छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
दुर्भिक्ष के संकट को और भी बढ़ाने वाला है।"
"खंडोबा!"
"जी महाराज!"
"इस सम्बन्ध में सेना और प्रजा को सावधान रहने की सूचना जल्दी ही
दे दो।"
शम्भूराजा ने दरिया सारंग और दौलतखान को जानबूझकर जंजीरे की लड़ाई
से वापस बुला लिया था।
शम्भूराजा ने कहा, "हमारे समुद्रीतटों पर लगभग सौ वर्षों से पुर्तगालियों का
क़ब्जा बना हुआ है। उन्हें उखाड़ फेंकना सरल नहीं है। चौल, थाने, बसई , तारापुर
में फिरंगियों के साथ हमारी नोंक-झोंक जारी है। निलोपन्त, फिलहाल आपकी
नियुक्ति किसी न किसी बन्दरगाह या खाड़ी के किनारे होगी। बोलिएऽऽ"
महाराज, हमारी सेना ने माहिम और तारापुर की पुर्तगाली चौकियों पर पहले
ही झटके में कब्जा कर लिया था। उनमें माहिम पुनः फिरंगियों के क़ब्ज़े में चला
गया। किन्तु तारापुर को पुनः हमने अपने अधिकार में खींच लिया। चोल और
देवदंड क्षेत्र में हमारा आग का खेल चल ही रहा है।"
"वाह निलोपन्त आजकल पेशवा होने पर भी आपकी कलम से स्याही
गिरने की जगह आपकी तलवार से फिरंगियों का खून बहता है। 'निलोबा
आयाऽऽ' सुनते ही फिरंगियों की जहाजें पानी के पेट में बैठ जाती हैं। आपका यह
पराक्रम देखने के लिए मोरोपन्त को जीवित रहना चाहिए था।"
शम्भूराजा ने गोवा के पास अंजदीप टापू पर तटबन्दी निर्माण के लिए सेना
भेजी थी। आवश्यक पत्थर और चूना भी भेजा गया था। उसका स्मरण दिलाते हुए
राजा ने पूछा—"कविराज आप डिचौंली से होकर आये हैं। बतायें कि अंजदीप पर
किले का निर्माण कार्य कहाँ पहुँचा है?"
"निर्माण कार्य आरम्भ होते-होते ही पुर्तगालियों के जहाज वहाँ आ गये।
उन्होंने निर्माण का कार्य रोक दिया।"
"लेकिन आज तक तो वह जगह मुक्त ही थी। कविराज, आप लोगों की
समझ में क्यों नहीं आता कि भविष्य में गोवा के फिरंगियों की छाती पर पाँव जमाने
के लिए वह जगह बहुत ही उपयोगी है।
"वस्तुतः यही बात उस काँट दी आल्व्होर ने भी अनुभव की है इसीलिए तो
उन्होंने तत्काल काम को रोक दिया।"
सम्भाजी महाराज विचारमग्न हो गये। फिर वे एक उच्छवास छोड़ते हुए
बोले, "सिद्दियों की तरह ही इन फिरंगियों को भी अपाहिज बनाकर छोड़ना
चाहिए। गोवा के साथ ही इस वाइसराय को भी पानी में डुबो देना चाहिए। नहीं तो
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यह रँगा सियार जल्दी ही उस औरंगजेब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो
जाएगा।"
इस विचार गोष्ठी में अनेक नये निर्णय लिए गये। घोड़ों की नस्ल सुधारने के
लिए सरदारों, थानेदारों, देशमुख और देशपांडे को रुपये दिये गये।
औरंगजेब के आक्रमण को किस प्रकार रोका जाय? इस विषय पर शम्भूराजा
ने बहुत विस्तार से चर्चा की। येसाजी और हंबीरराव से प्राप्त सूचनाओं पर गम्भीरता
से विचार किया। शम्भूराजा सन्तुष्ट दिख रहे थे। उन्होंने कहा-
"फिलहाल अपने राज्य में भाईबन्दी में धोखेबाजी घुला पानी स्वच्छ होता
दिखाई पड़ रहा है। वैसे तो स्त्रियों के बारे में छोटी-मोटी कहानियाँ गढ़कर बाजार
में गप्पें लगाने और अफवाहों को फैलाने में दिमाग की कोई जरूरत नहीं होती।
किन्तु औरंगजेब जैसे बलशाली शत्रु और समुद्र सी उफनती उसकी विशाल सेना
का मुकाबला करने के लिए पहाड़ जैसी बलवान छाती चाहिए। शेर की तरह साहस
चाहिए। माँ भवानी की कृपा और पुण्यवान पिता के आशीर्वाद से हम इस अग्निदाह
से अवश्य ही सही-सलामत बाहर निकलेंगे।"
बोलते बोलते शम्भूराजा यकायक चुप हो गये। सभा में गाते हुए जैसे कोई
सिद्ध गायक अपनी गायनकला में तल्लीन हो जाता है उसी प्रकार युद्ध की योजना
बनाते समय शम्भूराजा की स्थिति हो रही थी। वे बोले-"कोई भी किला यदि
अजेय रह सकता है तो उसमें संचित गोला बारूद के भंडार और साहसी सैनिकों
के बल पर ही। गोले बारूद की आग एक बार बुझ जाये तो भी कोई बात नहीं
किन्तु घोर प्रतिकार करने वाले जवानों के सीने की आग कभी ठंडी नहीं पड़नी
चाहिए। क्यों हंबीरराव?"
"बिलकुली ठीक सम्भाजी राजा।"
अचानक शंभूराजा को अपनी दादी जीजामाता का स्मरण हो आया। वे
प्रसन्नता से हँसे। पूर्णिमा की ज्योत्स्ना उनके चेहरे पर फैल गयी। उसी समय एक
पुरानी बात उनकी स्मृति में उछली। वे भावुक होकर कहने लगे-
"किसी किले को जीतने के लिए आक्रमण कैसे करना चाहिए? और उसे
किस प्रकार कब्जे में लेना चाहिए? इसकी वीरतापूर्ण कहानियाँ मैंने दादी की गोद में
सिर रखकर सुनी हैं। देवगिरी का किला अजेय था। किन्तु हमारे परदादा-लखुजी
जाधवराव साहब ने कैसे आक्रमण किया? इसकी कथा दादीजी ने मुझे सुनाई थी।
वह मैं आप लोगों को बताऊँ?"
"हाँ, हाँ, महाराज अवश्य सुनाइये।" बैठक में चारों ओर से आवाज आयी।
"देवगिरी का किला ऊँचाई पर बना है। किले के ऊपरी हिस्से में जाते समय
अनेक गुप्त रास्ते बने हैं। ये रास्ते अँधेरे से होकर जाते हैं। बीच में आग और पानी
की खंदकें बनाई गयी हैं। यदि किसी ने इस विशालकाय किले पर आक्रमण करने
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के लिए सोचा भी तो पहले उसे किनारे की तटबन्दी पार करनी पड़ेगी फिर खंदक।
यदि किसी तरह खंदक पार करने में कोई सफल हो गया तो फिर उसे ऊपर सरकने
में बड़ी कठिनाई होगी। बीच में ही अनेक अन्धे मोड़ और गुप्त रास्ते हैं। यदि इन
अँधेरे रास्तों का ज्ञान नहीं है तो कोई भी सेना अधिकारी अपनी फौज के साथ इन्हीं
अँधेरे रास्तों से होकर गहरी गुफाओं में जा गिरेगा। या फिर किले के नीचे गिर कर
मोक्ष लाभ करेगा। इस तरह के रास्तों को किले के निर्माण के समय ही योजनाबद्ध
तरीके से बनाये गया है। ये समस्याएँ आक्रमणकारी के ध्यान में भी नहीं आएँगी।"
"यह कैसे ?" हंबीरराव ने बीच में ही प्रश्न किया।
"क्योंकि उनकी रचना पैरों के नीचे की जाती थी।" शंभूराजा हँसते हुए
कहने लगे—"आगे जाने के लिए पैरों के नीचे काली जमीन नहीं पन्द्रह-सोलह
हाथ लम्बी लोहे की चद्दर बिछी है। यह बात किसी के भी ध्यान में नही आ
सकती। जब बाहर की तटबन्दी पर कोई आक्रमण होता है तो इस लम्बी फौलादी
चादर को तपा दिया जाता है। नीचे लकड़ियाँ जलाने के लिए हवा भी आनी चाहिए
दीवार में सुरंगें बना दी गयी थीं। हमारे परदादा किला जीतते हुए उस तपती लौह
चादर तक जा पहुँचे थे। उस समय किले के सैनिक उनके परिणाम की कल्पना
करके मन ही मन हँसने लगे।
"हँसेंगे ही, उस भयानक संकट की उन्हें क्या जानकारी थी?" महारानी
येसूबाई बोली।
"नहीं, महारानी, हमारे परदादा बड़े बुद्धिमान थे। किला जीतने का संकल्प
लेकर वे अन्दर गये थे। अन्दर जाते समय ही वे अपने साथ पानी से भरी हुई बड़ी
बड़ी चमड़े की मोटें और डोले ले गये थे। उस तपती चादर पर शीघ्रता से पानी
उड़ेल दिया गया और वह तपता तवा बुझ गया। उस अभिमानी अजेय किले ने
अपना सिर हमारे परदादा के कदमों में रख दिया।"
यह यथार्थ कथा सुनकर सभी लोग दंग रह गये।
बैठक में हुई दीर्घकालीन चर्चा का एकबार पुनः मूल्यांकन किया गया।
शम्भूराजा ने अन्त में कहा, "सम्भव होगा तो सभी मोर्चों पर आक्रमण होगा। जहाँ
सम्भव नहीं होगा वहाँ कुछ समय के लिए युक्तिपूर्वक पीछे हटना हमारी नीति
होगी। लाखों की सेना लेकर औरंगजेब आएगा। उसे युक्ति से टालना होगा। रुक
गया तो चकमा देंगे। सह्याद्रि की ढाल पेट और पीठ से बाँधकर उस पापी औरंगजेब
से हम धर्मयुद्ध लड़ेंगे।
"वाहऽ वाहऽ" बैठक के सभी लोगों ने राजा के निर्णय की प्रशंसा की।
खंडो बल्लाल, कविकलाश, निलोपन्त एक एक को चेतावनी देते हुए और
उन्हें संकल्प का रस पिलाते हुए शंभूराजा ने कहा—
"इसलिए कहता हूँ यारो! हमारे कन्धे पर शिवाजी महाराज और जीजामाता
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के पुण्य और बौद्धिक चैतन्य का पावन प्रसाद है। यह दैव दुर्लभ आशीर्वाद यों ही
नहीं समाप्त हो जाएगा। चलिए, निर्णय के अनुसार उस बादशाह और उसकी पाँच
लाख की सेना पर टूट पड़ें।
जिस प्रकार मद्य मे पागल हाथी किले के सिंहद्वार पर सिर पटकता है और
द्वार में लगे बड़े-बड़े खीले उसकी मस्ती को दूर कर देते हैं, उसी प्रकार कल
रायगढ़ पर अधिकार न कर पाने के कारण औरंगजेब नाम का बूढ़ा हाथी हमारे
दरवाजे पर निराश होकर धक्का मारेगा, अपना मस्तक फोड़कर हमारे सिंहद्वार पर
अपना खून बहाएगा। तभी सच्चे अर्थों में विजय की रंगोलियाँ बनाएँगे और नौबत-
नगाड़े बजाने का आरम्भ करेंगे।"
तीन
शम्भुराजा विचारगोष्ठी से हंबीरराव को अपने साथ अन्दर ले गये। बीच के चौक में
हंबीरराव बैठ गये सम्भाजी राजा और महारानी येसूबाई हंबीरराव की ओर एकटक
देखते रहे। उनकी इस दृष्टि से हंबीरराव विचलित हो गये।
शम्भुराजा ने दुखी स्वर में कहा, "हंबीरराव, जिन पर हम प्राण निछावर करते
हैं, ऐसे तीन प्राणी तीन वर्ष से बादशाह के बन्दीखाने में पड़े हुए हैं। उनके बिना यह
वैभव, यह गजपद हमें दुखी करता है।"
हंबीरराव ने राजा की ओर घबराई निगाहों से देखते हुए कहा, "एक राणूबाई
और दूसरी दुर्गाबाई- क्या यही दो नहीं?"
"हंबीरराव हमें एक कन्यारत्न की भी प्राप्ति हुई है। यह समाचार बाद में
मिला है। यह समाचार वहाँ के हमारे अपने आदमी ने दिया है। इसलिए खबर
पक्की है। हमारी कन्या अब तीन वर्ष की हो गयी होगी।" यह कहते हुए
शम्भुराजा का स्वर काँपने लगा।
हंबीरराव को धक्के पर धक्के लग रहे थे। राजकन्या की प्राप्ति की खबर,
बादशाह के अन्तःपुर तक पहुँचे शम्भुराजा के हाथ। हंबीरराव को विस्मयकारक
लगा। किन्तु उन्हें सोचने के लिए अधिक समय न देते हुए शम्भुराजा गरजे- "क्यों
हंबीरराव, क्यों? पिछले तीन वर्षों से हमें कहते रहे है। हमें स्वयं अहमदनगर के
किले पर आक्रमण करना चाहिए था। अपने प्रियजनों को शत्रु के बन्दीखाने में सड़ता
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हुआ छोड़कर, यहाँ राजा बनकर जीने का हमें क्या अधिकार है?''
"शम्भू बेटे! स्वराज्य का सेनापति होने के नाते मुझे आप से भी अधिक
लज्जा आती है। हम इस बात से बहुत लज्जित हैं। परन्तु हम शान्त नहीं बैठे थे।
हमारी दस-दस हजार की फौजें उस किले पर आक्रमण कर चुकी हैं। उनके बाद
हमारी फौज तूफानी चक्रवात की तरह अहमदनगर के चारों ओर चक्कर काटती
रहीं। परन्तु निजाम घराने का वह किला बहुत मजबूत है। वहाँ का किलेदार
रूहूल्लाखान भी शक्तिशाली है। वह प्रदेश मुगलों का है और सह्याद्रि से बहुत दूर
है। शत्रुओं का पहरा भी शक्तिशाली है फिर भी हम पीछे नहीं हटे।"
"हंबीरराव, कुछ तो कीजिए।" येसूबाई ने अतिस्वर में कहा।
"और यदि आपसे हो सकता है तो हमें जाने दीजिए। हम स्वयं जाकर किले
का दरवाजा तोड़ेंगे।"
"महाराज! आपकी इसी उतावली प्रवृत्ति से हमें भय लगता है।"
हंबीरराव कहने लगे- "शम्भू बेटे, आप शान्तिपूर्वक सारी बातों को अच्छी
तरह समझ लें। बड़े महाराज का जन्म शिवनेरी किले पर हुआ था। किन्तु उस किले
से लगा हुआ जुन्नर का इलाका हमेशा मुगलों के अधीन रहा। जालनापुर से आते
समय शिवाजी महाराज को संगमनेर के समीप रणमस्तानखान ने किस तरह पकड़
रखा था? उन्हीं के मुँह से आपने सुनी थी न वह कहानी? इसलिए कहता हूँ कि
धीरज रखिये। लाखों लोगों की आजीविका आप पर ही निर्भर है। आप हमारे हिन्दू
साम्राज्य के आधार स्तम्भ हैं। अतः इस प्रकार होशो-हवास खोकर कठिनाई में
उलझने का आपको अधिकार ही नहीं है। हंबीरराव ने रात का भोजन शम्भूराजा के
साथ लिया और दोनों ने अनेक राजनैतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। एक ही
समय में अनेक मोर्चों पर मुगलों के साथ मराठों का युद्ध आरम्भ हो गया था।
इसलिए हंबीरराव का यहाँ अधिक दिन रुकना सम्भव नहीं था।"
दूसरे दिन बिदा लेने के लिए हंबीरराव राजमहल में पहुँचे। सन्ध्या का समय
था। ग्यारह-बारह पालकियाँ बाहर खड़ी थीं। हंबीरराव ने देखा कि महारानी कहीं
जाने की तैयारी में हैं। उन्होंने पूछ लिया-"बहूरानी पालकियाँ तो रायगढ़ की दिख
रही हैं, शृंगारपुर की नहीं।"
"हाँ!" येसूबाई चौंक गयीं।
"परन्तु इतनी देर से निकल कर आप शृंगारपुर पहुँचेंगी कैसे?" हंबीरराव ने
चिंतित होकर पूछा।
सत्य को छुपाना महारानी के लिए कठिन हो गया। बगल में खड़ी माताजी
भी दुविधा में पड़ गयीं। "हंबीरराव हमें प्रसूति के लिए शृंगारपुर नहीं यहीं गंगोली
की ओर जा रहे हैं। पुत्र का जन्म वहीं पर हो, ऐसी हमारी माताजी और भाई की
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इच्छा है। येसूबाई की काजलभरी आँखों में आँसू छिप नहीं पाये।
सभी वरिष्ठों को नमन करके येसूबाई शीघ्रता से पालकी में बैठ गयीं। हाथ
की लाठियों का सहारा लेकर कहार चल पड़े।
दूर जाती पालकियों को शम्भुराजा आँखभर निहारते रहे। छोटी भवानी महीन
पर्दा बगल हटाकर पिता की ओर हाथ हिला रही थीं। गणोजी शिर्के ने अपनी बहन
की प्रसूति के लिए ले आने के लिए पालकी आदि नहीं भेजी थी। उल्टे एक ऐसा
पत्र भेजा था जिसके एक- एक शब्द छुरी के नोक की तरह शम्भुराजा के कानों को
छेद रहे थे—'येसू प्रसूति के लिए आने वाली हो, इसके लिए यहाँ से पालकी नहीं
भेज रहा हूँ। तुम भोसलों ने हम शिर्के लोगों के लिए छोड़ा ही क्या है ? हमारे वतन
को लूटा, हमे भिखारी बना दिया। फिर भी तुम प्रसूति के लिए अपनी पालकी से
यहाँ आ जाना। किन्तु आते समय अपने मक्कार ससुर के किये गए वादे के अनुसार
हमारे वतन के मुहर लगे कागजात साथ लाना न भूलना।'
महारानी की पालकी किले से नीचे उतर रही थी। रानी के बिना महाराज को
सूना-सूना लग रहा था। उस समय बिदा लेती हुई छोटी भवानी का चेहरा बार-बार
उनके सामने आ रहा था। उस भवानी से एक वर्ष छोटी बेटी भी उन्हें स्मरण हो रही
थी। उन्हें याद आने लगीं अहमदनगर के किले में, शत्रु के कड़े पहरे में कैद, अपने
छत्रपति पिता से मिलने के लिए आतुर वे छोटी छोटी आँखें। राजा का अन्तर्मन
भीतर ही भीतर चीत्कार कर रहा था।
"महाराज मैं चलूँ क्या ?" हंबीरराव ने जोर से पूछा।
"अँ- ? हाँ" सँभलते हुए शम्भुराजा ने हंबीरराव का हाथ पकड़ा वे साग्रह
कहने लगे—"हंबीरराव हमारे हृदय के छोटे से टुकड़े के लिए कुछ कीजिए। कृपया
इसे किसी राजा का आदेश न समझें। पर यह जिसे अभी तक देखा तक नहीं उस
छोटे बच्चे को चूमने के लिए तरस रहे एक पिता की प्रार्थना अवश्य है।
"मराठों के गंडस्थल का मतलब है, उनके शैतानी किले। एक के बाद एक
किला जीतते जाओ। ऐसा करते-करते सिर्फ छः महीने में पूरा दक्खन जीत लेंगे।"
"जैसा आपका हुक्म, हजरत !" शहाबुद्दीन फिरोजजंग ने अपने राजा के
सामने गर्दन झुकाई। वह तूरानी जाति का आबदार आँखों वाला वह भयंकर योद्धा
.सरदार था।
"किस किले से शुरुआत करोगे, फिरोजजंग ?"
"रामशेज से।"
"रामशेज ?"
"हाँ, यह नासिक से छः- सात मील पर है। पैंतीस-चालीस हजार की फौज
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लेकर जा रहा हूँ।"
"कितना समय लगेगा?"
"सुबह की नमाज के बाद बम लगाना शुरू करूँगा और किला जीतकर
दोपहर की नमाज के लिए किले पर ही चादर बिछाऊँगा।"
"वाहऽ, बहुत खूब।" बादशाह बहुत सन्तुष्ट दिख रहा था।
"हमें इस सम्भा को पराजित करके गोलकुंडा और बीजापुर के राज्य नष्ट
करने हैं। केवल आठ-महीने के भीतर पूरे दक्खन पर क़ब्ज़ा कर लेना है। एक वर्ष
के अन्दर हजरत बाबा चिस्ती के दरबार में उत्तर की ओर अजमेर पहुँचना है।"
औरंगजेब ने सूचित कर दिया।
फिरोजजंग उस दिन जल्दी ही औरंगाबाद से बाहर निकल पड़ा। उस समय
बादशाह बहुत प्रसन्न था। उसे विश्वास था कि रामशेज के बाद दो-चार दिन में
मराठों का कोई न कोई किला मिट्टी में मिला दिया जाएगा।
किन्तु दिनों के बाद बादशाह को दक्षिण की हवा का भी उसे अनुभव होने
लगा। औरंगजेब की गर्मी बढ़ने लगी। मूँछों पर ताव देकर शेखी बघारते हुए
रामशेज की ओर निकले फिरोजजंग के साथ कासिमखान, शुभकर्ण बुंदेला, पीर
गुलाम, मुहम्मद खलील, राव दलपत बुंदेला जैसे अनेक बहादुर सरदार थे।
औरंगाबाद में खबरें आ रही थीं कि प्रचंड तोपखाना और गोला-बारूद लेकर
फिरोजजंग ने पहली ही मुठभेड़ में रामशेज को चारों ओर से घेर लिया।
चार
असदखान अपने मालिक को धीरे-धीरे बता रहा था—"बस! किब्लाए-आलम !
ऐसा लगता है कि खुशखबरी यहाँ तक पहुँचने में शायद कुछ देर हो गयी है। नहीं
तो अब तक तो किला दम तोड़ दिया होता।"
"वजीरे आजम, किसी पर भी विश्वास करने की मूर्खता हम कभी नहीं
करते।" बादशाह ने असदखान की ओर क्रोध से देखा। उस अनुभवी सेनानी के
पसीने छूट गये। ऊँचा, सुन्दर, घुँघराले बालों वाला जुल्फिकारखान बादशाह के
सामने आकर खड़ा हो गया। अपने मौसरे भाई की ओर देखकर बादशाह ने पूछा—
394 :: सम्भाजी
“जुल्फिकार बीजापुर के सर्जाखान की ओर से कोई समाचार?”
“अभी तक नहीं, जहाँपनाह।”
बादशाह की मुद्रा कठोर हो गयी। उसकी भूरी पुतलियाँ तेजगति से नाचने
लगी। वह गुर्राते हुए बोला, “जुल्फिकार!”
“हजरत?”
“लोग कितने पागल रहते हैं?” कुछ उदास और कुत्सित स्वर में बादशाह
बोला, “हमने उस बेवकूफ सर्जाखान से वादा किया था कि हम मराठों का जितना
इलाका जीतेंगे उसे बीजापुर की झोली में डाल देंगे। वह इस काफिर बच्चे के
नामोनिशान मिटाने में हमारी मदद करे। उससे बस इतनी ही हमारी अपेक्षा थी।
फिर भी उस घमंडी सर्जाखान ने हमारी ओर देखा नहीं।”
जुल्फिकारखान ने उद्वेग के साथ कहा, “जहाँपनाह, वह आदिलशाह
सिकन्दर चौदह पन्द्रह वर्ष का बछेड़ा है। उसे अभी क्या अकल है?”
“परन्तु सर्जाखान जैसा अनुभवी सरदार ऐसी लापरवाही करे, यह दुख की
बात हैं।”
“उसने खत पहुँचने की सूचना भी नहीं दी?”
“नहीं हजरत!” खान घबराकर बोला।
बादशाह खिन्न दिखाई पड़ा। उसने अपनी सफेद मुलायम दाढ़ी पर बायाँ
हाथ फेरा। दाहिने हाथ की जपमाला को आँखों के समीप ले जाते हुए कुरान की एक
पंक्ति का ध्यान किया। वह कड़वाहट के स्वर में बोला, “ये बीजापुर और
गोलकुंडा के शिया मुसलमान सुधरने वाले नहीं हैं। सर्जाखान के साथ सभी बीजापुर
वालों को उस सम्भाजी से मित्रता रखनी है। गोलकुंडा का मुख्य दीवान यादण्णा तो
अत्यन्त चतुर, धूर्त और उतना बदमाश ब्राह्मण है। हम सोमनाथ से लेकर यहाँ तक
हिन्दुओं के मन्दिर ध्वस्त करते आये हैं। मैंने हुक्म दिया था कि मेरे बुरहानपुर
पहुँचने से पहले वहाँ के सारे मन्दिर ध्वस्त कर दिये जायें। मेरे हुक्म की तामील की
गयी। हैदराबाद के मुसलमानी इलाकों में क्या हो रहा है? वजीरे आजम आपको
इसका कुछ पता है?”
“हजरत?”
“वह कुतुबशाह का काफिर दीवान यादण्णा हिन्दुओं के बड़े-बड़े मन्दिर
बना रहा है।”
“तोबा! तोबा! हुजूर ” जुल्फिकारखान ने अपने गालों पर हल्की चपत
लगाते हुए अपना असन्तोष व्यक्त किया।
बादशाह ने जुल्फिकारखान और वजीर असदखान इन पिता-पुत्र पर नजर
डाली। अपनी भूरी आँखों को सिकोड़ते हुए औरंगजेब ने एक साँस ली और बोला,
सम्भाजी :: 395
"खैर, राजपूताना की मरुभूमि से निकलते समय हमारा.मकसद बहुत बड़ा नहीं
था। हमें अपनी एड़ी के नीचे सह्याद्रि के एक चूजे नहीं बल्कि एक चूहे के बच्चे को
रगड़कर मारना था। लेकिन यहाँ की आबोहवा कुछ अलग लग रही है। क्यों
वजीर! आपको कुछ अन्दाजा लग रहा है?"
"गिर जाएगा जहाँपनाह। रामशेज दो दिन में गिर जाएगा-नहीं गया
होगा।"
"मैं किसी दूसरे किले की बात नहीं कर रहा वजीरे आजम।" बादशाह बीच
में रुक गया। साँस लेकर हकलाते हुए बोला-"हमारी जिन्दगी में शक ही हमारा
सगा रहा है। आजकल हमें लग रहा है कि इस जहन्मी सम्भाजी, उस धर्मद्रोही
आदिलशाह और रात-दिन वेश्याओं के कोठों पर पड़ा रहने वाले हैदराबादी
कुतुबशाह के बीच कोई समझौता हो गया है। ऐसी शंका मुझे बार-बार हो रही
है।"
बादशाह के मुँह से निकली यह बात बहुत भयंकर थी इसलिए बाप-बेटे के
लिए कोई प्रतिक्रिया देना सम्भव नहीं था। बादशाह ने जान बूझकर विषय को बदल
दिया। कलेजे में एक चुभन होने से उसका मन उदास हो गया। उसने असदखान से
पूछा-"हमारे बेवकूफ शहजादे-अकबरशाह की ओर से कोई खबर?"
"उनकी और उस सम्भा की दोस्ती बहुत बढ़ रही है। बस इतना ही।"
शहजादा अकबर बादशाह के हृदय का एक रिसता घाव था। उसके भीतर का
यह गहरा घाव उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था। अपनी प्यारी बेगम दिलरस बानू
की गोद में खेलते उस नन्हे मुन्ने बादशाह को वह भूला नहीं था। उसका बड़ा
शहजादा सुल्तान विद्रोही चचेरेभाई के साथ बर्बाद हो गया था। आज तो वह
कैदखाने की हवा खा रहा था। बचे हुए मुअज्जम, आजम और कामबक्स शहजादों
से किसी-न-किसी कारण औरंगजेब रुष्ट था। हृदय से वह अकबरशाह को ही
चाहता था। किन्तु उसने नापाक राजपूतों और उस मूर्ख दुर्गादास राठौड़ के पीछे
लगकर खुद का माथा फोड़ लिया था।
मुगलों के राजतिलक का इतिहास बादशाह को याद आया। वह उदास स्वर
में बोला, "आजकल हम मुगलों के उत्तराधिकार का इतिहास युद्ध खून सनी कटारी
से लिखा जा रहा है। दिन ऐसे बुरे आये हैं कि कभी-कभी जाती दुश्मन भी दोस्त
की तरह नजर आते हैं। वस्तुतः शहजादों की कटार का भय अधिक होता है। हमारे
अब्बाजान शाहजहाँ साहब ने अपने पिता हमारे दादा जहाँगीर के विरुद्ध बगावत
की थी।"
"गुस्ताखी माफ, हजरत।" वजीर ने बीच में टोका।
"आपके अब्बाजान ने ताजमहल जैसो सारी दुनिया की सबसे खूबसूरत
396 :: सम्भाजी
इमारत बनाई। इसे कैसे भुलाया जा सकता है?''
''वजीर जी, ताजमहल जैसी खूबसूरत इमारत बनाने वाले कलाकार के हाथ
कितने रक्त से भरे थे? इसकी कोई जानकारी है आपको? शाहजहाँ साहब के उन्हीं
हाथों ने शहरयार और अन्य सगे भाइयों की गर्दनें काटी थीं। इतना ही नहीं उन्हीं
हाथों ने शहरयार के मासूम बच्चों को क्रूरतापूर्वक मार डाला था।''
बादशाह ने मन का सन्ताप व्यक्त किया। उसने महल में इधर-उधर दृष्टि
डाली। असदखान और जुल्फिकार के अतिरिक्त वहाँ कोई और नहीं था। शहरयार
की याद के साथ औरंगजेब मन में डर गया। उसे स्मरण हुआ कि दारा, सुजा और
मुराद जैसे होनहार भाइयों को उसने किस क्रूरता से मार डाला था। इन स्मृतियों से
वह बेचैन हो गया। बादशाह को यह भय सदा बना रहता था कि उसके बच्चे भी
राजगद्दी के लिए ऐसा ही खून खराबा करेंगे। इसीलिए शहजादों के साथ भोजन
करते समय बादशाह की संशयशील आँखें महल के कोनों में झाँकती रहती थीं। वह
इस बात से सावधान बना रहता था कि उसका कोई बेटा छुपकर उसका गला न घोंट
जाय। ये सरी पुरानी बातें आलमगीर को नये सिरे से याद आयीं। उसने उदास होकर
कहा, ''हम मुगलों के लिए तख्त ही वास्तविक ताज है।''
पाँच
माणगाँव से कुछ मील की दूरी पर जंगल में बसा गांगोली गाँव था। गाँव से थोड़ी
दूरी पर महारानी येसूबाई के नाना का महल था। वैपूर्णा नामक छोटी नदी के किनारे
छोटा किन्तु आकर्षक महल लकड़ियों से बनाया गया था। महल के साथ ही लगा
हुआ बैजनाथ का मन्दिर और सामने वाले आँगन के साथ नदी का काला प्रवाह।
येसूबाई का यह मायका शम्भूराजा को बहुत पसन्द था। सबसे अधिक तो यह कि
इसी पवित्र घर ने राजा को पुत्ररत्न प्रदान किया था। इसलिए पूरा वातावरण ही
सुगन्धित और पवित्र लग रहा था। महल के सामने का पहाड़ चढ़ने पर कुछ दूरी पर
ही रायगढ़ था। सामने वह किला ऐसा दिखाई पड़ता था जैसे कोई हाथी पैर मोड़कर
बैठा हो। महीना भर बालक शाहू को गोद में लेकर, उसकी छोटी-छोटी आँखों की
ओर देकर शम्भूराजा रायगढ़ की ओर बार-बार देखते रहे।
गांगोली के प्रवास में एक सुखद दिन आया। सन्त तुकोबा के चिरंजीव
सम्भाजी ∷ 397
महादेव महाराज राजा से मिलने आये। बैजनाथ की सीढ़ियों पर दोनों के बीच
बहुत-सी बातें हुईं। उसी समय महादेव महाराज ने कहा, "राजन, आषाढ़ में हजारों
वारकरी पैदल चलकर पंढरपुर जाते हैं। इस साल से सन्त तुकाराम की पालकी ले
जाने की सोच रहा हूँ।"
"पालकी? कहाँ से कहाँ तक?"
"देहू से पंढरपुर तक।"
"वाहऽऽ!" शम्भूराजा प्रसन्न हो गये। तुकाराम के पुत्र से उन्होंने कहा,
"कल्पना अच्छी है। नयी शुरुआत होगी। हर साल पालकी ले जाओ।
उसके लिए जो द्रव्य लगेगा उसे सरकार से लो। मैं अधिकारियों को आदेश जारी
करता हूँ कि वे पालकी को यथोचित सुरक्षा प्रदान करें।"
तुकाराम के पुत्र सन्तुष्ट होकर चले गये। राजा ने हुक्मनामा भी भेज दिया।
किन्तु फिर से उनके हृदय में दुख का ज्वार उमड़ आया। मैसूर में अपने मित्रों की
हत्या से बहुत बेचैन हो गये थे।
दिन तो आराम से बीत जाता था किन्तु रातें खाने को दौड़ती थीं। राजा को
किसी भी प्रकार से नींद नही आती थी। मैसूर के लिए भेजे गये कृष्णाजी कान्हेरे के
वापस आने की वे व्यग्र प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीरंगपट्टनम् की सीमा पर दादाजी
काकड़े, जैताजी काटकर और तुकोजी निंबालकर की टंगी हुई गर्दनें उनकी आँखों
के सामने आ जाती थीं। वे उदास हो उठते थे। वे यही सोचते कि—"कब मैसूर पर
आक्रमण के बाद वहाँ के घमंडी राजा चिक्कदेवराज को पराजित करके उसे बेड़ियाँ
पहनाऊँ।"
मिट्टी से सोंधी सुगन्ध आ रही थी। सभी को लग रहा था कि मृग नक्षत्र में
कोंकण में तूफानी वर्षा होगी। दो तीन दिन से रोज कड़ी धूप हो रही थी। गर्मी बढ़
जाने के कारण शरीर से पसीना छूट रहा था। पसीने से कपड़े भीग जाते थे। उस दिन
शाम को भारी वर्षा हुई। आसमान में बिजली चमक रही थी। बादल गरज रहे थे।
वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। लगातार तेज वर्षा ने जीना मुश्किल कर
दिया।
महल के बीच वाले चौक में राजाओं का विचार-विमर्श चल रहा था।
शम्भूराजा के समीप ही महारानी येसूबाई बैठी थीं। उनकी गोद में बालक शाहू सो
रहे थे। शम्भूराजा के बहुत गम्भीर हो जाने के कारण कविराज कलश जोत्याजी
केसरकर, रायप्पा आदि सभी दबाव का अनुभव कर रहे थे। आज भी कान्हेरे मैसूर
से वापस नहीं आये थे। इसीलिए शम्भूराजा बहुत चिंतित लग रहे थे। शम्भूराजा ने
थोड़ा मुस्कराते हुए कहा, "हमारा यह साल सुख-दुःख के हिंडोले में झूल रहा है।
एक ओर हमने सिद्दियों को दहशतज़दा बनाया, बादशाह की सेना को वापस लौटा
398 :: सम्भाजी
दिया, पुत्र की प्राप्ति हुई, ये सारी सुखद घटनाएँ हैं।
"महाराज, इन सुखों के सामने इतना-सा दुःख क्या है?"
"नहीं येसूराणी, हमारग दुःख थोड़ा नहीं है। कोंडाजी बाबा के लिए हम
शोक मना ही रहे थे कि कर्नाटक-तमिल देश ने हमारी बगल में एक के बाद एक
तीन छूरे भोंक दिये। काकड़े, काटकर और निम्बालकर ये हमारे तीनों सरदार
साधारण नहीं थे। उनके निधन की पीड़ा हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। हरजी जैसा
आदमी भी वहाँ भयभीत हो जाता है। इस सब की एक ही दवा है—आक्रमण,
केवल आक्रमण।"
चिराग की रोशनी में शम्भूराजा की मुखमुद्रा बहुत लाल दिख रही थी। उनके
सहयोगी एक दूसरे की ओर सहमकर देख रहे थे। येसूबाई ने साहस बटोरकर कहा,
"परन्तु महाराज औरंगजेब जैसा शत्रु अपनी सेना लेकर वतन के सीने पर आ बैठा
है। उसे यहाँ छोड़कर दूर कर्नाटक तमिल में जाना आत्मघात नहीं होगा क्या?"
"नहीं महारानी, मैसूर का वह चिक्कदेवराज बहुत घमंडी हो गया है। वह
इस अभिमान में फूला हुआ है कि उसे कोई छू नहीं सकता। अधिक समय तक
शान्त बैठने का मतलब है अपने तीन सरदारों की मृत आत्मा के साथ गद्दारी
करना।" बाहर लगातार वर्षा हो रही थी। नदी के किनारे ठंडी हवा बह रही थी।
वर्षा रुक नहीं रही थी। रात बहुत हो चुकी थी। शम्भूराजा ने शान्त और धीमे स्वर
में कहा, "कल औरंगजेब और हममें महायुद्ध होगा। तब कर्नाटक और तमिल से
जो रसद हमें अपने अधिकार से मिलती है वही हमें आगे ले जाएगी। आगे कदम
बढ़ाने से पहले हम मैसूर गये कान्हेरे की प्रतीक्षा करेंगे। निश्चित किया गया कि
कान्हेरे के आने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाये।"
नासिक बागलाण की ओर हंबीरराव को एक सन्देश भेजा गया। अन्य मुद्दों
पर भी विचार-विमर्श किया गया। आधी रात बीत चुकी थी। लोगों की आँखें भारी
हो गयी थीं। शम्भूराजा उठकर शयनकक्ष में चले गये। इसी समय ड्योढ़ी के
पहरेदार दौड़कर अन्दर आये। जोर-जोर से शम्भूराजा से कहने लगे—"बाहर
कृष्णाजी पन्त नाम का आदमी आया है। भीतर आकर राजा से मिलने का आग्रह कर
रहा है।" शम्भूराजा की नींद उचट गयी। उन्होंने तत्काल कान्हेरे को अन्दर
बुलाया। सभी की निगाहें उसी पर टिक गयीं। कान्हेरे वर्षा में पूरी तरह भीग चुके
थे। उन्हें सर्दी भी लग रही थी। वे बिना रुके भागते हुए मैसूर से स्वराज्य में वापस
आये थे। शम्भूराजा ने अपने कन्धे का शाल कृष्णाजी पन्त के हाथ में दी। कृष्णाजी
ने अपने भीगे सिर को किसी प्रकार पोंछा। इसी समय शम्भूराजा ने प्रश्न किया—
"कृष्णाजी पन्त, चिक्कदेवराजा क्या कह रहा है? हो गया कौल करार?"
कृष्णाजी पन्त ने गर्दन झुका ली और नकार में सिर हिला दिया। शम्भूराजा ने
सम्भाजी :: 399
पुनः पूछा— "फिर वह बगल में क्या है? देखूँ तो जरा।"
"रुकिए मालिक, मैं ही दिखाता हूँ कि क्या है।"
कृष्णाजी पन्त ने बगल में दबाया अपना जरीदार लाल अंगरखा बाहर निकाला
और गीले वस्त्र की तरह झटककर उसे फैला दिया। वह अंगरखा अनेक जगहों पर
फाड़ दिया गया था। यह देखकर सभी को पता चल गया कि मराठों के वकील का
मैसूर में कैसा स्वागत किया गया था। उस अपमानित चीथड़े को देखते नहीं बन रहा
था। दाँत पीसते हुए धीमी आवाज में शम्भूराजा ने पूछा—
"मैसूर के उस घमंडी राजा ने कहा क्या?"
"कैसे बताऊँ महाराज ? फिर भी बताता हूँ।"
'मैं अनुमति लेकर चिक्कदेवराजा से मिला। उन्हें बताया सम्भाजी महाराज
के यहाँ से आया हूँ।' वह तुरन्त बोल पड़ा—'कौन राजा ? कहाँ का राजा ? हम ऐसे
किसी भी आदमी को नहीं जानते। जिस तरह घास उगती है उसी तरह हजारों
जमींदार हर रोज पैदा होते हैं और घास की तरह सूखकर समाप्त हो जाते हैं।' मैसूर
दरबार के विदूषकों ने किस प्रकार वस्त्र फाड़े और अपमानित किया था, वह सब
कृष्णाजी को स्मरण हो आया। वे रो पड़े।
महारानी येसूबाई, कवि कलश और अन्य सभी भयभीत होकर शम्भूराजा की
ओर देखने लगे। सभी का अनुमान था कि अब जलते हुए बारूदखाने की तरह
शम्भूराजा के विराट रूप का दर्शन होगा। किन्तु शम्भूराजा क्रुद्ध न होकर गम्भीर बने
रहे। अपने शयकक्ष की ओर जाते समय उन्होंने साथियों से कहा, "अब क्यों चिन्ता
करें? हमारी दिशा निश्चित हो गयी है। कर्नाटक और तमिल प्रदेश में नचाये बिना
हमारे घोड़ों के दाँत को पीड़ा शान्त नहीं होगी।"
"क्या मतलब महाराज ?" सभी ने भयातुर होकर पूछा।
यह स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था कि महाराज स्वयं कर्नाटक तमिल की
यात्रा पर निकलेंगे। इस समय पाँच लाख की सेना के साथ छाती पर सवार औरंगजेब
का भी सभी को भय था। अपने भयभीत साथियों की ओर राजा ने देखा। येसूबाई
की गोद में सोये बालक शाहू को उन्होंने सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा, "राज्य
का कार्यभार और राज्य का संरक्षण हम महारानी और हंबीरराव पर सौंपेंगे। तीन-
चार महीने की दक्षिण यात्रा किये बिना अब कोई अन्य मार्ग नहीं है।"
"किन्तु महाराज औरंगजेब ?"
"उसकी कुंडली का हमने ठीक-ठीक अध्ययन कर लिया है।" शम्भूराजा
ने सीने से लगाये बालक शाहू के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए आत्मविश्वासपूर्वक
कहा, "अब मृग नक्षत्र से वर्षा आरम्भ हो गयी है। दशहरे तक कोंकण के कीचड़
में अपना घोड़ा लाने का साहस औरंगजेब नहीं करेगा। इसी कालावधि में हम चले
400 :: सम्भाजी
जाएँगे और जिंजी, तंजौर के साथ अपना दक्षिणी क्षेत्र सँभालेंगे।
छह
चिक्कमंगलूर की पूर्वोत्तर दिशा में वाणावर था। वहाँ के सूबेदार लिंगप्पा का सन्देश
चिक्कदेवराजा के पास पहुँचा। समाचार पाते ही उसके होश उड़ गये। पत्र को ऊपर
उछालते हुए वह दरबार में जोर-जोर से चिल्लाने लगा—"अपना राज्य इतना
विकलांग कब से बन गया? अपने गुप्तचर इतने लापरवाह कब से हो गये?"
"क्या हुआ हुजूर?" घबराकर दीवान ने पृछा।
"वह सम्भा मराठा अपनी दस हजार की सेना लेकर वाणावर के समीप पहुँच
गया है और हमें इसकी खबर तक नहीं।"
दो तीन सरदारों ने एक साथ पृछा—"वह जंगली चूहे का बच्चा यहाँ तक
पहुँचा ही कैसे?"
"आप लोग किस स्वप्नलोक में रहते हैं? सम्भाजी के पास दस हजार घोड़े
हैं। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक भी उनके साथ हैं। उसकी भी पाँच हजार की सेना
उसके साथ है।"
चिक्कदेवराजा अधिक समय तक शान्त बैठने वाला नहीं था। उसने झटपट
सेना तैयार की। वह स्वयं वाणावर की ओर चल पड़ा। सह्याद्रि की तरह वर्षा वहाँ
नहीं थी। इसलिए शम्भुराजा प्रसन्न थे। गोलकुंडा का दीवान मादण्णा पंडित जबान
का पक्का था। वादे के मुताबिक उसने अपनी दस हजार सेना सम्भाजी की सेवा में
हाजिर कर दी थी। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक भी चिक्कदेवराजा से भयंकर ईर्ष्या
करता था। इतनी दूर से घोड़े दौड़ाते महाराज यहाँ पहुँचे इससे हरजी महाड़िक
उत्साहित थे। बहुत दिनों के बाद इन लोगों की भेंट युद्ध के मैदान में हुई थी।
शम्भुराजा ने हरजी की सराहना करते हुए कहा—
"जीजाजी आपने दक्षिण में बड़ा पराक्रम किया है। आपका प्रत्येक कदम
पिताजी के दामाद के योग्य हैं। आपकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।"
"केवल चिक्कदेवराजा की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा पर हम काबू नहीं कर पाये
इसीलिए हम आपकी सहायता के लिए दौड़े-दौड़े आये हैं।"
यह कहते-कहते शम्भुराजा को स्मरण हो आया। वे पूछने लगे—"जीजाजी,
सम्भाजी :: 401
हमारे चाचा एकोजी राजा हमारी सहायता के लिए आएँगे?"
"इसका भरोसा कौन दिला सकता है?" दुविधा में पड़े हरजी ने
प्रतिप्रश्न किया।
"आपने उनकी सहायता माँगी है क्या?"
"हाँ, उम्र से पिताजी के समान, रिश्ते में मेरे चाचा हैं। उनके पास दक्षिण की
मिट्टी का जन्म भर का अनुभव है। सम्भव हुआ तो उनका लाभ अवश्य उठाएँगे।
स्वामी जी का कहना है-'मराठियों को एकत्र करो, महाराष्ट्र धर्म की वृद्धि करो'।
वैसे शम्भूराजा और हरजी के मन में विश्वास नहीं था। वे शिवाजी महाराज
के कर्नाटक आक्रमण के समय मिलने के लिए आये थे। किन्तु रातभर में ही नदी
पार करके पीछे हट गये। वाणावर में बादल छाए हुए थे। उस दिन दोपहर के बाद
गर्मी बहुत बढ़ गयी थी। शम्भूराजा, कवि कलश, हरजी और वहाँ इकट्ठी पचीस
हजार सेना के सामने अपने उद्देश्य को बताने लगे।
वहाँ फौजी डेरे में मराठा, कुतुबशाही सैनिक और कन्नड़ के प्रमुख सरदार
बैठे थे। एक दो दिन में ही त्रिचनापल्ली तक जाना था और कावेरी का समृद्ध क्षेत्र
लूटना था। ऐसा गुप्त रूप से निश्चित किया जा रहा था।
बसप्पा नाइक ने शम्भूराजा से कहा, "विगत कुछ वर्षों में चिक्कदेव की
शक्ति दस गुना बढ़ गयी है। उसकी राजधानी मैसूर पर आक्रमण करना कोई आसान
काम नहीं है।"
"तुम्हारी बात सच है बसप्पा। एकोजी राजा ने बैंगलौर की चालीस वर्ष
पुरानी चौकी को तंजौर स्थानान्तरित किया और सारी गड़बड़ी शुरू हुई। जब तक
मराठों ने बैंगलौर में पाँव जमा रखा था तब तक मैसूर पर उनकी बड़ी दहशत थी।"
शिविर में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया। मैसूर पर आक्रमण करने के
स्थान पर त्रिचनापल्ली की ओर से आक्रमण किया जाये। बाघ को जंगल से बाहर
निकालकर फिर उसकी हत्या की जाये। ये बातें चल ही रही थीं कि एक खबर
आयी-"पन्द्रह हजार की फौज लेकर चिक्कदेव राजा स्वयं हमारे ऊपर आक्रमण
करने आ रहा है। शाम तक दोनों सेनाएँ आपस में भिड़ जाएँगी।"
यह खबर सुनकर शम्भूराजा गम्भीर हो गये। उन्होंने कहा-
"इसका मतलब यह हुआ कि चिक्कदेव बड़ा खेल खेल रहा है। हम
सावधान हों, इससे पहले ही उसने आक्रमण करने का निश्चय किया।"
अपनी सेना को तत्काल तैयार करना, आसपास की पहाड़ियों की आड़
लेकर, लड़ाई को जारी रखना महत्त्वपूर्ण और आवश्यक था। मैसूर की सेना संगठित
और बलशाली है। इसकी जानकारी सभी को हो गयी थी।
उस रात अपनी सेना को अर्ध चन्द्राकार बनाकर चिक्कदेव तैयार हो गया।
402 :: सम्भाजी
दूसरे दिन सभी ओर से युद्ध आरम्भ नहीं हुआ। चिक्कदेव जितना साहसी, मगरूर
और मक्कार था उतना ही ताकतवर भी। सुबह से ही दोनों सेनाओं के बीच छिट-
पुट युद्ध हो रहा था। थोड़ी बहुत तलवारबाजी किन्तु कोई भी निर्णायक युद्ध नहीं
कर रहा था। जैसे-तैसे दोपहर बीती दूरी पर वर्षा होने का दृश्य दिखाई पड़ रहा था।
घोड़ों को संभालते लोग, छोटी-बड़ी तोपों के गोलन्दाज, भालाधारक राउत,
संरक्षक आदि सभी आश्चर्य से आसमान की ओर देखने लगे। वह सचमुच वर्षा
नहीं थी। बल्कि बाणों से वर्षा थी। अचानक सूँऽ सूँऽऽ करते बाण आने लगे। ये
बाण लोगों के पीठ-पेट में घुसने लगे।
आसमान से आने वाले बाणों की दिशा मालूम नहीं पड़ती थी। किन्तु पागल
मधुमक्खियों की तरह जो भी मिलता था उसे काटती थीं। घोड़ों की गर्दनों में, मुँह
में, आँख में, सैनिकों के पेट में, बाँहों में ये बाण घुस रहे थे। बाणों की तीक्ष्णता के
कारण कि घायलों के शरीर से रक्त बहने लगा। इन बाणों की वर्षा से हड़कम्प मच
गया। मराठों के होश उड़ गये। 'हे भगवानऽऽ, मर गयाऽऽ, ओ माँ' जैसी चीत्कारें
मराठों की निकलने लगीं। कुतुबशाही में सुख की रोटियाँ तोड़ने वाले हट्टे-कट्टे
सैनिक भी सामना नहीं कर पा रहे थे। जिस ओर भी रास्ता मिला उधर भागने लगे।
'अल्लाहऽऽ' 'तौबाऽऽ' 'बचाओऽऽ' शब्दों के अतिरिक्त उनके मुँह से कोई और
शब्द नहीं निकल रहा था। लेकिन उनकी परेशानी बढ़ती जा रही थी। चालाक
घुड़सवार नीचे कूदकर भाग रहे थे। बहुत से लोग वहीं गिरकर मर रहे थे। बाणों से
बिंधे घोड़े उन पर गिर रहे थे। आदमी कुचले जा रहे थे। हैदराबादी सैनिकों की
भाग-दौड़ सबसे अधिक थी। उनके सेनापति के पास शम्भूराजा घोड़ा दौड़ाते हुए
पहुँचे। 'भागो मतऽ' 'भागो मतऽऽ' जोर-जोर से कहने लगे। उसी समय हरजी
राजा आश्चर्यचकित उनके पास आये। वे अपना रक्त-पसीना पोंछते हुए पूछने
लगे- "शम्भू महाराज क्या करें? चिक्कदेव बहुत बलशाली है, बाणों की गति भी
अचूक है।"
"जीजाजी थोड़ी देर रुकिये, धैर्य धारण कीजिए। युद्धभूमि से पीछे हटना
मराठा धर्म नहीं है।"
शम्भूराजा, हरजी और कवि कलश के घोड़े युद्धभूमि में थिरक-थिरककर
नाच रहे थे। घुड़सवार राउतों को धीरज बँधाने की वे कोशिश कर रहे थे। परन्तु
बाणों की धार बहुत विषैली थी। जैसे कि इक्के-दुक्के राहगीर पर जंगल में विषैली
चोंचों वाली पंछियाँ आक्रमण करें, उसी तरह बाण आ रहे थे। मराठों की युद्ध
सामग्री का पूरा पता लगाकर चिक्कदेवराजा ने आक्रमण किया था। अँधेरा हो जाने
पर भी बाणों की वर्षा थम नहीं रही थी। अन्य अवसरों पर जो घोड़े आग में से कूद
जाते थे, वे नाक के बल गिर रहे थे। एक साथ दस-दस जवानों से लड़ने वाले
सम्भाजी :: 403
बहादुरों के भी सीने फटे जा रहे थे। तेजी से घुस जाने वाले बाणों के कारण उनकी
आँखें सफेद पड़ती जा रही थीं।
राजा हरजी और सम्भाजी राजा ने बड़ी हिम्मत बाँधी थी। उसी शाम को
तंजौर से एकोजी राजा की सेना आकर पहुँची। उनके साथ पाँच हजार घोड़े थे। पर
विषैले बाणों के आगे उनकी भी कुछ न चली। अनेक अच्छे घोड़ों और बहादुर
जवानों की सम्पदा नष्ट हो रही थी। कुतुबशाही सेना की कमर टूट गयी थी। बाणों
की वर्षा में वे बेसहारा औरत की तरह चीखने लगे थे।
भोजन का समय करीब आ गया। रात हो चुकी थी। थके-हारे मैसूर के
सैनिक भोजन के लिए रुके होंगे। युद्ध कुछ समय के लिए बन्द हो गया था।
शम्भूराजा की आँखों के सामने ही एक मराठी जवान के सीने में विषैला बाण घुस
गया। उसके रक्त के छींटे राजा की आँख में पड़े। राजा की आँखें अभी तक कडुआ
रही थीं। एकोजी राजा ने अपने भतीजे शम्भूराजा का आलिंगन किया। दीर्घ
निःश्वास छोड़ते हुए शम्भूराजा ने कहा—"क्षमा करें चाचाजी, पराभव के समय
आपसे भेंट हुई, इसका मुझे बहुत खेद है।"
"जाने दे शम्भू बेटे। अच्छे दिन भी आएँगे। माँ भवानी की कृपा से सब ठीक
हो जाएगा।" एकोजी राजा ने पिता की तरह सान्त्वना दी। मराठों और उनके
साथियों की सेना टूट चुकी थी। अब युद्धभूमि छोड़कर हट जाने के अतिरिक्त कोई
उपाय न था। रात में आक्रमण होने की कोई सम्भावना नहीं थी। वहाँ से यथाशीघ्र
हट जाने में ही बुद्धिमानी थी।
उद्विग्न हुए शम्भूराजा ने मशालची को पास बुलाया। बगल के तालाब के पास
पेड़ों और बाँसों की घनी छाया थी। चिक्कदेवराजा और उसकी सेना की आँखों में
धूल झोंकने के लिए पेड़ों पर मशालें जला दी गयीं। उन्हें यह आभास दिया गया
कि मराठे विश्राम कर रहे हैं। तब हरजी, शम्भूराजा, कलश और एकोजी राजा बचे
खुचे घोड़ों और सैनिकों को बाहर निकाल रहे थे। युद्धभूमि से भागने की
अपमानजनक स्थिति शम्भूराजा की जिन्दगी में पहली बार आयी थी। एकोजी राजा
ने निश्चित किया कि वे तंजौर जाएँगे। रातभर सेना भागती रही। दूसरे दिन दोपहर
की धूप चढ़ी। थकी हारी सेना की गति मन्द पड़ गयी। एक तालाब के किनारे सेना
रुकी। जख्मों पर पट्टी बाँधी जा रही थी। सैनिक कुछ सचेत हो रहे थे। शम्भूराजा
की आँखें सूजी हुई दिखाई पड़ रही थीं। उनकी नाक पर भी चोट आयी थी। बायें
हाथ में एक बाण चुभ गया था। उस घाव को देखकर ज्योत्याजी, केसकर, कविराज,
रायप्पा आदि सभी उदास हो गये।
कुछ लोगों को तालाब के किनारे पहरे पर खड़ा किया गया था। वहीं पर
चिक्कदेवराजा का एक हरकारा आया। चिक्कदेव ने शम्भूराजा को चेतावनी देने के
404 :: सम्भाजी
लिए सन्देश भेजा था। कवि कलश जोर-जोर से पढ़कर सुनाने लगे—
“मराठो, अपने सह्याद्रि पर्वत पर चले जाओ। तुम्हारा हमारे दक्षिण से
सम्बन्ध क्या है? हमारे हाथ से जब तक बचे रहते हो उसे ईश्वर की कृपा समझो।
वाणावर की सीमा रेखा हमने बाणों और तलवारों से खींची है। मैसूर राज्य पर आँखें
ऊँची करके देखोगे तो तुम्हारी आँखें फोड़ देंगे।”
बहुत देर तक चर्चा होती रही। एकोजी राजा ने सुझाव दिया—
“शम्भू बेटे अब आ ही गये हो तो कुछ दिन तंजौर में चलकर रहो। अपनी
सेना के साथ रहो। किन्तु रायगढ़ को छोड़कर तुम्हारा अधिक दिन तक दक्षिण में
रहना ठीक नहीं होगा। शीघ्रता से सह्याद्रि चले जाओगे तो कम से कम सुरक्षित तो
रहोगे।”
“चाचा साहब, यह सम्भव नहीं है।” शम्भुराजा घायल शेर की तरह गुर्राए।
“एक तो पराजित होकर अपने राज्य में जाना हमारी जाति और कीर्ति के
लिए शोभनीय नहीं है। इसके अतिरिक्त वह कालसर्प हमें वहाँ जाने दे तब न वहाँ
पीछे जायें?”
“कौन?”
“औरंगजेब !” शम्भुराजा बहुत दुखी स्वर में बोले, “डगमगाते हुए चलने
वाले शराबी और पराजित राजा की स्थिति एक जैसी होती है। इनकी कनपटी पर
जो एक चपत नहीं लगाता वह आलसी कहलाता है।”
“शम्भुराजा... ?”
“जी चाचा जी। सेना में उत्साह और संकल्प की आग फूँकने के लिए हमने
कर्नाटक और तमिल पर आक्रमण किया था, पराजित होने के लिए नहीं।”
“शम्भुराजा, यह तो बताइये कि आपकी आगे की योजना क्या है?”
“पराभव के जालिम जख्म को धोने के लिए नयी विजय जैसा रामबाण
उपाय दूसरा कौन हो सकता है? चाचाजी?” शम्भुराजा ने प्रश्न किया।
सात
एक रात को असदखान डरते हुए औरंगजेब से मिलने आया। उसके चेहरे पर अंकित
उलझन बादशाह से छिपी न रही। किसी प्रकार शब्दों को जोड़ते हुए असदखान ने
सम्भाजी :: 405
कहा, "हजरत ! रामसेज का वह बूढ़ा मराठा किलेदार सूर्याजी जेधे तो बहुत हट्टा-
कट्टा है।"
"हूँऽऽ।" वजीरे आजम यह बताओ कि उस किले पर मरगट्टों की कितनी
सेना है?"
"अँ... है न, काफी है। मतलब-मतलब छह सौ से एक हजार तक।"
"और किले के नीचे अपनी केवल पाँच-छः हजार की सेना। ठीक है न?"
बादशाह ने आँखों से घूरा।
"गुस्ताखी माफ हजरत ! पाँच छः हजार नहीं कुछ ज्यादा ही।"
जीभ दबाकर असदखान ने कहा, "ज्यादा-ज्यादा मतलब होंगे पैंतीस-
चालीस हजार। एक मामूली किला और इतनी बड़ी फौज?"
"जहाँपनाह ! किला मामूली नहीं, बहुत पुराना है। चढ़ने में बड़ी कठिनाई
है। वहाँ की मराठी सेना और उनका मुखिया बुड्ढा सूर्याजी जेधे बहुत हठी है।
हमारी सेना ने उन पर तोप दागना शुरू कर दिया है। हमारे सैनिक रात में रस्सियों
की सीढ़ियाँ लगाते हैं, रात में ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं, परन्तु ऊपर से मरगट्टे
पत्थरों की ऐसी मार करते हैं.."
"पत्थरों की ?"
"अँ-कुछ अजीब जादू-टोना है उस किले पर। कहते हैं कि किले पर तोपें
नहीं हैं फिर भी हमारी सेना पर गोले गिरते हैं।"
"वजीरे आजम, आज आपकी दिमागी हालत ठीक नहीं लगती। तोपें नहीं
हैं फिर भी गोला बारूद उड़ता है। मतलब क्या है?"
"जहाँपनाह, उस किले पर सागौन की बहुत लकड़ी है, बैल-भैसों के
चमड़े हैं। उन होशियार मराठों ने चमड़े की तोपें बनाई हैं। उनसे बाहर आने वाले
गोले भी बहुत शक्तिशाली होते हैं।
"अब तक हमारे कितने आदमी मारे जा चुके हैं?"
"ज्यादा नहीं, तीन-साढ़े तीन हजार... परन्तु जहाँपनाह फिरोजजंग का यह
ताजा खत देखें। वह कह रहा है-'चाहें कुछ भी हो चार दिनों में रामसेज पर चाँद
सितारों वाला हरा झंडा फहराकर दिखाऊँगा'।"
बादशाह कुछ अधिक बोला नहीं। मराठों के क्षेत्र में काम कर रहे कुछ
जासूसों से उसे समाचार मिले थे। रात में ही उसने उन्हें पढ़ लिया था। सम्भाजी
और अकबरशाह की दोस्ती बहुत बढ़ती जा रही है। वह अकबर और दुर्गादास
राठौड़ को साथ लेकर युद्ध के लिए निकलता है। यह खबर पढ़कर बादशाह बहुत
हैरान था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि केवल चौबीस वर्ष के शिवाजी पुत्र से
इस प्रकार की छेड़-छाड़ की जाएगी। गुप्तचरों से आने वाली खबरों को सुनकर
406 . सम्भाजी
बादशाह आश्चर्यचकित होता था। कभी बुरहानपुर पर मराठों की बीस हजार
घुड़सवार सेना आक्रमण कर रही है तो उसी समय सोलापुर के समीप मराठों की
सेना हड़कम्प मचा रही है। कभी सम्भाजी खुद जंजीरे के सीने पर पैर रखकर खड़ा
हो रहा है। सम्भाजी के बिना भी उसके सहयोगी हंबीरराव, रूपाजी भोसले,
मानाजी मोरे जैसे लोग अपनी-अपनी सेनाएँ लेकर एक ही समय में मुगलों के
अनेक क्षेत्रों में उपद्रव मचा रहे हैं। इस प्रकार के चौमुखी संघर्ष की कल्पना
बादशाह ने कभी नहीं की थी।
मराठों के उपद्रव से मुगल क्षेत्र की प्रजा हैरान हो गयी थी। दो दिनो में
बादशाह ने विचार-विमर्श के लिए बैठक बुलायी। रात में देर से असद खान के साथ
सभी अधिकारी बादशाह के पास जमा हुए। बादशाह ने कल्याण की ओर भेजी गयी
सेना की गतिविधियों की जानकारी ली। उसी बैठक में उसने शहजादा आजम और
दिलेर खान को आदेश दिया—‘‘जाओ अहमदनगर के बाहर निकलो, घोड नदी को
पार करो। मरगट्ठों के क्षेत्र में घुस जाओ। उनके गाँव, खेत सब कुछ बर्बाद करो।
सम्भा के क्षेत्र में कुहराम मचा दो।’’
शहजादे आजम और दिलेरखान ने सहमति से गर्दनें हिलाईं। बादशाह की
नजर हट्टे कट्टे जुल्फिकार पर पड़ी। उसने ऊँची आवाज में पूछा—‘‘क्या खबर है
रामशेज की?’’
‘‘जहाँपनाह शहाबुद्दीन साहब कोशिश कर रहे हैं। मरगट्ठे किले पर चढ़ने
नहीं दे रहे हैं। शहाबुद्दीन साहब जिद पर अड़े हैं। वे वहाँ के बडे-बड़े पेड़ काटकर
लकड़ी की एक मीनार बनाने की शुरुआत की हैं। उस ऊँची मीनार पर तोप चढ़ाकर
रामशेज को ध्वस्त करेंगे, ऐसा उनका इरादा है।’’
यह समाचार सुनकर बादशाह प्रसन्न हुआ। उसने असदखान को हुक्म
दिया—‘‘वजीरे आजम रामशेज और खानदेश के युद्ध पर विशेष ध्यान दो।’’
‘‘हजरत गुस्ताखी माफ।’’ बीच में असद खान घुटनों के बल बैठते हुए
बोला, ‘‘नासिक और खानदेश में जाकर इतनी बड़ी सेना ले जाकर जाया करने की
जरूरत ही क्या है? उससे बेहतर तो यह होगा कि हम सम्भा के रायगढ़ पर सह्याद्रि
पर्वत पर सीधा हमला करें।’’
अपने वजीर की सलाह सुनकर बादशाह ने आँखें फैलाकर देखा। एक लम्बी
साँस लेकर बादशाह ने कहा, ‘‘वजीरे-आजम, आपके इरादे काबिले तारीफ हैं।
लेकिन आते-आते ही रायगढ़ और सह्याद्रि पर आक्रमण करके अपने बादशाह को
अपने लिए मौत का कुआँ खोदने की सलाह क्यों दे रहे हो? उससे उस शैतान
सम्भा का ही फायदा होगा। वह सह्याद्रि सचमुच भूतों का डेरा है।
घने पहाड़ों में अफजलखान नाम के इस्लाम के बन्दे को शिवाजी ने बकरे की
सम्भाजी .. 407