयभीत वाइसराय अब मन से समझौता
और शान्ति चाह रहा था इसलिए शीघ्रता से पुर्तगालियों ने सम्भाजी से समझौता कर
लिया। बसई और दमण के लिए चौथ कर देना स्वीकार कर लिया। इसके अतिरिक्त
कांट ने लिखित रूप में स्वीकार किया था कि वे अपने क्षेत्र में मुगलों को, औरंगजेब
की फौज के लिए रसद और गोला बारूद नहीं ले जाने देंगे। यह सारा ममाचार
सुनकर शहजादा ने क्रोधित होकर पूछा, "सम्भाजी विजयी हो गया क्या?"
प्रतिशोध की भावना से शहजादा अन्धा हो रहा था। साथ ही उसे शहजादा
अकबर के डिचोली में होने की सूचना मिल गयी थी। उसने तत्काल छोटे से सुन्दर
डिचोली गाँव पर आक्रमण कर दिया। अकबर वहाँ पर रुका नहीं था। परन्तु
मुअज्जम ने क्रुद्ध होकर सम्भाजी महाराज और कवि कलश के सुन्दर महलों को
तोपों से ध्वस्त कर दिया। कवि कलश द्वारा बड़े परिश्रम से तैयार किया गया गुलाब
का बगीचा हाथियों से रौंदवा दिया। शहजादे ने भतग्राम, नार्वे जैमे गाँवों को लूटा,
पिलगाँव के राममन्दिर को ध्वस्त कर दिया, मप्तकोटेश्वर के मन्दिर का कलश
तोड़ दिया। गोवा की सीमा पर जहाँ तहाँ ध्वंसलीला की। उसे खबर मिली कि
शहजादा अकबर ने ईरान की ओर भाग जाने के लिए एक जहाज बनवाया है जो
बेगुर्ला बन्दरगाह में खड़ा है। फिर क्या था मुअज्जम ने पूरे बन्दरगाह को जलाकर
खाक कर दिया। परन्तु इस कार्य से उसने सूरत से आने वाली अपनो रसद को भी
नष्ट कर दिया।
होशियार कांट द आल्होर ने सम्भाजी महाराज के साथ लिखित समझौता कर
लिया था। समझौते के कागजातों को पुर्तगाल भेजकर खतरे में पड़े अपने वाइसराय
पद को सँभाल लिया था। पणजी के तटों पर नयी तोपें लगाई गयी थीं। सम्भाजी के
डर से मार्मा गोवा भेजे गये कागजात फिर से पणजी ले आये गये थे। वाइसराय
500 :: सम्भाजी