छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
इमारत बनाई। इसे कैसे भुलाया जा सकता है?''
''वजीर जी, ताजमहल जैसी खूबसूरत इमारत बनाने वाले कलाकार के हाथ
कितने रक्त से भरे थे? इसकी कोई जानकारी है आपको? शाहजहाँ साहब के उन्हीं
हाथों ने शहरयार और अन्य सगे भाइयों की गर्दनें काटी थीं। इतना ही नहीं उन्हीं
हाथों ने शहरयार के मासूम बच्चों को क्रूरतापूर्वक मार डाला था।''
बादशाह ने मन का सन्ताप व्यक्त किया। उसने महल में इधर-उधर दृष्टि
डाली। असदखान और जुल्फिकार के अतिरिक्त वहाँ कोई और नहीं था। शहरयार
की याद के साथ औरंगजेब मन में डर गया। उसे स्मरण हुआ कि दारा, सुजा और
मुराद जैसे होनहार भाइयों को उसने किस क्रूरता से मार डाला था। इन स्मृतियों से
वह बेचैन हो गया। बादशाह को यह भय सदा बना रहता था कि उसके बच्चे भी
राजगद्दी के लिए ऐसा ही खून खराबा करेंगे। इसीलिए शहजादों के साथ भोजन
करते समय बादशाह की संशयशील आँखें महल के कोनों में झाँकती रहती थीं। वह
इस बात से सावधान बना रहता था कि उसका कोई बेटा छुपकर उसका गला न घोंट
जाय। ये सरी पुरानी बातें आलमगीर को नये सिरे से याद आयीं। उसने उदास होकर
कहा, ''हम मुगलों के लिए तख्त ही वास्तविक ताज है।''
पाँच
माणगाँव से कुछ मील की दूरी पर जंगल में बसा गांगोली गाँव था। गाँव से थोड़ी
दूरी पर महारानी येसूबाई के नाना का महल था। वैपूर्णा नामक छोटी नदी के किनारे
छोटा किन्तु आकर्षक महल लकड़ियों से बनाया गया था। महल के साथ ही लगा
हुआ बैजनाथ का मन्दिर और सामने वाले आँगन के साथ नदी का काला प्रवाह।
येसूबाई का यह मायका शम्भूराजा को बहुत पसन्द था। सबसे अधिक तो यह कि
इसी पवित्र घर ने राजा को पुत्ररत्न प्रदान किया था। इसलिए पूरा वातावरण ही
सुगन्धित और पवित्र लग रहा था। महल के सामने का पहाड़ चढ़ने पर कुछ दूरी पर
ही रायगढ़ था। सामने वह किला ऐसा दिखाई पड़ता था जैसे कोई हाथी पैर मोड़कर
बैठा हो। महीना भर बालक शाहू को गोद में लेकर, उसकी छोटी-छोटी आँखों की
ओर देकर शम्भूराजा रायगढ़ की ओर बार-बार देखते रहे।
गांगोली के प्रवास में एक सुखद दिन आया। सन्त तुकोबा के चिरंजीव
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महादेव महाराज राजा से मिलने आये। बैजनाथ की सीढ़ियों पर दोनों के बीच
बहुत-सी बातें हुईं। उसी समय महादेव महाराज ने कहा, "राजन, आषाढ़ में हजारों
वारकरी पैदल चलकर पंढरपुर जाते हैं। इस साल से सन्त तुकाराम की पालकी ले
जाने की सोच रहा हूँ।"
"पालकी? कहाँ से कहाँ तक?"
"देहू से पंढरपुर तक।"
"वाहऽऽ!" शम्भूराजा प्रसन्न हो गये। तुकाराम के पुत्र से उन्होंने कहा,
"कल्पना अच्छी है। नयी शुरुआत होगी। हर साल पालकी ले जाओ।
उसके लिए जो द्रव्य लगेगा उसे सरकार से लो। मैं अधिकारियों को आदेश जारी
करता हूँ कि वे पालकी को यथोचित सुरक्षा प्रदान करें।"
तुकाराम के पुत्र सन्तुष्ट होकर चले गये। राजा ने हुक्मनामा भी भेज दिया।
किन्तु फिर से उनके हृदय में दुख का ज्वार उमड़ आया। मैसूर में अपने मित्रों की
हत्या से बहुत बेचैन हो गये थे।
दिन तो आराम से बीत जाता था किन्तु रातें खाने को दौड़ती थीं। राजा को
किसी भी प्रकार से नींद नही आती थी। मैसूर के लिए भेजे गये कृष्णाजी कान्हेरे के
वापस आने की वे व्यग्र प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीरंगपट्टनम् की सीमा पर दादाजी
काकड़े, जैताजी काटकर और तुकोजी निंबालकर की टंगी हुई गर्दनें उनकी आँखों
के सामने आ जाती थीं। वे उदास हो उठते थे। वे यही सोचते कि—"कब मैसूर पर
आक्रमण के बाद वहाँ के घमंडी राजा चिक्कदेवराज को पराजित करके उसे बेड़ियाँ
पहनाऊँ।"
मिट्टी से सोंधी सुगन्ध आ रही थी। सभी को लग रहा था कि मृग नक्षत्र में
कोंकण में तूफानी वर्षा होगी। दो तीन दिन से रोज कड़ी धूप हो रही थी। गर्मी बढ़
जाने के कारण शरीर से पसीना छूट रहा था। पसीने से कपड़े भीग जाते थे। उस दिन
शाम को भारी वर्षा हुई। आसमान में बिजली चमक रही थी। बादल गरज रहे थे।
वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। लगातार तेज वर्षा ने जीना मुश्किल कर
दिया।
महल के बीच वाले चौक में राजाओं का विचार-विमर्श चल रहा था।
शम्भूराजा के समीप ही महारानी येसूबाई बैठी थीं। उनकी गोद में बालक शाहू सो
रहे थे। शम्भूराजा के बहुत गम्भीर हो जाने के कारण कविराज कलश जोत्याजी
केसरकर, रायप्पा आदि सभी दबाव का अनुभव कर रहे थे। आज भी कान्हेरे मैसूर
से वापस नहीं आये थे। इसीलिए शम्भूराजा बहुत चिंतित लग रहे थे। शम्भूराजा ने
थोड़ा मुस्कराते हुए कहा, "हमारा यह साल सुख-दुःख के हिंडोले में झूल रहा है।
एक ओर हमने सिद्दियों को दहशतज़दा बनाया, बादशाह की सेना को वापस लौटा
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दिया, पुत्र की प्राप्ति हुई, ये सारी सुखद घटनाएँ हैं।
"महाराज, इन सुखों के सामने इतना-सा दुःख क्या है?"
"नहीं येसूराणी, हमारग दुःख थोड़ा नहीं है। कोंडाजी बाबा के लिए हम
शोक मना ही रहे थे कि कर्नाटक-तमिल देश ने हमारी बगल में एक के बाद एक
तीन छूरे भोंक दिये। काकड़े, काटकर और निम्बालकर ये हमारे तीनों सरदार
साधारण नहीं थे। उनके निधन की पीड़ा हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। हरजी जैसा
आदमी भी वहाँ भयभीत हो जाता है। इस सब की एक ही दवा है—आक्रमण,
केवल आक्रमण।"
चिराग की रोशनी में शम्भूराजा की मुखमुद्रा बहुत लाल दिख रही थी। उनके
सहयोगी एक दूसरे की ओर सहमकर देख रहे थे। येसूबाई ने साहस बटोरकर कहा,
"परन्तु महाराज औरंगजेब जैसा शत्रु अपनी सेना लेकर वतन के सीने पर आ बैठा
है। उसे यहाँ छोड़कर दूर कर्नाटक तमिल में जाना आत्मघात नहीं होगा क्या?"
"नहीं महारानी, मैसूर का वह चिक्कदेवराज बहुत घमंडी हो गया है। वह
इस अभिमान में फूला हुआ है कि उसे कोई छू नहीं सकता। अधिक समय तक
शान्त बैठने का मतलब है अपने तीन सरदारों की मृत आत्मा के साथ गद्दारी
करना।" बाहर लगातार वर्षा हो रही थी। नदी के किनारे ठंडी हवा बह रही थी।
वर्षा रुक नहीं रही थी। रात बहुत हो चुकी थी। शम्भूराजा ने शान्त और धीमे स्वर
में कहा, "कल औरंगजेब और हममें महायुद्ध होगा। तब कर्नाटक और तमिल से
जो रसद हमें अपने अधिकार से मिलती है वही हमें आगे ले जाएगी। आगे कदम
बढ़ाने से पहले हम मैसूर गये कान्हेरे की प्रतीक्षा करेंगे। निश्चित किया गया कि
कान्हेरे के आने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाये।"
नासिक बागलाण की ओर हंबीरराव को एक सन्देश भेजा गया। अन्य मुद्दों
पर भी विचार-विमर्श किया गया। आधी रात बीत चुकी थी। लोगों की आँखें भारी
हो गयी थीं। शम्भूराजा उठकर शयनकक्ष में चले गये। इसी समय ड्योढ़ी के
पहरेदार दौड़कर अन्दर आये। जोर-जोर से शम्भूराजा से कहने लगे—"बाहर
कृष्णाजी पन्त नाम का आदमी आया है। भीतर आकर राजा से मिलने का आग्रह कर
रहा है।" शम्भूराजा की नींद उचट गयी। उन्होंने तत्काल कान्हेरे को अन्दर
बुलाया। सभी की निगाहें उसी पर टिक गयीं। कान्हेरे वर्षा में पूरी तरह भीग चुके
थे। उन्हें सर्दी भी लग रही थी। वे बिना रुके भागते हुए मैसूर से स्वराज्य में वापस
आये थे। शम्भूराजा ने अपने कन्धे का शाल कृष्णाजी पन्त के हाथ में दी। कृष्णाजी
ने अपने भीगे सिर को किसी प्रकार पोंछा। इसी समय शम्भूराजा ने प्रश्न किया—
"कृष्णाजी पन्त, चिक्कदेवराजा क्या कह रहा है? हो गया कौल करार?"
कृष्णाजी पन्त ने गर्दन झुका ली और नकार में सिर हिला दिया। शम्भूराजा ने
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पुनः पूछा— "फिर वह बगल में क्या है? देखूँ तो जरा।"
"रुकिए मालिक, मैं ही दिखाता हूँ कि क्या है।"
कृष्णाजी पन्त ने बगल में दबाया अपना जरीदार लाल अंगरखा बाहर निकाला
और गीले वस्त्र की तरह झटककर उसे फैला दिया। वह अंगरखा अनेक जगहों पर
फाड़ दिया गया था। यह देखकर सभी को पता चल गया कि मराठों के वकील का
मैसूर में कैसा स्वागत किया गया था। उस अपमानित चीथड़े को देखते नहीं बन रहा
था। दाँत पीसते हुए धीमी आवाज में शम्भूराजा ने पूछा—
"मैसूर के उस घमंडी राजा ने कहा क्या?"
"कैसे बताऊँ महाराज ? फिर भी बताता हूँ।"
'मैं अनुमति लेकर चिक्कदेवराजा से मिला। उन्हें बताया सम्भाजी महाराज
के यहाँ से आया हूँ।' वह तुरन्त बोल पड़ा—'कौन राजा ? कहाँ का राजा ? हम ऐसे
किसी भी आदमी को नहीं जानते। जिस तरह घास उगती है उसी तरह हजारों
जमींदार हर रोज पैदा होते हैं और घास की तरह सूखकर समाप्त हो जाते हैं।' मैसूर
दरबार के विदूषकों ने किस प्रकार वस्त्र फाड़े और अपमानित किया था, वह सब
कृष्णाजी को स्मरण हो आया। वे रो पड़े।
महारानी येसूबाई, कवि कलश और अन्य सभी भयभीत होकर शम्भूराजा की
ओर देखने लगे। सभी का अनुमान था कि अब जलते हुए बारूदखाने की तरह
शम्भूराजा के विराट रूप का दर्शन होगा। किन्तु शम्भूराजा क्रुद्ध न होकर गम्भीर बने
रहे। अपने शयकक्ष की ओर जाते समय उन्होंने साथियों से कहा, "अब क्यों चिन्ता
करें? हमारी दिशा निश्चित हो गयी है। कर्नाटक और तमिल प्रदेश में नचाये बिना
हमारे घोड़ों के दाँत को पीड़ा शान्त नहीं होगी।"
"क्या मतलब महाराज ?" सभी ने भयातुर होकर पूछा।
यह स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था कि महाराज स्वयं कर्नाटक तमिल की
यात्रा पर निकलेंगे। इस समय पाँच लाख की सेना के साथ छाती पर सवार औरंगजेब
का भी सभी को भय था। अपने भयभीत साथियों की ओर राजा ने देखा। येसूबाई
की गोद में सोये बालक शाहू को उन्होंने सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा, "राज्य
का कार्यभार और राज्य का संरक्षण हम महारानी और हंबीरराव पर सौंपेंगे। तीन-
चार महीने की दक्षिण यात्रा किये बिना अब कोई अन्य मार्ग नहीं है।"
"किन्तु महाराज औरंगजेब ?"
"उसकी कुंडली का हमने ठीक-ठीक अध्ययन कर लिया है।" शम्भूराजा
ने सीने से लगाये बालक शाहू के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए आत्मविश्वासपूर्वक
कहा, "अब मृग नक्षत्र से वर्षा आरम्भ हो गयी है। दशहरे तक कोंकण के कीचड़
में अपना घोड़ा लाने का साहस औरंगजेब नहीं करेगा। इसी कालावधि में हम चले
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जाएँगे और जिंजी, तंजौर के साथ अपना दक्षिणी क्षेत्र सँभालेंगे।
छह
चिक्कमंगलूर की पूर्वोत्तर दिशा में वाणावर था। वहाँ के सूबेदार लिंगप्पा का सन्देश
चिक्कदेवराजा के पास पहुँचा। समाचार पाते ही उसके होश उड़ गये। पत्र को ऊपर
उछालते हुए वह दरबार में जोर-जोर से चिल्लाने लगा—"अपना राज्य इतना
विकलांग कब से बन गया? अपने गुप्तचर इतने लापरवाह कब से हो गये?"
"क्या हुआ हुजूर?" घबराकर दीवान ने पृछा।
"वह सम्भा मराठा अपनी दस हजार की सेना लेकर वाणावर के समीप पहुँच
गया है और हमें इसकी खबर तक नहीं।"
दो तीन सरदारों ने एक साथ पृछा—"वह जंगली चूहे का बच्चा यहाँ तक
पहुँचा ही कैसे?"
"आप लोग किस स्वप्नलोक में रहते हैं? सम्भाजी के पास दस हजार घोड़े
हैं। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक भी उनके साथ हैं। उसकी भी पाँच हजार की सेना
उसके साथ है।"
चिक्कदेवराजा अधिक समय तक शान्त बैठने वाला नहीं था। उसने झटपट
सेना तैयार की। वह स्वयं वाणावर की ओर चल पड़ा। सह्याद्रि की तरह वर्षा वहाँ
नहीं थी। इसलिए शम्भुराजा प्रसन्न थे। गोलकुंडा का दीवान मादण्णा पंडित जबान
का पक्का था। वादे के मुताबिक उसने अपनी दस हजार सेना सम्भाजी की सेवा में
हाजिर कर दी थी। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक भी चिक्कदेवराजा से भयंकर ईर्ष्या
करता था। इतनी दूर से घोड़े दौड़ाते महाराज यहाँ पहुँचे इससे हरजी महाड़िक
उत्साहित थे। बहुत दिनों के बाद इन लोगों की भेंट युद्ध के मैदान में हुई थी।
शम्भुराजा ने हरजी की सराहना करते हुए कहा—
"जीजाजी आपने दक्षिण में बड़ा पराक्रम किया है। आपका प्रत्येक कदम
पिताजी के दामाद के योग्य हैं। आपकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।"
"केवल चिक्कदेवराजा की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा पर हम काबू नहीं कर पाये
इसीलिए हम आपकी सहायता के लिए दौड़े-दौड़े आये हैं।"
यह कहते-कहते शम्भुराजा को स्मरण हो आया। वे पूछने लगे—"जीजाजी,
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हमारे चाचा एकोजी राजा हमारी सहायता के लिए आएँगे?"
"इसका भरोसा कौन दिला सकता है?" दुविधा में पड़े हरजी ने
प्रतिप्रश्न किया।
"आपने उनकी सहायता माँगी है क्या?"
"हाँ, उम्र से पिताजी के समान, रिश्ते में मेरे चाचा हैं। उनके पास दक्षिण की
मिट्टी का जन्म भर का अनुभव है। सम्भव हुआ तो उनका लाभ अवश्य उठाएँगे।
स्वामी जी का कहना है-'मराठियों को एकत्र करो, महाराष्ट्र धर्म की वृद्धि करो'।
वैसे शम्भूराजा और हरजी के मन में विश्वास नहीं था। वे शिवाजी महाराज
के कर्नाटक आक्रमण के समय मिलने के लिए आये थे। किन्तु रातभर में ही नदी
पार करके पीछे हट गये। वाणावर में बादल छाए हुए थे। उस दिन दोपहर के बाद
गर्मी बहुत बढ़ गयी थी। शम्भूराजा, कवि कलश, हरजी और वहाँ इकट्ठी पचीस
हजार सेना के सामने अपने उद्देश्य को बताने लगे।
वहाँ फौजी डेरे में मराठा, कुतुबशाही सैनिक और कन्नड़ के प्रमुख सरदार
बैठे थे। एक दो दिन में ही त्रिचनापल्ली तक जाना था और कावेरी का समृद्ध क्षेत्र
लूटना था। ऐसा गुप्त रूप से निश्चित किया जा रहा था।
बसप्पा नाइक ने शम्भूराजा से कहा, "विगत कुछ वर्षों में चिक्कदेव की
शक्ति दस गुना बढ़ गयी है। उसकी राजधानी मैसूर पर आक्रमण करना कोई आसान
काम नहीं है।"
"तुम्हारी बात सच है बसप्पा। एकोजी राजा ने बैंगलौर की चालीस वर्ष
पुरानी चौकी को तंजौर स्थानान्तरित किया और सारी गड़बड़ी शुरू हुई। जब तक
मराठों ने बैंगलौर में पाँव जमा रखा था तब तक मैसूर पर उनकी बड़ी दहशत थी।"
शिविर में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया। मैसूर पर आक्रमण करने के
स्थान पर त्रिचनापल्ली की ओर से आक्रमण किया जाये। बाघ को जंगल से बाहर
निकालकर फिर उसकी हत्या की जाये। ये बातें चल ही रही थीं कि एक खबर
आयी-"पन्द्रह हजार की फौज लेकर चिक्कदेव राजा स्वयं हमारे ऊपर आक्रमण
करने आ रहा है। शाम तक दोनों सेनाएँ आपस में भिड़ जाएँगी।"
यह खबर सुनकर शम्भूराजा गम्भीर हो गये। उन्होंने कहा-
"इसका मतलब यह हुआ कि चिक्कदेव बड़ा खेल खेल रहा है। हम
सावधान हों, इससे पहले ही उसने आक्रमण करने का निश्चय किया।"
अपनी सेना को तत्काल तैयार करना, आसपास की पहाड़ियों की आड़
लेकर, लड़ाई को जारी रखना महत्त्वपूर्ण और आवश्यक था। मैसूर की सेना संगठित
और बलशाली है। इसकी जानकारी सभी को हो गयी थी।
उस रात अपनी सेना को अर्ध चन्द्राकार बनाकर चिक्कदेव तैयार हो गया।
402 :: सम्भाजी
दूसरे दिन सभी ओर से युद्ध आरम्भ नहीं हुआ। चिक्कदेव जितना साहसी, मगरूर
और मक्कार था उतना ही ताकतवर भी। सुबह से ही दोनों सेनाओं के बीच छिट-
पुट युद्ध हो रहा था। थोड़ी बहुत तलवारबाजी किन्तु कोई भी निर्णायक युद्ध नहीं
कर रहा था। जैसे-तैसे दोपहर बीती दूरी पर वर्षा होने का दृश्य दिखाई पड़ रहा था।
घोड़ों को संभालते लोग, छोटी-बड़ी तोपों के गोलन्दाज, भालाधारक राउत,
संरक्षक आदि सभी आश्चर्य से आसमान की ओर देखने लगे। वह सचमुच वर्षा
नहीं थी। बल्कि बाणों से वर्षा थी। अचानक सूँऽ सूँऽऽ करते बाण आने लगे। ये
बाण लोगों के पीठ-पेट में घुसने लगे।
आसमान से आने वाले बाणों की दिशा मालूम नहीं पड़ती थी। किन्तु पागल
मधुमक्खियों की तरह जो भी मिलता था उसे काटती थीं। घोड़ों की गर्दनों में, मुँह
में, आँख में, सैनिकों के पेट में, बाँहों में ये बाण घुस रहे थे। बाणों की तीक्ष्णता के
कारण कि घायलों के शरीर से रक्त बहने लगा। इन बाणों की वर्षा से हड़कम्प मच
गया। मराठों के होश उड़ गये। 'हे भगवानऽऽ, मर गयाऽऽ, ओ माँ' जैसी चीत्कारें
मराठों की निकलने लगीं। कुतुबशाही में सुख की रोटियाँ तोड़ने वाले हट्टे-कट्टे
सैनिक भी सामना नहीं कर पा रहे थे। जिस ओर भी रास्ता मिला उधर भागने लगे।
'अल्लाहऽऽ' 'तौबाऽऽ' 'बचाओऽऽ' शब्दों के अतिरिक्त उनके मुँह से कोई और
शब्द नहीं निकल रहा था। लेकिन उनकी परेशानी बढ़ती जा रही थी। चालाक
घुड़सवार नीचे कूदकर भाग रहे थे। बहुत से लोग वहीं गिरकर मर रहे थे। बाणों से
बिंधे घोड़े उन पर गिर रहे थे। आदमी कुचले जा रहे थे। हैदराबादी सैनिकों की
भाग-दौड़ सबसे अधिक थी। उनके सेनापति के पास शम्भूराजा घोड़ा दौड़ाते हुए
पहुँचे। 'भागो मतऽ' 'भागो मतऽऽ' जोर-जोर से कहने लगे। उसी समय हरजी
राजा आश्चर्यचकित उनके पास आये। वे अपना रक्त-पसीना पोंछते हुए पूछने
लगे- "शम्भू महाराज क्या करें? चिक्कदेव बहुत बलशाली है, बाणों की गति भी
अचूक है।"
"जीजाजी थोड़ी देर रुकिये, धैर्य धारण कीजिए। युद्धभूमि से पीछे हटना
मराठा धर्म नहीं है।"
शम्भूराजा, हरजी और कवि कलश के घोड़े युद्धभूमि में थिरक-थिरककर
नाच रहे थे। घुड़सवार राउतों को धीरज बँधाने की वे कोशिश कर रहे थे। परन्तु
बाणों की धार बहुत विषैली थी। जैसे कि इक्के-दुक्के राहगीर पर जंगल में विषैली
चोंचों वाली पंछियाँ आक्रमण करें, उसी तरह बाण आ रहे थे। मराठों की युद्ध
सामग्री का पूरा पता लगाकर चिक्कदेवराजा ने आक्रमण किया था। अँधेरा हो जाने
पर भी बाणों की वर्षा थम नहीं रही थी। अन्य अवसरों पर जो घोड़े आग में से कूद
जाते थे, वे नाक के बल गिर रहे थे। एक साथ दस-दस जवानों से लड़ने वाले
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बहादुरों के भी सीने फटे जा रहे थे। तेजी से घुस जाने वाले बाणों के कारण उनकी
आँखें सफेद पड़ती जा रही थीं।
राजा हरजी और सम्भाजी राजा ने बड़ी हिम्मत बाँधी थी। उसी शाम को
तंजौर से एकोजी राजा की सेना आकर पहुँची। उनके साथ पाँच हजार घोड़े थे। पर
विषैले बाणों के आगे उनकी भी कुछ न चली। अनेक अच्छे घोड़ों और बहादुर
जवानों की सम्पदा नष्ट हो रही थी। कुतुबशाही सेना की कमर टूट गयी थी। बाणों
की वर्षा में वे बेसहारा औरत की तरह चीखने लगे थे।
भोजन का समय करीब आ गया। रात हो चुकी थी। थके-हारे मैसूर के
सैनिक भोजन के लिए रुके होंगे। युद्ध कुछ समय के लिए बन्द हो गया था।
शम्भूराजा की आँखों के सामने ही एक मराठी जवान के सीने में विषैला बाण घुस
गया। उसके रक्त के छींटे राजा की आँख में पड़े। राजा की आँखें अभी तक कडुआ
रही थीं। एकोजी राजा ने अपने भतीजे शम्भूराजा का आलिंगन किया। दीर्घ
निःश्वास छोड़ते हुए शम्भूराजा ने कहा—"क्षमा करें चाचाजी, पराभव के समय
आपसे भेंट हुई, इसका मुझे बहुत खेद है।"
"जाने दे शम्भू बेटे। अच्छे दिन भी आएँगे। माँ भवानी की कृपा से सब ठीक
हो जाएगा।" एकोजी राजा ने पिता की तरह सान्त्वना दी। मराठों और उनके
साथियों की सेना टूट चुकी थी। अब युद्धभूमि छोड़कर हट जाने के अतिरिक्त कोई
उपाय न था। रात में आक्रमण होने की कोई सम्भावना नहीं थी। वहाँ से यथाशीघ्र
हट जाने में ही बुद्धिमानी थी।
उद्विग्न हुए शम्भूराजा ने मशालची को पास बुलाया। बगल के तालाब के पास
पेड़ों और बाँसों की घनी छाया थी। चिक्कदेवराजा और उसकी सेना की आँखों में
धूल झोंकने के लिए पेड़ों पर मशालें जला दी गयीं। उन्हें यह आभास दिया गया
कि मराठे विश्राम कर रहे हैं। तब हरजी, शम्भूराजा, कलश और एकोजी राजा बचे
खुचे घोड़ों और सैनिकों को बाहर निकाल रहे थे। युद्धभूमि से भागने की
अपमानजनक स्थिति शम्भूराजा की जिन्दगी में पहली बार आयी थी। एकोजी राजा
ने निश्चित किया कि वे तंजौर जाएँगे। रातभर सेना भागती रही। दूसरे दिन दोपहर
की धूप चढ़ी। थकी हारी सेना की गति मन्द पड़ गयी। एक तालाब के किनारे सेना
रुकी। जख्मों पर पट्टी बाँधी जा रही थी। सैनिक कुछ सचेत हो रहे थे। शम्भूराजा
की आँखें सूजी हुई दिखाई पड़ रही थीं। उनकी नाक पर भी चोट आयी थी। बायें
हाथ में एक बाण चुभ गया था। उस घाव को देखकर ज्योत्याजी, केसकर, कविराज,
रायप्पा आदि सभी उदास हो गये।
कुछ लोगों को तालाब के किनारे पहरे पर खड़ा किया गया था। वहीं पर
चिक्कदेवराजा का एक हरकारा आया। चिक्कदेव ने शम्भूराजा को चेतावनी देने के
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लिए सन्देश भेजा था। कवि कलश जोर-जोर से पढ़कर सुनाने लगे—
“मराठो, अपने सह्याद्रि पर्वत पर चले जाओ। तुम्हारा हमारे दक्षिण से
सम्बन्ध क्या है? हमारे हाथ से जब तक बचे रहते हो उसे ईश्वर की कृपा समझो।
वाणावर की सीमा रेखा हमने बाणों और तलवारों से खींची है। मैसूर राज्य पर आँखें
ऊँची करके देखोगे तो तुम्हारी आँखें फोड़ देंगे।”
बहुत देर तक चर्चा होती रही। एकोजी राजा ने सुझाव दिया—
“शम्भू बेटे अब आ ही गये हो तो कुछ दिन तंजौर में चलकर रहो। अपनी
सेना के साथ रहो। किन्तु रायगढ़ को छोड़कर तुम्हारा अधिक दिन तक दक्षिण में
रहना ठीक नहीं होगा। शीघ्रता से सह्याद्रि चले जाओगे तो कम से कम सुरक्षित तो
रहोगे।”
“चाचा साहब, यह सम्भव नहीं है।” शम्भुराजा घायल शेर की तरह गुर्राए।
“एक तो पराजित होकर अपने राज्य में जाना हमारी जाति और कीर्ति के
लिए शोभनीय नहीं है। इसके अतिरिक्त वह कालसर्प हमें वहाँ जाने दे तब न वहाँ
पीछे जायें?”
“कौन?”
“औरंगजेब !” शम्भुराजा बहुत दुखी स्वर में बोले, “डगमगाते हुए चलने
वाले शराबी और पराजित राजा की स्थिति एक जैसी होती है। इनकी कनपटी पर
जो एक चपत नहीं लगाता वह आलसी कहलाता है।”
“शम्भुराजा... ?”
“जी चाचा जी। सेना में उत्साह और संकल्प की आग फूँकने के लिए हमने
कर्नाटक और तमिल पर आक्रमण किया था, पराजित होने के लिए नहीं।”
“शम्भुराजा, यह तो बताइये कि आपकी आगे की योजना क्या है?”
“पराभव के जालिम जख्म को धोने के लिए नयी विजय जैसा रामबाण
उपाय दूसरा कौन हो सकता है? चाचाजी?” शम्भुराजा ने प्रश्न किया।
सात
एक रात को असदखान डरते हुए औरंगजेब से मिलने आया। उसके चेहरे पर अंकित
उलझन बादशाह से छिपी न रही। किसी प्रकार शब्दों को जोड़ते हुए असदखान ने
सम्भाजी :: 405
कहा, "हजरत ! रामसेज का वह बूढ़ा मराठा किलेदार सूर्याजी जेधे तो बहुत हट्टा-
कट्टा है।"
"हूँऽऽ।" वजीरे आजम यह बताओ कि उस किले पर मरगट्टों की कितनी
सेना है?"
"अँ... है न, काफी है। मतलब-मतलब छह सौ से एक हजार तक।"
"और किले के नीचे अपनी केवल पाँच-छः हजार की सेना। ठीक है न?"
बादशाह ने आँखों से घूरा।
"गुस्ताखी माफ हजरत ! पाँच छः हजार नहीं कुछ ज्यादा ही।"
जीभ दबाकर असदखान ने कहा, "ज्यादा-ज्यादा मतलब होंगे पैंतीस-
चालीस हजार। एक मामूली किला और इतनी बड़ी फौज?"
"जहाँपनाह ! किला मामूली नहीं, बहुत पुराना है। चढ़ने में बड़ी कठिनाई
है। वहाँ की मराठी सेना और उनका मुखिया बुड्ढा सूर्याजी जेधे बहुत हठी है।
हमारी सेना ने उन पर तोप दागना शुरू कर दिया है। हमारे सैनिक रात में रस्सियों
की सीढ़ियाँ लगाते हैं, रात में ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं, परन्तु ऊपर से मरगट्टे
पत्थरों की ऐसी मार करते हैं.."
"पत्थरों की ?"
"अँ-कुछ अजीब जादू-टोना है उस किले पर। कहते हैं कि किले पर तोपें
नहीं हैं फिर भी हमारी सेना पर गोले गिरते हैं।"
"वजीरे आजम, आज आपकी दिमागी हालत ठीक नहीं लगती। तोपें नहीं
हैं फिर भी गोला बारूद उड़ता है। मतलब क्या है?"
"जहाँपनाह, उस किले पर सागौन की बहुत लकड़ी है, बैल-भैसों के
चमड़े हैं। उन होशियार मराठों ने चमड़े की तोपें बनाई हैं। उनसे बाहर आने वाले
गोले भी बहुत शक्तिशाली होते हैं।
"अब तक हमारे कितने आदमी मारे जा चुके हैं?"
"ज्यादा नहीं, तीन-साढ़े तीन हजार... परन्तु जहाँपनाह फिरोजजंग का यह
ताजा खत देखें। वह कह रहा है-'चाहें कुछ भी हो चार दिनों में रामसेज पर चाँद
सितारों वाला हरा झंडा फहराकर दिखाऊँगा'।"
बादशाह कुछ अधिक बोला नहीं। मराठों के क्षेत्र में काम कर रहे कुछ
जासूसों से उसे समाचार मिले थे। रात में ही उसने उन्हें पढ़ लिया था। सम्भाजी
और अकबरशाह की दोस्ती बहुत बढ़ती जा रही है। वह अकबर और दुर्गादास
राठौड़ को साथ लेकर युद्ध के लिए निकलता है। यह खबर पढ़कर बादशाह बहुत
हैरान था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि केवल चौबीस वर्ष के शिवाजी पुत्र से
इस प्रकार की छेड़-छाड़ की जाएगी। गुप्तचरों से आने वाली खबरों को सुनकर
406 . सम्भाजी
बादशाह आश्चर्यचकित होता था। कभी बुरहानपुर पर मराठों की बीस हजार
घुड़सवार सेना आक्रमण कर रही है तो उसी समय सोलापुर के समीप मराठों की
सेना हड़कम्प मचा रही है। कभी सम्भाजी खुद जंजीरे के सीने पर पैर रखकर खड़ा
हो रहा है। सम्भाजी के बिना भी उसके सहयोगी हंबीरराव, रूपाजी भोसले,
मानाजी मोरे जैसे लोग अपनी-अपनी सेनाएँ लेकर एक ही समय में मुगलों के
अनेक क्षेत्रों में उपद्रव मचा रहे हैं। इस प्रकार के चौमुखी संघर्ष की कल्पना
बादशाह ने कभी नहीं की थी।
मराठों के उपद्रव से मुगल क्षेत्र की प्रजा हैरान हो गयी थी। दो दिनो में
बादशाह ने विचार-विमर्श के लिए बैठक बुलायी। रात में देर से असद खान के साथ
सभी अधिकारी बादशाह के पास जमा हुए। बादशाह ने कल्याण की ओर भेजी गयी
सेना की गतिविधियों की जानकारी ली। उसी बैठक में उसने शहजादा आजम और
दिलेर खान को आदेश दिया—‘‘जाओ अहमदनगर के बाहर निकलो, घोड नदी को
पार करो। मरगट्ठों के क्षेत्र में घुस जाओ। उनके गाँव, खेत सब कुछ बर्बाद करो।
सम्भा के क्षेत्र में कुहराम मचा दो।’’
शहजादे आजम और दिलेरखान ने सहमति से गर्दनें हिलाईं। बादशाह की
नजर हट्टे कट्टे जुल्फिकार पर पड़ी। उसने ऊँची आवाज में पूछा—‘‘क्या खबर है
रामशेज की?’’
‘‘जहाँपनाह शहाबुद्दीन साहब कोशिश कर रहे हैं। मरगट्ठे किले पर चढ़ने
नहीं दे रहे हैं। शहाबुद्दीन साहब जिद पर अड़े हैं। वे वहाँ के बडे-बड़े पेड़ काटकर
लकड़ी की एक मीनार बनाने की शुरुआत की हैं। उस ऊँची मीनार पर तोप चढ़ाकर
रामशेज को ध्वस्त करेंगे, ऐसा उनका इरादा है।’’
यह समाचार सुनकर बादशाह प्रसन्न हुआ। उसने असदखान को हुक्म
दिया—‘‘वजीरे आजम रामशेज और खानदेश के युद्ध पर विशेष ध्यान दो।’’
‘‘हजरत गुस्ताखी माफ।’’ बीच में असद खान घुटनों के बल बैठते हुए
बोला, ‘‘नासिक और खानदेश में जाकर इतनी बड़ी सेना ले जाकर जाया करने की
जरूरत ही क्या है? उससे बेहतर तो यह होगा कि हम सम्भा के रायगढ़ पर सह्याद्रि
पर्वत पर सीधा हमला करें।’’
अपने वजीर की सलाह सुनकर बादशाह ने आँखें फैलाकर देखा। एक लम्बी
साँस लेकर बादशाह ने कहा, ‘‘वजीरे-आजम, आपके इरादे काबिले तारीफ हैं।
लेकिन आते-आते ही रायगढ़ और सह्याद्रि पर आक्रमण करके अपने बादशाह को
अपने लिए मौत का कुआँ खोदने की सलाह क्यों दे रहे हो? उससे उस शैतान
सम्भा का ही फायदा होगा। वह सह्याद्रि सचमुच भूतों का डेरा है।
घने पहाड़ों में अफजलखान नाम के इस्लाम के बन्दे को शिवाजी ने बकरे की
सम्भाजी .. 407
तरह काटा था। उसी पर्वत का सहारा लेकर हमारी लाखों की सेना में घुसकर मामू
साहब साइस्ता खान की उसने उँगलियाँ तोड़ दी थीं। हमें अपमानित करके वह
शिवाजी रात में ही भाग गया था। उसी बैताल नगरी में उस शिवा का बच्चा शैतानी
खेल खेल सकता है। वर्षा के मौसम में सह्याद्रि पर आक्रमण असम्भव है। हमारी
जानकारी के अनुसार वहाँ पर एक बार बरसात शुरू हो जाये तो छोटे-छोटे नाले भी
बड़ी-बड़ी नदियाँ बन जाते हैं। वहाँ के नालों को भी दो-दो महीने तक पार करना
असम्भव हो जाता है।"
"पर जहाँपनाह, सम्भा वहाँ तमिलनाडु में चला गया है—बादशाह को
इसकी खबर थी। वह हँसकर बोला—"देखेंगे बन्दर कितना नाचता है? उस
चिक्कदेव की कैद से जिन्दा बचकर वापस आएगा तब आगे की सोचेंगे।"
"पर जहाँपनाह, शुरुआत में नासिक और बागलण की ओर इतनी बड़ी फौज
भेजने का कारण क्या है?" जुल्फिकारखान ने पूछा।
आलमगीर दिल खोलकर हँसा। उसने गर्व से वजीर की ओर देखा।
जुल्फिकार खान के प्रश्न से बादशाह प्रसन्न था। नक्शे पर उँगली फेरते हुए दोनों
की ओर संकेत करके बोला, "यह देखो, यह बुरहानपुर से आने वाली राह खानदेश
से नासिक, कल्याण और आगे रायगढ़ की ओर जाती है। अगर कल हमारी
बदनसीबी से मराठों की बड़ी सेना शहजादा अकबर के साथ हो जाये और हमारे
विद्रोही बेटे में इतनी हिम्मत आ जाये और अकबर तथा सम्भा इसी रास्ते से दिल्ली
पर हमला बोल दें तो अनर्थ हो जाएगा। आगरा और दिल्ली में छिपे हमारे दुश्मन
भी इसी प्रेत मंडली में जा मिलेंगे। इसलिए हम यहाँ धोखा नहीं खाना चाहते।
नासिक से थाने तक के इलाके में इस रास्ते के सारे किलों और सारी चारी चौकियों
पर हमारा क़ब्ज़ा होना चाहिए।
आठ
"रायप्पा, अच्छी तरह सँभालना बाबा। घाव को बढ़ने नहीं देना। अभी और युद्ध
लड़ना है।" शम्भुराजा ने कहा।
विशाल कावेरी नदी के किनारे एक घने जंगल में मराठों की सेना थी।
शम्भुराजा की बाँह पर रायप्पा पट्टी बाँध रहा था। दस दिन पहले लगा घाव अब
408 : सम्भाजी
किया। आजकल उस पाषाणी किले पर मदुरेकर चोक्कनाथ नायक अपनी मदुरई
छोड़कर स्थायी रूप से रह रहा था। वह इस समय का अतिशय दुर्बल और
शक्तिहीन राजा था। वैसे मदुरा सम्पन्न नगरी थी, किन्तु उसका कुछ हिस्सा मैसूर के
चिक्कदेव राजा ने, कुछ हिस्सा एकोजी राजा ने, कुछ हिस्सा हरजी राजा ने अपने
कब्जे में कर लिया था। आजकल चोक्कनाथ नायक चिक्कदेव राजा की कृपा पर
दिन काट रहा है। त्रिचनापल्ली नगरी में और ऊपर किले पर मदुरेकर की सेना
नाममात्र की थी। वहाँ की सारी फौज चिक्कदेव की थी। पहाड़ी किले पर
चिक्कदेव राजा के अनेक कुशल गोलन्दाज थे। उनकी निश्चित संख्या का पता
किसी को नहीं था। किन्तु नगर में ऐसी चर्चा होती थी कि वह सेना बहुत
शक्तिशाली है। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक शम्भूराजा की क्रुद्ध और उद्विग्न मुद्रा को
बार-बार देख रहा था। उसने बड़े उत्साह से कहा, "शम्भू महाराज, वाणावर की
लड़ाई में हमारी फौज ने भी पराजय स्वीकार की है। इसका यह मतलब नहीं है कि
हम डर गये हैं या हार गये हैं। वहाँ हमारे डेढ़ हजार सैनिक शहीद हुए। किन्तु आप
चिन्ता न करें। चार-आठ दिनों में हमारी पाँच हजार की सेना आपके चरणों की सेवा
में पहुँच जाएगी।"
"हुक्केरीकर लड़ाई के लिए आप बहुत उत्सुक दिखाई पड़ रहे हैं।"
"क्या करें चाचा साहब?" बसप्पा ने हँसते हुए कहा।
"जब तक आपके राजा हैं तभी तक उस उन्मत्त चिक्कदेव को हम ललकार
सकते हैं। उनके चले जाने पर चिक्कदेव हमें निगले बिना नहीं रहेगा।" शम्भूराजा
ने एकोजी राजा के तंजौर और हरजी राजा की जिंजी से अधिक से अधिक गोला-
बारूद मँगवाया। विचार-विमर्श आरम्भ होने के पहले ही शम्भूराजा ने कवि कलश
से कहा, "आज ही गोलकुंडा को दूत भेजिए। कुतुबशाह की नयी पाँच हजार सेना
दस-पन्द्रह दिन में यहाँ पहुँच जानी चाहिए।" बातचीत समाप्त करते हुए शम्भूराजा
ने कहा, "अपने घाव अच्छे होने के पहले शत्रु को घायल करना है।"
नौ
शम्भूराजा के उठने से पहले वहाँ पहुँचना और उनकी सेवा में खड़ा रहना, रायप्पा
का जीवनभर का नियम था। परन्तु उस दिन रायप्पा को ही शम्भूराजा के दूसरे सेवक
जगाने के लिए आये। उठने में विलम्ब हो गया, ऐसा सोचकर रायप्पा तुरन्त उठकर
410 :: सम्भाजी
खड़ा हो गया। आँखें मलते हुए बाहर देखा तो सुबह होने को आयी थी। वह वैसे
ही शीघ्रता से राजा के पास पहुँचा। शम्भूराजा की आँखें लाल दिख रही थीं।
सम्भवतः वे रातभर सोये नहीं थे। उन्होंने रायप्पा को तत्काल आदेश दिया—
“रायप्पा अपने सिपाहियों को लेकर आसपास के गाँवों में जाओ। हमें अधिक से
अधिक चमारों की आवश्यकता है।”
“जी सरकार।”
सेना के लोग हड़बड़ा गये। कविराज की समझ में भी कुछ नहीं आया।
दक्षिण के आक्रमण के लिए निकलते समय येसूबाई ने स्वयं इस बात की निगरानी
की थी कि अपनी सेना के बहादुर जवानों के पास जूते-चप्पल हैं या नहीं?
रायगढ़वाड़ी में इसके लिए चर्मोद्योग का एक कारखाना ही था। राजा की आज्ञा के
अनुसार आस-पास के गाँवों से अनेक चमार एकत्र हो गये। फिर शम्भूराजा ने भैंस,
बैल, हाथी जिसका भी मिले चमड़ा जमा करने का आदेश दिया। चमड़े को अच्छी
तरह कमाकर अच्छे जूते बनाने की आज्ञा सभी चर्मकारों को दी गयी।
जोत्याजी और कविराज को अलग उत्तरदायित्व सौंपा गया। कावेरी नदी के
दोनों किनारों पर जितने भी मछुआरे थे उन्हें सभी छोटी-बड़ी नौकाओं को एक साथ
ले आने का आदेश दिया गया। कुछ दिनों के लिए ये सारी नावें किराये पर ले ली
गयीं। लगभग एक हजार नौकाएँ उस विशाल नदी में एक कतार में खड़ी हो गयीं।
वर्षा का मौसम जैसे समीप आया, शम्भूराजा शीघ्रता करने लगे। उनके भीतर
एक जुझारू युद्धवीर अधीर हो रहा था। उस सेनानायक के कन्धे उचकने लगे।
हरजी महाड़िक भी राजा का संकल्प पूरा करने के लिए अपना खून-पसीना एक कर
रहे थे। एक बार कावेरी में यदि बाढ़ आ गयी तो राजा की सारी योजना भी डूब
जाएगी। कम से कम दो महीने तक यह नदी पार नहीं उतरने देगी। कोई साहसी
व्यक्ति इसे पार कर भी ले, किन्तु भारी सामान और घोड़ों का उस पार ले जाना
असम्भव था। इसी बीच कविराज ने तीन सौ बहादुर सवारों का दल छाँटकर उन्हें
तीरंदाजी का अभ्यास कराना आरम्भ किया। वे बाँस और बेंत के बाणों से अभ्यास
करते थे। प्रतिदिन सुबह-शाम अभ्यास होता था। किन्तु चिक्कदेव जैसे बाण मराठा
फौज के पास नहीं थे। सभी को विश्वास था कि ठीक समय पर शम्भूराजा कहीं न
कहीं से सामान उपलब्ध कराएँगे। तंजौर, जिंजी, गोलकुंडा और इक्केरी से नयी
सेनाएँ आ गयी थीं। रायगढ़ से आये लोगों और घोड़ों में गुरूर चढ़ रहा था। घोड़े
और मनुष्य दोनों ललकारने लगे। सेना में खबर फैली कि आने वाले एक-दो दिन
में शम्भूराजा मछली के बड़े शिकार के लिए निकलने वाले हैं। आखिर वह सुबह
आयी।
कावेरी की धारा में सवेरे-सवेरे हजारों नावें कतार में खड़ी थीं। उनकी काली
सम्भाजी :: 411
छाया पानी की सतह पर फैली थी। कुछ मराठे नावों में कूद पड़े। उनमें से अनेक ने
घोड़ों की लगाम हाथ में पकड़ रखी थी। ये नाव के सहारे तैरकर दूसरे किनारों पर
जाने वाले थे। यहाँ के जंगलों में हाथी बहुत थे। हरजी राजा ने पाँच सौ हाथियों का
दल तैयार किया था। उनकी पीठ पर भारी सामान लादा गया। शाम से सुबह तक
नदी तट पर बड़ी व्यस्तता और हलचल रही। मशाल की रोशनी में शम्भूराजा की
मुद्रा दृढ़ संकल्पी लग रही थी। उन्होंने कावेरी के दूसरे किनारे पर सोई हुई
त्रिचनापल्ली नगरी और वहाँ की ऊँची पहाड़ी की ओर देखा। पहाड़ी की वह चोटी
उन्हें रायगढ़ की चोटी जैसी लग रही थी। उन्होंने हँसते हुए हरजी राजा की ओर
देखा। संकेत मिलते ही नावें पानी को काटते हुए सर-सर आगे बढ़ने लगीं। पतवारें
हिलने लगीं, पानी से छपाक, छपाक की आवाज उठने लगी। उथले पानी का
अन्दाजा लगाकर महावतों ने हाथियों को पानी में उतारा। वे जल्दी जल्दी आगे
बढ़ने लगे।
शम्भूराजा की चतुरंगिणी सेना सुबह होते-होते त्रिचनापल्ली से जा टकराई।
अचानक हुए इस आक्रमण से अन्दर की सेना डर गयी। 'ऐदिरीऽ, ऐदिरीऽ'
'दुश्मनऽ दुश्मन' 'मराठाऽ मराठाऽ' ऐसी आवाज अन्दर से आने लगी। पर वे लोग
जल्दी से उठ गये और तटबन्दी के बुर्ज पर खड़े हो गये। उनके जानलेवा तेज बाण
सूंऽ सूंऽ करके छूटने लगे। अब तक पूरी तरह सवेरा हो चुका था। चिक्कदेव की
सेना बाणों की वर्षा कर रही थी। किन्तु मराठे और उनकी साथी पीछे नहीं हट रहे
थे। बुर्ज के कन्नड़ और तमिल सैनिक अवाक् होकर आगे देखने लगे। नावों की
ओर चर्मधारी सेना थी। राजा ने सिपाहियों के लिए मोटे चमड़े के लिबास और सिर
के लिए चमड़े के टोप बनवा दिये थे। आने वाले बाण नाकाम हो रहे थे। तेल लगे
उन चमड़ों पर से नीचे फिसल रहे थे। चिक्कदेव के आदेश के अनुसार शस्त्रों के
उपयोग का कोई लाभ नहीं हो रहा था। नाव पर शम्भूराजा, हरजी महाड़िक और
इक्केरीकर मुस्करा रहे थे।
चढ़ती धूप के साथ रणचंडी ने उग्र रूप धारण किया। त्रिचनापल्ली की सेना
को पीछे खदेड़ने लगी। हाथी और हाथी जितना शक्ति रखने वाले मराठे भीतर
घुसने लगे। प्रवेश द्वार के दरवाजे पर हाथियों ने टक्कर मारी। इन टक्करों से दरवाजे
टूट गये। मराठा मित्रों की सेना अन्दर प्रवेश कर गयी। हर ओर संघर्ष होने लगा।
शाम तक त्रिचनापल्ली शहर जीत लिया गया। विजेता शम्भूराजा को हँसी आयी।
उसी शाम शम्भूराजा, हरजी महाड़िक, एकोजी, कलश सभी की पालकियाँ
श्रीरंगमाला पहुँच गयीं। उनमें से एक पालकी में शम्भूराजा की बड़ी बहन अंबिका
बाई थीं। वह अपने पराक्रमी छोटे भाई की ओर बड़े अभिमान से देख रही थीं।
कावेरी और कोलडिम नदी के संगम पर शेष शैया पर लेटे भगवान विष्णु का सभी
412 :: सम्भाजी
ने दर्शन किया। भगवान का अभिषेक किया गया। परन्तु मन्दिर से बाहर आते समय
शम्भूराजा की दृष्टि बार-बार सामने के पहाड़ की चोटी से टकरा रही थी। वहाँ के
बुर्जों पर खड़े पहरेदार दिखाई पड़ रहे थे। राजा की उदास मुद्रा को देखकर हरजी
राजा ने कहा, "शम्भूराजा, इस समय किले पर आक्रमण करना धोखादायक है।
वहाँ पर मदुरेकर नायक चोक्कनाथ रहता है।"
और कुछ दिनों तक किले के आसपास छोटी मोटी लड़ाइयाँ होती रहीं।
किन्तु दोनों सेनाएँ एक दूसरे की शक्ति का सही अन्दाजा लगा रही थीं। किले की
तलहटी में सात आठ एकड़ का एक तेपाकुलम नाम का तालाब था। वहाँ कावेरी के
पानी में मराठा सैनिक आराम से स्नान करते थे। बीच-बीच में वे किले की ओर
ललचायी दृष्टि से देख लिया करते थे। थोड़े दिनों में ऊपर किले में रहने वाले राजा
चोक्कनाथ नायक की मृत्यु हो गयी।
नायक दीवान शम्भूराजा से मिलने आया। वह अपने राजा चोक्कनाथ के शव
को राजधानी मदुरई ले जाने की आज्ञा माँगने लगा। शम्भूराजा ने बड़े उदार मन से
उसे अनुमति दे दी। बसप्पा संकेत से शम्भूराजा को बुलाकर एक ओर ले गया।
उसने धीरे से कहा, "शम्भूराजा, समय अच्छा है। राजा का शव बाहर ले जाने के
लिए सिंहद्वार खुलेगा। इस अवसर को हम हाथ से जाने नहीं देंगे, अपनी सेना
अन्दर ले जाएँगे।" शम्भूराजा ने रुष्ट होकर हुक्केरीकर की ओर देखा। उन्होंने
कहा, "बसप्पा, हम राजा हैं, कोई चोर डकैत नहीं।"
शम्भूराजा बहुत सावधान थे। एकोजी राजा कुछ चिंतित थे। उन्हें मैसूर के
राजा का भय सता रहा था। हरजी महाड़िक और कवि कलश के घोड़े रातभर नगर
की सीमा पर घूमते रहे। त्रिचनापल्ली जैसी समृद्ध नगरी मराठों के अधिकार में आना
चिक्कदेव से सहन नहीं होगा। वह किसी भी क्षण आक्रमण करेगा। ऐसी चर्चा चल
रही थी।
चार-आठ दिन तक कुछ भी नहीं हुआ। उसके बाद आसमान में काले मेघों
ने भविष्य का भय दिखाना आरम्भ कर दिया।
एक दिन शम्भू महाराज ने अपने घोड़े को बाहर निकाला और ललकारा—
'हरऽ हरऽ महादेव' 'जय शिवाजीऽऽ' 'जय सम्भाजीऽ' जैसे नारों से आसमान
गूँजने लगा। दस हजार की सेना ने उस पाषाणी किले को घेर लिया। किला बहुत
बड़ा और खड़ी ऊँचाई उसकी ऊँचाई। सौ गज थी। किनारों पर बहुत मजबूत
तटबन्दी थी और उसके बाद पानी से भरी गहरी खन्दक। मराठी और कन्नड़ सैनिक
आगे बढ़े। अन्दर की सेना बुर्ज पर आ गयी। वहाँ से उन्होंने बाणों की वर्षा आरम्भ
की। मराठा, हैदराबादी और हुक्केरीकर सैनिकों ने चमड़े के लिबास का सहारा
लिया। इसलिए बाणों का उनके ऊपर कोई असर नहीं हुआ।
सम्भाजी :: 413
दो-तीन दिन तक घनघोर युद्ध होता रहा। मराठे सीढ़ियाँ लगाकर तटबन्दी
पर साहसपूर्व चढ़ने का प्रयास करने लगे। हाथी सिंहद्वार को तोड़ने की कोशिश
करने लगे। दोनों दलों में बाणों से, भालों से और गोला-बारूद से युद्ध हो रहा था।
घोड़े खून में लथपथ होकर जमीन पर गिर रहे थे। तोपों के गोलों से आहत हाथी
तांडव करने लगे थे। उनकी चिंग्घाड़ कान के पर्दे फाड़ रही थी। युद्ध भयानक हो
उठा था।
तीसरी शाम शम्भुराजा ने कवि कलश को आदेश दिया। उनके आदेश के
अनुसार कविराज की तीन सौ तीरन्दाजों की सेना सामने खड़ी हो गयी। शम्भुराजा
ने हँसते हुए कहा-
"हमारे मैसूरकर मित्र को बाण बहुत पसन्द हैं। उसे वही देंगे।"
परन्तु कविराज के सैनिकों के पास बाँस की फट्टियों के बाण थे। इन बाणों से
किसी का क्या बिगड़ने वाला था। अनेक लोग कवि कलश और शम्भुराजा की ओर
देखकर हँसने लगे। इसी समय मशालची दौड़ते हुए आये। उन्होंने उन बाणों में
कपड़े बाँधे। उन्हें तेल में भिगोकर आग लगाना शुरू किया। अब ये अग्निबाण सूँऽ
सूँऽ करके ऊपर चढ़ने लगे। इन बाणों के बारूदखाने में गिरते ही भयंकर आग लग
गयी। 'धुड़मऽऽ धामऽऽ, धुद्दूमऽऽ धामऽऽ' की आवाज के साथ विस्फोट होने
लगे। किले के ऊपर ही शीशमहल धड़ाधड़ जलने लगा। एक बारूदखाना तटबन्दी
के समीप ही था। उसमें इतने जोर का धमाका हुआ कि तटबन्दी ढहकर पानी भरी
खंदक में जा गिरी। धुआँ, धूल और आग के कारण होहल्ला मच गया। किले के
अनेक सैनिक उस आग में जलकर खाक हो गये। दीवार गिर जाने से किले के
अन्दर की भाग-दौड़ साफ दिखाई दे रही थी। किले के सरदारों के बच्चे छाती
पीट-पीटकर चिल्लाने लगे। 'कापातिंगऽऽ' 'कापातिंगऽऽ' 'बचाइए' 'बचाइए'
'निरतिंगऽऽ' 'निरतिंगऽऽ' 'रुकिएऽऽ रुकिएऽऽ' इस प्रकार करुण चीत्कार करने
लगे।
शम्भुराजा के संकेत पर अग्निबाण रुक गये। किला पूरी तरह पराजित हो
गया। शम्भुराजा प्रसन्न हुए। हरजी और एकोजी ने राजा की पीठ थपथपायी। श्री
रंगपट्टनम के उस पहाड़ी किले पर मराठों का भगवा झंडा पहली बार फहराया
गया।
इस विजय के बाद शम्भुराजा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैसूर, कर्नाटक और
तमिल के कुल बाईस किले मराठों के कब्जे में आ गये। एक ओर धर्मपुरी, होसूर
का क्षेत्र तो दूसरी ओर नीचे मदुरा से जिंजी बेलूर तक का क्षेत्र मराठों के अधिकार
में आ गया था। यह सारा क्षेत्र मराठों के घोड़ों की टापों से प्रतिध्वनित होने लगा।
कावेरी में बाढ़ आयी और चली गयी किन्तु वह शिवपुत्र सम्भाजी के पराक्रम के
414 :: सम्भाजी
आड़े न आ सकी। अनेक जगहों से वसूली एकत्र की जा रही थी। एकत्र किये गये
द्रव्य की गठरियाँ घोड़ों और बैलों की पीठ पर लादकर रायगढ़ को भेजी जा रही
थीं।
चिक्कदेवराजा को दुबारा सम्भाजी का सामना करने का साहस नहीं हुआ।
तिलुगा, कोडग और मलायला जैसे दाक्खिनी राजाओं ने चिक्कदेव का साथ छोड़
दिया था। वे मराठों के मित्र बन गये थे। शम्भूराजा को वे कर दे रहे थे। मराठों के
गुप्तचर चारों ओर घूमते थे। चिक्कदेव ने औरंगजेब को पत्र लिखकर कहा था—
'दक्षिण में आकर सभी को कष्ट देने वाले सम्भा को काबू में करो। हमारी सहायता
के लिए शीघ्र आओ।' पर जाने क्यों बादशाह की ओर से उन पत्रों की कोई
प्रतिक्रिया नहीं मिली।
शम्भूराजा ने दशहरे का सोना त्रिचनापल्ली में ही लूटा। उनकी सेना आस-
पास से शीघ्रतापूर्वक कर वसूल कर रही थी। दशहरा बीत गया फिर भी शम्भूराजा
वापस महाराष्ट्र लौटने का नाम नहीं ले रहे थे। उनकी उपस्थिति से दक्षिण के
अमीर उमराव निश्चिन्त हो गये थे। चिक्कदेव को कर देना बन्द कर दिया था। कर
न मिलने से चिक्कदेव बौखला गया था। उसकी स्थिति का पता शम्भूराजा को लगा
तो उन्होंने अपने गुप्तचरों से चिक्कदेव के पास सन्देश भिजवाया—'हम कर्नाटक
और तमिल राज्य पर शासन करें, ऐसी हमारी पिताजी की इच्छा थी। हमारे चाचा
एकोजी राजा जैसे चाचा और हरजी राजा जैसे जीजा यहीं पर हैं। हम उस सह्याद्रि
के जंगल में वापस क्यों जायें? हम यहीं पर आनन्द से रहेंगे।'
इस सन्देश से चिक्कदेवराजा डर गया। उसने बिना शर्त समझौते की बातें
शुरू कीं। दीवाली के बाद त्रिचनापल्ली के पहाड़ी किले में सौ खंभों वाले सभागार
में समझौता वार्ता निश्चित की गयी। उसके लिए दो करोड़ की पूँजी लेकर
चिक्कदेवराजा स्वयं आने वाला था। समझौता वार्ता का दिन आ गया। चिक्कदेवराजा
के बदले उसका ग्यारह साल का छोटा बेटा चिक्कदेव के हस्ताक्षर वाले कागजात
लेकर आया। वह दो करोड़ के स्थान एक करोड़ की पूँजी लेकर आया था। शेष
द्रव्य बाद में देने का वादा किया गया था। अपना राज्य छोड़कर इतने दिनों तक दूर
रहना शम्भूराजा को भी ठीक नहीं लग रहा था। अन्ततः समझौता हो गया।
अपनी दक्षिण की विजय में यशस्वी होकर शम्भूराजा महाराष्ट्र की ओर जाने
के लिए निकले। सेना में इस बात की चर्चा हो रही थी कि चिक्कदेव समझौता वार्ता
के लिए क्यों नहीं आया। लोगों ने अनुमान लगाया कि उसे किसी ने बताया होगा
कि सम्भाजी उसी शिवाजी के पुत्र हैं जिसने अफजल खान को मिलने के लिए
बुलाया था। अफजल खान धोखा खा गया था इसीलिए चिक्कदेव ने ऐन वक्त पर
अपना इरादा बदल लिया।
सम्भाजी :: 415
त्रिचनापल्ली की सीमा पर आने पर शम्भूराजा ने हरजी राजा को बाँहों में भर
लिया। उम्र में छोटे शम्भूराजा को हरजी और अम्बिका दीदी ने असंख्य आशीर्वाद
दिये। हरजी ने कहा, "शम्भूराजा, रायगढ़ और हिन्दवी स्वराज्य आपके हाथ में
सदा सुरक्षित रहे।"
शम्भूराजा ने भावुक होकर कहा, "दुर्भिक्ष के कारण आजकल अपना राज्य
जर्जर हो गया है। जीजाजी आप दक्षिण रसद आपूर्ति सँभालें। फिर दस औरंगजेब
भी हमारे ऊपर आक्रमण करें तो भी उसकी परवाह कौन करता है?"
दस
शम्भूराजा कर्नाटक की लड़ाई के बाद वापस आ गये थे। झंडे लगाकर उनका
जोरदार स्वागत किया गया। आते आते ही शम्भूराजा ने येसूबाई को धन्यवाद दिया
और बोले, "रानी साहब, हरजी राजा को दक्षिण का सूबेदार बनाने की आपकी
सलाह बहुत उचित सिद्ध हुई। वरना मुझे तो यही लग रहा था कि हम पुराने
कर्मचारी हणमन्त के साथ अन्याय कर रहे हैं।
इस संवाद से येसूबाई प्रसन्नता से खिल उठीं। शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में
यह भी कहा कि निंबालकर और शिर्के जैसे लोगों से महाड़िक कहीं अच्छे हैं। दो
ही दिनों के बाद दुर्गादास राजा से मिलने आये और धीमी आवाज में कहने लगे—
"शम्भूराजा शहजादा अकबर की प्रार्थना कुछ अलग है।"
"क्या है?"
"उनका कहना है कि आप शहजादे के साथ दिल्ली चलें।"
"रायगढ़ को छोड़कर ? औरंगजेब जैसा अजगर मुँह खोलकर बैठा है। ऐसी
स्थिति में हम कैसे जा सकते हैं?"
"वे कहते हैं कि आप कर्नाटक-जिंजी तक इतना बड़ा युद्ध लड़कर कैसे आ
गये?"
"वह वर्षा का मौसम था दुर्गादास ! मेरे पिता द्वारा जीते गये क्षेत्र में गड़बड़ी
चल रही थी। उसे समय रहते ठीक करना आवश्यक था।"
"महाराज, शहजादे के साथ कम से कम सेना तो दीजिए।"
"दुर्गादास, आपकी समझ में यह क्यों नहीं आता? हमारे हिन्दवी स्वराज्य
की, उसकी प्रतिष्ठा की ध्वजा भले ही आकाश में उड़ रही हो। किन्तु हमारा
416 :: सम्भाजी