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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

अशुभ मोड़
एक
आगरा और दिल्ली के बाद बुरहानपुर ही मुगलों का सर्वाधिक समृद्ध नगर था।
दक्षिण का प्रवेशद्वार होने के कारण, मध्यकालीन भारत के सबसे बड़े व्यापार के रूप
में उसकी ख्याति थी। यह सैनिक गतिविधियों की दृष्टि मे बड़े महत्त्व का स्थान
था। इसलिए बुरहानपुर का सूबेदार बादशाह का कोई करीबी रिश्तेदार ही बनाया
जाता था। खानजहान बहादुरखान बादशाह का दूधभाई था। इसीलिए उसकी
नियुक्ति इस जिम्मेदारी के पद पर की गयी थी। बुरहानपुर से ही दक्षिण का शासन
चलाया जा रहा था।
तापी नदी के तट पर बसी यह ऐश्वर्यनगरी उस शाम को भी नित्य की भाँति
आनन्द और विलास में डूबी थी। नदी के तट पर अनेक सुन्दर महल, राजप्रासाद
व्यापारियों की बड़ी-बड़ी पीढ़ियाँ, मदरसे आदि विद्यमान थे। शहर के बीच में ऊँचे
और मजबूत गुम्बदों वाली मस्जिद खड़ी थी।
बहादुरखान कोकल्तास अपने भतीजी की शादी में सम्मिलित होने, चार दिन
पहले औरंगाबाद चला गया था। उसका समधी भी हैदराबाद के नवाब का भाई था।
बारात बड़ी धूमधाम से गोलकुंडा से आने वाली थी। अपनी शौकत में कमी न पड़े,
इसके लिए बहादुरखान बहुत सचेत था। बुरहानपुर में नियुक्त आठ हजार फौजियों
में से तीन हजार फौजी अपने साथ लेकर वह औरंगाबाद के लिए रवाना हुए। शाही
विवाह में अपना प्रभाव दिखाने के लिए ही उसने अपने साथ फौज ली थी। उसके
जाने के बाद नायबसूबेदार फाकरखान बुरहानपुर का सर्वेसर्वा था। जगह-जगह पर
मशालें और बत्तियाँ जलाने का कार्य आरम्भ हुआ। तापी की धारा में उठने वाली
तरंगें, रात के अन्धकार में लुप्त होने लगी थीं।
शहर के सामने बहुत बड़ी दीवार थी। उसके साथ इधर हाल के दिनों में
अनेक नयी बस्तियाँ बन गयी थीं। नवाबपुर, करणपुर, शाहजहाँपुर, खुर्रमपुर जैसे
सम्भाजी :. 241

कुल सत्रह 'पुर' बस गये थे। किन्तु इन सभी पुरों में बहादुरपुर सर्वाधिक समृद्ध
'पुर' के रूप में बहादुरपुर में सूरत और हैदराबाद जैसे शहरों के व्यापारी रहते थे।
वहाँ रेशम, मलमल, सोना-चाँदी आदि के व्यापार में करोड़ों रुपयों का लेन-देन
होता था।
वैभव से भरी बुरहानपुर नगरी उस 30 जनवरी, 1681 की शाम बाहर से
हमेशा की तरह ही लग रही थी। नायब सूबेदार काकरखान ने सन्ध्याकाल की
नमाज पढ़ी। हिन्दू प्रजा के साथ किए गये दुर्व्यवहार के कारण वह बहुतों के रोष का
कारण बन गया था। इसलिए दो सौ सशस्त्र सैनिक उसके बाड़े के बाहर हमेशा
तैनात रहते थे।
आज की दोपहर विशेष रूप से घटना प्रधान बन गयी थी। सूरत के सूबेदार
की ओर से हरकारे आये थे। उन्होंने बताया कि सूरत के आसपास के जंगलों में वहाँ
के ग्रामीणों ने अनेक मराठा घुड़सवारों को देखा है। इसलिए किसी भी क्षण सूरत पर
मराठों का आक्रमण हो सकता है। इस आशंका से वहाँ की प्रजा बहुत भयभीत हो
गयी है। विशेष रूप से गोदामों वाले विदेशी व्यापारी। इसके पूर्व पहली बार
लगभग बीस वर्ष पहले और दूसरी बार बारह वर्ष पहले शिवाजी ने सूरत में लूटपाट
की थी। अब ठीक बारह वर्ष बाद उनका बेटा सम्भाजी सूरत लूटेगा। इस कल्पना
मात्र से लोगों की कँपकँपी छूट रही थी।
सूरत के थानेदार ने बुरहानपुर से जितनी सम्भव हो उतनी सेना तत्काल भेजने
की प्रार्थना की थी। सूरत की दूसरी लूट के बाद शहर के चारों ओर तीन पोरिसा
ऊँची दीवार उठाई गयी थी। आवश्यकता से अधिक फौज भी वहाँ तैनात थी। किन्तु
मराठों के आक्रमण के भय से यह सारा प्रयत्न वहाँ हो रहा था।
काकरखान ने अपने सहयोगियों से विचार-विमर्श किया। अन्ततः केवल
एक हजार फौज बुरहानपुर में रखकर शेष चार हजार की फौज और बड़ा तोपखाना
दोपहर में ही सूरत के लिए रवाना कर दिया। सन्ध्या होने से पहले ही यह सेना पाँच
कोस से आगे निकल गयी। काकरखान ने नमाज की चादर मोड़ी। उसी समय चार-
पाँच गुप्तचरों के घोड़े उसके महल के सामने आकर खड़े हुए। दरवाजे के पास
अपने घोड़ों को रोककर सवार नीचे उतरे। वे पसीने से तर दौड़ते हुए काकरखान के
पास पहुँचे। वे घबराहट के स्वर में कहने लगे—
"हुजूर, मरगट्टे बुरहानपुर तक पहुँच गये हैं। मरगट्टों ने आक्रमण कर दिया
है, हुजूरऽऽ।"
"क्या बकते हो? मरगट्टे और बुरहानपुर? पागलोऽऽ उनका लक्ष्य तो सूरत
था...।" काकरखान चकरा गया। उसने सुराही को मुँह से लगाकर गटागट पानी
पिया—"मरगट्टों का सिपाहसालार कौन है? वह सम्भा तो इतनी दूर आ नहीं
242 :: सम्भाजी

सकता। पहुँचेगा भी कैसे? पन्द्रह दिन पहले तो रायगढ़ पर था। दूल्हा राजा बनकर
अपनी ताजपोशी का आनन्द ले रहा था। "
"किसी भी हालत में वह यहाँ नहीं पहुँच सकता। घोड़े पर रात-दिन दौड़
लगाए तो भी उसे यहाँ पहुँचने में पाँच-छ: दिन तो लगेंगे ही।" पास खड़े एक
मौलवी ने कहा।
काकरखान और अन्य लोगों को यह सूचना सच नहीं लग रही थी। किन्तु
जासूसों के भयभीत चेहरों को देखकर उनकी जबान बन्द हो गयी थी। नगर के कुछ
बड़े व्यापारी भी वहाँ एकत्र हो गये थे। मराठों की सेना सचमुच बुरहानपुर में आ
गयी तो क्या होगा? इस कल्पना से सभी को पसीना छूट रहा था। बाहर गली-
मुहल्लों में भी यह खबर फैली परिणामस्वरूप चारों ओर भय का वातावरण पसर
गया। इसी बीच तीन अन्य गुप्तचर वहाँ पर दौड़ते हुए आये। वे ताजी खबर सुनाने
लगे—"यहाँ से तीन कोस की दूरी पर घने जंगल में मराठों ने पड़ाव डाला है।
उनके साथ पन्द्रह-सत्रह हजार की फौज है। हंबीर मामा नाम का एक बहुत ही
जिद्दी सिपहसालार उनके साथ है।"
"या अल्लाहऽऽ !!" काकरखान को मितली-सी आने लगी। वह भयभीत
होकर इधर उधर देखने लगा। वह चिल्लाकर बोला, "ये मरगट्टे तो पूरे निकम्मे हैं
और हमारे जासूस बेवकूफ। सूरत का नाटक रचकर इन बदमाशों ने अब बुरहानपुर
को सफाचट करने की सोची है। उस शिवाजी की अपेक्षा उसका लौंडा सम्भा
महाबदमाश निकला।"
"क्या बताऊँ, हुजूर ? इन मूर्खों की चालें इतनी गुप्त होती हैं कि क्या
बताऊँ? उन हैवानों ने दोपहर में ही पीछे के जंगल में खाना तैयार कर लिया। रात
के लिए खाना साथ लेकर वे आसपास की घनी झाड़ियों में छुपकर बैठे हैं। उनका
ठिकाना बहुत बड़ा है परन्तु वहाँ पर एक चूल्हा जलता हुआ नहीं दिखेगा। सारे
काम कैसे चुपचाप..."
"इतना ही नहीं हुजूर ?" तीसरा जासूस कहने लगा, "उस बड़ी खोपड़ी
वाले हंबीर मामा का क्या करें? आसपास के गाँवों में उनसे कुत्तों के आगे कटी हुई
मुर्गियों के टुकड़े डाले। कुत्तों को लालच देकर वाणों और लाठियों से उन्हें मार
डाला।"
"इसकी वजह ?"
"कुत्ते ऐन मौके पर शोर न करने लगें और गाँव नींद से जागे नहीं।"
"मरगट्टे चाहते क्या हैं?" बड़ा व्यापारी बाबरखान आगरा वाला पूछने
लगा।
सम्भाजी :: 243

"कल सवेरे सूरज की किरणें निकलने से पहले बुरहानपुर पर क़ब्जा जमाने
की उनकी इच्छा दिखती है।" यह कहते हुए काकरखान का चेहरा काला पड़
गया।
काकरखान के दरबार में बैठक आरम्भ हुई। शहर के बड़े व्यापारी, मुल्ला-
मौलवी, खानदानी मुसलमान सभी एकत्र हुए। जैसे शीत लहर के आने पर सभी
ठंड से काँपने लगते हैं, वैसी ही दशा सभी की हो रही थी। बहुतों की रुलाई छूट
गयी। कुछ आपस में बात करने लगे— "यह मत भूलो! सम्भा के बाप शिवाजी ने
सूरत को दो बार लूटा था। तब वह नगरी पूरी तरह नग्न हो गयी थी। अपना शहर
यदि एक बार सफाचट किया तो फिर खड़ा नहीं हो पाएगा। कुछ भी कीजिए
लेकिन हमें बचाइए।"
कुछ व्यापारियों का धैर्य छूट गया था। व्यापारी, आढ़तिए और सुनार इतने
घबरा गये कि उन्होंने मुहरों की थैलियाँ लाकर काकरखान के पैरों में रख दीं और
उसका पैर पकड़कर सिसक-सिसककर रोने लगे— "कुछ भी करिए सरदार लेकिन
हमें बचा लीजिए!....हमें बचाइए।"
काकरखान कठोर, ईर्ष्यालु और लड़ाकू वृत्ति का था। इसीलिए औरंगजेब ने
जजिया कर की वसूली के लिए उसे विशेष रूप से नियुक्त किया था। बुरहानपुर में
केवल एक हजार की फौज थी। इतनी कम सेना से इतना बड़ा शहर कैसे बचाया
जाये? समझ में नहीं आ रहा था। अपने बाड़े में एकत्र नगरवासियों के सामने काकर
खान साहसपूर्वक खड़ा हुआ। उसने कहा, "बचाव के लिए हमारे पास बहुत थोड़ी
फौज है। व्यापारी प्रतिष्ठानों के पास लगभग एक हजार सुरक्षाकर्मी हैं, उन्हें मेरे
साथ कर दें। मैं इतना ही कहूँगा कि मैं अपने प्राण दे दूँगा किन्तु बुरहानपुर को
बचाऊँगा।"
काकरखान सभी को डूबती नाव को बचाने वाला कुशल नाविक लगा। निजी
सुरक्षाकर्मियों और पहरेदारों को मिलाकर डेढ़ हजार की फौज तैयार की गयी। यह
देखकर काकरखान का साहस बढ़ा। उसकी धमनियाँ गर्म हुईं। वह अपने दाँतों को
भींचते हुए बोला, "चलिए, उठिए अब मराठों की राह देखने की बेवकूफी क्यों की
जाए? चलिए हम थोड़ी हिम्मत करें। हिम्मत से छुपते-छुपाते जाएँ और आज रात में
ही मराठों के खेमे पर हमला करें। आग लगाकर उनके डेरे-डंडे जलाकर खाक कर
दें। उन शैतानों का सोते हुए ही कत्ल कर दें।"
"वाहऽ, बहुत खूबऽऽ!" इकट्ठी हुई भीड़ चिल्ला उठी।
मध्यरात्रि में बुरहानपुर का मुख्य द्वार चरमराया। एक हजार घुड़सवार और
डेढ़ हजार पैदल साहस के साथ उस दरवाजे से बाहर निकले। सबसे आगे
काकरखान का घोड़ा दौड़ रहा था। आरम्भ में पाँच-छः सौ कदम चलने के बाद
244 :: सम्भाजी

एक बन्द पड़ी खंदक मिली। कभी-कभी उसमें शहर की सुरक्षा के लिए लकड़ियाँ
जलाई जाती थीं। वह खंदक एक बार पार हुई तो सेना रास्ते पर आ जाती।
किसी तरह काकरखान अपने पाँच-छः सौ सिपाहियों को लेकर उस अँधेरी
खंदक के मुख तक आया। आसपास उसे कुछ हिलता-डुलता-सा दिखाई पड़ा।
एकाएक खंदक की हजार-हजार जीभें फूट पड़ीं। उसके भीतर छुपे मराठों के घोड़े
हिनहिनाते हुए बाहर निकले। 'हर हर महादेव', 'शिवाजी महाराज की जय',
'सम्भाजी महाराज की जय' चारों ओर यही उद्घोष गूँजने लगा। आसपास के अँधेरे
में कुछ दूरी पर छिपे चार हजार घोड़े और भी बाहर आ गये। बुरहानपुर वासियों के
सामने मौत दिखाई देने लगी। मराठे, 'मारोऽऽ, मारोऽऽ', चिल्लाते हुए उन पर
हल्ला बोल रहे थे। उनके घोड़े आगे बढ़ रहे थे। उनके हाथ की भवानी तलवार
'गर्र-गर्र' घूम रही थी। सबसे आगे सम्भाजी महाराज का सफेद रंग का घोड़ा था।
सम्भाजीराजा ने सिर पर लोहे का शिरस्त्राण और जाली वाला फौलादी कवच पहना
था। वे सामने शत्रुओं के सिर उसी तरह छाँट रहे थे मानो ज्वार की बालें काट रहे
हों। राजा के साथ युद्ध लड़ने का अवसर पाने के कारण उनके साथियों में भी बड़ा
उत्साह आ गया था। वे बड़ी दृढ़ता से अपने घोड़ों को आगे बढ़ा रहे थे। भागते हुए
बुरहानपुरी घोड़ों पर मराठी घोड़े टूट पड़ रहे थे। रक्त की धाराएँ बह निकलीं। बाढ़
के प्रवाह की तरह मराठी सेना बुरहानपुरी सेना का पीछा कर रही थी। काकरखान
किसी तरह जान बचाकर दीवार के भीतर आया। चार-पाँच सौ घुड़सवार मारे जा
चुके थे। अनेक मनुष्य और जानवर घायल होकर रास्ते में घिसट रहे थे। वे पीड़ा से
चिल्ला रहे थे। 'या अल्लाहऽ, या खुदाऽऽ' कहकर हाथ-पैर पटक रहे थे।
बुरहानपुर के ऐश्वर्य का पूरा नक्शा शम्भूराजा के मस्तिष्क में स्पष्ट रूप से
अंकित था। इसीलिए उन्होंने काकरखान का पीछा न करके अपने मदमस्त घोड़े को
दरवाजे पर ही रोक लिया। इसी समय घोड़ा दौड़ाते हुए कवि कलश राजा के पास
पहुँचे। चिराग के उजाले में उन्होंने बुरहानपुर का कच्चा नक्शा शम्भूराजा को
दिखाया। अपने को आश्वस्त करने के लिए आँखें घुमाते हुए शम्भूराजा ने कहा,
"अपने दो तीन सौ लड़कों को यहाँ दरवाजे पर भिड़ा दो। लड़ाई का नाटक चालू
रहने दो। बाकी सभी सामने के रास्ते से उस बहादुरपुर की ओर चलें। द्रव्यों से
खचाखच भरी तिजोरियाँ और सन्दूकें वहीं हैं। चलिए रात में ही दुकानें तोड़ना शुरू
कर दीजिए।"
"जैसी आज्ञा, राजन।"
"और हाँ, किसी स्त्री या बाल-बच्चे को हाथ नहीं लगाना है। ध्यान रखें
कि कम से-कम जनहानि हो। किन्तु यदि कोई शस्त्र लेकर आक्रमण करता है तो
उसे तुरन्त आसमान दिखा दीजिए।"
सम्भाजी :: 245

दो
नींद में भी जाग कर सेनापति को अपना युद्ध धर्म पूरा करना पड़ता है। हंबीर मामा
की फौज उस जंगल में विश्राम कर रही थी। किन्तु मामा अपने तम्बू में जाग रहे थे।
मध्य रात्रि अँधेरे की काली चादर ओढ़े समाप्ति की प्रतीक्षा कर रही थी। इतने में
कहीं दूर बुरहानपुर की ओर से 'हर हर महादेव', 'सम्भाजी महाराज की जय',
'शिवाजी महाराज की जय' ऐसी जोर की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। हंबीर मामा
झटके से उठे, अपना कंबल सँभालते हुए बाहर आये। उसी समय उस रण गर्जना
को सुनकर खेमे के सैनिक भाले तलवारें लिये मामा के पास इकट्ठे हो गये।
सामने खड़े मराठा वीरों के उत्साह को देखकर हंबीरराव बोले, "बेवजह
गड़बड़ मत करो। ये झूठे नारे दुश्मनों के हैं। उन्हें हमारे आने की खबर लग गयी
होगी। इसीलिए वे होशियारी की चाल खेल रहे हैं। अपनी तलवारों को म्यानों में
रखकर सब लोग हंबीर मामा के सामने चुपचाप खड़े थे। इसी समय दूसरी ओर से
घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। थोड़ी ही देर में गश्ती सेना के बारह घोड़े हंबीरराव
के तम्बू के बाहर आकर खड़े हो गये। घुड़सवार दूर से ही चिल्लाने लगे-"मामा
साहबऽऽ, मामा साहब शम्भू महाराज! अपने शम्भू महाराजऽऽ!!"
"शम्भू महाराज? कहाँ? कैसे आएँगे शम्भू महाराज?" मामा ने आश्चर्य से
पूछा। हम अपनी आँख से देखकर आये हैं। शम्भू महाराज ने वहाँ बुरहानपुर पर
आक्रमण भी कर दिया है!"
"हाँ मामा! राजा के साथ आये दो घुड़सवारों ने बताया कि शम्भुराजा ने पाँच
दिन और पाँच रात लगातार दौड़ लगाई। चार हजार घोड़ों को लेकर इतनी दूर की
दौड़ लगाई है मामा!" दूसरा कहने लगा।
यह बात सुनते ही हंबीरराव के रोंगटे खड़े हो गये। उनके सिर और मूँछों के
बाल खड़े हो गये। दूसरे ही क्षण 'हर हर महादेव' का जयघोष करते हुए, पन्द्रह
हजार घोड़े बुरहानपुर की दिशा में दौड़ पड़े। रात में ही हंबीरराव की फौज
शम्भुराजा की फौज से मिल गयी। बहादुरपुर लूटना आरम्भ हुआ। दुकानदारों के
दरवाजे टूटे। तिजोरियों पर घन चलने लगे। तलघरों के जमीनी रास्ते खुलने लगे।
शम्भुराजा और हंबीरराव ने पूरे परिवार की नाकेबन्दी कर दी थी। पुराने
बुरहानपुर में लड़के जूझ रहे थे। वहाँ युद्ध का नाटक चल रहा था। करणपुर में
अनेक सिख सरदार रहते थे। उनके मुगलों के साथ मिल जाने की सम्भावना थी।
यह सूचना पाते ही मराठों ने करणपुर को घेर लिया। सिख सरदारों को निःशस्त्र कर
246 सम्भाजी

दिया। शम्भूराजा ने शहर के चारों ओर सैनिकों की एक कड़ी बना दी थी। बुरहानपुर
के आक्रमण की सूचना बाहर न जाये इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा था।
इस लूट के आक्रमण में अनेक पुराने योद्धा थे। कोई बारह वर्ष पहले तो कुछ
बीस वर्ष पहले शिवाजी महाराज के साथ सूरत लूट चुके थे। वैसे ही बेशुमार धन
यहाँ मिल रहा था। इसके लिए शम्भूराजा और हंबीरराव ने अलग अलग गुट तैयार
किये। बुरहानपुर के तलघरों में भी पारों और गहदालों से खुदाई की जा रही थी।
जमीन के पेट में छिपी लक्ष्मी खोद-खोदकर बाहर निकाली जा रही थी।
सरकती रात के साथ सब काम ठीक ठाक हो रहा था। पास के एक वृक्ष के
नीचे सेवकों ने एक आपातकालीन ठिकाना तैयार किया। वहीं दो बड़े पत्थरों पर
शम्भूराजा और हंबीरराव समाधानपूर्वक बैठे थे। राजा के पेट में भूख के कारण चूहे
कूद रहे थे। इसका अनुमान होते ही रायप्पा मक्के के भुने हुए हरे दाने ले आया।
ताजे भुने हुए सोंधे दाने खाते हुए मामा भांजे आमने सामने बैठे थे। अब उजाला
होने लगा था। पेड़ों पर पंछी बोलने लगे थे। शम्भूराजा के थके हुए किन्तु उत्साहित
चेहरे की ओर देखकर हंबीर मामा बोले, "क्यों भांजे साहब ! पीछे पीछे आने की
इतनी जल्दी क्यों मचा दी ? आपको 'मामेरा' नहीं मिल पाएगा। ऐसा भय लग रहा
था क्या ?"
"भांजे को भी अपने कर्तव्य पालन में कोई कोरकसर नहीं रखनी चाहिए,
मामा साहब!" शम्भूराजा ने हँसते हुए कहा, राजा का काम केवल हीरे जवाहरात
पहनकर दरबार में घूमना भर नहीं है। उसे रणभूमि में रक्त बहाकर अपने साथियो
को प्रोत्साहित और तरोताजा भी करना होता है। उन्हें सजग बनाना होता है।"
शम्भू महाराज के इस उदगार पर मामा भांजे दोनों खिलखिलाकर हँसे।
हंबीरराव बीच में ही उठ गये। वे शहर के चारों तरफ के नाकों की जाँच कर रहे थे।
उनका प्रयत्न था कि किसी भी हालत में एक भी जासूस इस आक्रमण का समाचार
लेकर बाहर न जा सके। मराठों की लूटपाट चालू थी। हीरे मोतियों से बोरे भरे जा
रहे थे। उन्हें ले जाने के लिए आसपास के गाँवों से गधे खच्चर आदि इकट्ठे किए
जा रहे थे। लूटपाट करते दो दिन बीत गये। दोपहर को रायप्पा शम्भूराजा के कान में
कहने लगा, "महाराज एक बहुत अच्छी खबर है। अरबी घोड़ों का एक बहुत बड़ा
व्यापारी उस्मान खान यहाँ आया हुआ है। उसके पास दो हजार बहुत ही उमदा
जानवर हैं।"
"क्या कह रहे हो ? कहाँ है वह ?" शम्भूराजा उत्साहित होकर खड़े हो
गए।
"यहीं दमदमपुर के बाग में। बहादुरखान के औरंगाबाद चले जाने के कारण
वह व्यापारी उसी के आने की प्रतीक्षा कर रहा है।"
सम्भाजी · 247

इतनी बड़ी अश्व सम्पत्ति इतने पास आकर रुकी हुई है, इसका पता चलते ही
शम्भू महाराज का मन प्रफुल्लित हो गया। हंबीर मामा और गश्ती सेना को साथ
लेकर शम्भूराजा वहाँ के लिए तुरन्त रवाना हो गये। दमदम बाग के उन घोड़ों को
देखते हुए उनकी आँखें चकरा गयीं। इस तरह की चौड़ी पीठ वाले चुस्त दुरुस्त
घोड़े उन्होंने कहीं देखे न थे। एक आसमानी रंग और बड़ी-बड़ी आयल वाले घोड़े
की पीठ पर उन्होंने बड़े लाड़ से थाप मारी।
सौदागर उस्मान महाराज के सामने काँपता हुआ खड़ा हो गया। उसकी ओर
देखते हुए महाराज ने कहा, "ऐसी नस्ल, ऐसी जाति और ऐसी आँखें हमारे देश में
तो सम्भव नहीं हैं। कहाँ से ले आये हो ये जानवर?"
"अरबस्तान से।"
"डरो नहीं, सीधे खड़े रहो। जैसे कोई शिल्पकार अपनी छेनी से शिल्पाकृति
बनाता है वैसा ही जादू तुम्हारी उँगलियों में है।"
शम्भूराजा से रहा नहीं गया। उन्होंने उस आसमानी रंग के घोड़े पर छलाँग
लगाई। काठी और जीन न कसी होने पर भी वे घोड़े पर बैठ गये। लगाम खींचते
ही घोड़ा आगे के पैर हवा में उछालते हुए हिनहिनाया। अपनी जगह पर ही पैर
झाड़ते थैया-थैया नाचने लगा। उस्मान चिल्लाया- "राजा साहब ठहरिए! उसे
दौड़ाइए नहीं, आप गिर जाएँगे, बहुत बदमाश जानवर है।" परन्तु शम्भू महाराज
घोड़े के साथ अदृश्य हो गये। उनके पीछे-पीछे रायप्पा और अन्य गश्ती सैनिकों के
घोड़े दौड़ पड़े। उस्मान अपना सिर पीटता वहीं खड़ा रहा। उसके गम्भीर चेहरे की
ओर हंबीर मामा हँसते हुए देख रहे थे। बहुत देर बाद महाराज वापस लौटे। लौटने
पर ऐसा लगा कि उस घोड़े और शम्भूराजा में जन्म जन्मान्तर की मित्रता हो गयी है।
शम्भूराजा ने उस्मान से जानवरों की कीमत पूछी। पहले से ही घबराया हुआ
उस्मान शम्भूराजा के पैरों में गिर पड़ा। दया की याचना करते हुए बोला- "मेरे
आका मुझ गरीब का मजाक क्यों उड़ा रहे हैं? ये जानवर, ये पूरा तबेला मुफ्त में ले
जाइए।"
शम्भूराजा जोर से हँसे। हंबीर मामा ने भी सौदागर उस्मान को समझाया।
अन्त में महाराज ने कहा- "जो उचित हो वह कीमत बताओ। हमें तुम्हारा एक भी
जानवर मुफ्त में नहीं ले जाना है।"
वह सौदागर मुस्कराया और साहस बटोरकर बोला- "अजी हुजूर आपने
यहाँ दिन दहाड़े बुरहानपुर नगर को लूटा है और हमसे इन जानवरों की कीमत पूछ
रहे हैं? हुजूर हमें चकमा देने का इरादा तो आपका नहीं है?"
एक अभिजात हास्य शम्भूराजा के चेहरे पर तैर गया। उन्होंने कहा-
"सौदागर, जिस परिश्रम और लगन से तुमने यह अश्वलक्ष्मी एकत्र की है, उसका
218 :: सम्भाजी

अपमान करने का हमारा कोई इरादा नहीं है।"
शम्भूराजा ने सारे घोड़े खरीद लिये। अपने खेमे पर पहुँचकर उन्होंने खंडो
बल्लाल से धीमे स्वर में कहा-"खंडोबा! यह मौदागर जितना माँगे उसे उतना
द्रव्य दीजिए। बुरहानपुर की लूट में से नहीं अपने खजाने से ही यह द्रव्य दीजिए।"
महाराज के उद्गार को सुनकर खंडो बल्लाल और हंबीर मामा ठठाकर हँसे।
तीसरे दिन सबेरे औरंगाबाद की ओर हरकारे आये। वे शम्भू महाराज को
बताने लगे-"बहादुरखान कोकलताश को खबर लग गई है। भतीजी की शादी
छोड़कर अपनी फौज के साथ इस ओर घूम पड़ा है। अपने फौजियों और घोड़ों को
पानी के लिए भी हकने नहीं दे रहा है। लूट का द्रव्य इतना अधिक था कि उन्हें
ढोकर ले जाने के लिए गधे और खच्चर कम पड़ रहे थे। शीघ्रता से बाँधा-बाँधी
आरम्भ हो गयी।"
दोपहर में ही सामानों से लदे गधे बुरहानपुर से बाहर निकलने लगे। उनकी
पीठ पर एक करोड़ मोहरों की दौलत थी। आसपास के नागरिकों में काकरखान के
प्रति बड़ा क्षोभ था। जजिया कर की वसूली में उसने हिन्दुओं को बहुत सताया था।
उससे भेंट किये बिना शम्भूराजा को बाहर निकलना अच्छा न लगा। बुरहान के
महल से पकड़कर मराठा सैनिक काकरखान को पकड़कर शम्भूराजा के पाम ले
आये। डर के मारे वह पहले ही अधमरा हो गया था। राजा के हुक्म से उसके
मखमली लिबास को उतारा गया। सैनिकों ने उसे एक पेड़ से बाँध दिया। कुछ
लोगों ने उसे दो चार हाथ मारा भी। शम्भूराजा ने उसे चेतावनी देते हुए कहा, "फिर
से अत्याचार करेगा तो याद रखना!"
बुरहानपुर को लूटकर मामा भांजे प्रसन्नतापूर्वक वापस आ रहे थे। रास्ते में
बहादुरखान कोकलताश के साथ मुठभेड़ की सम्भावना थी। इसके अर्तारक्त सूरत
के बाद मराठे जिस जंगली रास्ते से गये थे उसका मुगलों को पता था। इसलिए इस
बात की चिन्ता थी कि बिना किसी अवरोध के यह लूट की सम्पत्ति को लेकर कैसे
जाया जाय? दुश्मन की ओर से अचानक हमला हो सकता था। इसलिए सेना में
व्यूह रचना की आवश्यकता थी। इसलिए मामा भांजे ने मिलकर बीस हजार सेना
को चार चार हजार की संख्या के हिसाब से पाँच भागों में बाँट दिया। हंबीरराव ने
कहा, "शम्भूराजा! मेरा विचार है कि औरंगाबाद जीतकर ही हम रायगढ़ आएँ।
दस-बारह हजार फौज मेरे लिए पर्याप्त होगी।"
"मामाजी मेरे साथ पाँच हजार फौज पर्याप्त है।" शम्भूराजा ने कहा।
"इतनी कम फौज के साथ जान जोखिम में नहीं डाला करते, शम्भू बेटे!"
मामा ने अपनी राय व्यक्त की।
निश्चित किया गया कि लूट का अधिकांश हिस्सा रास्ते में साल्हेर के किले
सम्भाजी :. 249

में रख दिया जाए। वापस लौटने के लिए धरण गाँव-चोपड़ा का मार्ग ही
सुविधाजनक था। किन्तु, इस बात की सम्भावना थी कि उस मार्ग में बहादुरखान
कहीं भी भुजंग की तरह सामने आ जाएगा।
उस दिन दोपहर को चोपड़ा से दस कोस की दूरी पर बहादुरखान मोर्चा
बाँधकर बैठा हुआ था। वह मराठों को कत्ल कर देना चाहता था। बहुत समय तक
प्रतीक्षा करते करते वह थक गया। अन्त में दोपहर को उस जंगल में घोड़ों की टापें
सुनाई पड़ने लगीं। केवल पाँच-सात सौ मराठी घुड़सवारों को देखकर बहादुरखान
आश्चर्य चकित हो गया। घोड़ों के सामने से निकलते ही बहादुरशाह के सैनिक उन
पर टूट पड़े। घुड़सवारों ने हाथ ऊपर कर दिये। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगे—
"वकीली सरंजामऽ, वकीली सरंजामऽऽ।"
बहादुरखान के सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। सबके बीच ऊँट पर बैठे वकीलों
को बहादुरखान के सामने प्रस्तुत किया गया। एक वकील थे मुल्ला काजी हैदर,
दूसरे वकील थे जोत्याजी केसकर। बहादुरखान ने उन पर अपनी नजरें गड़ाकर
पूछा—"कहाँ चले?"
"भागानगर के लिए, हुजूर! कुतुबशाह के लिए शम्भूराजा का पत्र ले
जा रहे हैं।"
बहादुर खान ने उस पत्र को आँखें फाड़ फाड़कर देखा। जासूसों को बुलाकर
शम्भूराजा के हस्ताक्षर को मत्यापित कराया। इन दोनों वकीलों ने शपथपूर्वक कहा,
"चोपड़ा धरण गाँव के रास्ते से संभाजी महाराज आएँगे ही क्यों? क्या वे यह नहीं
जानते कि आपको इस रास्ते का पता है?"
"तो फिर किस रास्ते से निकले वे?"
"शायद जलगाँव या औरंगाबाद—पता नहीं, किन्तु यहाँ तो व फटकेंगे
नहीं।"
समय के बीतने के साथ भ्रम भी बढ़ने लगा। मुल्ला काजी हैदर ने कहा, "मैं
तो आपकी ही कौम का हूँ। मुझे भी एक सरदार के रूप में अपनी फौज में भर्ती कर
लीजिए।" जोत्याजी ने बात को आगे बढ़ाया—"खान साहब हमारे नेता पालकरजी
ने क्या इस्लाम धर्म नहीं स्वीकार किया था? मेरे जैसे देहाती आदमी को यदि सरदार
बनाने के लिए तैयार हों तो मैं भी इस्लाम धर्म स्वीकार कर लूँ।" अँधेरा होने लगा।
इसी समय नीचे की घाटी में घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। बहादुरखान सावधान
हो गया। उसने अपने सैनिकों को हुक्म दिया—"बिना मेरे संकेत के आक्रमण नहीं
करना।"
मराठे घुड़सवार टेकड़ी चढ़कर झपाटे से ऊपर आ गये। बहादुरखान के
सैनिक पेड़ों के पीछे छुपे, साँस रोके सामने का दृश्य देख रहे थे। मराठे घुड़सवार
250 . सम्भाजी

खाली हाथ खड़े। उनके पास लूट का सामान तो क्या कोई सादी पोटली तक न थी।
बहादुर खान ने उन तीन हजार घुड़सवारों को निर्विघ्न रूप से जाने दिया। जोत्याजी
उत्साहपूर्वक बोले, "खान साहब! मैंने जो कहा था वह सच ही कहा था न?
शम्भुराजा कोई पागल है क्या जो इस रास्ते से जाएँ?" बहादुरखान कोकल्ताश को
विश्वास हो गया कि लूट का माल लेकर जाने वाले मराठे ऐदलाबाद की तरफ मे
ही गये होंगे।
शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करना, लूट का माल उनसे हस्तगत करना,
औरंगजेब के क्रोध से अपनी जान बचाना जैसे अनेक विचार बहादुरखान के मन में
एक साथ उठ रहे थे। उसका दिमाग तड़फड़ा रहा था। वह तीर की तरह ऐदलाबाद
की ओर दौड़ने लगा। शम्भुराजा और हंबीरराव का पीछा करने की धुन में उसे पता
ही नहीं चला कि वकील बने काजी हैदर और जोत्याजी कब और कहाँ गायब हो
गये? उसका ध्यान तो लूट के माल पर केन्द्रित था।
बहादुरखान के रास्ते से हट जाने का विश्वास हो जाने पर, रात के अँधेरे में
इधर उधर फैले जासूसों ने आपस में मंकेतों से ममाचार को आगे बढ़ाया। दोपहर
को जहाँ पर बहादुरखान मोर्चा बाँधे बैठा था, वहीं से मराठों की मुख्य फौज तीन
घंटे के भीतर आगे निकल गयी। शम्भुराजा और हंबीर मामा अपने अपने दलों के
साथ लूट का माल लेकर उसी चोपड़ा मार्ग से माल्हेरे के बलशाली किले की ओर
चल पड़े।
मध्य रात्रि बीत चुकी थी। घोड़े पहाड़ से नीचे गिरती जलधारा की भाँति भाग
रहे थे। अत्यधिक परिश्रम के कारण घोड़ों और सैनिकों का बुरा हाल हो रहा था।
उनका रक्त गर्म हो गया था। बाहर कड़ाके की ठंडक होने पर भी घोड़े और
सिपाही अपने भीतर गर्मी महसूस कर रहे थे। मनुष्यों और जानवगे दोनों को आगे
बढ़ने के लिए जोर लगाना पड़ रहा था। मैनिकों के साथ साथ लूट के माल का
बोझा भी घोड़ों की पीठ पर था। दो पहाड़ों के बीच की घाटी से घोड़े चल रहे थे।
सवेरा होने से पहले आगे का रास्ता पकड़ने का शम्भुराजा का विचार था।
इसी समय मानाजी की दृष्टि पास की पहाड़ी के दो ऊँचे कलशों की ओर
गयी। उन्होंने कहा, "महाराज, यह सामने की पहाड़ी मार्कंडा किले का पिछला
हिस्सा है। यह सप्तशृंगी माता को पहाड़ी है।"
राजा ने घोड़े की लगाम खींची। उन्होंने कहा, "बाकी मेना को आगे जाने
दीजिए। हमारे साथ डेढ़ हजार घोड़े पर्याप्त होंगे।"
"यानी? अब इस घुप्प अँधेरी रात में कहाँ जाना है?" मानाजी ने पूछा।
"मतलब यह कि सप्तशृंगी के दर्शन के लिए जाएँगे। बुरहानपुर की ओर
निकलते समय मैंने देवी से सहायता के लिए याचना की थी। अब उनकी उपेक्षा
मम्भाजी 251

करके कैसे आगे जा सकते हैं?"
"महाराज, हमारी सुनें, विलम्ब हो जाएगा। हमारा पीछा किया जाये, इसकी
भी सम्भावना है। देवी के दर्शन के लिए फिर आ जाएँगे।" रूपाजी कहने लगे।
"नहीं ऽ! अभी जाएँगे।"
"परन्तु महाराज यह सामने की चढ़ाई चढ़ते-उतरते सारी रात बीत
जाएगी।" मानाजी ने विनयपूर्वक कहा।
"होने दीजिए, अच्छे यश और आशीर्वाद के लिए कष्टकर मार्ग ही अपनाना
पड़ता है।" शम्भूराजा ने दृढ़ता से कहा।
लूट का सामान लेकर जाने वाली सेना कवि कलश के साथ आगे बढ़ गयी।
केवल डेढ़ हजार घुड़सवार लेकर, रात में ही शम्भूराजा ऊपर गये। भोर होने लगी
थी। उस सोये जंगल में सप्तशृंगी का एक गश्ती मराठा दल जाग रहा था। हो
सकता है कि श्रद्धालु, शम्भूराजा लौटते समय पीछे के रास्ते से वहाँ आएँ, इसलिए
वहाँ का थानेदार भी जाग रहा था। सामने की घाटी की दूसरी ओर मार्कंडा किले की
बुर्जों पर पहरेदार भी जाग रहे थे।
सप्तशृंगी माता का छोटा-सा मन्दिर पहाड़ी के कन्धों पर खड़ा था। नीचे
थोड़ी समतल भूमि पर पुजारियों के घर थे। वहीं से आने वाली रोशनी के उजाले में
महाराज चढ़ाई करने लगे। रास्ता सँकरा, खड़ा और दोनों ओर से करौंदे की घनी
झाड़ियों से घिरा था। उस सँकरे रास्ते से एक-एक व्यक्ति ही चल सकते थे। नीचे
घोड़े से उतरकर शम्भू महाराज तेजी से चढ़ाई चढ़ने लगे।
पहाड़ी के मध्य भाग में महामाया सप्तशृंगी का वह छोटा-सा मन्दिर था।
मन्दिर के सामने दो-तीन सोमजुही के पेड़ थे। महाराज देवी दर्शन के लिए आने
वाले हैं, यह खबर भिखारियों और वनवासी गरीबों को लग चुकी थी। वे मन्दिर के
बाहर सँकरी जमीन में इकट्ठे हो गये थे। उनके साथ चार-पाँच फकीर भी हाथ में
कटोरे लेकर बैठे थे। दर्शन के लिए भीतर जाने से पहले राजा वहाँ रुके। खंडो
बल्लाल के हाथ में मुहरों की थैली थी। उसमें हाथ डालकर महाराज गरीबों की
थालियों और फकीरों के कटोरों में मुट्ठी-मुट्ठी भर मुहरें डालने लगे। फकीरों के
वेश में बैठे पठानों ने अपने नीचे छुपाई हुई तलवारें खींच लीं। वे 'मारोऽ मारोऽऽ'
कहते हुए शम्भू महाराज पर टूट पड़े। शम्भू महाराज ने भी अपनी कमर से तलवार
खींच ली और क्रोध से आगे बढ़े। एक साथ पाँच लोग महाराज पर आक्रमण कर
रहे थे। महाराज अपनी तलवार को तेज चलाते हुए अपना बचाव कर रहे थे। राजा
के कन्धों पर तलवार का वार पड़ा। वस्त्र फट गया और 'खन्न' की आवाज हुई।
शम्भू महाराज ने जालीदार कवच पहनने में प्रमाद नहीं किया था। वह कवच और
लौह शिरस्त्राण उनकी सहायता कर रहे थे। जैसे कोई भूखा शेर अयाल फैलाकर
252 :: सम्भाजी

अपने शिकार पर टूट पड़ता है, वैसे शम्भू महाराज उन पठानों पर टूट पड़े। चौथे
पठान के दाहिने कन्धे पर तलवार का ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर लुढ़क कर
नीचे गिर गया। वह सिर कटी मुर्गी की तरह तड़पने लगा। वह पास के पत्थर के
नीचे गिर गया। वह भयानक दृश्य देखकर पूरा वातावरण भयाक्रान्त हो गया। इतने
में सोनजुही की झाड़ के अँधेरे में छिपा पाँचवाँ पठान शम्भू महाराज की पीठ पर
कूदा। उसकी लम्बाई तीन आदमियों के बराबर थी। अपनी ताकत से उसने शम्भू
महाराज को नीचे दबोच लिया। वह महाराज को नीचे दबाने का प्रयास करने लगा।
नीचे पड़ने से महाराज की कुहनियाँ हिल गयीं। इसी बीच महाराज के कुछ
सहयोगी आ गये और उस हत्यारे को हटाने की कोशिश करने लगे। शम्भुराजा का
दम फूलने लगा था। वे किसी प्रकार एक ओर सरक पाये। दाहिना हाथ मुक्त होते
ही उन्होंने अपनी कटार निकाली और दूसरे ही क्षण पठान के पेट में भोंक दिया।
उस पठान का पेट फाड़ती हुई वह कटार गले के पास जाकर निकली। तब कहीं
वह जल्लाद जाकर एक ओर गिरा।
पीछे आ रहे सहयोगी दौड़कर आगे आये। पास के झरने से पानी लाया गया।
महाराज ने अपने वस्त्र ठीक किये। खंडो बल्लाल कहने लगे—
"महाराज! काल आया था लेकिन समय नहीं आया था।" शम्भू महाराज
हँसे। वे सावधान होते हुए बोले, "सप्तश्रृंगी माता ने आज अलग ढंग से दर्शन देने
का निश्चय किया था। आज बच पाये है, तो उसी के आशीर्वाद से।" सवेरा होते
होते पूजा की गयी। शम्भू महाराज बहुत देर तक सप्तश्रृंगी की डेढ़ पोरिसा ऊँची
पाषाण मूर्ति और उसकी स्निग्ध आँखों की ओर सन्तोषपूर्वक देखते रहे।
महाराज वह ढलान उतरने लगे। अँधेरा छँटने लगा था। घाटी में पहाड़ों के
अस्पष्ट आकार को फिर से आकार मिलने लगा था। मार्कडा पहाड़ की ऊँची
चोटियाँ अब स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। ऐसा लगता था मानो जटाधारी ध्यानस्थ
मार्कंडेय ऋषि महाराज को आशीर्वाद देने के लिए अवतरित हुए हों।
तीन
शिलंगण का सोना लूटा जा चुका था। स्वयं शम्भू महाराज ने स्वराज्य के प्रधान
सेनापति हंबीरराव मोहिते और उनकी रूपाजी, मानाजी जैसे सहयोगियों पच्चीस
सम्भाजी 253

हजार सेना की प्रशंसा की थी। नासिक, बागलाठा और मराठवाड़ा में उनके
वीरोचित पराक्रम से हाहाकार मच गया था। बुरहानपुर और औरंगाबाद जैसे
बादशाह के प्रिय नगरों का नक्शा ही बदल दिया गया था।
रायगढ़ में शम्भूमहाराज ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई। विजयी वीरों के
स्वागत के लिए रायगढ़ के लोभ ही नहीं, वहाँ की सारी वस्तुएँ, पाषाणी, मेहराबें,
छतों के खपरैल तक उत्सुक थे।
शम्भूराजा ने स्वयं दस कदम आगे बढ़कर हंबीर मामा को वस्त्र प्रदान किए,
उनकी पगड़ी में हीरों के झुमकेदार फूल लगाए। वस्तुतः हंबीरराव का यह सम्मान
महाराज सोयराबाई के हाथों कराना चाहते थे किन्तु सोयराबाई ने बीमारी का बहाना
बनाकर भाई के सम्मान का अवसर टाल दिया।
मान-सम्मान का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। शम्भू महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक
प्रह्लाद मिराजी से पूछा, "पन्त हमारे लाये गये लूटे माल की गणना हो गयी
क्या?"
"चल रही है महाराज ! वह विशाल भंडार गिनते-गिनते कर्मचारियों की
गर्दनें और आँखें दुखने लगी हैं। लेकिन सम्भवतः अभी इसका अधिकांश भाग तो
साल्हेर के किले में, वहाँ खानदेश में रखा है।"
"किन्तु शत्रु भी सोया नहीं था।" हंबीरराव कहने लगे, "हमारे आक्रमण
की खबर बहादुरखान को लग गयी। खबर लगते ही वह हवा की तरह दौड़ता
आया। प्राप्त की दौलत के निकल जाने का समय आ गया था। किन्तु हमारी भी
दूरदृष्टि कम न थी। शम्भू महाराज हमने आपके साथ वरहाँ के नक्शे का अध्ययन
किया। आपके आदेशानुसार हमने चोपड़ा की राह पकड़ी और खान को चकमा
देकर सही सलामत साल्हेर के किले में आ गये।"
हंबीर मामा की बात समाप्त होते ही सूर्याजी जाखड़े उठकर खड़ा हो गया।
वह कुछ दुख और निराशा के स्वर में कहने लगा—"महाराज थोड़ी-सी चूक हो
गयी। नहीं तो औरंगाबाद का काँटा भी लगे हाथ निकाल दिये होते। बुरहानपुर को
लौटते समय बहादुरखान को हमारे आक्रमण की खबर लग गयी। वह फरदापुर की
ओर से दौड़ता हुआ समय पर आ पहुँचा इसीलिए औरंगाबाद बच गया।"
"ठीक है सूर्याजी और कोई बड़ा अवसर तुम्हारी तलवार की राह देख रहा
होगा।" शम्भूराजा ने कहा।
शम्भूराजा ने तत्काल मुआयना किया। शम्भूराजा ने मुगलों के क्षेत्र में अपनी
सेनाएँ भेजी थीं। नासिक से बरहाड़ और नीचे भागानगर से हैदराबाद की सीमा तक
ये सेनाएँ धूम मचा रही थीं। कुछ फौजी टुकड़ियाँ शोलापुर की ओर भी गयी थीं।
संभाजी महाराज की नीति थी कि जितना सम्भव हो शत्रु की हानि की जाये, उनके
254 :: सम्भाजी

क्षेत्र को जलाकर खाक कर दिया जाये। युद्ध क्षेत्र में अपना राजा सैनिकों के साथ
आगे रहता है, इसकी सेना में बड़ी प्रशंसा होती थी।
शम्भूराजा के राज्याभिषेक के एक पखवाड़े के भीतर ही उन्हें महत्त्वपूर्ण
विजय का यश मिला था। इसलिए प्रजा ने शम्भूराजा और सेनापति की बहुत जय
जयकार की। शम्भूराजा को इससे चिन्ता हुई। वे विनम्र स्वर में कहने लगे—
“अभी तो शुरुआत है। अभी बहुत आगे जाना है। आप सभी बुजुर्ग एक और
बात का ध्यान रखें। राज्य के क्रिया-कलाप को जिस प्रकार आप बुजुर्ग लोग अपना
हक मानते हैं उसी प्रकार महत्त्वाकांक्षी और उत्साही तरुणों की आकांक्षाओं को
बहुत दिन तक रोक पाना हमारे लिए सम्भव न होगा। आज रूपाजी भोसले, धनाजी
जाधव, सन्ताजी घोडपड़े, निलोपन्त, कृष्णाजी कंक जैसे तरुणों और अनुभवी
वरिष्ठों का एक समन्वित योग बनाकर हमें महाराष्ट्र धर्म की रचना करनी है।”
“महाराज, औरंगजेब उत्तर में लाखों घोड़ों और मनुष्यों की सेना सागर तैयार
कर रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि उसके मन में कुछ खोट है।” बालाजी
चिटणीस ने कहा।
“यह शिवाजी का बालक शिवाजी का भी सवाई निकलेगा तब औरंगजेब
को पता चलेगा।” हिरोजी फर्जन्द ने बड़े आत्मविश्वास से कहा।
“फर्जन्द काका हम आपके सामने स्पष्ट कर देना चाहते हैं।” शम्भूराजा ने
स्पष्ट शब्दों में कहा, “अपने पिता की तरह मैं कोई अवतारी पुरुष नहीं हूँ। वैसा
कोई अपना चित्र भी बनाने मैं नहीं बैठूँगा। मेरे पिताजी का व्यक्तित्व हिमालय की
भाँति भव्य और दिव्य था। शताब्दियों के बाद ऐसे पुण्यात्मा और गुणी महापुरुष पैदा
होते हैं। इस हिमालय से मेरी तुलना करने के चक्कर में कभी न पड़ें। किन्तु मेरी
धमनियों में प्रवहमान रक्त उसी महापुरुष का है, इसे भी न भूलें।”
“महाराज!” सभी प्रमुख कर्मचारी भाव विह्वल होकर शम्भू महाराज की
ओर देखते रह गये।
“हाँ बालाजी काका और हिरोजी काका! इस स्वराज्य के मन्दिर पर चार
अधिक स्वर्ण कलश लगाने की शक्ति देवताओं और भाग्य ने हमें न दी हो तो कोई
बात नहीं परन्तु जब तक यह संभाजी जीवित है तब तक शिवाजी महाराज के इस
हिन्दवी स्वराज्य के किसी किले को तो क्या, किसी चहारदीवारी की फूटी ईंट को
भी उस पापी औरंगजेब को हस्तगत नहीं करने देंगे।”
दरबार की बैठक समाप्त होने पर भी शम्भू महाराज वहीं रुके रहे। स्वराज्य
के कोने कोने से आये सैनिकों से उनकी बातचीत चल रही थी।
बालाजी चिटणीस महारानी के महल तक चलकर गये। उन्होंने महारानी से
कहा, “आज दरबार में, आखिरी समय में शम्भू महाराज बहुत भावविभोर
दिखाई दिये।”
सम्भाजी :: 255

"चलता है, शम्भू महाराज के हृदय का एक हिस्सा कठोर राजनीतिज्ञ का है
तो दूसरा एक भावुक कवि का।" येसू रानी ने कहा।
"क्या कह रही हैं बहू रानी?"
"हाँ काका, जो केवल राजनीतिज्ञ होते हैं वे अपने स्वार्थों के गुलाम होते हैं।
उनके लिबास के भीतर छिपी रक्तरंजित कटारें रहती हैं। इसलिए वे अपने स्वार्थ के
अवसर पर पत्थर-से कठोर हो सकते हैं। किन्तु कवि का हृदय घास के गीले पत्ते
जैसा होता है, इसीलिए किसी का छोटा दुख देखकर भी महाराज का हृदय द्रवीभूत
हो उठता है।"
चार
कभी नहीं आते थे। किन्तु एक दिन दोपहर में शम्भू महाराज दरबार से लौट आये।
वे अपने निजी कक्ष में विश्राम कर रहे थे। इसी समय एक सेवक अन्दर आया और
अभिवादन करके कहने लगा—"कवि कलश बाहर आये हैं और तत्काल आपसे
मिलना चाहते हैं।" शम्भुराजा की आज्ञा मिलते ही खिन्न मन कवि कलश हाथ
झटकते हुए अन्दर आये।
"राजन! अघटित घट गया, धोखा हुआऽऽ।"
"हुआ क्या है? कविराज?"
"जिसको हम एकनिष्ठता की मूर्ति और स्वराज्य का एक बलशाली बुर्ज
समझते थे, वह बुर्ज ही ढह गया।" हताशा के साथ कविराज ने कहा।
"साफ-साफ बताइए, क्या हुआ?"
"अपने कोंडाजी फर्जन्द जंजीरावाले उस बदमाश सिद्दी से जाकर मिल
गये।"
"भाँग पिये व्यक्ति की तरह व्यर्थ में क्यों बड़बड़ा रहे हो? आपका दिमाग
ठिकाने पर तो है न?" शम्भू महाराज कड़कती आवाज में पूछने लगे—"और किस
फर्जन्द के विषय में बोल रहे हो? हिरोजी या कोंडाजी?"
"दुर्भाग्य से कोंडाजी ही।" कलश गर्दन नीची कर ली।
शम्भुराजा का चेहरा अचानक उतर गया उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा
था। महारानी येसूबाई भी बहुत सम्भ्रमित थीं। उन्होंने अनेक बार अपने ससुर स्वयं
256 :: सम्भाजी

शिवाजी महाराज से कोंडाजी की भूरि-भूरि प्रशंसा सुनी थी। अँधेरी रात में
पन्हालगढ़ की चोटी पर साँप की तरह चढ़कर जाने वाले और केवल चौंसठ मावलों
के साथ आक्रमण करके पन्हालगढ़ जैसे किले पर अधिकार कर लेने वाले जादूगर
अर्थात् कोंडाजी फर्जन्द।
शम्भू महाराज अपने क्रोध को दबाते हुए शान्त स्वर में बोले, "कविराज।
बाजार में तो रोज अफवाहें उड़ती रहती हैं, किन्तु उस बात को राजा से कहने के
लिए प्रधान दीवान को कुछ सबूत तो एकत्र कर लेने चाहिए।"
कवि कलश ने आँखें फैलाई और अपने हाथ का पत्र देते हुए बोले—
"पढ़िए राजन! पंक्ति पंक्ति, अक्षर अक्षर। दडाराजपुरी के सूबेदार ने अपने
हाथों लिखा है। राजन! इसमें और कुछ कहने की गुजाइश नहीं है।"
उस पत्र को पढ़ते हुए शम्भू महाराज को बड़ा क्लेश हुआ। उनका चेहरा
बदल गया। उन्होंने दाँत भींचकर कड़कते स्वर में पूछा—
"कैसे गये? अकेले ही या हमारी सेना मे विद्रोह की आग लगाकर ?"
"अच्छे खासे ग्यारह लोगों का समूह साथ लेकर गये। ऊपर से उन चोरों का
शोर कि शम्भूराजा के शासन में न्याय नहीं बचा है, दिनोंदिन अत्याचार बढ़ रहा है।
ऐसी बहुत-सी शिकायतें उन्होंने उस सिद्दी कासमखान से की है।"
"देखा युवराज्ञी? कितना भरोसा किया था इन पर?"
"अपने ही लोग इस तरह धोखेबाज क्यों हो जाते हैं?"
"जागीरदारी के लिए और किस लिए?" चिन्ताग्रस्त शम्भूमहाराज एक
लम्बी मुस्कान बिखेरते हुए बोले "जागीर की हवस से मराठों का ऐसा ही पतन
होता है।"
कोंडाजी का विद्रोह छिपने लायक नहीं था। वह शीघ्र ही चारों ओर फैल
गया। पूरे रायगढ़ पर एक अशुभ छाया सी पसर गयी। सम्भाजी महाराज बहुत
तनाव में दिखे। कवि कलश ने स्पष्ट शब्दों में कहा—
"राजन, आज नहीं तो कल, इस सम्बन्ध में कोई न कोई निर्णय लेना होगा।
मराठे हों या ब्राह्मण सभी जागीरदारी के विषय में एक ही तरह पूछते हैं। सभी पूछत
हैं—हमारी जागीरदारी का क्या हो रहा है? हमें अपनी मिल्कियत अपनी मुहर के
पास कब मिलेगी? वह हमारे बाल बच्चों के नाम कब होगी? बड़े महाराज के
प्रभाव से हम उनकी मृत्यु तक चुप रहे। अब और कितने दिन इस मजबूरी के
निकालें?"
कवि कलश के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए शम्भू महाराज की आँखें विलक्षण
रूप से चमकीं। उन्होंने कहा, "मेरे पिताजी मुझसे हमेशा कहते थे जागीर के कारण
सम्भाजी 257

अलग-अलग संस्थाएँ और संस्थाओं के कारण अलग-अलग जागीरदार मौज करते
हैं और प्रजा की स्थिति बिगड़ती जाती है। राज्य की हानि होती है। मनुष्य तो क्या
देवी-देवता के नाम पर भी जागीर नहीं देनी चाहिए। पुजारियों को बिगाड़ना नहीं
चाहिए।"
"किन्तु राजन, आगे भी सारे जागीरदार यह प्रश्न मुझसे पूछते रहेंगे, उन्हें हम
क्या उत्तर दें?"
"उनसे साफ-साफ कह दीजिए-चाहिए तो जागीर के बदले मेरे हाथ-पैर
के टुकड़े माँग लें, हम प्रसन्नता से दे देंगे किन्तु मेरी आखिरी साँस तक मुझसे
जागीरदारी की आशा न करें।"
कोंडाजी की गद्दारी का घाव शम्भू महाराज के मन में बैठ गया था। मराठों
और सिद्दियों की शत्रुता को नयी धार मिलने वाली थी। उन्होंने शीघ्रता से निलोपन्त
पेशवा को आदेश दिया- "निलोबा पानी के ऊपर कभी भी युद्ध आरम्भ हो सकता
है। अपनी ओर से पूरी तैयार रखिए।"
"जी महाराज।"
कुलाबा और सागरी किलों पर आवश्यक धान्य भंडार, गोला-बारूद है कि
नहीं, इसकी पुष्टि कीजिए। यदि रसद की कमी हो तो उसकी दुगुनी भेजिए। वह
सिद्दी और उसके आश्रयदाता अँग्रेज स्वराज्य पर चढ़ आये तो अनर्थ हो जाएगा।
उसके लिए समुद्र के किनारे के बुर्जों पर शत्रु की टोह लेते रहने की चौकस तैयारी
कीजिए।"
"बड़े महाराज की दृष्टि भी बड़ी थी, महाराज।" निलोपन्त पेशवा कहने
लगे- "उन्होंने मृत्यु से दो वर्ष पूर्व ही कुलाबा का किला बनवाया था।"
"लेकिन कुलाबा की तटबन्दी का काम अभी बाकी है। अजोजी यादव को
शीघ्र ही वहाँ भिजवाइए। चार महीने के भीतर वहाँ की तटबन्दी तैयार हो जानी
चाहिए।"
"जैसी आज्ञा, महाराज।"
उस रात शम्भू महाराज देर तक जागते रहे। अप्रसन्न मनःस्थिति में भी उनके
चेहरे पर किंचित हँसी आयी। यह देखकर येसूबाई पूछने लगीं-"महाराज बीच में
वह क्या?"
"येसू, मुझे अपने बचपन की एक घटना स्मरण हो आयी। पुरन्दर के
समझौते में पिताजी ने तेईस किले मुगलों को देने के लिए स्वीकार किया था। उस
समझौते पर हस्ताक्षर करके हमारे पिताजी वापस लौटे थे। तब उनके भी चेहरे पर
ऐसी ही हँसी आयी थी। इस पर जीजामाता नाराज हो गयीं। वे पिताजी से कहने
लगीं-शिवबा एक रायगढ़ छोड़कर अपने सभी बलशाली किले गँवाकर आ गये
258 : सम्भाजी

हो और उस पर हँस भी रहे हो? तब भी पिताजी की दाढ़ी-मूँछों मे हँसी गायब
नहीं हुई। वे बोले—माताजी! उन तेइस किलों के बदले में मुगलों की ओर से
जयसिंह ने हमें जंजीरा देना स्वीकार कर लिया है। "
" 'क्या कह रहे हैं महाराज ? जंजीरा तभी मिल गया था ? " येसूबाई ने बीच
में ही उत्सुकता से पूछा।
वह हम मराठों को मिले इसके लिए जयसिंह ने बादशाह से सिफारिश की
थी— "जहाँपनाह ! तेईस बलशाली किलों के बदले में जंजीरा छोड़ दें ऐसा शिवाजी
का बालहठ है। जाने दें। पानी का एक सामान्य किला छोड़ दिया तो क्या बिगड़
जाएगा ?"
" उस पर औरंगजेब ने क्या जवाब दिया ?" येसूबाई ने पूछा।
"वह भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।" शम्भूराजा बताने लगे, "औरंगजेब ने मिर्जा
राजा को लिखा—मिर्जा राजा आप पागल हैं। जंजीरा सिद्दी के लिए ही नहीं हमारे
लिए भी कलेजे का टुकड़ा है। तुम्हारे इस दान से उस शिवा का, जंगली चूहे का
मगरमच्छ में रूपान्तरण हो जाएगा और फिर उसकी पूँछ के धक्के से दिल्ली का
सिंहासन भी डगमगा जाएगा।"
वे बीती बातें सुनकर येसूबाई अवाक रह गयीं। उन्होंने धीरे से पूछा—
"महाराज, क्या जंजीरा सचमुच इतना जुल्मी है ?"
"आज हमें जंजीरा न जीत पाने का इतना दुख नहीं है। किन्तु उस नर वीर
कोंडीबाबा को गँवा देने का हमें बड़ा दुख है। उनके उधर चले जाने से जंजीरे के
सिद्दी की ताकत दुगुनी हो गयी।"
पाँच
"अल्लाहताला की मेहरबानी से दिल्ली का तख्त मुझे मिला तो नाम मेरा रहेगा
और शासन केवल संभाजी महाराज करेंगे। बादशाह मेरे वालिद हैं तो भी आपके
और मेरे सबसे बड़े दुश्मन हैं। इसे ध्यान में रखें। इसलिए हम दोनों के दुश्मन का
खात्मा करने के लिए हम दोनों एक हो जाएँ।"
आँखों के आगे का पत्र पढ़ते-पढ़ते कविराज बीच में ही रुक गये। उन्होंने
महाराज की ओर चौंककर देखा। शम्भूमहाराज विचारमग्न दिखे। मुस्कराते हुए
सम्भाजी :: 259

उन्होंने पूछा- "कविराज, यह पत्र किसकी ओर से आया है?"
"शहजादा अकबर।"
"यह बादशाह का सचमुच का बेटा है या कोई नकली?" महाराज ने
चिन्तित स्वर में पूछा।
"राजन, मैंने जासूसों से इस बात की पुष्टि करवा ली है। दिलरस बानू नामक
बेगम से पैदा हुआ है यह लड़का। कहते हैं कि यह बादशाह का बड़ा लाड़ला
शहजादा था।"
"इसने ही क्या पिछले दिनों राजपूताना में औरंगजेब के साथ बगावत की
थी? राजपूतों की कुछ सेनाएँ उसके साथ मिल गयी थीं? उन्हीं को लेकर इसने
अपने को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया।"
"हाँ राजन, वही बगावत करने वाला शहजादा।"
"ऐसा है! लेकिन सारा हिन्दुस्तान छोड़कर वह दक्षिण में हमारे पास ही क्यों
आना चाहता है? इस शहजादे के हमारे पास आने का उद्देश्य ठीक ठीक पता
लगाकर हमें खबर कीजिए।" राजा ने दरबार में इस सन्दर्भ की सभी को सूचना दी।
किन्तु पहले पत्र के बाद 'मान न मान मैं तेरा मेहमान' की शैली में शहजादा अकबर
दक्षिण की ओर चल पड़ा।
पन्द्रह बीस दिन होते-होते शहजादे की ओर से दूसरा पत्र महाराज को प्राप्त
हुआ। पत्र में शहजादा बहुत उतावला दिखाई पड़ रहा था। लगता था उसे शम्भुराज
के पास आने और उनकी सहायता लेने की बड़ी उत्सुकता थी। किन्तु दूसरा पत्र
पढ़ते हुए भी शम्भु महाराज के चेहरे की लकीरें हिली नहीं। यह देखकर कवि
कलश अपनी घनी भौंहों को तानकर बोले-"राजन, शहजादे के पहले पत्र का भी
उत्तर अभी तक गया नहीं। इतनी उदासीनता भी अच्छी नहीं?"
"देखिए कविराज, इस अकबर के बारे में और क्या क्या सूचनाएँ मिलीं,
पहले वह बताइए।"
महाराज के इस प्रश्न के साथ ही कविराज कुछ हिचके, परन्तु तुरन्त स्वयं को
संभालते हुए बोले, "अपने लाडले की बगावत से औरंगजेब बहुत दुखी हो गया
है। लेकिन मराठों जैसे अपने कट्टर दुश्मन से अकबर के मिलने के समाचार से
बादशाह बहुत घबरा गया है। उसे डर है कि कहीं मराठों के साथ उसके अन्य शत्रु
भी अकबर के साथ न मिल जाएँ। इस कल्पना से उसका धैर्य छूट गया है। शहजादे
को दक्षिण जाने से रोकने के लिए जी तोड़ मुहिम चलाई है। सेना की अनेक
टुकड़ियाँ भेजकर रास्ते की नदियों, पहाड़ी घाटियों, सरायों आदि पर पहरे बिठा
दिये हैं। अपने बाप की व्यवस्था को चकमा देने के लिए शहजादा पागलों की भाँति
भाग रहा है। वह आपसे मिलने के लिए व्याकुल है।"
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