छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
है।
आपकी अनुपस्थिति में हमारा भी भाग्य फूट गया। हमें भी उनके साथ
मिलना पड़ा। वे मुझे और मेरे पुत्र आवजी को जबरन शहजादे के पास ले जा रहे हैं।
षड्यन्त्र का खत भी उन्होंने बलपूर्वक मेरे हाथ से लिखवा लिया। फिर भी रास्ते में
अवसर निकालकर यह पत्र आपके पास पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। खंडे राव से
हमारी प्रार्थना है कि यह पत्र आपके पास समय से पहुँच जाए। हम बाप-बेटे की
स्थिति साँप के गले में अटके मेंढक की हो गयी है। ईश्वरी लीला के सामने मनुष्य
विवश है।
बड़े महाराज कैलासवासी हो गये। तब इन्हीं लोगों ने आपको पकड़ने का
षड्यन्त्र रचा था। उस बार पत्र आवजी के हाथ से लिखवा लिया था। इस बार हमारे
पीछे पड़कर और छुरी दिखाकर मुझसे लिखवा लिया। वस्तुतः हमें शब्दों की सूली
पर चढ़ा दिया।
वह पत्र लिखते समय बड़ी यातनाएँ हुईं। परन्तु स्वामी आप सरस्वती पुत्र हैं,
ज्ञान कोविद हैं। जितने क्रोधी हैं, उतने ही शान्त और उदार। स्वामी के भीतर तो
गंगा बहती है। हमारे भाग्य में क्या लिखा है इसे कौन जाने ? जो होगा सो होगा।
परन्तु शम्भू महाराज आपको और महारानी येसूबाई को सुयश मिले, सदा कल्याण
हो।
श्रीकृपा से जीवित रहे तो स्वामी की सेवा में पुनः तत्परता से हाजिर होंगे।
अन्यथा ईश्वर पर सब कुछ अवलम्बित है। श्रम कम करें और अपनी तबीयत को
सँभालें।'"
बगल चन्दन के खंभे का सहारा लेते हुए शम्भुराजा पलंग पर बैठ गये।
उनकी दशा ऐसी हो गयी जैसे किसी व्यक्ति का मेरुदंड टूट गया हो। उन्हें पसीना
छूट रहा था। नौकर ने शीतल पेय का पात्र पकड़ाया उसे 'गट-गट' गले के नीचे
उतारते हुए शम्भुराजा ने व्यथित होकर कहा, "येसू, यह कितना बुरा हुआ?"
शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद आज पहली बार शम्भुराजा छोटे बच्चे की तरह
रो रहे थे। उनके कन्धे पर हाथ रखकर सहारा देते हुए येसूबाई ने सान्त्वना के स्वर
में कहा, "स्वामी सँभालिए अपने आपको। चिटणीस के बच्चों खंडो बल्लाल और
निलो बल्लाल को इसके बाद हम अपने पेट के बच्चे की तरह पालेंगे। उन्हें सेवा
का अवसर देंगे। उन्हें पेड़ की तरह बड़ा करेंगे।"
298 .: सम्भाजी
परचक्र
एक
शम्भुराजा रायगढ़ पर पहुँचे। दिन भर उन्होंने स्वयं को दरबार के कार्य में व्यस्त
रखा। वहाँ मन न लगने के कारण वे जगदीश्वर के मन्दिर में घोड़े पर न जाकर पैदल
गये।
कुछ भी करने पर शम्भुराजा की आँखों के आगे से बालाजी की भूरी आँखों
वाली छवि हट नहीं रही थी। दो दिन पहले शम्भुराजा ने औंढ़ा का प्रसंग कवि
कलश से पुनः सुना था। वे असलियत को जानना चाहते थे। वहाँ का वह भयानक
चित्र उनके मस्तिष्क में बहुत गहरे बैठ गया था। अपनी मृत्यु को सामने देखते हुए
भी अण्णाजी भयभीत नहीं हुए थे। उल्टे सैनिकों के शस्त्रों की ओर सिर उठाकर
निर्भीक भाव से देख रहे थे। जैसे वे आश्वस्त थे कि कभी न कभी तो दंड मिलना
ही है।
बालाजी चिटणीस की कहानी बड़ी हृदय विदारक थी। उनके पत्र से सब
कुछ स्पष्ट हो चुका था। शेष अपराधियों को मार देने का शम्भुराजा को कोई दुख
नहीं था। परन्तु इस बात का उन्हें बड़ा कष्ट था कि इन सभी में राज्य के प्रति
निष्ठावान, सहृदय और निष्पाप बालाजी चिटणीस भी मार दिये गये। शाम को
शम्भुराजा अपने महल में लौटे। किन्तु उनके पैर चन्दनी दरवाजे के पास अपने आप
रुक गये।
औंढ़ा के मैदान में राजद्रोही अपराधी मारे गये किन्तु उन्हीं के बीच का एक
व्यक्ति किले पर रह रहा है। वह भी हमारे सप्त महल में। इस बात का ध्यान आते
ही शम्भुराजा क्रोध से तिलमिला उठे। वे बड़ी शीघ्रता से सोयराबाई के महल की
ओर जाने लगे। जिस प्रकार अचानक दौड़ते हुए किसी घुड़सवार के बाजार में घुसने
से बकरियों और मुर्गियों की भीड़ इधर-उधर भागती है उसी प्रकार शम्भुराजा को
देखकर बच्चे, नौकर-चाकर इधर उधर भागने लगे। सोयराबाई के महल के दास
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दासी भी आगे को भागने लगे। शम्भूराजा की उग्र मुद्रा को देखने का साहस किसी
में भी नहीं था। सेवकों को एक उपाय सूझा। राजा के दरवाजे पर पहुँचने के पहले
ही उन्होंने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया।
शम्भूराजा महल के दरवाजे पर पहुँचे। दरवाजे को बन्द देखकर उनकी
मुट्ठियाँ बँध गयीं। वे ओठों और दाँतों को पीसते हुए बन्द दरवाजे को देखने लगे।
शम्भूराजा एक आदमी की जगह जलती हुई भट्टी बन गये थे। दरवाजे की ओर
देखकर शम्भूराजा जोर से दहाड़े-‘‘माताजी, दरवाजा बन्द कर लेने से पाप नहीं
छुप सकता। मैंने जब पहली बार नजरबन्द किया था, तभी कह दिया था कि यहाँ
आप दया की पात्र शरणार्थी की तरह नहीं माता के अधिकार से रहिए। परन्तु माताजी
आपने तो हद ही कर दी। आपने तो राजमाता के स्थान पर एक कपटी, स्वार्थी और
दुष्ट स्त्री का रूप धारण कर लिया। माताजीऽऽ अब छुपकर क्यों बैठी हो? दरवाजा
खोलिएऽऽ....?’’
शम्भूराजा के शरीर से ज्वालाएँ फूट रही थीं। उनके रौद्र रूप के सामने जाने
की हिम्मत किसी में भी नहीं थी। अपनी आँखों से जलते अंगारे फेंकते हुए
शम्भूराजा ने कहा, ‘‘माताजी आप के काले कारनामे ऐसे हैं कि कैकेयी भी उनके
आगे हारकर सिर झुका ले। राज्य का उत्तराधिकारी होने पर भी आप मेरी गिरफ्तारी
का आदेश भेजती हैं? एक बार नहीं बार-बार मेरा प्राण लेने का प्रयत्न कर रही हैं,
आप। अजी, कहाँ माताजी पुतलीबाई थीं जो शिवाजी महाराज के जूते अपने सीने से
लगाकर अग्नि में कूद गयीं, सती हो गयीं, अमर हो गयीं और आप हैं कि शिवाजी
महाराज का स्वराज्य अपने स्वार्थ के लिए उस औरंगजेब के लड़के की झोली में
डालने निकली थीं। अरे आप हमारी माता हैं? आप तो सचमुच पूतना मौसी
हैं!!....’’
महल की दूसरी ओर लोगों की भीड़ जमा हो गयी थी। आगे बढ़ने की
हिम्मत किसी में भी नहीं थी। उसी समय महारानी येसूबाई भीड़ से निकलकर
सामने आ पहुँचीं। उन्होंने क्रोध से उबलते शम्भूराजा का हाथ पकड़ा और कठोर
शब्दों में कहा, ‘‘स्वामी, आप राजा हैं, राजा की तरह व्यवहार कीजिए।’’
शम्भूराजा ने येसूबाई का हाथ झटक दिया। अपना हाथ उठाकर वे गरज
पड़े-‘‘हमारी राजमाता डाइन की तरह व्यवहार करे? हमारे अष्ट प्रधान दुश्मन के
सामने नमाज पढ़ें और हमारे गले पर छुरी रखें?’’
‘‘महाराज कृपा कीजिए। क्रोध पर काबू पाइए।’’
‘‘येसूबाई आप मेरे क्रोध का क्या लेकर बैठी हैं? यह अपने राजाराम की
माता हैं इसलिए.... नहीं तो इन्हें कब का दीवार में चुनवाकर मार डाला होता।’’
शम्भूराजा के भयंकर क्रोध के आगे येसूबाई हार गयीं। उनकी आँखें भर
300 :: सम्भाजी
आयीं। उन्होंने यों ही पीछे की ओर मुड़कर देखा। फिर से एक बार राजा का हाथ
खींचकर उनका ध्यान दूसरी ओर घुमाना चाहा। वहाँ के नक्काशीदार खम्भे से
चिपके दस वर्ष के अबोध राजाराम भयभीत दृष्टि से देख रहे थे। वह दृश्य देखते
ही शम्भूराजा होश में आ गये। अपने बच्चे की ओर लपकते पंछी की तरह आगे
बढ़कर राजाराम को सीने से लगा लिया। राजाराम को थपथपाकर, उनके आँसू
पोंछकर वे बोले, "राजा! तुम्हारे आँसुओं में कितनी शक्ति है? तुम्हारे दो बूँद
आँसुओं ने इस आग के समुद्र को निगल लिया।"
दो
सवेरे मवेरे कवि कलश मिलने आये थे। वे किसी दबाव में दिख रहे थे। उत्साही
कविराज कुछ बोल नहीं रहे थे। येसूबाई ने ध्यान में आते ही उनसे पूछा, "कविराज
इतने गम्भीर क्यों हो? क्या बात है?"
येसूबाई को दंडवत करते हुए कविराज ने विनम्रता से कहा, "रानी साहिबा!
आज तक जितना सम्भव हुआ आपके राजा और स्वराज्य की सेवा मैंने की। अब
हमें छुट्टी दें।"
"पर अब कहाँ जा रहे हो?"
"कन्नौज को।"
"वहाँ किसलिए? घर में कुछ धार्मिक अनुष्ठान है क्या?"
"हमेशा के लिए जाने को कह रहा हूँ, महारानी जी।"
"पागल हो गये हैं कविराज आप? शम्भूराजा एक बार अपनी छाया से भी
अलग होकर जी सकते हैं, किन्तु आपके साथ के बिना नहीं।"
येसूबाई ने उन दोनों को अपने दीवानखाने में बिठा दिया। कविराज के प्रस्ताव
पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। महारानी को ज्ञात था कि कविराज के मन को
कौन सा दुख पीड़ित कर रहा था। औंढ़ा के मैदान की उस घटना ने येसूबाई के
हृदय को भी घायल कर दिया था। उन्होंने कहा, "सूखी घास के साथ गीली घास
भी जल जाती है। चिटणीस का पत्र समय पर न पहुँच पाने के कारण यह गड़बड़
हो गयी। चिटणीस जैसा भला आदमी नाहक मारा गया। जो कुछ हुआ, बहुत बुरा
हुआ। उस दिन से स्वामी आपसे भी अधिक बेचैन हैं। रात-बिरात अचानक उठ
सम्भाजी ३०।
जाते हैं और चिल्लाने लगते हैं।"
कवि कलश बड़ी नाराजी के साथ बताने लगे- "महारानी जी वह प्रसंग
घटित न हो, इसके लिए मैंने भी बहुत प्रयास किया था। महाराज को भी कोई
जानकारी नहीं थी। परन्तु दरबार के हमारे शत्रुओं ने हमें नष्ट करने का प्रयास बार-
बार किया। सभी ने यही आरोप लगाया कि कवि कलश के कहने से ही राजा ने
चिटणीस को मृत्यु दंड दिया। चिटणीस की हत्या के लिए हर तरह से मैं जिम्मेदार
ठहराया गया। मैं ही जीवन भर के लिए बदनाम किया गया।"
आँखों में उमड़े आँसू को सँभालते हुए कवि कलश आगे बढ़े और येसूबाई
का पैर पकड़कर बोले, "दया कीजिए महारानी जी। हमें जाने की आज्ञा दीजिए।"
"कविराज, आपके इस प्रकार अचानक चले जाने में राजा की ही हानि है।
विरोधियों का क्या जाता है? कविराज, सच्चाई तो यह है कि हमें ही आपकी
अत्यन्त आवश्यकता है। हम इस बात को हृदय से स्वीकार करते हैं। आप जानते हैं
कि शम्भूराजा नाम के इस जलते तूफान को आँचल में बाँधकर जीवन चलाना कितना
कठिन है?"
"परन्तु....?"
"अब जाने दीजिए। मन में आने वाले उल्टे-सीधे विचारों को निकाल
दीजिए। कविराज, आप महाराज की काव्यशास्त्र विनोद की महफिल के एक रसिक
मित्र हैं। कालिदास का कोई नाटक हो, गीत-गोविन्द की कोई पंक्ति हो या सूफी
पन्थ की कोई चर्चा हो, हमारे स्वामी कितने ज्ञानपिपासु हैं? यह हम अच्छी तरह
जानते हैं। आपके साहचर्य में ही उन्होंने संस्कृत में प्रवीणता प्राप्त की। 'बुधभूषणम्'
जैसा काव्य ग्रन्थ लिखा। 'नख शिख' और 'नायिकाभेद' जैसे महाकाव्य ब्रजभाषा
में लिखे। यह सब कुछ आपकी संगति से ही सम्भव हुआ। आज युद्ध भूमि में
आक्रमण करने के लिए उनके साथ हंबीरराव, म्हालोजी घौड़पड़े, रूपाजी भोसले
जैसे अनेक लोग हैं। परन्तु ज्ञान और सरस्वती के प्रांगण में मुक्त विहार करते समय
उन्हें केवल आपकी आवश्यकता होती है।"
येसूबाई के कथन से कविराज निरुत्तर हो गये। वे व्यथित स्वर में बोले,
"महारानी जी, यहाँ मुझे बहुत कष्ट है। यहाँ के लोग मुझ पर जादू-टोना करने का
आरोप लगाते हैं। किन्तु रोज सवेरे हमारे महल के आसपास सुई चुभोये नींबुओं
और काली गुड़ियों का ढेर पड़ा रहता है। यहाँ के भूतों का मुझे बहुत डर लगा
रहता है।" येसूबाई के सामने हाथ जोड़कर कवि कलश ने दीन स्वर में पूछा,
"महारानी जी, अब आप ही न्याय करें। विरोधियों के कथनानुसार क्या मैं जारण
मारण क्रिया करने वाला कोई भोंदू मान्त्रिक हूँ? क्या आपको ऐसा लगता है?"
येसूबाई ने मन्द मुस्कान के साथ कहा, "जैसा वे समझते हैं वैसा कोई राजा
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को बिगाड़ने वाला भयंकर मान्त्रिक हमारे दरबार में होता तो क्या हम चुप बैठे
रहते ? देवी शिकोई की सौगन्ध, देवी के चरणों में जैसे नारियल फोड़ा जाता है, वैसे
हम स्वयं उसके सिर को चूर-चूर कर देते।"
कवि कलश सन्तुष्ट हो गये। उन्होंने येसूबाई की ओर देखा। येसूबाई की
आँखों में उन्हें एक विलक्षण चमक दिखाई पड़ी। येसूबाई ने कहा—
"दस्तूरखुद्द शिवाजी महाराज ने कविराज आपको बारह-पन्द्रह वर्षों तक
बहुत करीब से देखा। जैसा कि यह दुष्ट मंडली कहती है, उसके अनुसार उनका
युवराज किसी भोंदू मान्त्रिक या कब्जी बाबा के प्रभाव में चला गया होता तो ? ..
तो कविराज महाराज ने ऐसे मान्त्रिक को कब का हाथी के पैर के नीचे कुचलवाकर
मार न दिया होता ?"
येसूबाई का धारदार वक्तव्य सुनकर कवि कलश की आँखें भर आयीं। वे
भाव विह्वल होकर बोले, "महारानी जी, आपको सब कुछ पता है। यह हमारा
सौभाग्य है।"
"कविराज, मैं उसी अधिकार से आपको आदेश देती हूँ। यदि घोड़ों पर
सामान लाद दिया हो तो उन्हें उतारकर रख दीजिए और सीधे शम्भूराजा के शिविर
में चले जाइए। वे आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। आज एक समय में घर और बाहर
के राहु-केतु, राजा को हैरान कर रहे हैं। मुगलों का मांडलिक बन जाने के बाद
जंजीरे के सिद्दी समझते हैं कि स्वर्ग अब केवल दो अंगुल दूर रह गया है। गोवा के
पुर्तगाली हैं, डच हैं, अँग्रेज हैं। हमारा जन्म-जन्मान्तर का शत्रु औरंगजेब अपनी
बड़ी तैयारी के साथ कभी भी महाराष्ट्र पर आक्रमण कर सकता है। संकट की काली
घटाओं से आसमान भर गया है। यहाँ राज्य का कार्यकलाप भी अभी तक व्यवस्थित
नहीं हुआ है। ऐसे विकट समय में कविराज, महाराज को आवश्यकता है तो आप
जैसे उत्साही, दिलेर, अनुभवी एवं विश्वसनीय मित्र की।"
तीन
सितम्बर 1681। इसी दिन आलमगीर औरंगजेब अजमेर से निकले थे। उनकी पाँच
लाख से अधिक लड़ाकू फौज के साथ आचारे, भिस्ती मोतदार, खिदमतगार जैसे
एक लाख सेवक थे। यह फौज दक्षिण की ओर चल रही थी। यह फौज नहीं एक
सम्भा-३ ३०३
चलता बोलता विशाल नगर था।
मार्ग में एक छोटी-सी नदी के किनारे अस्थायी रूप से छाया करने के लिए
एक छोटा-सा शाही तम्बू खड़ा किया गया था। उसमें औरंगजेब दोपहर का विश्राम
कर रहा था। बादशाह की उम्र तिरसठ वर्ष की थी। राज्य का कार्यभार सँभालने के
बाद उन्होंने पिछले तीस-पैंतीस वर्षों में कभी भी अपना स्वास्थ्य बिगड़ने नहीं
दिया था। उनका शरीर सागौन वृक्ष के तने की तरह सीधा और बलवान था। उनकी
आँखें तीक्ष्ण, भेदक एवं देखते समय किसी पर भी अपना प्रभाव छोड़ने वाली थीं।
साथ ही फौज आगे-पीछे चल रही थी। सेना की अनेक टुकड़ियाँ जहाँ कहीं भी
छाया मिली वहाँ विश्राम कर रही थीं।
बादशाह के उस लाल तम्बू में इस समय उनके मुख्य काजी अब्दुल वहाब
और वजीर असदखान जैसे कुछ प्रमुख लोग ही थे। शाहंशाह की प्रशंसा करते हुए
असदखान ने कहा, "जहाँपनाह, आज आपकी शाही हुकूमत काबुल से लेकर
बंगाल, आसाम तक, नीचे बुरहानपुर खानेदेश तक है। आपने बहुत बड़ा साम्राज्य
अपनी मुट्ठी में कर लिया है। आज किसी में भी ऐसी हिम्मत बची नहीं है कि
आपके सामने सिर ऊँचा कर सके। आप दुनिया के बड़े से बड़े बादशाहों में एक हैं।
आप इस संसार में सबसे अधिक ताकतवर हैं।"
काजी साहब ने पूछा, "जहाँपनाह आपकी इस दक्षिण मुहिम को कितना
समय लगेगा?"
औरंगजेब कुछ गम्भीर होते हुए बोला, "आप नहीं जानते इस मुहिम को।
दक्षिण का प्रदेश इतना आसान नहीं है। सम्राट अकबर भी दक्षिण का प्रदेश जीतने में
कामयाब नहीं हो पाये थे। हमारे अब्बाजान शाहजहान भी बड़ी मुश्किल से
अहमदनगर की निजामशाही को जीत पाये थे। गोलकुंडा और बीजा की शिया
मुसलमानों की रियासतें मरगट्टों का महाराष्ट्र काँटों का प्रदेश है। इसे जीतना इतना
आसान नहीं है।"
इसके पहले इतनी बड़ी पाँच छः लाख की फौज लेकर औरंगजेब ही नहीं
दिल्ली का कोई भी बादशाह बाहर नहीं निकला था। औरंगजेब जब अपने तम्बू में
बैठता था, उस समय लगभग तीन लाख घोड़े, दो लाख पैदल सेना, दृष्टि की सीमा
में न समाने वाले आदमी और जानवर देखकर उसका सीना अभिमान से भर जाता
था। अपनी इस शान-शौकत और विराट सेना के प्रभाव से दहशत फैल जानी
चाहिए। ऐसा औरंगजेब सोचता था। गोलकुंडा और बीजापुर के दरबार को तो डोर
टूटी पतंग की तरह कहीं से कहीं फेंका जा सकता है। अपने आने और सेना के इस
महासागर की खबर सुनकर उस काफिर के बच्चे सम्भा की डर से छाती फट जानी
चाहिए। फिर भी दक्षिण देश की इस मिट्टी का ठीक ठीक अनुमान लगाना कठिन
३०4 सम्भाजी
है बादशाह को ऐसा लग रहा था।
आज आलमगीर के मन को एक दूसरा ही दुख बेचैन कर रहा था। अपने
शहजादे द्वारा किया गया सीने पर का घाव सहज रूप से छुपाने लायक नहीं था।
दिल्ली के मुगल घराने में राजपूताने के सैकड़ों राजाओं और सरदारों को अपना
मांडलिक बनाकर, पैरों के नीचे दबाकर रखा था। केवल उदयपुर का घराना कभी
भी दिल्ली का मांडलिक नहीं बना था। जसवन्त सिंह की पहले ही मृत्यु हो चुकी
थी।
किसी हिन्दू राजा की मृत्यु होने पर उसके राज्य को अपने अधीन कर लेने का
अवसर मिलेगा। इस विचार से औरंगजेब प्रसन्न हो जाता था। औरंगजेब की इस
घातक नीति के विरोध में राजपूताना के सभी राजा एकत्र हो गये थे। उन्होंने
औरंगजेब के विरुद्ध तलवार निकाल ली थी। किन्तु माम, दाम, दड और भेद जैसी
नीतियाँ औरंगजेब के रसोईघर में पानी भरती थीं। इन्हीं के प्रयोग से औरंगजेब
विजयी हो गया। राजपूतों के साथ युद्ध में एक ऐसा भी समय आया था जब
औरंगजेब के भाग्य ने पूरी तरह मुँह मोड़ लिया था। सारे राजपूत औरंगजेब के
विद्रोही शहजादे के पीछे खड़े हो गये थे। उसके चहेते शहजादे अकबर ने अपने
पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था। परन्तु अन्त में औरंगजेब की कपट नीति के कारण
बेचारे शहजादे का मस्तक फूट गया।
उस समय हुए युद्ध की असदखान ने याद दिलायी। तब लम्बी साँस छोड़ते
हुए बादशाह ने कहा, "मैंने लड़ाई जीत ली। किन्तु एक बादशाह ने अपने चहेते
शहजादे को नहीं बल्कि एक बेचारे बाप ने प्रिय बच्चे को गँवा दिया।"
औरंगजेब की इच्छा के अनुसार चलते रहना बड़ा कठिन था। बादशाह की
चारों बेगमों से यह सम्भव नहीं हो पाया। किन्तु बादशाह के वजीरे-आजम
असदखान पिछले अनेक वर्षों से अपना पद सँभाले हुए थे। रिश्ते में वह बादशाह
का मौसा था। कभी पैरों पर गिरकर, कभी शरणागत होकर अपना पद सँभाले हुए
था। बाल-बच्चों के हँसने बोलने कभी कोई रुचि न रखने वाला बादशाह शहजादा
अकबर के साथ पहले से ही इतना अनुरक्त कैसे हो गया ? यह रहस्य असदखान
से भी नहीं खुल रहा था।
उसी समय फौलादखाने से एक व्यक्ति समाचार लेकर आया-
"जहाँपनाह आपका अनुमान सच निकला।"
"क्यों ? क्या हुआ?"
"शहजादा दक्षिण की ओर भाग गया है। उस काफिर सम्भाजी के साथ
मित्रता करने का उसका पक्का इरादा है।"
"जैसा गुरु वैसा चेला।" कड़ुआहट भरी मुद्रा बनाते हुए बादशाह ने कहा।
सम्भाजी . 305
“शहजादे की बर्बादी का ज़िम्मेदार वह मक्कार दुर्गादास है। दुर्गादास जैसा
इस्लाम का दुश्मन मैंने जिन्दगी में नहीं देखा।”
औरंगजेब की आँखों के आगे उनकी पिछली जिन्दगी का चित्र उभर रहा था।
जिस समय वह अपनी उम्र का मात्र अठारहवाँ सोपान कर रहा था उसी समय
बादशाह शाहजहाँ ने उसे दक्षिण की सूबेदारी का जरीदार लिबास पहना दिया था।
परन्तु उस उम्र में भी औरंगजेब को अपने पिता की साजिश का पता चल गया था।
राजधानी के तख्त, ताज और खजाने की संगति छोड़कर कौन शहजादा दक्षिण के
जंगलों में जाना पसन्द करेगा? शाहंशाह शाहजहाँ ने तरुण औरंगजेब की
महत्त्वाकांक्षाओं को जान चुका था। शाहजहाँ को इस बात का अनुमान लग गया था
कि धीर-गम्भीर, कम बोलने वाला, हमेशा सावधान, संयमी, अपने पेट का पानी न
हिलने देने वाला साहसी औरंगजेब किसी दिन संकट उत्पन्न कर सकता है। प्रिय
शहजादे दाराशिकोह के रास्ते का रोड़ा बन सकता है। इसीलिए इस वृक्ष को स्वतन्त्र
रूप से बढ़ने नहीं देना है। उसकी महत्त्वाकांक्षा की जड़ें राजमहल की दीवारों के
भीतर घुसें, इससे पहले ही उन्हें उखाड़ फेंकने का निर्णय शाहजहाँ ने किया।
किन्तु जिस पेड़ की जड़ें मजबूत होती हैं उसे उखाड़कर फेंक देने पर भी
वह फिर से खड़ा हो जाता है और फैलने लगता है। इसी नीति के अनुसार
औरंगजेब ने भी दक्षिण में अपने पैर जमा लिए। बागलान और आवसा जैसे प्रदेशों
को उसने अपने अधिकार में कर लिया। उदगीर का क्षेत्र भी उसने अपने राज्य में
मिला लिया। मलिक अंबर ने खड़की नाम के नगर को बसाकर विकसित किया था।
उसे औरंगजेब ने औरंगाबाद नाम देकर विकसित किया। आगे उसने गोलकुंडा को
जीतकर बीजापुर पर आक्रमण करने और उसे अपने अधिकार में लेने की तैयारी की
थी। उसे विश्वास था कि वहाँ के शियापन्थी मुसलमानों का तख्त उलट देने से उसे
पिता की ओर से इनाम मिलेगा। किन्तु ऐन मौके पर दारा ने हस्तक्षेप किया।
औरंगजेब की महत्त्वाकांक्षा के घोड़े को पकड़कर रोक दिया। दारा ने सोचा कि दो
समृद्ध राज्य नहीं भी मिले तो कोई बात नहीं किन्तु औरंगजेब को इस तरह बढ़ने
देना ठीक नहीं।
कुछ समय बाद शाहजहाँ बीमार पड़ गया। उसके चारों शहजादों में सम्पत्ति
के उत्तराधिकार के लिए झगड़ा आरम्भ हो गया। इसी समय अपना दक्षिण का काम
छोड़कर औरंगजेब दिल्ली चला गया था। दिल्ली आते समय उसके मन में एक ही
भय उठ रहा था। महाराष्ट्र के पठार पर शिवाजी के रूप में एक विद्रोही रहता था।
औरंगजेब की दृष्टि में शिवाजी कोई राजा वाजा नहीं थे। वे केवल एक निकृष्ट
जमींदार थे। बुरहानपुर की सीमा को पार कर आगे जाते हुए औरंगजेब ने वहाँ के
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थानेदार को शिवाजी का नाम लेकर ताकीद दी थी—"इस विद्रोही जमींदार पर
कड़ी नजर रखो। उसे बड़ी मस्ती चढ़ रही है।"
दोपहर के उस विश्रान्ति क्षण में बादशाह को सम्भाजी के साथ शिवाजी की
भी याद आयी। उत्तर में उत्तराधिकार के लिए युद्ध, उसके बाद काबुल कंधहार से
लेकर बिहार बंगाल तक की मुहिम, राज्य कर्मचारियों के व्यवस्थित कार्य व्यापार
सुदृढ़ करने जैसे कार्यों में हम बीच-पचीस वर्ष उत्तर में ही अटके रहे। इसी का
नाजायज फायदा शिवाजी ने उठाया। अपने मामा साहब शाइस्ता खान पर आक्रमण
करके उसने उनकी उंगलियाँ तोड़ दीं। अपनी सूरत जैसी समृद्ध नगरी को दो बार
लूटा। ये सारी बातें औरंगजेब को याद आयीं। किन्तु शिवाजी से आगरा में हुई भेंट
को स्मरण करते ही औरंगजेब व्यथित हो गया। अपने भीतर के असह्य दुख को
व्यक्त करते हुए औरंगजेब बोल पड़ा—
"पुरन्दर की घटना के बाद मैंने शिवाजी को आगरा आने के लिए मजबूर
किया था। किन्तु मनुष्य के हाथ कभी-कभी ऐसी चूक हो जाती है कि जिन्दगी भर
उसका अफसोस करने के अलावा कुछ बचता ही नहीं।"
"जहाँपनाह? " असदखान और काजी साहब घबराकर बादशाह की ओर
देखने लगे।
"उस शिवाजी और उसके इस सम्भाजी नाम के बच्चे को काबुल और
कंधहार की मुहिम पर भेजने का मैंने पक्का निश्चय कर लिया था। मरगट्टों की इस
जमीन से दूर किसी अनाम जंगल में धोखे से इन बाप-बेटे का हमें कत्ल करना था।
उसी समय यदि शिवाजी समाप्त हो गया होता तो उसकी हुकूमत और मराठों की
मूर्खता भी उसी समय समाप्त हो गयी होती। लेकिन अफसोस। हमने असावधानी
उन्हें वहाँ भेजने में देरी कर दी और आज तक पश्चाताप कर रहे हैं। इतनी-सी भूल
की कितनी बड़ी सजा।"
बीच में ही साहस बटोरकर फौलादखान ने पूछा, "गुस्ताख़ी माफ़ जहाँपनाह
मुझे ऐसा लगता है कि आगरा से शिवाजी जिस समय भाग गये वही आपकी
जिन्दगी का सबसे अधिक शर्मनाक और दुखद दिन है?"
"नहीं, वह दिन नहीं। हिन्दुस्तान का कोई भी राजा मरा या मारा गया तो उसे
हम अल्लाह की कृपा मानकर खुशी से पागल हो जाते हैं। किन्तु एक दिन हम इसी
तरह दरबार में बैठे थे कि हरकारे ने हमारी जिन्दगी की सबसे बुरी खबर दी थी।"
"कौन-सी? जहाँपनाह!"
"काशी से ब्राह्मण को बुलाकर शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक कराया और
उसका उत्सव मनाया। यह हमारी ज़िन्दगी की सबसे ज्यादा शर्मनाक और दुखद
ख़बर थी। यह हमारी ज़िन्दगी का सबसे ज्यादा शर्मनाक दिन था।"
सम्भाजी 307
इस घटना की स्मृति मात्र से औरंगजेब का दिल जल उठा। वह लम्बी साँस
लेकर बोला, "काजी साहब जिस समय मुझे यह ख़तरनाक ख़बर मिली उसी क्षण
मैंने दरबार ख़ारिज कर दिया और तख्त से उतरकर घुटने टेक दिये। नाक रगड़ते हुए
मैंने अल्लाह का नाम लिया और अपनी पीड़ा व्यक्त की।"
असदखान ने डरते हुए पूछा, "जहाँपनाह किसी ज़मींदार के राज्याभिषेक से
आपके मन की इतनी बुरी दशा क्यों होनी चाहिए?"
"वजीरेआज़म! साम्राज्य का निर्माण भी होता है और साम्राज्य डूबता भी है।
उसका इतना क्या? किन्तु यहाँ तो एक किसान का बच्चा खेतों में कुदाल चलाने की
जगह सिंहासन पर बैठकर महाराजा बन गया था। यह बुरी खबर सुनकर हमें ऐसा
लगा कि कोई लोहे की जलती हुई सलाखों से हमारे कलेजे पर वार कर रहा है।"
आलमगीर की मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए काजी अब्दुल वहाब ने
पूछा, "बादशाह सलामत ! सम्भा को पराजित करने के लिए किबलाए आलम कितने
वर्ष लगेंगे?"
इस प्रश्न पर बादशाह ने अपनी सफेद दाढ़ी को बड़े प्यार से सहलाया। फिर
मीठी मुस्कान के साथ काजी की ओर देखकर अपना एक अँगूठा ऊपर कर दिया।
तब काजी साहब ने कहा, "एक वर्ष।"
इसके साथ ही बादशाह ने प्रसन्नता से सिर हिलाया।
औरंगजेब के साथ तीन लाख घोड़े दुलकी चाल से दक्षिण की ओर जा रहे
थे। साथ में दो लाख पैदल सैनिक चल रहे थे। घोड़ों के पीछे साढ़े तीन हजार हाथी
शान से चल रहे थे। उनमें सरदारों, दरकदारों और सेना के अधिकारियों के हाथी
बहुत सुन्दर ढंग से सजाये गये थे। उनके गले में सोने चाँदी और किसी किसी के
गले में ताँबे के घंटे लटकाए गये थे। खास खास हाथियों के पैरों में सोने चाँदी के
तोड़े बाँधे गये थे।
साठ सत्तर हाथी बादशाह की जनानियों को लेकर चल रहे थे। उनमें बेगमें,
शहजादे, बादशाह की बहुएँ तथा वरिष्ठ मनसबदारों के परिवार वाले शामिल थे।
सबसे बड़े हाथी पर चंदन की मेघाडंबरी रखी गयी थी। उसके महीन नीले पर्दे से
बेगम उदयपुरी बाहर झाँक रही थीं। उनके साथ बादशाह की लाडली शहजादी
जीनतउन्निसा बैठी थीं। मेघाडंबरी में सोना-चाँदी जड़ा हुआ था। मेघाडंबरी वाले
हाथी के पीछे-पीछे राजपरिवार की स्त्रियों के हाथी चल रहे थे। अंबरी के आगे-
पीछे छड़ी लिए खोजों, कश्मीरियों और अफगानियों की स्त्रीरक्षक सेना चल रही
थी। बादशाही जनाना समूह ऐसा लग रहा था जैसे स्वर्ग में अप्सराओं का मेला लगा
हो। हाथी दल के आगे-पीछे अपनी ऊँची गर्दनों को हिलाते हुए पचास हजार ऊँट
चल रहे थे।
308 :: सम्भाजी
इस चलते-बोलते नगर के साथ ढाई सौ बड़े बाजार आगे आगे चल रहे थे।
फौज के साथ चल रहे मनुष्यों और जानवरों की संख्या इतनी प्रचंड थी कि फौज
जहाँ रुकती थी वहाँ पचीस-पचीस, तीस तीस मील तक में पड़ाव पड़ता था।
विभिन्न नगरों के सौदागर, व्यापारी, दलाल, नर्तकियाँ, उनके साजी, नौकर चाकर
ऐसे पाँच छह लाख का जनसागर दक्षिण की ओर बढ़ रहा था। बाजार के सामान्य
लोग और सैनिक सम्भाजी की चर्चा करके उपहास करते हुए हँसते थे। एक-दूसरे
को ताली मारते हुए कहते थे-'अपने जगतविजयी आलमगीर साहब की यह
चतुरंगिणी फौज सम्भाजी ने दूर मे भी देखी तो उसका कलेजा फट जाएगा। वह
काफिर अपनी जगह पर ही डर कर मर जाएगा।'
फौज के कूच करने के पहले ही कामगारों का समूह आगे निकलता था।
हजारों कमाठी और बेगारी कन्धे पर फावड़ा और कुदाल रखकर रास्ता साफ करते
हुए आगे निकलते थे। उनके पीछे बादशाह का प्रचंड तोपखाना निकलता था।
बादशाह के साथ छोटी बड़ी सत्तर तोपें थीं। इन भारी तोपों को खींचकर ले जाना
इतना कठिन था कि एक-एक तोप को खींचने के लिए बैलों की बीस-बीस
जोड़ियाँ लगानी पड़ती थीं। रास्ते में पत्थरों और पहाड़ियों के आ जाने पर खींचने के
लिए बड़े-बड़े हाथियों को जोता जाता था। इसके अतिरिक्त बादशाह के साथ तीन
सौ छोटी तोपें थीं। बादशाह ने अँग्रेज, फ्रांसीसी, डच, जर्मन और पुर्तगाली
गोलंदाज फिरंगियों को सेना में नियुक्त कर रखा था। इसके अतिरिक्त शाही
खजाना, हीरे-जवाहरात, कार्यालय, पीने का पानी जैसी चीजों से लदीं हजारों
बैलगाड़ियाँ और ऊँटगाड़ियाँ दक्षिण की ओर चल रही थीं।
तोपखाने के पीछे घुड़सवार और उनके पीछे ऊँटों के काफिले थे। इसी के
पीछे बादशाह का जनानखाना चल रहा था। अकेले बादशाह का सामान इतना
अधिक था कि केवल उसे ढोने के लिए चौदह सौ ऊँट, चार सौ गाड़ियाँ और डेढ़
सौ हाथी लगते थे।
औरंगजेब के पीछे करीब दो सौ वर्ष का उसके बाप-दादों का पुण्य प्रताप
था। उसका समृद्ध खजाना ऐसा था कि कुबेर भी देखकर सिर झुका ले। काबुल
कंधहार, आगरा, मथुरा, काशी, बंगाल, उड़ीसा, मालवा, गुजरात जैसे प्रदेशों में
गरीबों के पेट पर पैर रखकर यह अतुल सम्पत्ति एकत्र की गयी थी। इसके साथ ही
एशिया के आधुनिकतम शस्त्रास्त्रों का कारखाना और बारूदखाना औरंगजेब के पास
था। इन प्रचंड शस्त्रास्त्रों एवं अतुल सम्पत्ति के सामने मराठों का छोटा-सा राज्य
मानो विशाल हाथी के सामने छोटा सा बच्चा हो। शिवाजी-सम्भाजी के स्वराज्य
का मतलब था मुम्बई और जंजीरे के हब्शियों का प्रदेश छोड़कर बेंगुली की सीमा से
थाना जव्हार तक का कोंकणपट्टा, आगे नासिक बागलान का कुछ हिस्सा और जुन्नर
को छोड़कर पुणे, सतारा, कोल्हापुर का भूभाग। इतनी ही थी उसकी भौगोलिक
सम्भाजी .: 309
सीमा। भौगोलिक क्षेत्र और आर्थिक समृद्धि की दृष्टि औरंगजेब का एक प्रदेश
मराठों के स्वराज्य से दुगुना तिगुना बड़ा था। औरंगजेब के पास ऐसे बाइस प्रदेश
थे।
दक्षिण की ओर चल रहे बादशाह को अपनी कुशलता और अपनी सेना की
बहादुरी पर पूरा विश्वास था। इसके अतिरिक्त औरंगजेब को रात दिन आतंकित
करने वाले शिवाजी अब नहीं थे। पिछले डेढ़ वर्षों से स्वराज्य सम्भाजी के अधिकार
में आ गया था। तब से गृह कलह बहुत बढ़ गया था। अनेक मराठा और ब्राह्मण
वतनदारों ने दिल्ली के बादशाह को पत्र भेजे थे—"आलमपनाह आप साक्षात
पृथ्वीपति हैं। जल्दी से जल्दी दिल्ली से दक्षिण आएँ, उस दुष्ट सम्भाजी और
उसके जुल्मी स्वराज्य से हमें मुक्त करें। हमारे वतन के सारे कागजात हमारी झोली
में डाल दें।" इस ठोस पार्श्वभूमि पर सम्भाजी जैसे एक क्षुद्र, मामूली ग्रामीण
विद्रोही को तो सहज ही कुचल देंगे। ऐसा बादशाह को दृढ़ विश्वास था। वह इसी
बेहोशी में अभिमान से चारों ओर देख रहा था। अपनी चतुरंगिणी सेना को बड़े गर्व
से देख रहा था।
संध्या का समय हो रहा था। शाही फौज के साथ मुकाम के लिए सामान की
दुहरी व्यवस्था थी। आज भी बादशाह के मुकाम पर पहुँचने के पहले ही कामगारों
ने डेरे डंडे खड़े कर दिये थे। पहाड़ी पर सबसे ऊँची जगह देखकर बादशाह, उनके
शहजादों और जनानियों के लिए व्यवस्था की गयी थी। वहाँ पर बादशाह का
अत्यन्त आकर्षक, लाल रंग का, मछलीपट्टनम के कपड़े का तम्बू खड़ा किया गया
था। बगल में बेगम और शहजादों के लिए तम्बू लगाए गये थे। इस हिस्से को
'गुलालबार' कहा जाता था।
बादशाह के डेरे के बाहर तोपखाने की एक प्रचंड सेना पहरा देने के लिए
खड़ी थी। वहाँ पर रोज एक नया सरदार पहरा देने के लिए नियुक्त होता था।
बादशाह के तम्बू के आगे एक बड़ा गुस्लखाना और दूसरा कोतवाली का तम्बू खड़ा
किया गया था।
गले में सोने का घंटा बाँधे और अनेक रूपों से सजाए हुए एक हाथी को लाल
तम्बू के सामने महावत ने बैठाया। उसी समय चाँदी की एक लम्बी सीढ़ी लेकर
कुछ परिचारक आगे दौड़े। अपना एक एक पैर सीढ़ी के डंडों पर रखते हुए बड़ी
शान से बादशाह हाथी से नीचे उतरे। बादशाह ने अपने तम्बू के सामने खड़ा किया
गया एक ऊँचा खम्भा देखा। पश्चिम में सूर्य के पहाड़ की ओट में मुँह छिपाने के
पहले ही बादशाह के तम्बू के सामने के खम्भे पर चिराग जला दिया गया था। समुद्र
में राह से भटके नाविकों के लिए जिस प्रकार आकाशदीप का दीपस्तम्भ होता है
उसी प्रकार लगभग तीस मील में फैली बादशाह की फौज के लिए यह आकाशदीप
३१० सम्भाजी
एक दीपस्तम्भ था। फौज में शाहंशाह का ठिकाना कहाँ है? यह उस दीपस्तम्भ से
किसी को भी ज्ञात हो सकता था।
उस ऊँची पहाड़ी और दूसरी ओर की घाटी में अँधेरा फैल गया। नित्य की
भाँति फौज में अनुशासनबद्ध रीति से अपने डेरे डाल दिये। बादशाह ने अपने
सहयोगियों के साथ नमाज पढ़ी। अपने अमीरों के साथ कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर
विचार विमर्श किया। उसके बाद वह अपनी गुलाबबारी की ओर लौट गया।
बादशाह ने आज अपने शहजादों और सेना के अपने नजदीकी मेहमानों के
लिए एक बड़ा भोज आयोजित किया था। इसलिए बादशाह के अपने खास लोगों
के लिए आज की रात बहुत महत्त्वपूर्ण थी।
इस बड़े भोज के लिए उस विशिष्ट तम्बू बेगम उदयपुरी के साथ सभी
खास खास स्त्रियाँ एकत्र हुईं। उनके पीछे बादशाह का बड़ा शहजादा मुअज्जम,
वैसे ही कामबख्श और मुअद्दीन के साथ बादशाह के सभी पौत्र एकत्र हुए। बादशाह
के परिवार के लोगों के आने पर बादशाह के अन्य मेहमान और सरदार बड़े अदब से
खड़े हो रहे थे। उनमें बादशाह के पीछे नित्य खड़ा रहने वाला, औरंगजेब से उम्र में
बड़ा हट्टा कट्टा असदखान था। उसकी बगल में औगंगजेब का मौसेरा भाई,
असदखान का बेटा जुल्फिकार खान बैठा था। सेना के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पदों पर
काम करने वाले बादशाह के मेहमान थे। उन्हें महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया था।
आज का भोज शाही मेहमानों के लिए एक आश्चर्यजनक चीज थी। अन्य
समयों पर अपने राजनीतिक शतरंज की चौपड़ और नमाज की चादर को छोड़कर
बादशाह किसी की ओर भूलकर भी नहीं ताकता था। उसकी हास्य विनोद और
संगीत में भी कोई रुचि नहीं थी। बादशाह का सेना में, दरबार में, अन्य कार्य व्यापार
में बड़ा दबदबा था। अन्य मेहमानों और अधिकारियों की बात तो दूर, शहजादा
आजम और मुअज्जम भी अपने पिता से आये पत्र को पढ़ते हुए थर थर काँपने लगते
थे। उनके चेहरे भय से ऐसे सफेद हो जाते थे जैसे किसी ने खड़िया या मिट्टी पोत दी
हो। इसलिए ऐसे बादशाह के साथ भोजन करने में भी सभी मेहमान भीतर से बहुत
डरे हुए थे। वे अल्लाहताला से दुआ कर रहे थे कि खुदा की मेहरबानी से उनके
द्वारा कोई गुस्ताखी न हो जाये और यहाँ से वे सकुशल छुट्टी पाएँ।
इसी बीच औरंगजेब की दुबली-पतली, बुढ़ापे से कमजोर किन्तु किसी
बालक के उत्साह से भरी मूर्ति वहाँ उपस्थित हुई। सभी की कोर्निस को स्वीकार
करते हुए बादशाह ऊँचे आसन पर बैठ गया। बादशाह के पीछे-पीछे उसकी पैंतीस
वर्षीय लाड़ली शहजादी जीनतउन्निसा चल रही थी। जैबुन्निसा औरंगजेब की बड़ी
बेटी थी और यदि सच कहा जाये तो उसने बादशाह का दिल जीत लिया था। किन्तु
शहजादे अकबर को बगावत के समय उसने छुपकर उसकी सहायता की थी। यह
सम्भाजी :: 311
समाचार पाते ही औरंगजेब के होश उड़ गये। जैबुन्निसा को उसने फूल की तरह
पाला-पोसा था। किन्तु जैबुन्निसा को उसने अपने से न केवल दूर किया अपितु उसे
बन्दी बनाकर दिल्ली की सलीमगढ़ किले में हमेशा के लिए कैद कर दिया। उसके
बाद से जीनतउन्निसा, उसकी छोटी बेटी, उसकी लाड़ली बन गयी थी।
बादशाह ने सभी के साथ बड़ी शान्ति से खाना खाया। किन्तु खाना समाप्त
होने पर बादशाह गम्भीर दिखने लगा। अपने में खोया हुआ बादशाह अभिमान से
बोला, "हथियार के रूप में मैं दो तलवारों का उपयोग हमेशा करता हूँ। एक
युद्धभूमि की दूसरी बुद्धि की। आप सभी जानते ही हैं कि पहली की अपेक्षा दूसरी
ज्यादा चलानी आती है।"
बादशाह की बात सुनकर असदखान को उत्साह आ गया। उसने सभी को
स्मरण कराते हुए कहा, "आप लोगों को कुछ दिन पहले की जादुई लड़ाई याद
होगी। एक ओर एक लाख लड़ाकू राजपूत, उनके साथ वह दुर्गादास नाम का कुत्ता
और अपने बदकिस्मत शहजादे अकबर। लेकिन लाखों की उस फौज को अकल
की तलवार से जहाँपनाह ने उस मरुभूमि में भगा दिया। खून की एक बूँद भी गिराये
बिना लड़ाई जीत ली।"
असदखान के इस गौरवपूर्ण उद्गार से बादशाह मन में बहुत प्रसन्न हुआ।
अपनी भूरि आँखों को फैलाते हुए उसने धीर गम्भीर स्वर में कहा-
"मेरे पास एक और तीसरा हथियार भी है। वह बहुत तेज और जहरीला
है।" बोलते बोलते बादशाह ने अपने कमर पट्टे से एक छोटी सी कटार निकाली।
उसकी चमकती धार को दिखाते हुए बोला, "मेरे साथ किसी ने गद्दारी और
दगाबाजी करने की कोशिश की तो मेरी यह कटार उस काफिर के पेट में बेदर्दी से
घूमकर, उसकी रीढ़ की हड्डियाँ तोड़ कर ही बाहर निकलती है।"
औरंगजेब पुनः सभी पर एक उड़ती नजर डालते हुए कुछ और कठोर स्वर में
बोला, "हमारे मुगल खानदान और दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले तुर्क वंशों में
अनेक बहादुर, कुशाग्रबुद्धि और कला के कद्रदान हो गये हैं। मेरे अनेक मित्र मुझे
चिढ़ाने के लिए उनका स्मरण कराने की बेवकूफी करते हैं। मेरा तो हिसाब ही
अलग है। हमारे जहाँगीर साहब की सारी जिन्दगी चित्र बनाने में चली गयी। मेरे
हाथ रंगों की कूची के लिए नहीं हैं। उनमें तलवार उठाने का रोमांच होता है। मुझे
दुश्मन के शरीर से निकलने वाले रक्त की प्यास रहती है। हमारे अब्बाजान
शाहजहाँ साहब ने महल और शाही इमारत बनाने में अपनी सारी उम्र बर्बाद की।
हमारे सम्राट अकबर साहब राजपूतों, हिन्दुओं को गोद में बिठाकर उनका दुलार
करते रहे। इस तरह साँपों को अपने शरीर से लिपटाकर उनके साथ खिलवाड़ करना
हम स्वीकार नहीं। इस तरह के खोखले भाईचारे का स्वप्न हम कभी नहीं देखते।
312 सम्भाजी
इनमें सबसे अधिक इज्जत में अलाउद्दीन खिलजी साहब की करता हूँ। वे यहाँ की
प्रजा को ठिकाने पर ले आये थे। पालतू घोड़ा, कुतिया और प्रजा ही नहीं सभी
जानवरों को काबू में रखना चाहिए। मुझे भी यहाँ की प्रजा की गर्दन पर तलवार
रखकर सियामत करना बहुत पसन्द आता है।"
आज के भोज में शहजादा आजम उपस्थित नहीं था। उसे सम्भाजी के
समाचार के लिए दक्षिण की ओर भेज दिया गया था। अपनी फौज में सबसे अधिक
कुशल और किसी भी संकटपूर्ण कार्य को सम्पन्न करने में सक्षम अपने बड़े बेटे
मुअज्जम की ओर देखा। सभी पर नजर डालते हुए बादशाह ने कहा-
"इस बार की यह दक्षिण मुहिम मेरे लिए नहीं है। बल्कि हमारे दो शहजादों
के लिए एक इम्तिहान है। क्यों असद खान?"
"जैसी आपकी मर्जी किबलाए आलम।"
"मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। मेरे बाद इस बादशाहत का कार्य भार कौन
सँभालेगा? मेरा उत्तराधिकारी कौन बनेगा? यह निश्चित करने का समय अब आ
गया है।"
बादशाह के इस कथन से मुअज्जम चौंका। उसकी बेगम आँखें फाड़कर
इधर उधर देखने लगीं। उसी समय बादशाह को कुछ स्मरण हुआ। आकाश से
अचानक झर झर बरसात करने वाली घटा के समान उसके चेहरे पर एक छाया
आयी और चली गयी। किसी की भी चिन्ता किये बिना बादशाह कहने लगा-
"आजम क्या और मुअज्जम क्या, मेरे बाद हिन्दुस्तान के तख्त पर बैठने की इन
दोनों में योग्यता नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य! क्या किया जाये? हमारी गद्दी पर बैठने
और ताज पहनने की जिसमें काबिलियत थी अपना वही शहजादा बेवकूफ निकला।
बगावत करके जानी दुश्मन से जा मिला। रहम आता है उस शहजादे पर।
अल्लाहताला ने उसे इतना सब कुछ दिया किन्तु उसकी बेवकूफी और बदनसीबी ने
सब कुछ छीन लिया।
शहजादा अकबर की याद से बादशाह का हृदय ऐसे लहूलुहान हो रहा था
मानो किसी ने उसके कलेजे में कटार भौंक दी हो। यह दृश्य देखकर बादशाह के
मारे मेहमान सहम गये थे। बगावत की कल्पना से बादशाह का चेहरा लाल हो
गया। वह गरजा-"हमारे शासन में जो विद्रोह की कोशिश करता है, वह खाक हो
जाता है। क्योंकि बगावत और गद्दारी की सही कला केवल इस औरंगजेब को आती
है। मेरे जन्मदाता पिता का दिमाग जिस समय खराब हुआ उस समय उन्हें भी बुढ़ापे
में मैंने सबक सिखाया। उसके लिए आगे पीछे नहीं देखा। जिस तरह किसी पेड़
की टहनी को सहजता से तोड़ दिया जाता है उसी प्रकार मैंने अपने बेवकूफ भाइयों
को श्मशान का रास्ता दिखाया। दुश्मनों की खैरियत चाहने वाली बहनों को हमेशा
सम्भाजी 313
के लिए बन्दीखाने के अँधेरे में ढकेल दिया। मुझे इतना ही कहना है, बस! हमारे
बाद दिल्ली का बादशाह कौन हो? यह निर्णय मैंने अपने पिता को भी नहीं करने
दिया। किन्तु मेरे बाद दिल्ली का बादशाह कौन होगा? यह निर्णय केवल मैं ही
करूँगा। हमारे शहजादों में जो दक्षिण की फ़तह हासिल करेगा, सम्भा जैसे मूर्ख को
कुचल देगा, उसी के सिर पर हम अपने हाथ से गर्व के साथ हिन्दुस्तान का ताज
पहनाएँगे।''
चार
हंबीरराव अपनी फौज के लिए अधिक रसद और गोला बारूद प्राप्त करने के लिए
राजधानी रायगढ़ आये थे। राजधानी में सेनापति हंबीरराव मोहित येसूबाई से मिले।
सोयराबाई ने इसी समय उनके लिए बुलावा भेजा। हंबीरराव इस सन्देश से चकित
हुए। क्योंकि सम्भाजी के द्वारा रायगढ़ का कार्यभार सँभालने के बाद लगभग डेढ़
वर्षों में सोयराबाई से उनकी भेंट नहीं हुई थी। हंबीरराव ने स्वयं दो तीन बार
सोयराबाई से मिलने की कोशिश की थी। किन्तु सोयराबाई को उनका मुँह देखना
गँवारा नहीं था।
अपनी बड़ी बहन के क्रोध का कारण हंबीरराव को मालूम था। ऐन मौके पर
हंबीरराव ने सब काम चौपट कर दिया। अपने भांजे का राजा बनना जब सगे मामा
को ही पसन्द नहीं है तो दूसरों को क्या दोष देना? सोयराबाई की ये कटूक्तियाँ
हंबीरराव के कानों तक बार-बार पहुँचती थीं।
सोयराबाई का अन्धा पुत्र प्रेम, अपने स्वार्थ के लिए शम्भुराजा के प्राणों की
भूख, उसके लिए खतरनाक साजिशों में शामिल होना आदि सभी को मालूम हो
गया था। इसी से सन्तप्त शम्भुराजा ने सोयराबाई के महल पर जाकर शोर मचाया
था। यह बात महीने डेढ़ महीने पहले की थी। उसके बाद सोयराबाई की पालकी
केवल दो बार जगदीश्वर का दर्शन करने गयी थी। रायगढ़ के निवासियों ने इसे
देखा था। इसके अतिरिक्त वे पूरे दिन अपने महल में रहती थीं। उनका स्वास्थ्य भी
अच्छा नहीं था।
हंबीरराव ने जब अपनी बड़ी बहन को देखा तो उनका कलेजा फट गया।
३१४ : सम्भाजी
सोने के गहनों से लदी रहने वाली महारानी सोयराबाई का आज का रूप ही एकदम
अलग था। सफेद वस्त्र, माथे पर पड़ी झुर्रियाँ, सूखते कुएँ जैसी गहरी आँखें एकदम
दुर्बल शरीर। सोयराबाई अनेक वर्षों तक तपस्या करने वाली सन्यासियों सी लग
रही थीं। उनकी आवाज भी बहुत पतली हो गयी थी। उन्होंने अपने भाई को बगल
के पलँग पर बैठने को कहा। हंबीरराव अपने को रोक न सके उन्होंने कहा, "माफ
क र न ।
दीदी जी, कारण जो भी हो आपका छोटा भाई आपके साथ नहीं रह सका। मुझे
माफ करें।"
"हंबीरराव वैसी कोई बात नहीं है। यह सच है कि आरम्भ में तुम्हारे ऊपर
मुझे बहुत क्रोध आया था। किन्तु बीती बातों पर गम्भीरता से विचार किया। सारी
घटना को तटस्थता से देखा। उसके बाद निश्चित किया कि तुम्हें शाबाशी देनी
चाहिए।"
"दीदीजी, आप क्या कह रही हैं?" हंबीरराव की आवाज भर आयी।
उन्होंने कहा, "राजाराम के विवाह के पहले की बात है। उस समय बड़े महाराज
ने एकान्त में मुझसे कहा था-राजाराम आप मेरे साले हैं। किन्तु यह मात्र संयोग है।
उस रिश्ते के आधार पर मैंने आपको सेनापति का पद नहीं दिया। इसके विपरीत
हमारा यह विश्वास है कि आपके मजबूत हाथों में स्वराज्य का संवर्धन होगा।"
"सच है हंबीरराव। महाराज गुणों के सच्चे पारखी थे।"
बहुत दिनों के बाद इस प्रकार खुले मन से बातें हो रही थीं। इसीलिए अपने
मन को मुक्त करते हुए हंबीरराव ने कहा "महाराज और शम्भुराजा की पन्हाला पर
हुई भेंट के बाद महाराज ने मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा था-शम्भुराजा से जो हमारी
बात हुई उसमें मैंने शम्भू के मन को अच्छी तरह पढ़ा। मुझे विश्वास हो गया है कि
स्वराज्य शम्भुराजा के हाथों में ही सुरक्षित रहेगा। राजाराम अभी अबोध है।"
"ऐसा है?" सोयराबाई गम्भीर हो गयीं।
रायगढ़ पर उत्तराधिकार के लिए हुए पहले विद्रोह की हंबीरराव को याद
आयी। उन्होंने कहा, "दीदी। उस सारी पार्श्व भूमि के सम्बन्ध में मैं आपसे इतना
ही कहूँगा कि हो सकता है कि एक भाई ने अपनी बहन का साथ न दिया हो या
धोखा दिया हो किन्तु स्वराज्य के एक ईमानदार सेवक ने खाये हुए नमक का अदा
किया है, यह निश्चित है।"
सोयराबाई ने शून्य में देखते हुए कहा, "हंबीरराव जब हम राजगढ़ में रहते
थे तब सईबाई के बाद मैंने शम्भू को अपने पेट के बच्चे की तरह पाला पोसा। बाद
में राजाराम हमारी गोद में आये। उसके बाद शम्भुराजा को हमने कब अलग कर
सम्भाजी ३१८
दिया, इसका मुझे भी पता नहीं। आगे स्वार्थी कर्मचारियों ने कहना शुरू किया कि
शम्भुराजा दुष्ट हैं, व्यसनी हैं, वही झूठी अफवाह मैंने अपने मन में बिठा ली।
क्योंकि रायगढ़ की महारानी बनने के बाद यहाँ की राजमाता बनने की मेरी इच्छा
बलवती हो गयी थी।"
हंबीरराव इधर उधर देखते हुए पूछने लगे— "राजाराम साहब कहाँ हैं?
कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं?"
"हंबीरराव, शम्भुराजा के यहाँ गढ़ पर रहने पर राजाराम को भूख-प्यास भी
नहीं लगती। हमारे पास रुकना तो दूर की बात है।" सोयराबाई ने कातर स्वर में
कहा, "अब हमें राजाराम की कोई चिन्ता नहीं है। हमारे साथ इतना कुछ हो गया
किन्तु राजाराम के प्रति शम्भुराजा का वात्सल्य रंच मात्र भी कम नहीं हुआ। ऐसा
लगता है कि बड़े महाराज की जगह शम्भुराजा ने ली है। उनकी कमी पूरी कर दी
है। येसू भी राजाराम का इतना ध्यान रखती हैं कि मुझे लगता है कि राजाराम को
अपनी माँ की भी कोई आवश्यकता नहीं है।"
"नहीं दीदी, आप ऐसे कहेंगी तो कैसे चलेगा?"
"हंबीरराव, आप हमारे छोटे भाई हैं इसलिए कह रही हूँ। मुझसे अनजाने में
नहीं, जानबूझकर इतने अपराध हुए हैं कि अब जीने की भी इच्छा नहीं होती।
पालकी में बैठकर जगदीश्वर के दर्शन करने जाने में भी लज्जा आती है। लोग मुझे
स्वार्थी और कपटी स्त्री के रूप में देखते हैं।"
"दीदीजी, आप इतना सोच विचार क्यों करती हैं? आपका स्वास्थ्य भी
ठीक नहीं है। कृपा करके अब आप आराम करें।"
"नहीं हंबीरराव, कभी-कभी पश्चाताप से हमारा हृदय साफ होता है। मनुष्य
की स्वार्थबुद्धि की भी कोई सीमा होनी चाहिए। एक ओर औरंगजेब जैसा हमारी
तीन-तीन पीढ़ियों का शत्रु स्वराज्य पर आक्रमण कर रहा है। ऐसे समय में माता
होने के नाते शम्भुराजा को सान्त्वना और प्रोत्साहन देना हमारा प्रथम कर्तव्य था।
परन्तु ऐसे समय में कपटी और दुष्ट कर्मचारियों के साथ लगकर हम शम्भू बेटे को
नष्ट करने पर तुले थे। मैं भी उन कुटिल षड्यन्त्रकारियों के साथ हो गयी थी। इससे
हमें अत्यधिक लज्जा का अनुभव होता है।"
बोलते-बोलते सोयराबाई का स्वर कातर हो गया। उनकी आँखों में आँसू
उमड़ आए। उनके गले में जोर का ठसका बैठा। एक दासी ने तुरन्त पानी का पात्र
उनके हाथ में पकड़ाया। उनकी यह दशा देखकर हंबीरराव ने कहा, "दीदी अब
अपने को और अधिक कष्ट न दें, विश्राम करें, सब ठीक हो जाएगा।"
शरीर पर शाल को लपेटते हुए सोयराबाई दासी की सहायता से भीतर जाने
लगीं। किन्तु तभी उन्होंने हंबीरराव को पुनः अपने समीप बुलाया। उन्होंने धीरे से
316 सम्भाजी
किन्तु कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा, "येसूबाई से मेरा निश्चित सन्देश दीजिए कि
हमें अब किसी की बात की चिन्ता नहीं है। तुम्हारे आँचल की छाया में हमारा बेटा
राजाराम सुखी और सुरक्षित रहेगा।"
अश्विन शुक्ल 11 शक सम्वत् 1603, दिनांक 27 अक्टूबर 1681 का दिन
था। सप्तमहल की ओर से रोने की आवाज आने लगी। दासियाँ जोर जोर से रो
रही थीं। सोयराबाई का मृत शरीर बिस्तर पर पड़ा था। शम्भूराजा और येसूबाई
दौड़ते हुए वहाँ आये। सफेद शुभ्र वस्त्रों में सोयराबाई का शरीर काला दिखाई पड़
रहा था। तत्काल राजवैद्य को बुलाया गया। वैद्य ने निदान करके बताया कि पिछली
रात को ही महारानी ने हीरे का टुकड़ा खाकर आत्महत्या की है।
शम्भूराजा ने काले हौद की बगल में, बड़े महाराज के अन्तिम संस्कार के
स्थान के पास सोयराबाई को मुखाग्नि दी। साथ ही भट भिक्षु, दीन दुर्बल, राही
बटोही को दान दक्षिणा दी। राजाराम साहब का वे बहुत ध्यान रख रहे थे।
क्रिया कर्म का कार्यक्रम समाप्त हो गया। पूरा राजमहल रिश्तेदारों से भरा
था। सोयराबाई की याद में शम्भूराजा की आँखें भर आयीं। उन्होंने कहा, "अपने
पुत्र के मोह में हमें बन्दी बनाने से लेकर मारने तक का उपाय उन्होंने किया था।
लेकिन यह मानवी स्वार्थ का एक प्रकार है। किन्तु पिताजी की जवानी में राजगढ़ के
हमारे बचपन में इन्हीं ने हम दोनों को संभाला था। उनके उस प्यार को हम कभी
भूल नहीं सकते। अपनी इन्हीं माताजी पर यह अभियोग लगा कि उन्होंने बड़े
महाराज को विष दिया था। किन्तु ऐसा लांछन लगाकर उनके पतिव्रत धर्म की
पवित्रता को कलंकित करना है। वे स्फटिक सी शुभ्र और पारदर्शी थीं।"
पाँच
"सम्भाजी महाराज आज औरंगजेब ने पूरे हिन्दुस्तान में उपद्रव मचा रखा है। उत्तर
भारत में बहुत से शक्तिशाली हिन्दू और राजपूत सरदार हैं। परन्तु वे सभी उस
बादशाह के अधीन पशु की भाँति विवश हैं।"
"ऐसा?"
"तो क्या उन्हें देश की, धर्म की, किसी को कोई चिन्ता नहीं है? आपने भी
सुना होगा कि औरंगजेब ने हिन्दुओं पर जजिया नाम का अन्यायपूर्ण कर लगाया है।
सम्भाजी :: 317