सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 498

"हर हर महादेवऽऽ"
"छत्रपति सम्भाजी महराज की जयऽऽ"
"जय शिवाजीऽऽ, जय सम्भाजीऽऽ"
कवि कलश के शरीर में द्वेष, हठ, क्रोध, प्रतिशोध आदि का एक रसायन बन
गया था। वे घोड़े की पीठ पर न बैठकर रिकेबों में, पाँव टिकाए, खड़े-खड़े ही घोड़े
की लगाम खींचते हुए आगे की ओर झुक रहे थे और तेज आवाज में गर्जना कर रहे
थे— 'चलऽऽ अरे तेज दौड़ऽऽ चलऽऽ।' घोड़ों की टापों और सेना की रणगर्जना से
आकाश प्रतिध्वनित होने लगा। बादलों की भाँति गरजती वह फौज थोड़ी ही देर में
गांगोली के मैदान में पहुँच गयी। सेना के आने से वहाँ के लोगों को ऐसा लगा जैसे
कोई बहुत बड़ी लहर सूखी नदी के पाट में आ गयी हो। इस प्रकार किसी आक्रमण
के प्रति असावधान मुगल सैनिक, 'अरे सम्भाऽऽ आया भागोऽऽ' ऐसा चिल्लाते हुए
अपने घोड़ों की ओर भागने लगे। आग लगाने का काम छोड़कर मुगल झटपट अपने
घोड़ों पर सवार होने लगे। तलवारें निकल गयीं। घोड़ों से घोड़े भिड़ने लगे मनुष्य
मनुष्यों का गला काटते हुए आगे बढ़ने लगे।
गांगोली, पानोसे और जोरगाँव से लेकर निजामपुर तक के खेतों खलिहानों में
लड़ाई छिड़ गयी। कवि कलश की तलवार इतने वेग से सपासप चलने लगी, एक
के बाद दूसरा सिर काटने लगी कि उनका घोड़ा देखते ही मुगल सिपाही उनके
सामने से भागने लगे। अखाड़े में पोषित उनका गठीला शरीर बहुत शक्तिशाली था।
वे बड़े जोश के साथ शत्रुओं का सामना कर रहे थे। अपने स्वामी की अनुपस्थिति में
रायगढ़ की लाज रखना उन्हीं का दायित्व है। इस भावना से वे बहुत उत्तेजित हो
गये थे। कविराज की वीरता देखकर मराठा वीरों में बहुत उत्साह आ रहा था। वे
कहने लगे— "कलम चलाने वाला बहादुर कवि दाडपट्टे की तरह सर सर तलवार
चला रहा है तो क्या हमें पीछे रहना चाहिए।"
पिछले चार-पाँच दिनों से लूटपाट कर रहे मुगलों को ऐसे भयंकर प्रतिकार
का अनुभव नहीं था। इसी असावधानी का लाभ उठाकर कवि कलश ने मैदान मार
लिया। मुगलों की यह दुर्दशा देखकर, जंगलों में छुपी निवासियों की टोली बाहर
आ गयी। वे कवि कलश की सेना की सहायता करने लगे।
सन्ध्या के चार बजे तक मुगलों ने सामना किया। तब तक मुगलों के लगभग
तीन हजार सैनिक मारे जा चुके थे। दो-तीन सौ मराठा भी शहीद हुए। सन्ध्या समय
के बढ़ते अन्धकार, कवि कलश के बढ़ते दबाव और घने जंगलों की भयानकता से
शहाबुद्दीन डर गया। वह जोर से चिल्लाया—"चलो कुछ देर के लिए वापस
चलो!" शत्रु सेना के मुख मोड़ते ही मराठों का उत्साह और भी बढ़ने लगा। पिछले
कई दिनों से जंगलों में छुपे गाँव के सन्तप्त लोग भी बाहर निकल आये और मुगलों
496 : सम्भाजी