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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 793 में से

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पृष्ठ 400

महादेव महाराज राजा से मिलने आये। बैजनाथ की सीढ़ियों पर दोनों के बीच
बहुत-सी बातें हुईं। उसी समय महादेव महाराज ने कहा, "राजन, आषाढ़ में हजारों
वारकरी पैदल चलकर पंढरपुर जाते हैं। इस साल से सन्त तुकाराम की पालकी ले
जाने की सोच रहा हूँ।"
"पालकी? कहाँ से कहाँ तक?"
"देहू से पंढरपुर तक।"
"वाहऽऽ!" शम्भूराजा प्रसन्न हो गये। तुकाराम के पुत्र से उन्होंने कहा,
"कल्पना अच्छी है। नयी शुरुआत होगी। हर साल पालकी ले जाओ।
उसके लिए जो द्रव्य लगेगा उसे सरकार से लो। मैं अधिकारियों को आदेश जारी
करता हूँ कि वे पालकी को यथोचित सुरक्षा प्रदान करें।"
तुकाराम के पुत्र सन्तुष्ट होकर चले गये। राजा ने हुक्मनामा भी भेज दिया।
किन्तु फिर से उनके हृदय में दुख का ज्वार उमड़ आया। मैसूर में अपने मित्रों की
हत्या से बहुत बेचैन हो गये थे।
दिन तो आराम से बीत जाता था किन्तु रातें खाने को दौड़ती थीं। राजा को
किसी भी प्रकार से नींद नही आती थी। मैसूर के लिए भेजे गये कृष्णाजी कान्हेरे के
वापस आने की वे व्यग्र प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीरंगपट्टनम् की सीमा पर दादाजी
काकड़े, जैताजी काटकर और तुकोजी निंबालकर की टंगी हुई गर्दनें उनकी आँखों
के सामने आ जाती थीं। वे उदास हो उठते थे। वे यही सोचते कि—"कब मैसूर पर
आक्रमण के बाद वहाँ के घमंडी राजा चिक्कदेवराज को पराजित करके उसे बेड़ियाँ
पहनाऊँ।"
मिट्टी से सोंधी सुगन्ध आ रही थी। सभी को लग रहा था कि मृग नक्षत्र में
कोंकण में तूफानी वर्षा होगी। दो तीन दिन से रोज कड़ी धूप हो रही थी। गर्मी बढ़
जाने के कारण शरीर से पसीना छूट रहा था। पसीने से कपड़े भीग जाते थे। उस दिन
शाम को भारी वर्षा हुई। आसमान में बिजली चमक रही थी। बादल गरज रहे थे।
वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। लगातार तेज वर्षा ने जीना मुश्किल कर
दिया।
महल के बीच वाले चौक में राजाओं का विचार-विमर्श चल रहा था।
शम्भूराजा के समीप ही महारानी येसूबाई बैठी थीं। उनकी गोद में बालक शाहू सो
रहे थे। शम्भूराजा के बहुत गम्भीर हो जाने के कारण कविराज कलश जोत्याजी
केसरकर, रायप्पा आदि सभी दबाव का अनुभव कर रहे थे। आज भी कान्हेरे मैसूर
से वापस नहीं आये थे। इसीलिए शम्भूराजा बहुत चिंतित लग रहे थे। शम्भूराजा ने
थोड़ा मुस्कराते हुए कहा, "हमारा यह साल सुख-दुःख के हिंडोले में झूल रहा है।
एक ओर हमने सिद्दियों को दहशतज़दा बनाया, बादशाह की सेना को वापस लौटा
398 :: सम्भाजी

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