छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
आपकी कृपा से सम्भव हुआ। महाराज बहुत-बहुत शुक्रिया! आज आपको एक
खुशखबरी देते हुए मुझे भी बड़ी खुशी हो रही है। आप भी एक प्यारी-प्यारी बेटी
के पिता हुए हैं।" यह समाचार पढ़ते ही शम्भुराजा के सर्वांग से आनन्द की बिजली
दौड़ गयी। वह धम्मभ से बिछौने पर बैठ गये। भूपालगढ़ के दिन उन्हें स्मरण हो
आये। उस समय समस्याओं से ग्रस्त दुर्गा देवी का चित्र उनकी आँखों के सामने
साकार हो गया।
शम्भुराजा की आँखों में आनन्दाश्रु भर आए। दूसरे ही क्षण लाडली बेटी का
स्मरण करके उनका हृदय भर आया। वे आगे का समाचार पढ़ने लगे—"बेलों में
फूल आने से माली खुशी से पागल हो उठता है। आप तो मराठों के बादशाह हैं।
आज आपकी राजकन्या औरंगजेब के अहमदनगर के किले में कैद है और वहीं
छोटी से बड़ी हो रही है। किसी बात की चिन्ता न करें। आपकी रानी, राणूदीदी
और लाडली बेटी की औरंगजेब ने अच्छी व्यवस्था की है। फिर भी पिंजड़ा तो
पिंजड़ा ही है, चाहे सोने का हो या लकड़ी का। किन्तु आप चिन्ता न करें।
कई जन्मों के लिए आपका शुक्रगुजार यह मियाँखान अभी जिन्दा है। बीमारी
की वजह बताकर अहमदनगर किले में ही एक छोटी नौकरी कर ली है। यहाँ यह
मियाँखान बादशाह की नहीं, अपनी राजदुलारी शहजादी की सेवा-चाकरी कर रहा
है।"
शयनगृह में उस रात अपनी बेटी का स्मरण करके राजा के धैर्य का बाँध टूट
गया। वे अपना रोना रोक नहीं सके। उनके रोने की आवाज से महारानी येसूबाई भी
जग गयीं। पत्र पढ़कर उनका भी मन भर आया। वह भी रोने लगीं। शम्भुराजा
संभले। येसूबाई के पेट में भी एक शिशु था। उसे कष्ट न पहुँचे इसलिए वे येसूबाई
को समझाने लगे। उन्हें धीरज बँधाने लगे। रानी के कपोलों पर अपनी उँगलियाँ
घुमाते-घुमाते बेटी की स्मृति में उनका मन बहुत छोटा होता जा रहा था।
प्रातः काल राजाज्ञा हुई। रायगढ़ पर जलेबियों की परातें आने लगीं। बहुत
लोगों को आश्चर्य भी हुआ। प्रजा में कानाफूसी होने लगी। खंडो बल्लाल ने
शम्भुराजा से पूछा, "महाराज, अभी महारानी प्रसूति के लिए मायके गयी भी नहीं,
तब तक ये जलेबियाँ?"
"क्यों ?"
"नहीं, महाराज को पुत्ररत्न प्राप्त हो ऐसी प्रजा की हार्दिक इच्छा है। हम
सब पेड़े चाहते हैं और आप जलेबियाँ बाँट रहे हैं।"
ऐसा है खंडोजी, बच्ची की इच्छा हुई तो आज जलेबियाँ। कल पुत्रप्राप्ति के
बाद पेड़े तो हैं ही।" इसी प्रकार कुछ कहकर शम्भुराजा ने बात को टाल दिया।
382 :: सम्भाजी
दो
शम्भूराजा को राजधानी में आये पाँच दिन हो चुके थे परन्तु उनका दर्शन दुर्लभ था।
वे न तो दरबार में आते थे और न ही जगदीश्वर के दर्शन के लिए बाहर निकलते
थे। उन्होंने अपने महल में स्वयं को बन्द कर लिया था। वे बीमार नहीं थे किन्तु
युद्ध नाम के ज्वर ने उन्हें पूरी तरह हैरान कर दिया था।
शम्भूराजा के साथ येसाजी कंक, म्हालोजी घोड़पड़े, निलोपन्त पेशवा,
प्रह्लाद निराजी, खंडो बल्लाल, यानाजी मोरे जैसे पुराने प्रतिष्ठित लोग और नयी
ऊर्जा के वीर सिर से सिर लगाकर बैठे थे। चार दिन किसी प्रकार बीत गये। गुप्त
मन्त्रणा अखंडरूप से चलती रही। दुर्गादास राठौर और शाहजादा अकबर का निवास
वकीलों के निवास के पास था। वे दिन में कभी-कभी आकर विचार-विमर्श में
भाग लेते थे। उनमें केवल दुर्गादास में ही इन कार्यों रुचि दिखाई पड़ती थी।
पिछले चार दिनों से शम्भूराजा प्रातःकाल आठ-नौ बजे से विचार गोष्ठी में
बैठ जाते थे। वहीं पर दोपहर और रात के भोजन के लिए थालियाँ आ जाती थीं रात
बीतने पर मुर्गे की पहली बाँग के साथ ही वे अपना स्थान छोड़ते थे। केवल घंटे दो
घंटे की ही नींद किसी प्रकार ले पाते थे। पुनः स्नान करके घंटे भर उनकी पूजा
चलती थी। इसके बाद गर्म दूध का प्याला उनके ओठों को लगता था। फिर वे
जल्दी में वस्त्र धारण करते थे। निजी कक्ष से सदर की ओर जाते हुए रायप्पा और
अन्य सेवक लिवासबन्द बाँधते और रत्नों के आभूषण पहनाते थे।
भीतर निजी दरबार में इतना व्यस्त कार्यक्रम चल रहा है, इसका किसी को
अनुमान तक न था। लेकिन विचार-विमर्श करते समय अर्जोजी यादव और
कान्होजी भांडवलकर जैसे विशेषज्ञों द्वारा बनाये गये मानचित्र एवं मोम की बनी
अनेक किलों की प्रतिकृतियाँ सदैव ही रखी रहती थीं। उनका अध्ययन करते हुए,
सारी रात मशाल की तरह आँख जलाते सभी रात भर जागते रहते थे। औरंगजेब के
भयंकर आक्रमण से शंभूराजा बहुत सावधान हो गये थे। बादशाह की पाँच लाख की
फौज और लगभग तीन लाख घुड़सवारों का समुद्र की तरह गरजते हुए स्वराज्य पर
चढ़ आना उन्हें अच्छी तरह स्मरण था। इस प्रचण्ड का मुँह मोड़ने, उसे दूसरी ओर
घुमा देने के लिए कौन-सा भगीरथ प्रयास किया जाय? इसी की चर्चा हो रही थी।
पिछली रात अचानक इस चर्चा में हंबीर मामा अवतरित हुए। उन्हें देखकर
नये-पुराने सभी सदस्य आश्चर्यचकित हुए। शम्भूराजा ने आश्चर्य से पूछा-
“मामाऽऽ आप यहाँ आयेंगे, ऐसी सम्भावना नहीं थी। आप तो वहाँ मोर्चे पर ... ?”
शान्त स्वभाव के हंबीरराव मोहिते हँसते हुए बोले, “शम्भू बेटे, हम बड़े
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महाराज के सेनापति रहे हैं और उनके प्रिय बहनोई भी। उनसे दो-चार अध्याय तो
पढ़े ही हैं।"
"मतलब?"
"दूसरा एक बन्दा हंबीर बनकर बी गरी का स्वांग किये हमारी भूमिका निभा
रहा है। हमारे शत्रुओं को ही नहीं मित्रों को भी यही विश्वास है कि मैं मोर्चे पर
मौजूद हूँ।"
"वाहऽऽ।" शम्भूराजा ने हंबीरराव की प्रशंसा की।"
हंबीरराव की उपस्थिति से सभी में उत्साह आ गया।
जिस समय किले पर जोरों की चर्चा चल रही उसी समय रायगढ़ किले की
तलहटी में निर्माण कार्य जोरों पर था। नयी सेना गठित की जा रही थी।
रायगढ़वाड़ी के अठारह कारखाने रात-दिन युद्ध सामग्री तैयार करने में लगे थे।
पाँचवें दिन दोपहर को प्रमुख व्यक्तियों की बैठक आरम्भ हुई। उसके पूर्व ही
कवि कलश राजधानी में वापस आ चुके थे। उन्होंने तोप गोलों का, कच्चे बारूद
का, भावी योजना का सारा ब्यौरा शम्भूराजा के सम्मुख प्रस्तुत किया। बैठक शुरू हो
गयी किन्तु महारानी येसूबाई अभी भी वहाँ पहुँच नहीं पायी थीं। राजा को अपनी
सहचरी महारानी की प्रतीक्षा थी। उसी समय महल के बाहर पैरों की आहट सुनाई
दी। महारानी के साथ गयी आठ-दस पालकियाँ वापस आयी थीं। अपनी पाँच
महीने की गर्भावस्था में भी बिना किसी का सहारा लिए, अपने को सँभालते हुए
येसूबाई बाहर निकलीं। उसी अवस्था में वे आकर बैठक में सम्मिलित हो गयीं।
महारानी को कुछ विलम्ब हो जाने से राजा को चिन्ता हुई। उनकी प्रश्नातुर
आँखों का भाव समझकर येसूबाई बोली- "जंजीरें की लड़ाई में काम आये चार सौ
सैनिकों की सूची आयी थी। उनमें से तीस बालपरवेशी निकले। उनकी व्यवस्था
देखने के बाद ही मैं यहाँ आयी।"
बैठक में उपस्थित दुर्गादास राठौड़ ने शम्भूराजा की ओर दृष्टि घुमाई।
शम्भूराजा ने उन्हें बताया- "हिन्दवी स्वराज्य के लिए जो युद्ध में वीरगति प्राप्त
करते हैं उनके बाल-बच्चों की समुचित देखरेख के लिए पिताजी ने बालपरवेशी
व्यवस्था आरम्भ की थी। आज भी हम उसका निर्वाह कर रहे हैं।"
"बालपरवेशी, यानी क्या?"
"युद्ध में जिन बच्चों के पिता काम आते हैं, उनका पालन-पोषण अपने
बच्चे की तरह राज्य की ओर से किया जाता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर जब तक
स्वयं सेना में भर्ती नहीं हो जाते तब तक उनका सारा दायित्व राज्य पर होता है।
उनकी माँ का यदि कोई दूसरा सहारा नहीं है तो उसकी भी व्यवस्था बालपरवेशी
गृह में की जाती है।"
"वाहऽ वाह! बहुत खूब-"
384 : सम्भाजी
“हाथियों के पीलखाने के पास हमारा एक बड़ा बालपरवेशी गृह है। एक
बार जाकर देख लो। केवल रायगढ़ पर हिन्दू, मुस्लिम, ब्राह्मण आदि सभी जातियों
और धर्मों के सत्तर बालपरवेशी रहते हैं। उनमें जंजीरा के नये तीस और जुड़ेंगे।”
इस यथार्थ को सुनकर दुर्गादास बहुत भावुक हो गये। वे कहने लगे—‘‘वाह
शम्भू महाराज! यह दुर्गादास दिल्ली, आगरा, राजपूताना जैसे अनेक प्रदेशों में घूमा
है। परन्तु शिवाजी और सम्भाजी महाराज जैसा प्रजाहितैषी राजा, कोई दूसरा देखने
को नहीं मिला।”
चर्चा आगे चलती रही। युद्ध सम्बन्धी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार-विमर्श के
लिए सभी अष्ट प्रधान, सेनापति, नये-पुराने सरदार और राजा के मुख्य सहयोगी
उपस्थित थे। दादाजी रघुनाथ देशपांडे ने जंजीरे की लड़ाई अभी तक चालू रखी थी।
कोंकण के समुद्रतट पर प्रत्येक बन्दरगाह में पुर्तगाली-मराठा संघर्ष की आग सुलग
रही थी। जिस प्रकार कोई सपेरा पूरे घर को विषैला बना देने के लिए अपने साँपों की
सभी टोकरियाँ खाली कर देता है उसी प्रकार हिन्दवी स्वराज्य को समाप्त कर देने
के लिए मुगलों की फौज बाहर निकली थी। ऐसी परिस्थिति में स्वराज्य के दूसरे
छत्रपति सम्भाजी महाराज अपने स्वराज्य के लिए क्या निर्णय लेते हैं? इस पर सभी
का ध्यान केन्द्रित था।
सम्भाजी महाराज ने अत्यन्त विनम्र शब्दों में कहना आरम्भ किया—‘‘बहादुर
जवानों, हम मराठों के लिए पर्वतराज सह्याद्रि वैसे ही जीवन और प्राण के समान है
जैसे श्रीकृष्ण के लिए गोकुल था। हमारे पिताजी यही मानते रहे। उन्होंने सह्याद्रि
नाम का ही लौह कवच धारण किया था। सह्याद्रि का आश्रय लेकर ही अनेक दाँव-
पेंच का प्रयोग करके, हिन्दवी स्वराज्य की सोने-मोतियों की फसल काटी।”
‘‘परन्तु शम्भूजी महाराज! हमारे समय की लड़ाइयाँ बहुत छोटी थीं। किसी
की पाँच लाख की फौज तो हमारे सपनों में भी नहीं आयी थी।” युद्ध अनुभवी
मालोजी घौड़पड़े ने कहा।
‘‘वही कह रहा हूँ, घौड़पड़े काका।” शम्भूराजा ने दृढ़ शब्दों में कहा,
‘‘जब तक सह्याद्रि नाम का यह लौह कवच हमारे पास है तब किसी की क्या
चिन्ता? कल तो पाँच तो क्या दस लाख की फौज का समुद्र हमारे ऊपर चढ़ आये
तो भी हम उसे इस सह्याद्रि के कवच से चकनाचूर कर देंगे।”
शम्भूराजा के इस आत्मविश्वास से सभी के भीतर स्वाभिमान और वीरत्व की
लहर दौड़ गयी। किन्तु आरम्भ में ही उन्होंने सभी को एक संकेत दिया।
‘‘एक बात स्मरण रखो। औरंगजेब की इतनी बलशाली सेना का खुले मैदान
में मुकाबला करना हमारे लिए वज्रघात होगा। नेसरी के जंगल में प्रतापराव गूजर ने
आदिलशाही फौज पर आक्रमण करके अपने प्राण गँवा दिये। वे अमर हो गये।
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किन्तु अब हमें भावावेश में नहीं, बहुत सोच समझकर सुनियोजित ढंग से अत्यन्त
सावधानीपूर्वक कदम बढ़ाना होगा। हम ऐसी खूबी से लड़ें कि इसी दक्षिण के
जंगल में उस पापी औरंगजेब की कब्र खोद दें। हमें महाराष्ट्र के ललाट पर शिवाजी
महाराज द्वारा अंकित हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा करनी है। साथ ही अपने साढ़े तीन
सौ किलों और समुद्री जहाजों में से एक भी खोना नहीं है। "
अर्जोजी द्वारा बनाये गये मानचित्र की ओर उँगली से संकेत करते हुए
शम्भूराजा ने कहा, "हम मराठा लोग केवल सह्याद्रि के जंगलों में छुपकर नहीं बैठे
थे। बल्कि कुडाल मालवन से लेकर बसई और तारापुर तक का हब्शियों का सारा
क्षेत्र, अपवाद स्वरूप मुम्बई को छोड़कर सम्पूर्ण समुद्रतट, वहाँ के सारे बन्दरगाह,
सभी खाड़ियाँ हमारे अधिकार में रहे हैं। कुकड़ी नदी के पास से लेकर नीचे
कोल्हापुर, बेलगाँव तक का बारह-बारह चौबीस मावल और अड़तीस नेरे के क्षेत्र
में हर नदी, हर पहाड़, हर घाटी पर जगह-जगह हमारी चौकियाँ रात दिन पहरा
देती हैं। हमारे सह्याद्रि का प्रत्येक किला वस्तुतः पिघले लोहे का कुंड है।"
"महाराज ! फिर भी अपना प्राणतत्व क्या है ?" निलोपन्त पेशवा ने पूछा।
"जहाँ सम्भव हो वहाँ तत्काल आक्रमण करना जहाँ सम्भव न हो वहाँ कुछ
समय के लिए पीछे हट जाना। हमारा शत्रु होशियार और अनुभवी है। वह यकायक
सह्याद्रि पर आक्रमण कर देने की हिम्मत नहीं दिखाएगा। किन्तु यदि उसने आक्रमण
कर दिया तो यहाँ की घाटियों में हम मुगल सेना को अच्छा सबक सिखाएँगे।"
"परन्तु महाराज ! शत्रु जब तक सह्याद्रि की बाँहों में नहीं आ जाता क्या तब
तक हम उसकी प्रतीक्षा करेंगे ?" हंबीरराव ने पूछा।
"छि · छि : कतई नहीं।' शत्रु और सर्प को जिन्दा छोड़ना युद्धशास्त्र की दृष्टि
से घातक है। यह सच है कि एक ओर मुगलों की पाँच लाख की फौज है और
दूसरी ओर हमारे साठ-सत्तर हजार सैनिक। किन्तु इसीलिए हमें रुकना नहीं है।
अपनी सेना की छोटी-छोटी टोलियाँ बनाकर मुगलों की सेना और उनके प्रदेशों पर
टूट पड़ना है। उन्हें जला-जुलाकर और लूटपाटकर कंगाल करना है। यही हमारी
नीति है। हंबीरराव आप पहले की भाँति अपना आग का खेल जारी रखकर मुगलों
को अधिक से अधिक हानि पहुँचाएँ।"
इस विचार-विमर्श में छोटे से छोटे मुद्दों पर गम्भीरता से चर्चा की गयी।
अपने और पराये का विवरण प्रस्तुत किया गया। उसी समय सेनापति हंबीरराव
मोहिते बोले, "परम्परा के आधार पर विचार किया जाये तो हैदराबाद का
कुतुबशाह, बीजापुर का आदिलशाह, जंजीरे के सिद्दी, दिल्ली के मुगल और
पुर्तगाली ये पाँच हमारे प्रमुख शत्रु हैं।"
"परन्तु हंबीरराव एक ही समय में सभी शत्रुओं के साथ युद्ध छेड़ना,
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युद्धशास्त्र की दृष्टि से मूर्खता होगी। सौभाग्य से आदिलशाह और कुतुबशाह हमारे
दोनों शत्रु पिताजी के अन्तिम दिनों में मित्र बन गये थे। इसके लिए पिताजी ने
राजनैतिक दबाव और कूटनीति का रास्ता अपनाया था। यह मैत्री भाव हम भी चालू
रखेंगे। हाँ, भविष्य में जब औरंगजेब और हमारी अन्तिम और निर्णायक लड़ाई
आरम्भ होगी तब दक्षिण के सभी राजा एकत्र होंगे। उस स्थिति के लिए हम रात
दिन प्रयास कर ही रहे हैं।''
सिद्दी का नाम आते ही कवि कलश अधीर होकर बोल पड़े—‘‘राजन, वह
सिद्दी नाम का नटखट चूहा उसी समय चीर दिया गया होता तो कितना
अच्छा होता ?’’
इस प्रसंग से शम्भूराजा कुछ विचलित हो गये। किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपने
को संभाल लिया। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे आक्रमण से जंजीरे के बुर्ज गिर गये हैं।
सिद्दी पराजित नहीं हुआ फिर भी वह अन्दर मे पूरी तरह हिल गया है। अब इसके
बाद सिद्दी बन्धु खुलकर औरंगजेब से मिलने के लिए भी नहीं दौड़ेंगे क्योंकि
पहले आक्रमण में ही हमने उनके हौसले पस्त कर दिये हैं।''
बीच में ही येसूबाई ने खंडो बल्लाल को सामने बुलाया। वे नम्र स्वर में
बोलने लगीं—‘‘एक बार युद्ध भूमि पर घोड़े नाचने लगें तो रसद की माँग बढ़ जाती
है। राजधानी की ओर रसद के माँगपत्र आने लगते है। यदि बिना रसद के अपने
सैनिकों के प्राण संकट में पड़ें तो इससे बड़ा दूसरा पाप नहीं। हमें नासिक से दक्षिण
में जिंजी और रामेश्वर तक सेना के लिए रसद पहुँचानी पड़ती है। स्वामी को पहले
ही इस ओर ध्यान देना चाहिए।''
शम्भूराजा ने तत्काल रसद सम्बन्धी जानकारी ली। विशेष रूप से उन्होंने
कर्जत, कोथलागढ़, शाहपुर, माहुली के शक्तिशाली किलों नासिक की ओर
अहिवन्तगढ़, साल्हेर और मुलेर के किलों, अष्टागार के सागरगढ़, सिंधुदुर्ग,
राजापुर, जैतापुर जैसे किलों में रसद और गोला बारूद की स्थिति का जायजा लिया।
सभी जगहों पर जाँच की गयी। जहाँ कुछ कमी थी वहाँ रसद भेजने का ओदश
दिया गया।
येसूबाई ने कहा, ‘‘इस वर्ष पूना की ओर भयानक दुर्भिक्ष पड़ा है। सरकार से
कहकर हमने पहले ही अनाज के बोरे और कोंकण से पिंजड़े वाली गाड़ियाँ वहाँ
भेजी हैं। इसके पहले अष्टागार का सूखा भी बहुत ही जानलेवा था।‘‘
शम्भूराजा का चेहरा तनावग्रस्त हो गया। वे कहने लगे—‘‘यद्यपि अतिवृष्टि
और अनावृष्टि के कारण आने वाला दुर्भिक्ष राज्य के सामने घोर सकट बना हुआ है।
अनेक बार प्रकृति के रौद्र रूप के सामने मनुष्य का कोई जोर नहीं चलता। किन्तु शत्रु
की इतनी बड़ी फौज का यहाँ रहना और लगातार लड़ाइयों का होते रहना, इस
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दुर्भिक्ष के संकट को और भी बढ़ाने वाला है।"
"खंडोबा!"
"जी महाराज!"
"इस सम्बन्ध में सेना और प्रजा को सावधान रहने की सूचना जल्दी ही
दे दो।"
शम्भूराजा ने दरिया सारंग और दौलतखान को जानबूझकर जंजीरे की लड़ाई
से वापस बुला लिया था।
शम्भूराजा ने कहा, "हमारे समुद्रीतटों पर लगभग सौ वर्षों से पुर्तगालियों का
क़ब्जा बना हुआ है। उन्हें उखाड़ फेंकना सरल नहीं है। चौल, थाने, बसई , तारापुर
में फिरंगियों के साथ हमारी नोंक-झोंक जारी है। निलोपन्त, फिलहाल आपकी
नियुक्ति किसी न किसी बन्दरगाह या खाड़ी के किनारे होगी। बोलिएऽऽ"
महाराज, हमारी सेना ने माहिम और तारापुर की पुर्तगाली चौकियों पर पहले
ही झटके में कब्जा कर लिया था। उनमें माहिम पुनः फिरंगियों के क़ब्ज़े में चला
गया। किन्तु तारापुर को पुनः हमने अपने अधिकार में खींच लिया। चोल और
देवदंड क्षेत्र में हमारा आग का खेल चल ही रहा है।"
"वाह निलोपन्त आजकल पेशवा होने पर भी आपकी कलम से स्याही
गिरने की जगह आपकी तलवार से फिरंगियों का खून बहता है। 'निलोबा
आयाऽऽ' सुनते ही फिरंगियों की जहाजें पानी के पेट में बैठ जाती हैं। आपका यह
पराक्रम देखने के लिए मोरोपन्त को जीवित रहना चाहिए था।"
शम्भूराजा ने गोवा के पास अंजदीप टापू पर तटबन्दी निर्माण के लिए सेना
भेजी थी। आवश्यक पत्थर और चूना भी भेजा गया था। उसका स्मरण दिलाते हुए
राजा ने पूछा—"कविराज आप डिचौंली से होकर आये हैं। बतायें कि अंजदीप पर
किले का निर्माण कार्य कहाँ पहुँचा है?"
"निर्माण कार्य आरम्भ होते-होते ही पुर्तगालियों के जहाज वहाँ आ गये।
उन्होंने निर्माण का कार्य रोक दिया।"
"लेकिन आज तक तो वह जगह मुक्त ही थी। कविराज, आप लोगों की
समझ में क्यों नहीं आता कि भविष्य में गोवा के फिरंगियों की छाती पर पाँव जमाने
के लिए वह जगह बहुत ही उपयोगी है।
"वस्तुतः यही बात उस काँट दी आल्व्होर ने भी अनुभव की है इसीलिए तो
उन्होंने तत्काल काम को रोक दिया।"
सम्भाजी महाराज विचारमग्न हो गये। फिर वे एक उच्छवास छोड़ते हुए
बोले, "सिद्दियों की तरह ही इन फिरंगियों को भी अपाहिज बनाकर छोड़ना
चाहिए। गोवा के साथ ही इस वाइसराय को भी पानी में डुबो देना चाहिए। नहीं तो
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यह रँगा सियार जल्दी ही उस औरंगजेब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो
जाएगा।"
इस विचार गोष्ठी में अनेक नये निर्णय लिए गये। घोड़ों की नस्ल सुधारने के
लिए सरदारों, थानेदारों, देशमुख और देशपांडे को रुपये दिये गये।
औरंगजेब के आक्रमण को किस प्रकार रोका जाय? इस विषय पर शम्भूराजा
ने बहुत विस्तार से चर्चा की। येसाजी और हंबीरराव से प्राप्त सूचनाओं पर गम्भीरता
से विचार किया। शम्भूराजा सन्तुष्ट दिख रहे थे। उन्होंने कहा-
"फिलहाल अपने राज्य में भाईबन्दी में धोखेबाजी घुला पानी स्वच्छ होता
दिखाई पड़ रहा है। वैसे तो स्त्रियों के बारे में छोटी-मोटी कहानियाँ गढ़कर बाजार
में गप्पें लगाने और अफवाहों को फैलाने में दिमाग की कोई जरूरत नहीं होती।
किन्तु औरंगजेब जैसे बलशाली शत्रु और समुद्र सी उफनती उसकी विशाल सेना
का मुकाबला करने के लिए पहाड़ जैसी बलवान छाती चाहिए। शेर की तरह साहस
चाहिए। माँ भवानी की कृपा और पुण्यवान पिता के आशीर्वाद से हम इस अग्निदाह
से अवश्य ही सही-सलामत बाहर निकलेंगे।"
बोलते बोलते शम्भूराजा यकायक चुप हो गये। सभा में गाते हुए जैसे कोई
सिद्ध गायक अपनी गायनकला में तल्लीन हो जाता है उसी प्रकार युद्ध की योजना
बनाते समय शम्भूराजा की स्थिति हो रही थी। वे बोले-"कोई भी किला यदि
अजेय रह सकता है तो उसमें संचित गोला बारूद के भंडार और साहसी सैनिकों
के बल पर ही। गोले बारूद की आग एक बार बुझ जाये तो भी कोई बात नहीं
किन्तु घोर प्रतिकार करने वाले जवानों के सीने की आग कभी ठंडी नहीं पड़नी
चाहिए। क्यों हंबीरराव?"
"बिलकुली ठीक सम्भाजी राजा।"
अचानक शंभूराजा को अपनी दादी जीजामाता का स्मरण हो आया। वे
प्रसन्नता से हँसे। पूर्णिमा की ज्योत्स्ना उनके चेहरे पर फैल गयी। उसी समय एक
पुरानी बात उनकी स्मृति में उछली। वे भावुक होकर कहने लगे-
"किसी किले को जीतने के लिए आक्रमण कैसे करना चाहिए? और उसे
किस प्रकार कब्जे में लेना चाहिए? इसकी वीरतापूर्ण कहानियाँ मैंने दादी की गोद में
सिर रखकर सुनी हैं। देवगिरी का किला अजेय था। किन्तु हमारे परदादा-लखुजी
जाधवराव साहब ने कैसे आक्रमण किया? इसकी कथा दादीजी ने मुझे सुनाई थी।
वह मैं आप लोगों को बताऊँ?"
"हाँ, हाँ, महाराज अवश्य सुनाइये।" बैठक में चारों ओर से आवाज आयी।
"देवगिरी का किला ऊँचाई पर बना है। किले के ऊपरी हिस्से में जाते समय
अनेक गुप्त रास्ते बने हैं। ये रास्ते अँधेरे से होकर जाते हैं। बीच में आग और पानी
की खंदकें बनाई गयी हैं। यदि किसी ने इस विशालकाय किले पर आक्रमण करने
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के लिए सोचा भी तो पहले उसे किनारे की तटबन्दी पार करनी पड़ेगी फिर खंदक।
यदि किसी तरह खंदक पार करने में कोई सफल हो गया तो फिर उसे ऊपर सरकने
में बड़ी कठिनाई होगी। बीच में ही अनेक अन्धे मोड़ और गुप्त रास्ते हैं। यदि इन
अँधेरे रास्तों का ज्ञान नहीं है तो कोई भी सेना अधिकारी अपनी फौज के साथ इन्हीं
अँधेरे रास्तों से होकर गहरी गुफाओं में जा गिरेगा। या फिर किले के नीचे गिर कर
मोक्ष लाभ करेगा। इस तरह के रास्तों को किले के निर्माण के समय ही योजनाबद्ध
तरीके से बनाये गया है। ये समस्याएँ आक्रमणकारी के ध्यान में भी नहीं आएँगी।"
"यह कैसे ?" हंबीरराव ने बीच में ही प्रश्न किया।
"क्योंकि उनकी रचना पैरों के नीचे की जाती थी।" शंभूराजा हँसते हुए
कहने लगे—"आगे जाने के लिए पैरों के नीचे काली जमीन नहीं पन्द्रह-सोलह
हाथ लम्बी लोहे की चद्दर बिछी है। यह बात किसी के भी ध्यान में नही आ
सकती। जब बाहर की तटबन्दी पर कोई आक्रमण होता है तो इस लम्बी फौलादी
चादर को तपा दिया जाता है। नीचे लकड़ियाँ जलाने के लिए हवा भी आनी चाहिए
दीवार में सुरंगें बना दी गयी थीं। हमारे परदादा किला जीतते हुए उस तपती लौह
चादर तक जा पहुँचे थे। उस समय किले के सैनिक उनके परिणाम की कल्पना
करके मन ही मन हँसने लगे।
"हँसेंगे ही, उस भयानक संकट की उन्हें क्या जानकारी थी?" महारानी
येसूबाई बोली।
"नहीं, महारानी, हमारे परदादा बड़े बुद्धिमान थे। किला जीतने का संकल्प
लेकर वे अन्दर गये थे। अन्दर जाते समय ही वे अपने साथ पानी से भरी हुई बड़ी
बड़ी चमड़े की मोटें और डोले ले गये थे। उस तपती चादर पर शीघ्रता से पानी
उड़ेल दिया गया और वह तपता तवा बुझ गया। उस अभिमानी अजेय किले ने
अपना सिर हमारे परदादा के कदमों में रख दिया।"
यह यथार्थ कथा सुनकर सभी लोग दंग रह गये।
बैठक में हुई दीर्घकालीन चर्चा का एकबार पुनः मूल्यांकन किया गया।
शम्भूराजा ने अन्त में कहा, "सम्भव होगा तो सभी मोर्चों पर आक्रमण होगा। जहाँ
सम्भव नहीं होगा वहाँ कुछ समय के लिए युक्तिपूर्वक पीछे हटना हमारी नीति
होगी। लाखों की सेना लेकर औरंगजेब आएगा। उसे युक्ति से टालना होगा। रुक
गया तो चकमा देंगे। सह्याद्रि की ढाल पेट और पीठ से बाँधकर उस पापी औरंगजेब
से हम धर्मयुद्ध लड़ेंगे।
"वाहऽ वाहऽ" बैठक के सभी लोगों ने राजा के निर्णय की प्रशंसा की।
खंडो बल्लाल, कविकलाश, निलोपन्त एक एक को चेतावनी देते हुए और
उन्हें संकल्प का रस पिलाते हुए शंभूराजा ने कहा—
"इसलिए कहता हूँ यारो! हमारे कन्धे पर शिवाजी महाराज और जीजामाता
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के पुण्य और बौद्धिक चैतन्य का पावन प्रसाद है। यह दैव दुर्लभ आशीर्वाद यों ही
नहीं समाप्त हो जाएगा। चलिए, निर्णय के अनुसार उस बादशाह और उसकी पाँच
लाख की सेना पर टूट पड़ें।
जिस प्रकार मद्य मे पागल हाथी किले के सिंहद्वार पर सिर पटकता है और
द्वार में लगे बड़े-बड़े खीले उसकी मस्ती को दूर कर देते हैं, उसी प्रकार कल
रायगढ़ पर अधिकार न कर पाने के कारण औरंगजेब नाम का बूढ़ा हाथी हमारे
दरवाजे पर निराश होकर धक्का मारेगा, अपना मस्तक फोड़कर हमारे सिंहद्वार पर
अपना खून बहाएगा। तभी सच्चे अर्थों में विजय की रंगोलियाँ बनाएँगे और नौबत-
नगाड़े बजाने का आरम्भ करेंगे।"
तीन
शम्भुराजा विचारगोष्ठी से हंबीरराव को अपने साथ अन्दर ले गये। बीच के चौक में
हंबीरराव बैठ गये सम्भाजी राजा और महारानी येसूबाई हंबीरराव की ओर एकटक
देखते रहे। उनकी इस दृष्टि से हंबीरराव विचलित हो गये।
शम्भुराजा ने दुखी स्वर में कहा, "हंबीरराव, जिन पर हम प्राण निछावर करते
हैं, ऐसे तीन प्राणी तीन वर्ष से बादशाह के बन्दीखाने में पड़े हुए हैं। उनके बिना यह
वैभव, यह गजपद हमें दुखी करता है।"
हंबीरराव ने राजा की ओर घबराई निगाहों से देखते हुए कहा, "एक राणूबाई
और दूसरी दुर्गाबाई- क्या यही दो नहीं?"
"हंबीरराव हमें एक कन्यारत्न की भी प्राप्ति हुई है। यह समाचार बाद में
मिला है। यह समाचार वहाँ के हमारे अपने आदमी ने दिया है। इसलिए खबर
पक्की है। हमारी कन्या अब तीन वर्ष की हो गयी होगी।" यह कहते हुए
शम्भुराजा का स्वर काँपने लगा।
हंबीरराव को धक्के पर धक्के लग रहे थे। राजकन्या की प्राप्ति की खबर,
बादशाह के अन्तःपुर तक पहुँचे शम्भुराजा के हाथ। हंबीरराव को विस्मयकारक
लगा। किन्तु उन्हें सोचने के लिए अधिक समय न देते हुए शम्भुराजा गरजे- "क्यों
हंबीरराव, क्यों? पिछले तीन वर्षों से हमें कहते रहे है। हमें स्वयं अहमदनगर के
किले पर आक्रमण करना चाहिए था। अपने प्रियजनों को शत्रु के बन्दीखाने में सड़ता
सम्भाजी :: 391
हुआ छोड़कर, यहाँ राजा बनकर जीने का हमें क्या अधिकार है?''
"शम्भू बेटे! स्वराज्य का सेनापति होने के नाते मुझे आप से भी अधिक
लज्जा आती है। हम इस बात से बहुत लज्जित हैं। परन्तु हम शान्त नहीं बैठे थे।
हमारी दस-दस हजार की फौजें उस किले पर आक्रमण कर चुकी हैं। उनके बाद
हमारी फौज तूफानी चक्रवात की तरह अहमदनगर के चारों ओर चक्कर काटती
रहीं। परन्तु निजाम घराने का वह किला बहुत मजबूत है। वहाँ का किलेदार
रूहूल्लाखान भी शक्तिशाली है। वह प्रदेश मुगलों का है और सह्याद्रि से बहुत दूर
है। शत्रुओं का पहरा भी शक्तिशाली है फिर भी हम पीछे नहीं हटे।"
"हंबीरराव, कुछ तो कीजिए।" येसूबाई ने अतिस्वर में कहा।
"और यदि आपसे हो सकता है तो हमें जाने दीजिए। हम स्वयं जाकर किले
का दरवाजा तोड़ेंगे।"
"महाराज! आपकी इसी उतावली प्रवृत्ति से हमें भय लगता है।"
हंबीरराव कहने लगे- "शम्भू बेटे, आप शान्तिपूर्वक सारी बातों को अच्छी
तरह समझ लें। बड़े महाराज का जन्म शिवनेरी किले पर हुआ था। किन्तु उस किले
से लगा हुआ जुन्नर का इलाका हमेशा मुगलों के अधीन रहा। जालनापुर से आते
समय शिवाजी महाराज को संगमनेर के समीप रणमस्तानखान ने किस तरह पकड़
रखा था? उन्हीं के मुँह से आपने सुनी थी न वह कहानी? इसलिए कहता हूँ कि
धीरज रखिये। लाखों लोगों की आजीविका आप पर ही निर्भर है। आप हमारे हिन्दू
साम्राज्य के आधार स्तम्भ हैं। अतः इस प्रकार होशो-हवास खोकर कठिनाई में
उलझने का आपको अधिकार ही नहीं है। हंबीरराव ने रात का भोजन शम्भूराजा के
साथ लिया और दोनों ने अनेक राजनैतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। एक ही
समय में अनेक मोर्चों पर मुगलों के साथ मराठों का युद्ध आरम्भ हो गया था।
इसलिए हंबीरराव का यहाँ अधिक दिन रुकना सम्भव नहीं था।"
दूसरे दिन बिदा लेने के लिए हंबीरराव राजमहल में पहुँचे। सन्ध्या का समय
था। ग्यारह-बारह पालकियाँ बाहर खड़ी थीं। हंबीरराव ने देखा कि महारानी कहीं
जाने की तैयारी में हैं। उन्होंने पूछ लिया-"बहूरानी पालकियाँ तो रायगढ़ की दिख
रही हैं, शृंगारपुर की नहीं।"
"हाँ!" येसूबाई चौंक गयीं।
"परन्तु इतनी देर से निकल कर आप शृंगारपुर पहुँचेंगी कैसे?" हंबीरराव ने
चिंतित होकर पूछा।
सत्य को छुपाना महारानी के लिए कठिन हो गया। बगल में खड़ी माताजी
भी दुविधा में पड़ गयीं। "हंबीरराव हमें प्रसूति के लिए शृंगारपुर नहीं यहीं गंगोली
की ओर जा रहे हैं। पुत्र का जन्म वहीं पर हो, ऐसी हमारी माताजी और भाई की
392 :: सम्भाजी
इच्छा है। येसूबाई की काजलभरी आँखों में आँसू छिप नहीं पाये।
सभी वरिष्ठों को नमन करके येसूबाई शीघ्रता से पालकी में बैठ गयीं। हाथ
की लाठियों का सहारा लेकर कहार चल पड़े।
दूर जाती पालकियों को शम्भुराजा आँखभर निहारते रहे। छोटी भवानी महीन
पर्दा बगल हटाकर पिता की ओर हाथ हिला रही थीं। गणोजी शिर्के ने अपनी बहन
की प्रसूति के लिए ले आने के लिए पालकी आदि नहीं भेजी थी। उल्टे एक ऐसा
पत्र भेजा था जिसके एक- एक शब्द छुरी के नोक की तरह शम्भुराजा के कानों को
छेद रहे थे—'येसू प्रसूति के लिए आने वाली हो, इसके लिए यहाँ से पालकी नहीं
भेज रहा हूँ। तुम भोसलों ने हम शिर्के लोगों के लिए छोड़ा ही क्या है ? हमारे वतन
को लूटा, हमे भिखारी बना दिया। फिर भी तुम प्रसूति के लिए अपनी पालकी से
यहाँ आ जाना। किन्तु आते समय अपने मक्कार ससुर के किये गए वादे के अनुसार
हमारे वतन के मुहर लगे कागजात साथ लाना न भूलना।'
महारानी की पालकी किले से नीचे उतर रही थी। रानी के बिना महाराज को
सूना-सूना लग रहा था। उस समय बिदा लेती हुई छोटी भवानी का चेहरा बार-बार
उनके सामने आ रहा था। उस भवानी से एक वर्ष छोटी बेटी भी उन्हें स्मरण हो रही
थी। उन्हें याद आने लगीं अहमदनगर के किले में, शत्रु के कड़े पहरे में कैद, अपने
छत्रपति पिता से मिलने के लिए आतुर वे छोटी छोटी आँखें। राजा का अन्तर्मन
भीतर ही भीतर चीत्कार कर रहा था।
"महाराज मैं चलूँ क्या ?" हंबीरराव ने जोर से पूछा।
"अँ- ? हाँ" सँभलते हुए शम्भुराजा ने हंबीरराव का हाथ पकड़ा वे साग्रह
कहने लगे—"हंबीरराव हमारे हृदय के छोटे से टुकड़े के लिए कुछ कीजिए। कृपया
इसे किसी राजा का आदेश न समझें। पर यह जिसे अभी तक देखा तक नहीं उस
छोटे बच्चे को चूमने के लिए तरस रहे एक पिता की प्रार्थना अवश्य है।
"मराठों के गंडस्थल का मतलब है, उनके शैतानी किले। एक के बाद एक
किला जीतते जाओ। ऐसा करते-करते सिर्फ छः महीने में पूरा दक्खन जीत लेंगे।"
"जैसा आपका हुक्म, हजरत !" शहाबुद्दीन फिरोजजंग ने अपने राजा के
सामने गर्दन झुकाई। वह तूरानी जाति का आबदार आँखों वाला वह भयंकर योद्धा
.सरदार था।
"किस किले से शुरुआत करोगे, फिरोजजंग ?"
"रामशेज से।"
"रामशेज ?"
"हाँ, यह नासिक से छः- सात मील पर है। पैंतीस-चालीस हजार की फौज
सम्भाजी :: 393
लेकर जा रहा हूँ।"
"कितना समय लगेगा?"
"सुबह की नमाज के बाद बम लगाना शुरू करूँगा और किला जीतकर
दोपहर की नमाज के लिए किले पर ही चादर बिछाऊँगा।"
"वाहऽ, बहुत खूब।" बादशाह बहुत सन्तुष्ट दिख रहा था।
"हमें इस सम्भा को पराजित करके गोलकुंडा और बीजापुर के राज्य नष्ट
करने हैं। केवल आठ-महीने के भीतर पूरे दक्खन पर क़ब्ज़ा कर लेना है। एक वर्ष
के अन्दर हजरत बाबा चिस्ती के दरबार में उत्तर की ओर अजमेर पहुँचना है।"
औरंगजेब ने सूचित कर दिया।
फिरोजजंग उस दिन जल्दी ही औरंगाबाद से बाहर निकल पड़ा। उस समय
बादशाह बहुत प्रसन्न था। उसे विश्वास था कि रामशेज के बाद दो-चार दिन में
मराठों का कोई न कोई किला मिट्टी में मिला दिया जाएगा।
किन्तु दिनों के बाद बादशाह को दक्षिण की हवा का भी उसे अनुभव होने
लगा। औरंगजेब की गर्मी बढ़ने लगी। मूँछों पर ताव देकर शेखी बघारते हुए
रामशेज की ओर निकले फिरोजजंग के साथ कासिमखान, शुभकर्ण बुंदेला, पीर
गुलाम, मुहम्मद खलील, राव दलपत बुंदेला जैसे अनेक बहादुर सरदार थे।
औरंगाबाद में खबरें आ रही थीं कि प्रचंड तोपखाना और गोला-बारूद लेकर
फिरोजजंग ने पहली ही मुठभेड़ में रामशेज को चारों ओर से घेर लिया।
चार
असदखान अपने मालिक को धीरे-धीरे बता रहा था—"बस! किब्लाए-आलम !
ऐसा लगता है कि खुशखबरी यहाँ तक पहुँचने में शायद कुछ देर हो गयी है। नहीं
तो अब तक तो किला दम तोड़ दिया होता।"
"वजीरे आजम, किसी पर भी विश्वास करने की मूर्खता हम कभी नहीं
करते।" बादशाह ने असदखान की ओर क्रोध से देखा। उस अनुभवी सेनानी के
पसीने छूट गये। ऊँचा, सुन्दर, घुँघराले बालों वाला जुल्फिकारखान बादशाह के
सामने आकर खड़ा हो गया। अपने मौसरे भाई की ओर देखकर बादशाह ने पूछा—
394 :: सम्भाजी
“जुल्फिकार बीजापुर के सर्जाखान की ओर से कोई समाचार?”
“अभी तक नहीं, जहाँपनाह।”
बादशाह की मुद्रा कठोर हो गयी। उसकी भूरी पुतलियाँ तेजगति से नाचने
लगी। वह गुर्राते हुए बोला, “जुल्फिकार!”
“हजरत?”
“लोग कितने पागल रहते हैं?” कुछ उदास और कुत्सित स्वर में बादशाह
बोला, “हमने उस बेवकूफ सर्जाखान से वादा किया था कि हम मराठों का जितना
इलाका जीतेंगे उसे बीजापुर की झोली में डाल देंगे। वह इस काफिर बच्चे के
नामोनिशान मिटाने में हमारी मदद करे। उससे बस इतनी ही हमारी अपेक्षा थी।
फिर भी उस घमंडी सर्जाखान ने हमारी ओर देखा नहीं।”
जुल्फिकारखान ने उद्वेग के साथ कहा, “जहाँपनाह, वह आदिलशाह
सिकन्दर चौदह पन्द्रह वर्ष का बछेड़ा है। उसे अभी क्या अकल है?”
“परन्तु सर्जाखान जैसा अनुभवी सरदार ऐसी लापरवाही करे, यह दुख की
बात हैं।”
“उसने खत पहुँचने की सूचना भी नहीं दी?”
“नहीं हजरत!” खान घबराकर बोला।
बादशाह खिन्न दिखाई पड़ा। उसने अपनी सफेद मुलायम दाढ़ी पर बायाँ
हाथ फेरा। दाहिने हाथ की जपमाला को आँखों के समीप ले जाते हुए कुरान की एक
पंक्ति का ध्यान किया। वह कड़वाहट के स्वर में बोला, “ये बीजापुर और
गोलकुंडा के शिया मुसलमान सुधरने वाले नहीं हैं। सर्जाखान के साथ सभी बीजापुर
वालों को उस सम्भाजी से मित्रता रखनी है। गोलकुंडा का मुख्य दीवान यादण्णा तो
अत्यन्त चतुर, धूर्त और उतना बदमाश ब्राह्मण है। हम सोमनाथ से लेकर यहाँ तक
हिन्दुओं के मन्दिर ध्वस्त करते आये हैं। मैंने हुक्म दिया था कि मेरे बुरहानपुर
पहुँचने से पहले वहाँ के सारे मन्दिर ध्वस्त कर दिये जायें। मेरे हुक्म की तामील की
गयी। हैदराबाद के मुसलमानी इलाकों में क्या हो रहा है? वजीरे आजम आपको
इसका कुछ पता है?”
“हजरत?”
“वह कुतुबशाह का काफिर दीवान यादण्णा हिन्दुओं के बड़े-बड़े मन्दिर
बना रहा है।”
“तोबा! तोबा! हुजूर ” जुल्फिकारखान ने अपने गालों पर हल्की चपत
लगाते हुए अपना असन्तोष व्यक्त किया।
बादशाह ने जुल्फिकारखान और वजीर असदखान इन पिता-पुत्र पर नजर
डाली। अपनी भूरी आँखों को सिकोड़ते हुए औरंगजेब ने एक साँस ली और बोला,
सम्भाजी :: 395
"खैर, राजपूताना की मरुभूमि से निकलते समय हमारा.मकसद बहुत बड़ा नहीं
था। हमें अपनी एड़ी के नीचे सह्याद्रि के एक चूजे नहीं बल्कि एक चूहे के बच्चे को
रगड़कर मारना था। लेकिन यहाँ की आबोहवा कुछ अलग लग रही है। क्यों
वजीर! आपको कुछ अन्दाजा लग रहा है?"
"गिर जाएगा जहाँपनाह। रामशेज दो दिन में गिर जाएगा-नहीं गया
होगा।"
"मैं किसी दूसरे किले की बात नहीं कर रहा वजीरे आजम।" बादशाह बीच
में रुक गया। साँस लेकर हकलाते हुए बोला-"हमारी जिन्दगी में शक ही हमारा
सगा रहा है। आजकल हमें लग रहा है कि इस जहन्मी सम्भाजी, उस धर्मद्रोही
आदिलशाह और रात-दिन वेश्याओं के कोठों पर पड़ा रहने वाले हैदराबादी
कुतुबशाह के बीच कोई समझौता हो गया है। ऐसी शंका मुझे बार-बार हो रही
है।"
बादशाह के मुँह से निकली यह बात बहुत भयंकर थी इसलिए बाप-बेटे के
लिए कोई प्रतिक्रिया देना सम्भव नहीं था। बादशाह ने जान बूझकर विषय को बदल
दिया। कलेजे में एक चुभन होने से उसका मन उदास हो गया। उसने असदखान से
पूछा-"हमारे बेवकूफ शहजादे-अकबरशाह की ओर से कोई खबर?"
"उनकी और उस सम्भा की दोस्ती बहुत बढ़ रही है। बस इतना ही।"
शहजादा अकबर बादशाह के हृदय का एक रिसता घाव था। उसके भीतर का
यह गहरा घाव उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था। अपनी प्यारी बेगम दिलरस बानू
की गोद में खेलते उस नन्हे मुन्ने बादशाह को वह भूला नहीं था। उसका बड़ा
शहजादा सुल्तान विद्रोही चचेरेभाई के साथ बर्बाद हो गया था। आज तो वह
कैदखाने की हवा खा रहा था। बचे हुए मुअज्जम, आजम और कामबक्स शहजादों
से किसी-न-किसी कारण औरंगजेब रुष्ट था। हृदय से वह अकबरशाह को ही
चाहता था। किन्तु उसने नापाक राजपूतों और उस मूर्ख दुर्गादास राठौड़ के पीछे
लगकर खुद का माथा फोड़ लिया था।
मुगलों के राजतिलक का इतिहास बादशाह को याद आया। वह उदास स्वर
में बोला, "आजकल हम मुगलों के उत्तराधिकार का इतिहास युद्ध खून सनी कटारी
से लिखा जा रहा है। दिन ऐसे बुरे आये हैं कि कभी-कभी जाती दुश्मन भी दोस्त
की तरह नजर आते हैं। वस्तुतः शहजादों की कटार का भय अधिक होता है। हमारे
अब्बाजान शाहजहाँ साहब ने अपने पिता हमारे दादा जहाँगीर के विरुद्ध बगावत
की थी।"
"गुस्ताखी माफ, हजरत।" वजीर ने बीच में टोका।
"आपके अब्बाजान ने ताजमहल जैसो सारी दुनिया की सबसे खूबसूरत
396 :: सम्भाजी
इमारत बनाई। इसे कैसे भुलाया जा सकता है?''
''वजीर जी, ताजमहल जैसी खूबसूरत इमारत बनाने वाले कलाकार के हाथ
कितने रक्त से भरे थे? इसकी कोई जानकारी है आपको? शाहजहाँ साहब के उन्हीं
हाथों ने शहरयार और अन्य सगे भाइयों की गर्दनें काटी थीं। इतना ही नहीं उन्हीं
हाथों ने शहरयार के मासूम बच्चों को क्रूरतापूर्वक मार डाला था।''
बादशाह ने मन का सन्ताप व्यक्त किया। उसने महल में इधर-उधर दृष्टि
डाली। असदखान और जुल्फिकार के अतिरिक्त वहाँ कोई और नहीं था। शहरयार
की याद के साथ औरंगजेब मन में डर गया। उसे स्मरण हुआ कि दारा, सुजा और
मुराद जैसे होनहार भाइयों को उसने किस क्रूरता से मार डाला था। इन स्मृतियों से
वह बेचैन हो गया। बादशाह को यह भय सदा बना रहता था कि उसके बच्चे भी
राजगद्दी के लिए ऐसा ही खून खराबा करेंगे। इसीलिए शहजादों के साथ भोजन
करते समय बादशाह की संशयशील आँखें महल के कोनों में झाँकती रहती थीं। वह
इस बात से सावधान बना रहता था कि उसका कोई बेटा छुपकर उसका गला न घोंट
जाय। ये सरी पुरानी बातें आलमगीर को नये सिरे से याद आयीं। उसने उदास होकर
कहा, ''हम मुगलों के लिए तख्त ही वास्तविक ताज है।''
पाँच
माणगाँव से कुछ मील की दूरी पर जंगल में बसा गांगोली गाँव था। गाँव से थोड़ी
दूरी पर महारानी येसूबाई के नाना का महल था। वैपूर्णा नामक छोटी नदी के किनारे
छोटा किन्तु आकर्षक महल लकड़ियों से बनाया गया था। महल के साथ ही लगा
हुआ बैजनाथ का मन्दिर और सामने वाले आँगन के साथ नदी का काला प्रवाह।
येसूबाई का यह मायका शम्भूराजा को बहुत पसन्द था। सबसे अधिक तो यह कि
इसी पवित्र घर ने राजा को पुत्ररत्न प्रदान किया था। इसलिए पूरा वातावरण ही
सुगन्धित और पवित्र लग रहा था। महल के सामने का पहाड़ चढ़ने पर कुछ दूरी पर
ही रायगढ़ था। सामने वह किला ऐसा दिखाई पड़ता था जैसे कोई हाथी पैर मोड़कर
बैठा हो। महीना भर बालक शाहू को गोद में लेकर, उसकी छोटी-छोटी आँखों की
ओर देकर शम्भूराजा रायगढ़ की ओर बार-बार देखते रहे।
गांगोली के प्रवास में एक सुखद दिन आया। सन्त तुकोबा के चिरंजीव
सम्भाजी ∷ 397
महादेव महाराज राजा से मिलने आये। बैजनाथ की सीढ़ियों पर दोनों के बीच
बहुत-सी बातें हुईं। उसी समय महादेव महाराज ने कहा, "राजन, आषाढ़ में हजारों
वारकरी पैदल चलकर पंढरपुर जाते हैं। इस साल से सन्त तुकाराम की पालकी ले
जाने की सोच रहा हूँ।"
"पालकी? कहाँ से कहाँ तक?"
"देहू से पंढरपुर तक।"
"वाहऽऽ!" शम्भूराजा प्रसन्न हो गये। तुकाराम के पुत्र से उन्होंने कहा,
"कल्पना अच्छी है। नयी शुरुआत होगी। हर साल पालकी ले जाओ।
उसके लिए जो द्रव्य लगेगा उसे सरकार से लो। मैं अधिकारियों को आदेश जारी
करता हूँ कि वे पालकी को यथोचित सुरक्षा प्रदान करें।"
तुकाराम के पुत्र सन्तुष्ट होकर चले गये। राजा ने हुक्मनामा भी भेज दिया।
किन्तु फिर से उनके हृदय में दुख का ज्वार उमड़ आया। मैसूर में अपने मित्रों की
हत्या से बहुत बेचैन हो गये थे।
दिन तो आराम से बीत जाता था किन्तु रातें खाने को दौड़ती थीं। राजा को
किसी भी प्रकार से नींद नही आती थी। मैसूर के लिए भेजे गये कृष्णाजी कान्हेरे के
वापस आने की वे व्यग्र प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीरंगपट्टनम् की सीमा पर दादाजी
काकड़े, जैताजी काटकर और तुकोजी निंबालकर की टंगी हुई गर्दनें उनकी आँखों
के सामने आ जाती थीं। वे उदास हो उठते थे। वे यही सोचते कि—"कब मैसूर पर
आक्रमण के बाद वहाँ के घमंडी राजा चिक्कदेवराज को पराजित करके उसे बेड़ियाँ
पहनाऊँ।"
मिट्टी से सोंधी सुगन्ध आ रही थी। सभी को लग रहा था कि मृग नक्षत्र में
कोंकण में तूफानी वर्षा होगी। दो तीन दिन से रोज कड़ी धूप हो रही थी। गर्मी बढ़
जाने के कारण शरीर से पसीना छूट रहा था। पसीने से कपड़े भीग जाते थे। उस दिन
शाम को भारी वर्षा हुई। आसमान में बिजली चमक रही थी। बादल गरज रहे थे।
वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। लगातार तेज वर्षा ने जीना मुश्किल कर
दिया।
महल के बीच वाले चौक में राजाओं का विचार-विमर्श चल रहा था।
शम्भूराजा के समीप ही महारानी येसूबाई बैठी थीं। उनकी गोद में बालक शाहू सो
रहे थे। शम्भूराजा के बहुत गम्भीर हो जाने के कारण कविराज कलश जोत्याजी
केसरकर, रायप्पा आदि सभी दबाव का अनुभव कर रहे थे। आज भी कान्हेरे मैसूर
से वापस नहीं आये थे। इसीलिए शम्भूराजा बहुत चिंतित लग रहे थे। शम्भूराजा ने
थोड़ा मुस्कराते हुए कहा, "हमारा यह साल सुख-दुःख के हिंडोले में झूल रहा है।
एक ओर हमने सिद्दियों को दहशतज़दा बनाया, बादशाह की सेना को वापस लौटा
398 :: सम्भाजी
दिया, पुत्र की प्राप्ति हुई, ये सारी सुखद घटनाएँ हैं।
"महाराज, इन सुखों के सामने इतना-सा दुःख क्या है?"
"नहीं येसूराणी, हमारग दुःख थोड़ा नहीं है। कोंडाजी बाबा के लिए हम
शोक मना ही रहे थे कि कर्नाटक-तमिल देश ने हमारी बगल में एक के बाद एक
तीन छूरे भोंक दिये। काकड़े, काटकर और निम्बालकर ये हमारे तीनों सरदार
साधारण नहीं थे। उनके निधन की पीड़ा हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। हरजी जैसा
आदमी भी वहाँ भयभीत हो जाता है। इस सब की एक ही दवा है—आक्रमण,
केवल आक्रमण।"
चिराग की रोशनी में शम्भूराजा की मुखमुद्रा बहुत लाल दिख रही थी। उनके
सहयोगी एक दूसरे की ओर सहमकर देख रहे थे। येसूबाई ने साहस बटोरकर कहा,
"परन्तु महाराज औरंगजेब जैसा शत्रु अपनी सेना लेकर वतन के सीने पर आ बैठा
है। उसे यहाँ छोड़कर दूर कर्नाटक तमिल में जाना आत्मघात नहीं होगा क्या?"
"नहीं महारानी, मैसूर का वह चिक्कदेवराज बहुत घमंडी हो गया है। वह
इस अभिमान में फूला हुआ है कि उसे कोई छू नहीं सकता। अधिक समय तक
शान्त बैठने का मतलब है अपने तीन सरदारों की मृत आत्मा के साथ गद्दारी
करना।" बाहर लगातार वर्षा हो रही थी। नदी के किनारे ठंडी हवा बह रही थी।
वर्षा रुक नहीं रही थी। रात बहुत हो चुकी थी। शम्भूराजा ने शान्त और धीमे स्वर
में कहा, "कल औरंगजेब और हममें महायुद्ध होगा। तब कर्नाटक और तमिल से
जो रसद हमें अपने अधिकार से मिलती है वही हमें आगे ले जाएगी। आगे कदम
बढ़ाने से पहले हम मैसूर गये कान्हेरे की प्रतीक्षा करेंगे। निश्चित किया गया कि
कान्हेरे के आने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाये।"
नासिक बागलाण की ओर हंबीरराव को एक सन्देश भेजा गया। अन्य मुद्दों
पर भी विचार-विमर्श किया गया। आधी रात बीत चुकी थी। लोगों की आँखें भारी
हो गयी थीं। शम्भूराजा उठकर शयनकक्ष में चले गये। इसी समय ड्योढ़ी के
पहरेदार दौड़कर अन्दर आये। जोर-जोर से शम्भूराजा से कहने लगे—"बाहर
कृष्णाजी पन्त नाम का आदमी आया है। भीतर आकर राजा से मिलने का आग्रह कर
रहा है।" शम्भूराजा की नींद उचट गयी। उन्होंने तत्काल कान्हेरे को अन्दर
बुलाया। सभी की निगाहें उसी पर टिक गयीं। कान्हेरे वर्षा में पूरी तरह भीग चुके
थे। उन्हें सर्दी भी लग रही थी। वे बिना रुके भागते हुए मैसूर से स्वराज्य में वापस
आये थे। शम्भूराजा ने अपने कन्धे का शाल कृष्णाजी पन्त के हाथ में दी। कृष्णाजी
ने अपने भीगे सिर को किसी प्रकार पोंछा। इसी समय शम्भूराजा ने प्रश्न किया—
"कृष्णाजी पन्त, चिक्कदेवराजा क्या कह रहा है? हो गया कौल करार?"
कृष्णाजी पन्त ने गर्दन झुका ली और नकार में सिर हिला दिया। शम्भूराजा ने
सम्भाजी :: 399
पुनः पूछा— "फिर वह बगल में क्या है? देखूँ तो जरा।"
"रुकिए मालिक, मैं ही दिखाता हूँ कि क्या है।"
कृष्णाजी पन्त ने बगल में दबाया अपना जरीदार लाल अंगरखा बाहर निकाला
और गीले वस्त्र की तरह झटककर उसे फैला दिया। वह अंगरखा अनेक जगहों पर
फाड़ दिया गया था। यह देखकर सभी को पता चल गया कि मराठों के वकील का
मैसूर में कैसा स्वागत किया गया था। उस अपमानित चीथड़े को देखते नहीं बन रहा
था। दाँत पीसते हुए धीमी आवाज में शम्भूराजा ने पूछा—
"मैसूर के उस घमंडी राजा ने कहा क्या?"
"कैसे बताऊँ महाराज ? फिर भी बताता हूँ।"
'मैं अनुमति लेकर चिक्कदेवराजा से मिला। उन्हें बताया सम्भाजी महाराज
के यहाँ से आया हूँ।' वह तुरन्त बोल पड़ा—'कौन राजा ? कहाँ का राजा ? हम ऐसे
किसी भी आदमी को नहीं जानते। जिस तरह घास उगती है उसी तरह हजारों
जमींदार हर रोज पैदा होते हैं और घास की तरह सूखकर समाप्त हो जाते हैं।' मैसूर
दरबार के विदूषकों ने किस प्रकार वस्त्र फाड़े और अपमानित किया था, वह सब
कृष्णाजी को स्मरण हो आया। वे रो पड़े।
महारानी येसूबाई, कवि कलश और अन्य सभी भयभीत होकर शम्भूराजा की
ओर देखने लगे। सभी का अनुमान था कि अब जलते हुए बारूदखाने की तरह
शम्भूराजा के विराट रूप का दर्शन होगा। किन्तु शम्भूराजा क्रुद्ध न होकर गम्भीर बने
रहे। अपने शयकक्ष की ओर जाते समय उन्होंने साथियों से कहा, "अब क्यों चिन्ता
करें? हमारी दिशा निश्चित हो गयी है। कर्नाटक और तमिल प्रदेश में नचाये बिना
हमारे घोड़ों के दाँत को पीड़ा शान्त नहीं होगी।"
"क्या मतलब महाराज ?" सभी ने भयातुर होकर पूछा।
यह स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था कि महाराज स्वयं कर्नाटक तमिल की
यात्रा पर निकलेंगे। इस समय पाँच लाख की सेना के साथ छाती पर सवार औरंगजेब
का भी सभी को भय था। अपने भयभीत साथियों की ओर राजा ने देखा। येसूबाई
की गोद में सोये बालक शाहू को उन्होंने सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा, "राज्य
का कार्यभार और राज्य का संरक्षण हम महारानी और हंबीरराव पर सौंपेंगे। तीन-
चार महीने की दक्षिण यात्रा किये बिना अब कोई अन्य मार्ग नहीं है।"
"किन्तु महाराज औरंगजेब ?"
"उसकी कुंडली का हमने ठीक-ठीक अध्ययन कर लिया है।" शम्भूराजा
ने सीने से लगाये बालक शाहू के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए आत्मविश्वासपूर्वक
कहा, "अब मृग नक्षत्र से वर्षा आरम्भ हो गयी है। दशहरे तक कोंकण के कीचड़
में अपना घोड़ा लाने का साहस औरंगजेब नहीं करेगा। इसी कालावधि में हम चले
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जाएँगे और जिंजी, तंजौर के साथ अपना दक्षिणी क्षेत्र सँभालेंगे।
छह
चिक्कमंगलूर की पूर्वोत्तर दिशा में वाणावर था। वहाँ के सूबेदार लिंगप्पा का सन्देश
चिक्कदेवराजा के पास पहुँचा। समाचार पाते ही उसके होश उड़ गये। पत्र को ऊपर
उछालते हुए वह दरबार में जोर-जोर से चिल्लाने लगा—"अपना राज्य इतना
विकलांग कब से बन गया? अपने गुप्तचर इतने लापरवाह कब से हो गये?"
"क्या हुआ हुजूर?" घबराकर दीवान ने पृछा।
"वह सम्भा मराठा अपनी दस हजार की सेना लेकर वाणावर के समीप पहुँच
गया है और हमें इसकी खबर तक नहीं।"
दो तीन सरदारों ने एक साथ पृछा—"वह जंगली चूहे का बच्चा यहाँ तक
पहुँचा ही कैसे?"
"आप लोग किस स्वप्नलोक में रहते हैं? सम्भाजी के पास दस हजार घोड़े
हैं। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक भी उनके साथ हैं। उसकी भी पाँच हजार की सेना
उसके साथ है।"
चिक्कदेवराजा अधिक समय तक शान्त बैठने वाला नहीं था। उसने झटपट
सेना तैयार की। वह स्वयं वाणावर की ओर चल पड़ा। सह्याद्रि की तरह वर्षा वहाँ
नहीं थी। इसलिए शम्भुराजा प्रसन्न थे। गोलकुंडा का दीवान मादण्णा पंडित जबान
का पक्का था। वादे के मुताबिक उसने अपनी दस हजार सेना सम्भाजी की सेवा में
हाजिर कर दी थी। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक भी चिक्कदेवराजा से भयंकर ईर्ष्या
करता था। इतनी दूर से घोड़े दौड़ाते महाराज यहाँ पहुँचे इससे हरजी महाड़िक
उत्साहित थे। बहुत दिनों के बाद इन लोगों की भेंट युद्ध के मैदान में हुई थी।
शम्भुराजा ने हरजी की सराहना करते हुए कहा—
"जीजाजी आपने दक्षिण में बड़ा पराक्रम किया है। आपका प्रत्येक कदम
पिताजी के दामाद के योग्य हैं। आपकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।"
"केवल चिक्कदेवराजा की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा पर हम काबू नहीं कर पाये
इसीलिए हम आपकी सहायता के लिए दौड़े-दौड़े आये हैं।"
यह कहते-कहते शम्भुराजा को स्मरण हो आया। वे पूछने लगे—"जीजाजी,
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