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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

खाली हाथ खड़े। उनके पास लूट का सामान तो क्या कोई सादी पोटली तक न थी।
बहादुर खान ने उन तीन हजार घुड़सवारों को निर्विघ्न रूप से जाने दिया। जोत्याजी
उत्साहपूर्वक बोले, "खान साहब! मैंने जो कहा था वह सच ही कहा था न?
शम्भुराजा कोई पागल है क्या जो इस रास्ते से जाएँ?" बहादुरखान कोकल्ताश को
विश्वास हो गया कि लूट का माल लेकर जाने वाले मराठे ऐदलाबाद की तरफ मे
ही गये होंगे।
शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करना, लूट का माल उनसे हस्तगत करना,
औरंगजेब के क्रोध से अपनी जान बचाना जैसे अनेक विचार बहादुरखान के मन में
एक साथ उठ रहे थे। उसका दिमाग तड़फड़ा रहा था। वह तीर की तरह ऐदलाबाद
की ओर दौड़ने लगा। शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करने की धुन में उसे पता
ही नहीं चला कि वकील बने काजी हैदर और जोत्याजी कब और कहाँ गायब हो
गये? उसका ध्यान तो लूट के माल पर केन्द्रित था।
बहादुरखान के रास्ते से हट जाने का विश्वास हो जाने पर, रात के अँधेरे में
इधर उधर फैले जासूसों ने आपस में मंकेतों से ममाचार को आगे बढ़ाया। दोपहर
को जहाँ पर बहादुरखान मोर्चा बाँधे बैठा था, वहीं से मराठों की मुख्य फौज तीन
घंटे के भीतर आगे निकल गयी। शम्भुराजा और हंबीर मामा अपने अपने दलों के
साथ लूट का माल लेकर उसी चोपड़ा मार्ग से माल्हेरे के बलशाली किले की ओर
चल पड़े।
मध्य रात्रि बीत चुकी थी। घोड़े पहाड़ से नीचे गिरती जलधारा की भाँति भाग
रहे थे। अत्यधिक परिश्रम के कारण घोड़ों और सैनिकों का बुरा हाल हो रहा था।
उनका रक्त गर्म हो गया था। बाहर कड़ाके की ठंडक होने पर भी घोड़े और
सिपाही अपने भीतर गर्मी महसूस कर रहे थे। मनुष्यों और जानवगे दोनों को आगे
बढ़ने के लिए जोर लगाना पड़ रहा था। मैनिकों के साथ साथ लूट के माल का
बोझा भी घोड़ों की पीठ पर था। दो पहाड़ों के बीच की घाटी से घोड़े चल रहे थे।
सवेरा होने से पहले आगे का रास्ता पकड़ने का शम्भुराजा का विचार था।
इसी समय मानाजी की दृष्टि पास की पहाड़ी के दो ऊँचे कलशों की ओर
गयी। उन्होंने कहा, "महाराज, यह सामने की पहाड़ी मार्कंडा किले का पिछला
हिस्सा है। यह सप्तशृंगी माता को पहाड़ी है।"
राजा ने घोड़े की लगाम खींची। उन्होंने कहा, "बाकी मेना को आगे जाने
दीजिए। हमारे साथ डेढ़ हजार घोड़े पर्याप्त होंगे।"
"यानी? अब इस घुप्प अँधेरी रात में कहाँ जाना है?" मानाजी ने पूछा।
"मतलब यह कि सप्तशृंगी के दर्शन के लिए जाएँगे। बुरहानपुर की ओर
निकलते समय मैंने देवी से सहायता के लिए याचना की थी। अब उनकी उपेक्षा
मम्भाजी 251

करके कैसे आगे जा सकते हैं?"
"महाराज, हमारी सुनें, विलम्ब हो जाएगा। हमारा पीछा किया जाये, इसकी
भी सम्भावना है। देवी के दर्शन के लिए फिर आ जाएँगे।" रूपाजी कहने लगे।
"नहीं ऽ! अभी जाएँगे।"
"परन्तु महाराज यह सामने की चढ़ाई चढ़ते-उतरते सारी रात बीत
जाएगी।" मानाजी ने विनयपूर्वक कहा।
"होने दीजिए, अच्छे यश और आशीर्वाद के लिए कष्टकर मार्ग ही अपनाना
पड़ता है।" शम्भूराजा ने दृढ़ता से कहा।
लूट का सामान लेकर जाने वाली सेना कवि कलश के साथ आगे बढ़ गयी।
केवल डेढ़ हजार घुड़सवार लेकर, रात में ही शम्भूराजा ऊपर गये। भोर होने लगी
थी। उस सोये जंगल में सप्तशृंगी का एक गश्ती मराठा दल जाग रहा था। हो
सकता है कि श्रद्धालु, शम्भूराजा लौटते समय पीछे के रास्ते से वहाँ आएँ, इसलिए
वहाँ का थानेदार भी जाग रहा था। सामने की घाटी की दूसरी ओर मार्कंडा किले की
बुर्जों पर पहरेदार भी जाग रहे थे।
सप्तशृंगी माता का छोटा-सा मन्दिर पहाड़ी के कन्धों पर खड़ा था। नीचे
थोड़ी समतल भूमि पर पुजारियों के घर थे। वहीं से आने वाली रोशनी के उजाले में
महाराज चढ़ाई करने लगे। रास्ता सँकरा, खड़ा और दोनों ओर से करौंदे की घनी
झाड़ियों से घिरा था। उस सँकरे रास्ते से एक-एक व्यक्ति ही चल सकते थे। नीचे
घोड़े से उतरकर शम्भू महाराज तेजी से चढ़ाई चढ़ने लगे।
पहाड़ी के मध्य भाग में महामाया सप्तशृंगी का वह छोटा-सा मन्दिर था।
मन्दिर के सामने दो-तीन सोमजुही के पेड़ थे। महाराज देवी दर्शन के लिए आने
वाले हैं, यह खबर भिखारियों और वनवासी गरीबों को लग चुकी थी। वे मन्दिर के
बाहर सँकरी जमीन में इकट्ठे हो गये थे। उनके साथ चार-पाँच फकीर भी हाथ में
कटोरे लेकर बैठे थे। दर्शन के लिए भीतर जाने से पहले राजा वहाँ रुके। खंडो
बल्लाल के हाथ में मुहरों की थैली थी। उसमें हाथ डालकर महाराज गरीबों की
थालियों और फकीरों के कटोरों में मुट्ठी-मुट्ठी भर मुहरें डालने लगे। फकीरों के
वेश में बैठे पठानों ने अपने नीचे छुपाई हुई तलवारें खींच लीं। वे 'मारोऽ मारोऽऽ'
कहते हुए शम्भू महाराज पर टूट पड़े। शम्भू महाराज ने भी अपनी कमर से तलवार
खींच ली और क्रोध से आगे बढ़े। एक साथ पाँच लोग महाराज पर आक्रमण कर
रहे थे। महाराज अपनी तलवार को तेज चलाते हुए अपना बचाव कर रहे थे। राजा
के कन्धों पर तलवार का वार पड़ा। वस्त्र फट गया और 'खन्न' की आवाज हुई।
शम्भू महाराज ने जालीदार कवच पहनने में प्रमाद नहीं किया था। वह कवच और
लौह शिरस्त्राण उनकी सहायता कर रहे थे। जैसे कोई भूखा शेर अयाल फैलाकर
252 :: सम्भाजी

अपने शिकार पर टूट पड़ता है, वैसे शम्भू महाराज उन पठानों पर टूट पड़े। चौथे
पठान के दाहिने कन्धे पर तलवार का ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर लुढ़क कर
नीचे गिर गया। वह सिर कटी मुर्गी की तरह तड़पने लगा। वह पास के पत्थर के
नीचे गिर गया। वह भयानक दृश्य देखकर पूरा वातावरण भयाक्रान्त हो गया। इतने
में सोनजुही की झाड़ के अँधेरे में छिपा पाँचवाँ पठान शम्भू महाराज की पीठ पर
कूदा। उसकी लम्बाई तीन आदमियों के बराबर थी। अपनी ताकत से उसने शम्भू
महाराज को नीचे दबोच लिया। वह महाराज को नीचे दबाने का प्रयास करने लगा।
नीचे पड़ने से महाराज की कुहनियाँ हिल गयीं। इसी बीच महाराज के कुछ
सहयोगी आ गये और उस हत्यारे को हटाने की कोशिश करने लगे। शम्भुराजा का
दम फूलने लगा था। वे किसी प्रकार एक ओर सरक पाये। दाहिना हाथ मुक्त होते
ही उन्होंने अपनी कटार निकाली और दूसरे ही क्षण पठान के पेट में भोंक दिया।
उस पठान का पेट फाड़ती हुई वह कटार गले के पास जाकर निकली। तब कहीं
वह जल्लाद जाकर एक ओर गिरा।
पीछे आ रहे सहयोगी दौड़कर आगे आये। पास के झरने से पानी लाया गया।
महाराज ने अपने वस्त्र ठीक किये। खंडो बल्लाल कहने लगे—
"महाराज! काल आया था लेकिन समय नहीं आया था।" शम्भू महाराज
हँसे। वे सावधान होते हुए बोले, "सप्तश्रृंगी माता ने आज अलग ढंग से दर्शन देने
का निश्चय किया था। आज बच पाये है, तो उसी के आशीर्वाद से।" सवेरा होते
होते पूजा की गयी। शम्भू महाराज बहुत देर तक सप्तश्रृंगी की डेढ़ पोरिसा ऊँची
पाषाण मूर्ति और उसकी स्निग्ध आँखों की ओर सन्तोषपूर्वक देखते रहे।
महाराज वह ढलान उतरने लगे। अँधेरा छँटने लगा था। घाटी में पहाड़ों के
अस्पष्ट आकार को फिर से आकार मिलने लगा था। मार्कडा पहाड़ की ऊँची
चोटियाँ अब स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। ऐसा लगता था मानो जटाधारी ध्यानस्थ
मार्कंडेय ऋषि महाराज को आशीर्वाद देने के लिए अवतरित हुए हों।
तीन
शिलंगण का सोना लूटा जा चुका था। स्वयं शम्भू महाराज ने स्वराज्य के प्रधान
सेनापति हंबीरराव मोहिते और उनकी रूपाजी, मानाजी जैसे सहयोगियों पच्चीस
सम्भाजी 253

हजार सेना की प्रशंसा की थी। नासिक, बागलाठा और मराठवाड़ा में उनके
वीरोचित पराक्रम से हाहाकार मच गया था। बुरहानपुर और औरंगाबाद जैसे
बादशाह के प्रिय नगरों का नक्शा ही बदल दिया गया था।
रायगढ़ में शम्भूमहाराज ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई। विजयी वीरों के
स्वागत के लिए रायगढ़ के लोभ ही नहीं, वहाँ की सारी वस्तुएँ, पाषाणी, मेहराबें,
छतों के खपरैल तक उत्सुक थे।
शम्भूराजा ने स्वयं दस कदम आगे बढ़कर हंबीर मामा को वस्त्र प्रदान किए,
उनकी पगड़ी में हीरों के झुमकेदार फूल लगाए। वस्तुतः हंबीरराव का यह सम्मान
महाराज सोयराबाई के हाथों कराना चाहते थे किन्तु सोयराबाई ने बीमारी का बहाना
बनाकर भाई के सम्मान का अवसर टाल दिया।
मान-सम्मान का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। शम्भू महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक
प्रह्लाद मिराजी से पूछा, "पन्त हमारे लाये गये लूटे माल की गणना हो गयी
क्या?"
"चल रही है महाराज ! वह विशाल भंडार गिनते-गिनते कर्मचारियों की
गर्दनें और आँखें दुखने लगी हैं। लेकिन सम्भवतः अभी इसका अधिकांश भाग तो
साल्हेर के किले में, वहाँ खानदेश में रखा है।"
"किन्तु शत्रु भी सोया नहीं था।" हंबीरराव कहने लगे, "हमारे आक्रमण
की खबर बहादुरखान को लग गयी। खबर लगते ही वह हवा की तरह दौड़ता
आया। प्राप्त की दौलत के निकल जाने का समय आ गया था। किन्तु हमारी भी
दूरदृष्टि कम न थी। शम्भू महाराज हमने आपके साथ वरहाँ के नक्शे का अध्ययन
किया। आपके आदेशानुसार हमने चोपड़ा की राह पकड़ी और खान को चकमा
देकर सही सलामत साल्हेर के किले में आ गये।"
हंबीर मामा की बात समाप्त होते ही सूर्याजी जाखड़े उठकर खड़ा हो गया।
वह कुछ दुख और निराशा के स्वर में कहने लगा—"महाराज थोड़ी-सी चूक हो
गयी। नहीं तो औरंगाबाद का काँटा भी लगे हाथ निकाल दिये होते। बुरहानपुर को
लौटते समय बहादुरखान को हमारे आक्रमण की खबर लग गयी। वह फरदापुर की
ओर से दौड़ता हुआ समय पर आ पहुँचा इसीलिए औरंगाबाद बच गया।"
"ठीक है सूर्याजी और कोई बड़ा अवसर तुम्हारी तलवार की राह देख रहा
होगा।" शम्भूराजा ने कहा।
शम्भूराजा ने तत्काल मुआयना किया। शम्भूराजा ने मुगलों के क्षेत्र में अपनी
सेनाएँ भेजी थीं। नासिक से बरहाड़ और नीचे भागानगर से हैदराबाद की सीमा तक
ये सेनाएँ धूम मचा रही थीं। कुछ फौजी टुकड़ियाँ शोलापुर की ओर भी गयी थीं।
संभाजी महाराज की नीति थी कि जितना सम्भव हो शत्रु की हानि की जाये, उनके
254 :: सम्भाजी

क्षेत्र को जलाकर खाक कर दिया जाये। युद्ध क्षेत्र में अपना राजा सैनिकों के साथ
आगे रहता है, इसकी सेना में बड़ी प्रशंसा होती थी।
शम्भूराजा के राज्याभिषेक के एक पखवाड़े के भीतर ही उन्हें महत्त्वपूर्ण
विजय का यश मिला था। इसलिए प्रजा ने शम्भूराजा और सेनापति की बहुत जय
जयकार की। शम्भूराजा को इससे चिन्ता हुई। वे विनम्र स्वर में कहने लगे—
“अभी तो शुरुआत है। अभी बहुत आगे जाना है। आप सभी बुजुर्ग एक और
बात का ध्यान रखें। राज्य के क्रिया-कलाप को जिस प्रकार आप बुजुर्ग लोग अपना
हक मानते हैं उसी प्रकार महत्त्वाकांक्षी और उत्साही तरुणों की आकांक्षाओं को
बहुत दिन तक रोक पाना हमारे लिए सम्भव न होगा। आज रूपाजी भोसले, धनाजी
जाधव, सन्ताजी घोडपड़े, निलोपन्त, कृष्णाजी कंक जैसे तरुणों और अनुभवी
वरिष्ठों का एक समन्वित योग बनाकर हमें महाराष्ट्र धर्म की रचना करनी है।”
“महाराज, औरंगजेब उत्तर में लाखों घोड़ों और मनुष्यों की सेना सागर तैयार
कर रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि उसके मन में कुछ खोट है।” बालाजी
चिटणीस ने कहा।
“यह शिवाजी का बालक शिवाजी का भी सवाई निकलेगा तब औरंगजेब
को पता चलेगा।” हिरोजी फर्जन्द ने बड़े आत्मविश्वास से कहा।
“फर्जन्द काका हम आपके सामने स्पष्ट कर देना चाहते हैं।” शम्भूराजा ने
स्पष्ट शब्दों में कहा, “अपने पिता की तरह मैं कोई अवतारी पुरुष नहीं हूँ। वैसा
कोई अपना चित्र भी बनाने मैं नहीं बैठूँगा। मेरे पिताजी का व्यक्तित्व हिमालय की
भाँति भव्य और दिव्य था। शताब्दियों के बाद ऐसे पुण्यात्मा और गुणी महापुरुष पैदा
होते हैं। इस हिमालय से मेरी तुलना करने के चक्कर में कभी न पड़ें। किन्तु मेरी
धमनियों में प्रवहमान रक्त उसी महापुरुष का है, इसे भी न भूलें।”
“महाराज!” सभी प्रमुख कर्मचारी भाव विह्वल होकर शम्भू महाराज की
ओर देखते रह गये।
“हाँ बालाजी काका और हिरोजी काका! इस स्वराज्य के मन्दिर पर चार
अधिक स्वर्ण कलश लगाने की शक्ति देवताओं और भाग्य ने हमें न दी हो तो कोई
बात नहीं परन्तु जब तक यह संभाजी जीवित है तब तक शिवाजी महाराज के इस
हिन्दवी स्वराज्य के किसी किले को तो क्या, किसी चहारदीवारी की फूटी ईंट को
भी उस पापी औरंगजेब को हस्तगत नहीं करने देंगे।”
दरबार की बैठक समाप्त होने पर भी शम्भू महाराज वहीं रुके रहे। स्वराज्य
के कोने कोने से आये सैनिकों से उनकी बातचीत चल रही थी।
बालाजी चिटणीस महारानी के महल तक चलकर गये। उन्होंने महारानी से
कहा, “आज दरबार में, आखिरी समय में शम्भू महाराज बहुत भावविभोर
दिखाई दिये।”
सम्भाजी :: 255

"चलता है, शम्भू महाराज के हृदय का एक हिस्सा कठोर राजनीतिज्ञ का है
तो दूसरा एक भावुक कवि का।" येसू रानी ने कहा।
"क्या कह रही हैं बहू रानी?"
"हाँ काका, जो केवल राजनीतिज्ञ होते हैं वे अपने स्वार्थों के गुलाम होते हैं।
उनके लिबास के भीतर छिपी रक्तरंजित कटारें रहती हैं। इसलिए वे अपने स्वार्थ के
अवसर पर पत्थर-से कठोर हो सकते हैं। किन्तु कवि का हृदय घास के गीले पत्ते
जैसा होता है, इसीलिए किसी का छोटा दुख देखकर भी महाराज का हृदय द्रवीभूत
हो उठता है।"
चार
कभी नहीं आते थे। किन्तु एक दिन दोपहर में शम्भू महाराज दरबार से लौट आये।
वे अपने निजी कक्ष में विश्राम कर रहे थे। इसी समय एक सेवक अन्दर आया और
अभिवादन करके कहने लगा—"कवि कलश बाहर आये हैं और तत्काल आपसे
मिलना चाहते हैं।" शम्भुराजा की आज्ञा मिलते ही खिन्न मन कवि कलश हाथ
झटकते हुए अन्दर आये।
"राजन! अघटित घट गया, धोखा हुआऽऽ।"
"हुआ क्या है? कविराज?"
"जिसको हम एकनिष्ठता की मूर्ति और स्वराज्य का एक बलशाली बुर्ज
समझते थे, वह बुर्ज ही ढह गया।" हताशा के साथ कविराज ने कहा।
"साफ-साफ बताइए, क्या हुआ?"
"अपने कोंडाजी फर्जन्द जंजीरावाले उस बदमाश सिद्दी से जाकर मिल
गये।"
"भाँग पिये व्यक्ति की तरह व्यर्थ में क्यों बड़बड़ा रहे हो? आपका दिमाग
ठिकाने पर तो है न?" शम्भू महाराज कड़कती आवाज में पूछने लगे—"और किस
फर्जन्द के विषय में बोल रहे हो? हिरोजी या कोंडाजी?"
"दुर्भाग्य से कोंडाजी ही।" कलश गर्दन नीची कर ली।
शम्भुराजा का चेहरा अचानक उतर गया उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा
था। महारानी येसूबाई भी बहुत सम्भ्रमित थीं। उन्होंने अनेक बार अपने ससुर स्वयं
256 :: सम्भाजी

शिवाजी महाराज से कोंडाजी की भूरि-भूरि प्रशंसा सुनी थी। अँधेरी रात में
पन्हालगढ़ की चोटी पर साँप की तरह चढ़कर जाने वाले और केवल चौंसठ मावलों
के साथ आक्रमण करके पन्हालगढ़ जैसे किले पर अधिकार कर लेने वाले जादूगर
अर्थात् कोंडाजी फर्जन्द।
शम्भू महाराज अपने क्रोध को दबाते हुए शान्त स्वर में बोले, "कविराज।
बाजार में तो रोज अफवाहें उड़ती रहती हैं, किन्तु उस बात को राजा से कहने के
लिए प्रधान दीवान को कुछ सबूत तो एकत्र कर लेने चाहिए।"
कवि कलश ने आँखें फैलाई और अपने हाथ का पत्र देते हुए बोले—
"पढ़िए राजन! पंक्ति पंक्ति, अक्षर अक्षर। दडाराजपुरी के सूबेदार ने अपने
हाथों लिखा है। राजन! इसमें और कुछ कहने की गुजाइश नहीं है।"
उस पत्र को पढ़ते हुए शम्भू महाराज को बड़ा क्लेश हुआ। उनका चेहरा
बदल गया। उन्होंने दाँत भींचकर कड़कते स्वर में पूछा—
"कैसे गये? अकेले ही या हमारी सेना मे विद्रोह की आग लगाकर ?"
"अच्छे खासे ग्यारह लोगों का समूह साथ लेकर गये। ऊपर से उन चोरों का
शोर कि शम्भूराजा के शासन में न्याय नहीं बचा है, दिनोंदिन अत्याचार बढ़ रहा है।
ऐसी बहुत-सी शिकायतें उन्होंने उस सिद्दी कासमखान से की है।"
"देखा युवराज्ञी? कितना भरोसा किया था इन पर?"
"अपने ही लोग इस तरह धोखेबाज क्यों हो जाते हैं?"
"जागीरदारी के लिए और किस लिए?" चिन्ताग्रस्त शम्भूमहाराज एक
लम्बी मुस्कान बिखेरते हुए बोले "जागीर की हवस से मराठों का ऐसा ही पतन
होता है।"
कोंडाजी का विद्रोह छिपने लायक नहीं था। वह शीघ्र ही चारों ओर फैल
गया। पूरे रायगढ़ पर एक अशुभ छाया सी पसर गयी। सम्भाजी महाराज बहुत
तनाव में दिखे। कवि कलश ने स्पष्ट शब्दों में कहा—
"राजन, आज नहीं तो कल, इस सम्बन्ध में कोई न कोई निर्णय लेना होगा।
मराठे हों या ब्राह्मण सभी जागीरदारी के विषय में एक ही तरह पूछते हैं। सभी पूछत
हैं—हमारी जागीरदारी का क्या हो रहा है? हमें अपनी मिल्कियत अपनी मुहर के
पास कब मिलेगी? वह हमारे बाल बच्चों के नाम कब होगी? बड़े महाराज के
प्रभाव से हम उनकी मृत्यु तक चुप रहे। अब और कितने दिन इस मजबूरी के
निकालें?"
कवि कलश के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए शम्भू महाराज की आँखें विलक्षण
रूप से चमकीं। उन्होंने कहा, "मेरे पिताजी मुझसे हमेशा कहते थे जागीर के कारण
सम्भाजी 257

अलग-अलग संस्थाएँ और संस्थाओं के कारण अलग-अलग जागीरदार मौज करते
हैं और प्रजा की स्थिति बिगड़ती जाती है। राज्य की हानि होती है। मनुष्य तो क्या
देवी-देवता के नाम पर भी जागीर नहीं देनी चाहिए। पुजारियों को बिगाड़ना नहीं
चाहिए।"
"किन्तु राजन, आगे भी सारे जागीरदार यह प्रश्न मुझसे पूछते रहेंगे, उन्हें हम
क्या उत्तर दें?"
"उनसे साफ-साफ कह दीजिए-चाहिए तो जागीर के बदले मेरे हाथ-पैर
के टुकड़े माँग लें, हम प्रसन्नता से दे देंगे किन्तु मेरी आखिरी साँस तक मुझसे
जागीरदारी की आशा न करें।"
कोंडाजी की गद्दारी का घाव शम्भू महाराज के मन में बैठ गया था। मराठों
और सिद्दियों की शत्रुता को नयी धार मिलने वाली थी। उन्होंने शीघ्रता से निलोपन्त
पेशवा को आदेश दिया- "निलोबा पानी के ऊपर कभी भी युद्ध आरम्भ हो सकता
है। अपनी ओर से पूरी तैयार रखिए।"
"जी महाराज।"
कुलाबा और सागरी किलों पर आवश्यक धान्य भंडार, गोला-बारूद है कि
नहीं, इसकी पुष्टि कीजिए। यदि रसद की कमी हो तो उसकी दुगुनी भेजिए। वह
सिद्दी और उसके आश्रयदाता अँग्रेज स्वराज्य पर चढ़ आये तो अनर्थ हो जाएगा।
उसके लिए समुद्र के किनारे के बुर्जों पर शत्रु की टोह लेते रहने की चौकस तैयारी
कीजिए।"
"बड़े महाराज की दृष्टि भी बड़ी थी, महाराज।" निलोपन्त पेशवा कहने
लगे- "उन्होंने मृत्यु से दो वर्ष पूर्व ही कुलाबा का किला बनवाया था।"
"लेकिन कुलाबा की तटबन्दी का काम अभी बाकी है। अजोजी यादव को
शीघ्र ही वहाँ भिजवाइए। चार महीने के भीतर वहाँ की तटबन्दी तैयार हो जानी
चाहिए।"
"जैसी आज्ञा, महाराज।"
उस रात शम्भू महाराज देर तक जागते रहे। अप्रसन्न मनःस्थिति में भी उनके
चेहरे पर किंचित हँसी आयी। यह देखकर येसूबाई पूछने लगीं-"महाराज बीच में
वह क्या?"
"येसू, मुझे अपने बचपन की एक घटना स्मरण हो आयी। पुरन्दर के
समझौते में पिताजी ने तेईस किले मुगलों को देने के लिए स्वीकार किया था। उस
समझौते पर हस्ताक्षर करके हमारे पिताजी वापस लौटे थे। तब उनके भी चेहरे पर
ऐसी ही हँसी आयी थी। इस पर जीजामाता नाराज हो गयीं। वे पिताजी से कहने
लगीं-शिवबा एक रायगढ़ छोड़कर अपने सभी बलशाली किले गँवाकर आ गये
258 : सम्भाजी

हो और उस पर हँस भी रहे हो? तब भी पिताजी की दाढ़ी-मूँछों मे हँसी गायब
नहीं हुई। वे बोले—माताजी! उन तेइस किलों के बदले में मुगलों की ओर से
जयसिंह ने हमें जंजीरा देना स्वीकार कर लिया है। "
" 'क्या कह रहे हैं महाराज ? जंजीरा तभी मिल गया था ? " येसूबाई ने बीच
में ही उत्सुकता से पूछा।
वह हम मराठों को मिले इसके लिए जयसिंह ने बादशाह से सिफारिश की
थी— "जहाँपनाह ! तेईस बलशाली किलों के बदले में जंजीरा छोड़ दें ऐसा शिवाजी
का बालहठ है। जाने दें। पानी का एक सामान्य किला छोड़ दिया तो क्या बिगड़
जाएगा ?"
" उस पर औरंगजेब ने क्या जवाब दिया ?" येसूबाई ने पूछा।
"वह भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।" शम्भूराजा बताने लगे, "औरंगजेब ने मिर्जा
राजा को लिखा—मिर्जा राजा आप पागल हैं। जंजीरा सिद्दी के लिए ही नहीं हमारे
लिए भी कलेजे का टुकड़ा है। तुम्हारे इस दान से उस शिवा का, जंगली चूहे का
मगरमच्छ में रूपान्तरण हो जाएगा और फिर उसकी पूँछ के धक्के से दिल्ली का
सिंहासन भी डगमगा जाएगा।"
वे बीती बातें सुनकर येसूबाई अवाक रह गयीं। उन्होंने धीरे से पूछा—
"महाराज, क्या जंजीरा सचमुच इतना जुल्मी है ?"
"आज हमें जंजीरा न जीत पाने का इतना दुख नहीं है। किन्तु उस नर वीर
कोंडीबाबा को गँवा देने का हमें बड़ा दुख है। उनके उधर चले जाने से जंजीरे के
सिद्दी की ताकत दुगुनी हो गयी।"
पाँच
"अल्लाहताला की मेहरबानी से दिल्ली का तख्त मुझे मिला तो नाम मेरा रहेगा
और शासन केवल संभाजी महाराज करेंगे। बादशाह मेरे वालिद हैं तो भी आपके
और मेरे सबसे बड़े दुश्मन हैं। इसे ध्यान में रखें। इसलिए हम दोनों के दुश्मन का
खात्मा करने के लिए हम दोनों एक हो जाएँ।"
आँखों के आगे का पत्र पढ़ते-पढ़ते कविराज बीच में ही रुक गये। उन्होंने
महाराज की ओर चौंककर देखा। शम्भूमहाराज विचारमग्न दिखे। मुस्कराते हुए
सम्भाजी :: 259

उन्होंने पूछा- "कविराज, यह पत्र किसकी ओर से आया है?"
"शहजादा अकबर।"
"यह बादशाह का सचमुच का बेटा है या कोई नकली?" महाराज ने
चिन्तित स्वर में पूछा।
"राजन, मैंने जासूसों से इस बात की पुष्टि करवा ली है। दिलरस बानू नामक
बेगम से पैदा हुआ है यह लड़का। कहते हैं कि यह बादशाह का बड़ा लाड़ला
शहजादा था।"
"इसने ही क्या पिछले दिनों राजपूताना में औरंगजेब के साथ बगावत की
थी? राजपूतों की कुछ सेनाएँ उसके साथ मिल गयी थीं? उन्हीं को लेकर इसने
अपने को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया।"
"हाँ राजन, वही बगावत करने वाला शहजादा।"
"ऐसा है! लेकिन सारा हिन्दुस्तान छोड़कर वह दक्षिण में हमारे पास ही क्यों
आना चाहता है? इस शहजादे के हमारे पास आने का उद्देश्य ठीक ठीक पता
लगाकर हमें खबर कीजिए।" राजा ने दरबार में इस सन्दर्भ की सभी को सूचना दी।
किन्तु पहले पत्र के बाद 'मान न मान मैं तेरा मेहमान' की शैली में शहजादा अकबर
दक्षिण की ओर चल पड़ा।
पन्द्रह बीस दिन होते-होते शहजादे की ओर से दूसरा पत्र महाराज को प्राप्त
हुआ। पत्र में शहजादा बहुत उतावला दिखाई पड़ रहा था। लगता था उसे शम्भुराज
के पास आने और उनकी सहायता लेने की बड़ी उत्सुकता थी। किन्तु दूसरा पत्र
पढ़ते हुए भी शम्भु महाराज के चेहरे की लकीरें हिली नहीं। यह देखकर कवि
कलश अपनी घनी भौंहों को तानकर बोले-"राजन, शहजादे के पहले पत्र का भी
उत्तर अभी तक गया नहीं। इतनी उदासीनता भी अच्छी नहीं?"
"देखिए कविराज, इस अकबर के बारे में और क्या क्या सूचनाएँ मिलीं,
पहले वह बताइए।"
महाराज के इस प्रश्न के साथ ही कविराज कुछ हिचके, परन्तु तुरन्त स्वयं को
संभालते हुए बोले, "अपने लाडले की बगावत से औरंगजेब बहुत दुखी हो गया
है। लेकिन मराठों जैसे अपने कट्टर दुश्मन से अकबर के मिलने के समाचार से
बादशाह बहुत घबरा गया है। उसे डर है कि कहीं मराठों के साथ उसके अन्य शत्रु
भी अकबर के साथ न मिल जाएँ। इस कल्पना से उसका धैर्य छूट गया है। शहजादे
को दक्षिण जाने से रोकने के लिए जी तोड़ मुहिम चलाई है। सेना की अनेक
टुकड़ियाँ भेजकर रास्ते की नदियों, पहाड़ी घाटियों, सरायों आदि पर पहरे बिठा
दिये हैं। अपने बाप की व्यवस्था को चकमा देने के लिए शहजादा पागलों की भाँति
भाग रहा है। वह आपसे मिलने के लिए व्याकुल है।"
260 :: सम्भाजी

महाराज ने कविराज की बात शान्ति से सुनी। उनके कपोलों में मन्द मुस्कान
बिखरी। उनकी इस शान्त प्रतिक्रिया को देखकर कवि कलश कुछ नाराज हुए। अपने
को न रोक पाये तो कहने लगे—"मेहरबानी करके इस ओर ध्यान दीजिए, इतना
विलम्ब चलेगा नहीं। जो भी हो वह अपने कट्टर शत्रु का शहजादा है। राजनीति में
ऐसे प्यादे समय पर उपयोगी होते हैं। आग से जलकर निकले नेमने की तरह बेचारा
हमारी ओर दौड़ रहा है। इसलिए राजन आपको दस कदम आगे बढ़कर उसका
स्वागत करना चाहिए।"
"परन्तु अपने कदमों में वह कौन सी आग लेकर हमारे दरवाजे पर खड़ा हो
रहा है? क्या इसकी जानकारी नहीं करनी चाहिए, कविराज?"
एक दिन संगमेश्वर सूबे के शिवोशी और दाभोल के कुछ किसान रायगढ़
आये। उनके साथ थानेदार मल्हार रंगनाथ और अन्य लोग थे। उन्हें शम्भू महाराज
से मिलना था। किन्तु उनके कार्य के स्वरूप को जान लेने पर लोग टाल-मटोल
करने लगे। दरबार के लोग उन पर हँसने लगे। किन्तु मल्हार रंगनाथ पीछे हटने को
तैयार न थे। किसानों के साथ वे शम्भुराजा के सामने आ गये। शम्भू महाराज ने
उनकी बातें शान्तिपूर्वक सुनीं। वे किंचित विस्मय के साथ मल्हार रंगनाथ से पूछने
लगे—"पन्त, यह सम्भव हो सकेगा? ढलान पर बाँध बनाकर पानी के प्रवाह को
दूसरी ओर मोड़ने की बात कर रहे हो? पहाड़ के दूसरी ओर पानी ले जाना तुम
किसानों के लिए सम्भव होगा?"
"क्यों नहीं महाराज? ये सभी परिश्रमी किसान हैं। मैं स्वयं। उस पहाड़ी में
चौदह सौ हाथ नाला खोदकर पानी का प्रवाह घुमाया जा सकता है। यदि यह कार्य
सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाये तो दो-तीन गाँवों का अकाल हमेशा के लिए मिट
जाएगा।"
"ऐसा? ठीक है। आपको सरकार से क्या चाहिए?"
"थोड़ी बहुत द्रव्य की सहायता, सरकार।"
शम्भू महाराज ने निलोपन्त पेशवा की ओर दृष्टि घुमाई।
"इन्हें एक हजार मुहरों की अग्रिम राशि दीजिए।"
आज्ञा होते ही सारे किसान कृतकृत्य भाव से प्रसन्न हो गये। निलोपन्त पैसा
देने से अप्रसन्न थे किन्तु राजाज्ञा का पालन तो करना ही था। प्रसन्न मन किसान
दरबार से बाहर निकलने लगे। तभी शम्भुराजा ने उन्हें रोक कर कहा—
"जब थोड़ा समय मिलेगा तब आप लोगों का कार्य देखने के लिए हम
अवश्य आएँगे।"
किसान बड़े हर्ष और सन्तोष के साथ बाहर निकले, अपना गला साफ करते
हुए निलोपन्त ने कहा-
सम्भाजी .: 261

"किन्तु महाराज ?"
"रहने दीजिए। आप जो कहने वाले हैं वह मुझे पता है। किन्तु नीलोपन्त !
इन लोगों के विचार उत्तम हैं, उद्देश्य पवित्र हैं। अपनी प्रजा के उत्साह का सम्मान
हम नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ?" सरकारी तिजोरी में जमा करते समय कर के
रूप में वसूली गयी राशि में कमी आती है। कुछ कर्मचारी कर वसूलते समय प्रजा
को सताते हैं, ऐसी शिकायतें महाराज के पास आ रही थीं। इसीलिए महाराज ने इस
विभाग का अनुशासन बहुत कड़ा कर दिया था। उस विभाग के कामगारों से लेकर
राजधानी के प्रधान कर्मचारी तक की जाँच हो रही थी। बालाजी चिटणीस तो मुख्य
रूप से जाँच का ही कार्य कर रहे थे। स्वयं महारानी येसूबाई और कवि कलश
दिन-दिन भर दरबार में बैठकर बारीकी से जाँच-पड़ताल कर रहे थे।
इस जाँच कार्य के आरम्भ होते ही अण्णाजी दत्तो बहुत बेचैन हो गये। उनके
भाई सोमाजी बोले, "जाने दो दादा ! इतनी चिन्ता क्यों करते हो ?"
"तू गधा है ! तुझे क्या पता कि यह सब क्यों हो रहा है ? इधर के और विशेष
रूप से कोंकण विभाग के बहुत से कर्मचारियों को मैंने नियुक्त करवाया है। ये सभी
हमारे परिवार के व्यक्ति के समान हमारे स्नेही हैं। इसीलिए तो उनके बारे में ऐसी
छानबीन की जा रही है।"
"भाई साहब ऐसा हो रहा है तो ठीक नहीं है।" सोमाजी ने कहा।
"सच है ! अन्य अष्टप्रधानों को बगावत करने के बाद भी उनके पुराने पद दे
दिये गये। केवल मुझे ही सुरनवीसी नहीं दी गयी। केवल मजूमदारी से सन्तोष
करना पड़ा। फिर भी हम कहीं चूकते हैं क्या ? इसके लिए यह सारी छानबीन ? अब
अच्छे लोगों के लिए रायगढ़ पर अच्छे दिन नहीं रहे, सोमाजी अब यही सच है।"
अण्णाजी पर हो रहे घोर अन्याय से सोमाजी बहुत क्रुद्ध हो गये। एक दिन
दरबार में महाराज, महारानी और चिटणीस नहीं थे। केवल निचले कुछ कर्मचारी
और कविराज थे। यह देखते ही सोमाजी दत्तो से रहा नहीं गया। वे झट से कविराज
के समीप पहुँच गये। वह कुछ व्यंग्य और कुछ दम देने जैसे स्वर में बोले, "क्यों
कविराज ! यहाँ दक्षिण में आकर हमारे धर्म-कर्म में गड़बड़ करने के लिए आपसे
किसने कहा है ?"
"कैसी गड़बड़, मेरी समझ में नहीं आया ?" कविराज ने कहा।
वह श्रीबाग के कोल्हटकर और रसूल के यवनों का प्रसंग ! आप उन
धर्मभ्रष्टों को हिन्दू धर्म में मिलाने जा रहे हैं?"
"उसमें कौन-सी गड़बड़ है ?" कवि कलश ने कहा, "उन गरीब ब्राह्मणों
की माँग है कि उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में सम्मिलित किया जाये। इसीलिए वे सब
रायगढ़ पर आये थे। ये सारी बात महाराज को बता दी गयी है।"
262 :: सम्भाजी

"बस, कविराज, अपनी अकल को काबू में रखो। अपने को गागाभट्ट का
बाप मत समझो। यह सब करने की जिम्मेदारी हमारी है। थोड़ा समय लगेगा।
किंतु उनको दोष मार्जन करना पड़ेगा। इसकी विधि है। कुछ उपचार भी है। इस
काम में आप गड़बड़ न करें।"
दोपहर को दरबार में घटी घटना रात को अण्णाजी को मालूम पड़ी। उन्होंने
अपने भाई को डाँटा—"सोमाजी, ऐसा अनर्थ मत कर। उस कलुषा को राजा
ही समझो। शम्भूराजा अभी तरुण हैं। ऐसा खुला संघर्ष उन्हें अच्छा नहीं लगेगा।
इसके अतिरिक्त श्रीबाग के कोल्हटकर और रसूल के कुलकर्णी जैसे विधर्मियों को
दरबार में क्यों बुलाते हो? इस प्रकरण को एक बार मिट जाने दो, अधिक बातचीत
की जरूरत नहीं है।"
"इतनी चिन्ता क्यों करनी चाहिए उन विधर्मियों की? उधर जाकर इतना
मजा किया। मांस खाया, मदिरा का सेवन किया। धार्मिक विधि के लिए, पाप
प्रक्षालन के लिए कुछ खुले हाथ खर्च करने को कहते हैं तो हीलाहवाली करते हैं,
गरीबी का ढोंग रचते हैं। कोंकण में इन लोगों के अच्छे-खासे बगीचे हैं।"
अण्णा साहब ने पता लगाया कि दरबार में जमाराशि की जाँच पड़ताल कहाँ
तक पहुँची? तब सोमाजी ने कहा—
"ऐसी कौन-सी छानबीन चालू है? बड़े महाराज का शासन बहुत कठोर था।
परन्तु वे भी बहुत त्रुटियों पर ध्यान नहीं देते थे। वे सच्चे जानकार राजा थे। भरा
हुआ घड़ा हिलेगा तो थोड़ा-बहुत पानी इधर उधर छलकेगा ही? थोड़ा-बहुत
पानी बाहर गिरेगा ही। कर्मचारियों के भी पेट है। बड़े महाराज को उनकी चिन्ता
थी।"
"दादा, आज रायगढ़ गरीब दुखियों का, कर्मचारियों का, सच्चे सेवकों का
नहीं रहा। महारानी की तरह पूजापाठ करना छोड़कर वह येसूबाई कभी भी दरबार
में आकर क्यों बैठती हैं? भगवान ही जानें। दरबार के कामकाज में, कागज पत्रों में
क्यों दिमाग खपाती हैं?"
"सच बात है। स्वयं महाराज महारानी और वह कपटी कलुषा, ऐसे तीन-
तीन लोग पीछे लगेंगे तो साधारण सेवक अपनी सेवा कैसे दे सकेंगे?" अण्णाजो ने
विवशता प्रकट करते हुए कहा।
सम्भाजी :: 263

छह
सूर्य डूबने लगा था। ढलते सूर्य की किरणें रायगढ़ पर पड़ रही थीं। भगवा झंडे की
लम्बी छाया प्रकाश के ऊपर फैल रही थी। वस्तुतः महाराज अपने निजी महल में
जाने की जल्दी में थे। उसी समय प्रह्लाद निराजी अन्दर आये और महाराज का
अभिवादन करके कहने लगे-
“महाराज पुर्तगालियों के वकील पिछले तीन दिनों से आपसे मिलने की
प्रतीक्षा में बैठे हैं। गढ़ के ऊपर की हवा उन फिरंगियों से सहन नहीं हो रही थी।
वे जर्जर मुर्गी की तरह बेहाल हो रहे थे।”
शम्भूमहाराज हँस पड़े। उन्होंने कवि कलश की ओर देखते हुए कहा,
“अपने वकील भी उनके साथ आने वाले थे न?”
“हाँ, राजन! अपने रामजी ठाकुर और येसाजी गम्भीरराव आपसे मिलने
के लिए।”
“तो फिर भेजो सभी को अन्दर।”
प्रह्लाद निराजी बाहर गये और दो हट्टे-कट्टे पुर्तगाली अधिकारी महाराज
के सामने आकर खड़े हो गये। उन्होंने लाल रंग का लिबास धारण किया था। उनके
साथ दुभाषिया रामचन्द्र शेणवी भी था। इन पुर्तगालियों ने महाराज को नमन किया।
सामान्य कुशलक्षेम की बात हुई। ये पुर्तगाली कवि कलश की ओर देखकर कुछ
दुविधा में पड़ गये थे। महाराज से अगला प्रश्न पूछते हुए उस वकील ने कहा-
“महाराज, हम अपने वाइसराय की ओर से एक महत्त्वपूर्ण सन्देश ले आये
हैं। हमसे एकान्त में बात करना चाहते हैं।”
कवि कलश की ओर देखकर शम्भुराज ने खुलकर हँसते हुए कहा-
“जो कोई सन्देश हो उसे मुक्त होकर पढ़ो। कवि कलश हमारे अपने ही हैं।
उनसे कुछ भी छुपाने की आवश्यकता नहीं है।”
शम्भू महाराज की अनुमति मिलते ही रामचन्द्र शेणवी सन्देश का भाषान्तर
करते हुए महाराज को सुनाने लगे-
“प्रिय छत्रपति संभाजी महाराज
“महाराज, इसके पहले हम डिचोली के सूबेदार की शिकायत कर चुके हैं।
मोरोदादा नाम का आपका यह सूबेदार एक धूर्त और असंस्कृत व्यक्ति है। वह प्रजा
के साथ बहुत छल करता है। प्रजा से पैसा वसूल कर स्वयं का पेट भरता है और
राज्य की हानि करता है। इतनी-सी नाराजी मे आपको स्पष्ट रूप से समझाने का
प्रमुख कारण यह है कि यह खड्रम व्यक्ति हमारी और आपकी मैत्री में दरार डालता
264 .. सम्भाजी

है। किन्तु ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति के बारे में इतनी गम्भीर शिकायत करने पर
भी उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होगी। इसका कारण यह है कि मोरोदादा ने
आपके दरबार के एक प्रधान कर्मचारी से अपना गहरा सम्बन्ध बना रखा है। वह
मोरोदादा को बहुत प्यार करता है। इसलिए ये महोदय प्रजा को, राजा को या किसी
को भी कुछ नहीं समझते।"
शम्भूराजा ने यह सन्देश शान्त भाव से सुन लिया। कुछ और भी बातें हुईं।
पुर्तगाली शिष्ट मंडल जाने लगा तभी महाराज ने गम्भीर स्वर में पूछा- "मोरोदादा
जी राव के सिर पर वरदहस्त रखने वाला मेरे दरबार का प्रधान अधिकारी कौन है?"
"हमें पता नहीं।" पुर्तगाली प्रतिनिधि ने कहा।
गोवा वाले वकीलों पर नजर टिकाकर शम्भू महाराज ने पूछा-
"क्यों ठाकुर? क्यों येसाजीराव? उस प्रधान अधिकारी का नाम तुम तो
बताओगे?" उन दोनों ने नकार में गर्दन हिलाई, किन्तु उनके चेहरे उस समय बहुत
तनावग्रस्त दिखे।
शम्भू महाराज क्रुद्ध होकर बोले, "तुम लोग उस भले आदमी का नाम लेने
मे क्यों हिचकिचा रहे हो? इसका मतलब तो यह हुआ कि वह अधिकारी मुझसे
भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।"
अभिवादन करते हुए पुर्तगाली बाहर निकल गये। शम्भूराजा ने कवि कलश
से पूछा- "डिचोली और कुडाल के पास अपने बारूद के कारखाने अच्छी तरह
चल रहे हैं न?"
"राजन! आप डिचोली की ओर से दो महीने पहले ही लौटकर आये हैं।
गोले-बारूद का निर्माण अच्छी तरह हो रहा है। अब सम्भव है कि गोले-बारूद के
लिए हमें डचों और अँग्रेजों पर अवलम्बित न रहना पड़े।"
दरबार का कार्य समाप्त करके शम्भू महाराज अपने महल की ओर निकले।
परन्तु पुर्तगालियों का सन्देश उन्हें व्यथित कर रहा था। उनके मस्तिष्क में एक ही
प्रश्न बार-बार उठ रहा था कि अपने दरबार का वह कौन-सा अधिकारी है जो
मोरोदादा से हाथ मिलाकर प्रजा का शोषण कर रहा है। मोरोदादा के सम्बन्ध में प्रजा
के द्वारा भी यदा कदा शिकायत की गयी थी। किन्तु उनके ऊपर वरदहस्त रखने
वाला यह प्रधान अधिकारी कौन है? अपने निजी महल के दरवाजे पर शम्भू महाराज
बेचैनी से टहलने लगे। उन्होंने कुछ सेवकों को काले हौज के पास बने दूतावास की
ओर भेजा। महाराज ने रात को ही रामचन्द्र शेणवी को बुलाया। शेणवी के आने की
सूचना पहरेदारों ने दी। यह सूचना पाते ही शम्भू महाराज ने कवि कलश की ओर
संकेत किया। कवि कलश भीतर की दालान में जाकर आड़ में बैठ गये। अब बैठक
में शम्भू महाराज अकेले थे। राजा ने शेणवी से सीधा प्रश्न किया- "दरबार में शंका
सम्भाजी :: 265

की एक बड़ी गठरी छोड़कर आप लोग निकल गये, किन्तु हमारी तो भूख और नींद
ही उड़ गयी। बताइए मोरोदादा जैसे भ्रष्ट सूबेदार को अभयदान देने वाला हमारे
दरबार में कौन है?"
महाराज का प्रश्न तलवार की धार की तरह सीधा था। इसलिए बिना कोई
टाल-मटोल किए, सिर झुकाकर रामचन्द्र शेणवी बोले-
"बारूद के कारखानों की जाँच और कर वसूली के लिए जो आजकल बार
बार गोवा की ओर जाते हैं, वही।"
"कौन? कवि कलश?"
"वे अकेले कैसे जाएँगे महाराज? वे तो आपकी छाया हैं।"
"फिर...? अपने अ...?"
"हाँ महाराज, अण्णाजी दत्तो ही। मोरोदादा और उनमें बहुत घनिष्ठ प्रेम है।
अण्णाजी ने अपना काला धन सावंतवाड़ी और कोंडा के व्यापारियों के पास दुगुने
ब्याज पर जमा किया है। जामिनदार के रूप में वहाँ का सारा व्यवहार मोरो दादा ही
देखते हैं।"
शम्भूराजा के अनुमान पर शेणवी ने पक्की मुहर लगा दी। शेणवी के चले
जाने के बाद महाराज का कवि कलश के साथ विचार-विमर्श चलता रहा।
शम्भूराजा ने हँसते हुए कहा, "मेरा अनुमान एकदम ठीक निकला। क्योंकि इतनी
क्रूर कठोरता अभी किसी अन्य में नहीं समा पायी है।"
"राजन! इतने बड़े प्रधान अधिकारी के विषय में मैं क्या कह सकता हूँ?"
"बोलना ही नहीं है? रायगढ़ की गद्दी हम कोई भाँग के नशे में नहीं चला
रहे हैं? मुझे सारी बातों का पता है। अण्णाजी के कोई एक ही मोरोदादा नहीं हैं।
ऐसे अनेक भक्त उन्होंने लाभ वाली जगहों पर नियुक्त कर रखे हैं।" शम्भू
महाराज कहने लगे- "पिताजी के राज्याभिषेक के पहले ही जीजा माता के साथ
जब मैंने दरबार में कदम रखा था, तभी मैंने अपने खजाने को खाली करने वाले छिद्रों
को पहचान लिया था। तब मेरी उम्र केवल सत्रह वर्ष थी। उस समय तरुणाई का
नशा था। उसी के आवेश में हम पिताजी के सामने कहते थे- 'ये सारे लुच्चे और
धोखेबाज हैं। उसी समय से ये लोग मुझसे नाराज रहने लगे।"
कवि कलश ने शान्त स्वर में कहा, "राजन इस समय पुर्तगाली वाइसराय के
साथ अपना सम्बन्ध वैसे ही बनाए रखना होगा।"
इसलिए वस्तुस्थिति की पूरी छानबीन करके मोरोदादा पर तत्काल कार्यवाही
करनी होगी। वैसे यह वाइसराय भी इतने भरोसे का नहीं है। कल को दिल्ली वाले
अपने ऊपर आक्रमण करें तो इसकी सही परीक्षा हो जाएगी। किन्तु अभी उसे मैत्री
के धोखे में रखना ही ठीक होगा।"
कवि कलश अपने घर जाने के लिए महाराज से आज्ञा माँगने लगे। शम्भू
266 :: सम्भाजी

महाराज ने हँसकर कहा, "मेरी नींद हराम करके आप खुद कहाँ चले?"
"महाराज?"
"झोंपड़ी हो या महल! एक बार चूहों ने सुराख कर दी और खोदना शुरू
कर दिया तो सुख की नींद कैसे आ सकती है? अब जल्दी से एक काम कीजिए।
अभी के अभी मोरोदादा को पदच्युत करने का आदेश निकालिए। उस फरमान की
तामील के लिए आज ही मध्यरात्रि के पूर्व पाचाड़ से डिचोली की ओर घोड़े दौड़
जाने चाहिए।"
"राजन! आपकी आज्ञा का पालन मैं अवश्य करूँगा। किन्तु इस फरमान पर
अपने पेशवों और सुरनवीम की स्वीकृति आवश्यक है।"
"ऐसा क्या कह रहे हैं कविराज? आप छंदोगामात्य अर्थात् सर्वाधिकार
सम्पन्न पद पर नियुक्त किए गये हैं। इस प्रकार का कोई भी आदेश जारी करने के
लिए यदि अष्टप्रधान उपलब्ध नहीं हैं, तो ऐसी स्थिति में नियमानुसार आपको सारे
अधिकार प्राप्त हो जाते हैं।"
महाराज, आप मुझ पर पहाड़ जैसा विश्वास रखते हैं, इसके लिए लिए मैं
सदैव ही आपके प्रति कृतज्ञ रहूँगा। किन्तु यह न भूलें कि यह प्रशासन है। हम इस
प्रकार का आचरण कैसे कर सकते हैं?" कवि कलश ने चिन्तित स्वर में कहा,
"राजन प्रशासन चलाने में उसकी सीढ़ियों को ठोकर मारने से नहीं चलता।
अधिकारियों और प्रधानों की राय का ध्यान रखना पड़ता है।"
"छोड़ो भी कविराज, इन फिजूल की बातों को। प्रशासन चलाते हुए जब
तक मैंने अपने हृदय में प्रजा का मंगलकुम्भ सँभाल कर रखा है, तब तक किसी की
चिन्ता करने का कोई कारण नहीं है। बता दीजिए उस प्रधान को कि प्रशासन के
कागजी घोड़े आपके मनोरंजन के नहीं, हमारे स्वप्नों को पूरा करने के लिए नचाए
जाते हैं। किसी भी परिणाम के लिए राजा के रूप में हम स्वयं भी उत्तरदायी होते
हैं। कविराज, संसार में जब जब क्रान्ति होती है, राजा की गद्दी डगमगाती है। तब
सिर राजा का ही काटा जाता है, कर्मचारियों का नहीं।"
सात
पदच्युत होने का फरमान मोरोदादा को डिचोली में दिया गया। उसी दिन उनके
निवास का महल जब्त कर लिया गया। रामजी ठाकुर ने वहाँ के कागजात, मुद्राएँ
और गोदामों की चाभियाँ आदि सब कुछ अपने कब्जे में ले लिया। घंटे भर की
सम्भाजी : 267

अवधि में मगरूर मोरोदादा अस्तित्वहीन हो गये।
मोरोदादा के पदच्युत होने के समाचार को रायगढ़ पहुँचने में चार दिन लग
गये। इस समाचार से अष्टप्रधानों की नींद उड़ गयी। इस बात की किसी को भी
कोई सूचना नहीं थी कि मोरोदादा को पदच्युत करने के लिए महाराज के हस्ताक्षर
और मुद्रा के साथ कोई फरमान निकाला गया था और गोवा की ओर भेजा गया था।
अष्टप्रधान पूरी तरह भौचक्के हो गये थे।
इस प्रकरण से अण्णाजी दत्तो को गहरा धक्का लगा। कुछ दिनों तक तो उन्हें
अन्न-पानी की भी सुधि न रही। उन्हें अविराम गति से कँपकँपी छूट रही थी। वे
बालाजी चिटणीस से गम्भीर स्वर में कहने लगे—"चिटणीस, मैं श्री गजानन की
शपथ लेकर कहता हूँ कि अब इसके आगे ऐसा ही होता रहेगा। अपराध की न
जाँच-पड़ताल न कोई सबूत, यह तो ऐसा ही हुआ कि जो पसन्द नहीं है उसकी
गर्दन पर बेरहमी से आरी चला दो।"
अण्णाजी को समझाते हुए चिटणीस ने कहा, "जाने दीजिए अण्णाजी! एक
सामान्य सूबेदार के पदच्युत होने से आप इतना दुखी क्यों हो रहे हो? सहयोगियों
की राय के बिना भी राजा स्वतन्त्र निर्णय लेने का अधिकारी होता है।"
"बालाजी यह इतना सरल नहीं है? इसके मूल में एक षड्यन्त्रकारी
राजनीति है। जानबूझकर मेरे आदमियों को चुन चुनकर उनके साथ धोखा किया जा
रहा है। शिवाजी महाराज के समय के सभी कर्मचारी नालायक हैं, यही सिद्ध करने
के लिए ये सारे षड्यन्त्र रचे जा रहे हैं।"
"परन्तु इसमें वास्तविक दोषी कौन है?"
"किसको दोष दिया जाये, चिटणीस? अरे भाई, उस कलुषा ने राजा को
अपने क़ब्ज़े में कर लिया है। उस लम्पट के कारण हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, सब
कुछ खतरे में पड़ गया है।"
इन दिनों हिरोजी फर्जन्द और प्रधानों के बीच उठना-बैठना बहुत बढ़ गया
था। राज्य अनेक जिम्मेदारी वाले कार्य महाराज ने हिरोजी को सौंपे थे, किन्तु
हिरोजी कुछ असन्तुष्ट दिखाई पड़ते थे। वे अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान नहीं दे रहे
थे। उनकी ये शिकायतें राजा के पास आ रही थीं।
एक दिन हिरोजी फर्जन्द शम्भू महाराज से मिलने दरबार में आए। दोपहर का
समय था। इसकी सूचना मिलते ही शम्भूमहाराज ने उन्हें अन्दर बुला लिया। पैंसठ
वर्ष के ऊँचे कद और उत्तम स्वास्थ्य वाले हिरोजी फर्जन्द ने आते ही कहा,
"शम्भूराजा कुछ हमारी सलाह भी सुन लिया करें। मौके का लाभ उठाइए।
औरंगजेब का वह छोकरा आपको पत्र पर पत्र भेज रहा है, किन्तु आपने उसकी ओर
मुड़कर भी नहीं देखा।"
268 :: सम्भाजी

"हाँ, देखेंगे।"
शम्भूराजा की इस उदासीनता से हिरोजी नाराज हो गये। वे अधीर होते हुए
बोले, "शम्भूराजा, आपकी जगह यदि हमारे शिवाजी होते और ऐसा कोई शहजादा
मदद माँगने देहरी पर आता तो मैं सौगन्धपूर्वक कहता हूँ कि ऐसा सुअवसर मिलने
पर उस बहादुर ने सारा हिन्दुस्तान पैरों के नीचे रौंद दिया होता। आप भी उठिए और
बादशाह के बेटे को साथ में लेकर दिल्ली पर आक्रमण कर दीजिए।"
शम्भूराजा ने कहा, "आपकी कल्पना बहुत भव्य और दिव्य है काका।"
शम्भू बेटा, अपना आगरा का अभियान याद है न? उस समय का हमारा
गुर्राता हुआ बच्चा आज ठंडा कैसे पड़ गया?"
"काका साहब, रायगढ़ से आगरा जाने के लिए और आगरा से बड़ी
कुशलता से बचकर दक्षिण की ओर आने के लिए पिताजी को कितनी तैयारी और
कितनी योजनाबद्ध रीति से कार्य करना पड़ा था? वे जागकर बिताई गयी अनेक रातें
और तूफानी दिन आपको याद हैं?"
शम्भूराजा के इस सीधे प्रश्न ने हिरोजी को निरुत्तर कर दिया। महाराज ने
स्पष्ट स्वर में कहा, "आपके जैसे बुजुर्गों को ही नहीं बल्कि हम सभी को विचार
करना चाहिए कि उस शहजादे का हमारे पास आने का उद्देश्य क्या है? अपने पिता
के प्रति छेड़े गये विद्रोह में सच्चाई है या केवल दिखावा?"
शम्भूराजा के इस तर्क से हिरोजी शान्त पड़ गये। वे शीघ्रता से लौट पड़े।
प्रहलाद निराजी बड़ी उत्सुकतापूर्वक हिरोजी से पूछा, "क्यों हिरोजी, क्या तय
हुआ महाराज से मिलकर? उस शहजादे का स्वागत करने के लिए क्या आप
त्र्यम्बकगढ़ तक जाएँगे?"
"तुम भी कैसा प्रश्न करते हो प्रहलाद पन्त? मुझे जाने दीजिए। मुझे यह सब
बुरा लगता है। इतना ही कहूँगा कि उस कलुषा नाम के दुष्ट मान्त्रिक ने यदि रायगढ़
का पूरा खजाना लूट लिया होता तो कोई बात नहीं थी लेकिन उसने तो राजा का
दिमाग ही गायब कर दिया है, इसका क्या करें?"
शहजादा अकबर के आगमन पर शम्भूराजा ने अपनी बारीक नजर रखी थी।
उन्होंने हिरोजी फर्जन्द को त्र्यंबकगढ़ की ओर नहीं भेजा किन्तु नासिक के अपने
सूबेदार पर उसके स्वागत का दायित्व सौंप दिया था। मूल्यवान रत्नहारों की भेंट
देकर शहजादा अकबर और दुर्गादास का स्वागत किया गया। वहीं से शम्भू महाराज
की एक बड़ी सेना और तेज दौड़ने वाले गुप्तचरों का एक दल शहजादे के साथ
चलने लगा। शहजादा शीघ्रता से रायगढ़ की ओर आने के लिए निकला था। उसकी
रोज की यात्रा, रुकने के स्थान और अन्य सभी गतिविधियों की पूरी जानकारी शम्भू
महाराज को थी। एक बार दरबार के कार्य में व्यस्त शम्भू महाराज से कवि कलश ने
सम्भाजी 269

हँसते हुए कहा—
“महाराज, आप में और शहजादा अकबर में बहुत-सी समानताएँ हैं।”
“मतलब ?”
“आप दोनों की उम्र एक ही है। दोनों चौबीस वर्ष के। शहजादा अकबर
औरंगजेब की चौथी सन्तान है और आप भी शिवाजी महाराज की चौथी सन्तति हैं।
उस शहजादे की माँ तो उसे जन्म देकर दो महीने के अन्दर ही अल्लाह को प्यारी
हो गयी, किन्तु आपकी माताजी भी आपके दो वर्ष के होने पर अचानक स्वर्ग
सिधार गयीं। इतना ही नहीं—कृपया क्षमा करें। साफ बोलूँ तो बुरा न मानें—
शहजादे ने अपने पिता से बगावत की है और आप अपने पिताजी से बगावत करके
दिलेरखान से जाकर मिल गये थे।”
इन समानताओं को सुनते हुए शम्भूराजा चकित रह गये। उनका बड़ा
मनोरंजन भी हुआ। राजा को प्रसन्नचित्त देखकर कविराज धीरे-से बोले—
“राजन, राज्यशास्त्र के कुछ अलिखित सन्देश होते हैं। आपके शत्रु की ओर
से आये हुए इतने अमूल्य मोहरे की उपेक्षा ठीक नहीं है। राजनीति के पटल पर ऐसे
प्यादे का उपयोग अवसर आने पर ठीक ढंग से हो सकता है।”
“कविराज, इस प्रसंग में हमारा उतावला होना, निश्चित रूप से लाभदायक
नहीं है। इस अकबर का स्वागत अपनी सीमा पर हमारे प्रतिनिधि ने क्यों किया?
पता है? क्योंकि शहजादे के साथ राजपूताने का एक भला व्यक्ति भी है।”
“दुर्गादास राठौड़,” कविराज ने कहा।
“बिलकुल ठीक, वहाँ के हिन्दू दुर्गादास को धर्मनिष्ठ और रीति-नीति का
प्रतीक मानते हैं। इसके अतिरिक्त एक और बात है जिसका आपको पता नहीं लग
सका।”
“किस बात का, राजन ?
“औरंगजेब अपने अन्य शहजादों को तलवार की नोंक पर नचाता है। तब भी
उसका सच्चा प्रेम अकबर से ही है। कारण यह है कि उसकी माँ दिलरास बानू
शाहंशाह की लाड़ली बेगम थी। कविराज यद्यपि कि औरंगजेब जैसे दुष्ट मनुष्य
पाषाण हृदय के होते हैं। इसी औरंगजेब ने काशी के विश्वेश्वर मन्दिर, मथुरा के
केशव मन्दिर और सोमनाथ मन्दिर जैसे हमारे देवालयों को ध्वस्त किया। किन्तु ऐसे
पाषाण हृदय मनुष्यों के भी दिल के कुछ कोने नाजुक और कमजोर होते हैं।”
“वही कह रहा हूँ राजन! अब आप अधिक ‘भवति न भवति’ न करके
शहजादे के पीछे खड़े हो जाइए।”
“वैसी जल्दी करना ठीक नहीं कविराज! शहजादे ने अपने पिता के साथ
विद्रोह किया है किन्तु भविष्य में ये बाप-बेटे परस्पर कैसा व्यवहार करेंगे? इसका
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