छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
उसकी तटबन्दी तो नहीं तोड़ रहे हैं। इस कल्पना से युवराज का सिर चकरा रहा
था।
बीच रास्ते में एक काजी साहब मिले। युवराज को सलाम करते हुए बोले,
"बादशाह औरंगजेब अगले हफ्ते से गैर मुसलमानों पर जजिया कर लगाने वाला
है। ऐसी अनीति औरंगजेब के बाप तो क्या उसके दादा ने भी नहीं की थी।"
चलते-चलते शम्भुराजा स्वयं से ही बोले, "लगता है काजी के रूप में यह
समाचार बाणोबा ही दे रहे हैं। हिन्दू प्रजा पर जजिया जैसा अमानवीय कर लगाने
वाला औरंगजेब हमें क्या न्याय देगा?"
समय बहुत बुरा आ रहा है। यह सोचते हुए शम्भुराजा बाणोबा के शीतल
गर्भगृह में पहुँच गये। भगवान के चरणों पर सिर रखकर वे बहुत समय तक बैठे
रहे।
राणूबाई ने इक्कीस नारियल की माला और अपने गले का सोने का हार
बाणोबा की पिंडी पर चढ़ाया। पुजारी ने उन्हें मंगल आशीर्वाद दिया। राणूबाई बड़ी
व्यग्रता से पुजारी से बोलीं, "गुरुजी वचन दीजिए कि इस बार हमारे युवराज को
पुत्र ही होगा।" मन्नत के फल जानने के लिए राणूबाई पुजारी से आग्रह कर रही
थीं। राणूबाई की बात सुनते ही दुर्गाबाई के चेहरे पर वसन्त की बहार आ गयी। वे
मुस्करा पड़ीं। शम्भुराजा आश्चर्य से दोनों की ओर देखने लगे। वे सोचने लगे कि
इस भागदौड़ में यह मधुर भार उठाकर किस तरह और कितना दौड़ा जा सकता है।
संभाजी राजा के मन की शान्ति अधिक समय तक नहीं टिक सकी। वे वहाँ
विश्राम कर रहे थे। इसी समय उनके चार विश्वस्त सेवक दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे। वे
अत्यधिक डरे और सहमे हुए थे—'युवराज ऽ युवराज ऽऽ' कहते हुए वे मर्मभेदी
दहाड़ें मार रहे थे। उनकी आवाज सुनकर शम्भुराजा तेजी से उठे। उन्हें विश्वास हो
गया कि कोई बड़ा धोखा हो गया है। उन्होंने अधीरता से कहा, "बोलो बोलो!
कहो क्या हो गया?"
"महाराज, बहुत अन्याय हो गया। बहुत अन्याय हो गया।" उनमें से
एक बोला।
दूसरा अत्यन्त भयभीत स्वर में कहने लगा—"कल किले पर बन्दी बनाये
सात सौ मराठा सैनिक, जिन्हें नीचे ले जाया गया था..।"
"अरे क्या हुआ उन्हें?" युवराज की साँस फूलने लगी।
"अब कैसे बतायें महाराज ?" उन सेवकों की आँखों से धारासार आँसू बहने
लगे। दहाड़ें मारते हुए एक बोला, "युवराज, उन दुष्टों ने सात सौ में से आधे
सैनिकों के एक-एक हाथ काटकर अपाहिज बना दिया और बचे हुए आधे सैनिकों
के एक-एक पैर काटकर उन्हें लँगड़ा बना दिया। इनसानों की तो क्या ऐसी दुर्गति
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तो जानवरों की भी किसी ने नहीं की होगी।"
यह भयंकर समाचार सुनते ही संभाजी राजा की क्रोधाग्नि धधक उठी। उनके
सिर के नरम रेशमी बाल खड़े हो गये; हथेलियों की मुट्ठी बँध गयी। वे क्रोध से
दाँत पीसने लगे। मन्दिर के बाहर ही युवराज का घोड़ा खड़ा था। वे शीघ्रता से घोड़े
के पास पहुँचे और उसकी पीठ पर अपना मर्दाना हाथ रखा। पीठ का आधार देकर
वे उछलकर घोड़े की पीठ पर सवार हो गये। किले के पिछवाड़े से पत्थरों और
खड्डों के बीच से उन्होंने घोड़े को दौड़ाया। पीछे से दूसरे घुड़सवार जोर जोर से
चिल्ला रहे थे—"युवराज रुक जाओ, गड़बड़ मत करो घोड़ा गिर जाएगा, रुक
जाओ।" किन्तु युवराज के पागलपन को कोई भी आवाज सुनाई नहीं दे रही थी।
देखते देखते खड्डों भरी वह ऊबड़ खाबड़ ढलान घोड़े ने पार कर ली। पसीने से
लथपथ घोड़ा दिलेरखान के शामियाने के सामने आकर रुका।
शम्भुराजा के उस आश्चर्यजनक रूप को मुगल सरदार देखते ही रह गये।
घोड़े के चारों पैर खून से भीग रहे थे, शम्भुराजा की आँखों से लाल अंगारे फूट रहे
थे। वे घोड़े पर से छलाँग लगा कर जमीन पर उतरे। जोर की गर्जना के साथ उन्होंने
आवाज दी—"कहाँ है वह हरामखोर बुड्ढा दिलेरखान?"
दिलेरखान ने जब शम्भुराजा को किले की ढलान से उतरते देखा था तभी
आने वाले भयानक संकट की आहट उसे मिल गयी थी। दिलेरखान की छावनी के
चारों ओर दो हजार सशस्त्र सैनिकों का घेरा था। खेत के मेड़ में छिपे चूहे की तरह
खान अन्दर छुप गया। क्रुद्ध शम्भुराजा का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी।
"डरपोक बुड्ढेऽऽ बाहर निकल।" शम्भुराजा बहुत देर तक पुकारते रहे।
कुछ समय बाद ऊपर की लहरें तो शान्त हो गयीं लेकिन समुद्र का भीतरी
हिस्सा अभी अशान्त बना हुआ था। उन्होंने सामने खड़े सैनिकों से दिलेरखान के
लिए सन्देश भेजा—
"जाओ, कहो अपने बुड्ढे दिलेरखान से कि एक संभाजी मुगलों से आ
मिला तो क्या हुआ, शिवाजी महाराज अभी समाप्त नहीं हुए हैं और समाप्त होंगे
भी नहीं।"
रात में शम्भुराजा को भयंकर बेचैनी रही। कुहनी से कटे हाथ और घुटने से
कटे पाँव वाले मराठे सैनिक उनकी आँखों के सामने बार-बार आते थे। जिस
क्रोधित और अपमानित नजर से वे शम्भुराजा की ओर देख रहे थे उससे शम्भुराजा
उद्विग्न हो गये थे। उनका सिर फटा जा रहा था। उनकी इस बेचैन दशा को देखकर
दुर्गाबाई और राणूबाई आधी रात के बाद भी उनके पलँग के पास बैठी रहीं।
मस्तिष्क की भयानक पीड़ा शान्त होने का नाम नहीं ले रही थी। शम्भुराजा तेजी से
उठे और कोने में पड़ा बाटे का पत्थर हाथ से उठा लिया। राणूबाई को अपने भाई के
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असीम क्रोध का अन्दाजा हो गया। उन्होंने दौड़कर पीछे से शम्भूराजा को बाँहों में
भर लिया। दूसरे सैनिक भी उनकी मदद के लिए दौड़ पड़े। सभी मिलकर
शम्भूराजा को सँभालने का प्रयल करने लगे। तब शम्भूराजा जोर से चिल्लाये—
“छोड़ो-छोड़ो, दीदीजी हमें छोड़ दो।”
“क्या कर रहे हैं, युवराज?”
शम्भूराजा अपना सिर पीटते हुए बोले—“रानू दीदी इस खाई में शिवाजी के
पुत्र इस संभाजी के रहते हुए उस पार थोड़ी दूरी पर, सात सौ मराठों के हाथ-पैर
तोड़े जाते हैं और ऐसे अमानवीय कृत्य को हम रोक नहीं पाये तो मेरे इन हाथों का
क्या उपयोग है ? आप रुकिए मुझे अपने इन हाथों को ही तोड़कर प्रायश्चित
करने दीजिए।”
“युवराज धैर्य रखिए, अपने को सँभालिए।” दुर्गाबाई ने हाथ जोड़कर प्रार्थना
करते हुए कहा।
शम्भूराजा ने अपनी पूरी शक्ति से जोर का धक्का दिया। परिणामस्वरूप उन्हें
पकड़कर रोकने वाले सेवक बगल में जा गिरे। यह देखते ही राणूबाई दौड़कर
शम्भूराजा के पैरों में गिर पड़ीं। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर दहाड़
मारकर रोते हुए बोलीं, “शम्भूराजा, आज तुम अपना हाथ खो दोगे तो कल हमारा
क्या होगा ? पिताजी के बाद वह दुष्ट औरंगजेब हमारे देश पर आक्रमण करेगा तो
उसके घोड़े के पैर को काट देने की शक्ति तुम्हारे अतिरिक्त और किसी में है
क्या?”
राणूबाई की चीत्कार और व्याकुलता से शम्भूराजा के हाथ का बाटे का पत्थर
नीचे गिर गया। सामने शामियाने के बीच का खम्भा था। शम्भूराजा ने उसी को बाँहों
में भर लिया। जिस प्रकार भन्नाया हुआ हाथी अपने मस्तक ज्वर को शान्त करने के
लिए पत्थर पर अपना माथा पटकता है, उसी तरह शम्भूराजा भी खम्भे पर अपना
सिर पटकने लगे। आँखों से लगातार गिरते गर्म आँसुओं को पोंछते हुए वे बोले—
“पिताजी बहुत बड़ी भूल की है मैंने, बहुत बड़ी गलती।”
चार
सिंह की नाक पर यदि किसी चूहे ने ज़रा-सी भी खरोंच की तो वनराज क्रोध से
134 :: सम्भाजी
पागल हो उठता है। शम्भूराजा बहुत ही स्वाभिमानी, भावुक और संवेदनशील थे।
उनकी आयु भी अभी कुल बीस वर्ष थी। इसलिए शरीर का रक्त स्वभावतः गर्म
था। दूसरी ओर मुगल सरदारों ने सात सौ मराठी सैनिकों के हाथ-पैर काट दिए थे।
इस पर गर्म खून वाले, स्वाभिमानी युवराज के क्रोध की कल्पना से ही दिलेरखान
अत्यधिक बेचैन हो रहा था। सबसे अधिक उसको यह चिन्ता सता रही थी कि यदि
यह सिंह का बच्चा क्रुद्ध होकर चला गया तो उसकी अपनी इज्जत का क्या होगा।
भूपालगढ़ की बगल में ही सेना ठहर गयी थी। शम्भूराजा तीन दिन तक
अपनी छावनी से बाहर नहीं निकले। वे भोजन का स्पर्श तक नहीं कर रहे थे। पूरे
दिन में केवल आधा गिलास दूध लेते थे। पूरे समय छावनी के मन्दिर के सामने
पागल की तरह बैठे रहते थे। उनकी वह दशा देखकर पत्नी दुर्गाबाई और बहन
गणूबाई दोनों भयभीत हो गयीं। ये सारे समाचार दिलेरखान को लगातार मिल रहे
थे। शम्भूराजा की बिगड़ती स्थिति से दुर्गाबाई को भी ज्वर आने लगा। मौके का
फायदा उठाने के लिए दिलेरखान ने अपने खास वैद्य और हकीम को युवराज की
छावनी में भेजना आरम्भ किया। पीछे पीछे मिठाइयों और फलों की टोकरियाँ भी
जाने लगीं। हकीमों के माध्यम से चाटुकारिता भी आरम्भ हुई। बताया गया कि
मराठी सैनिकों के हाथ पैर काटने की सजा दिलेरखान ने दी ही नहीं थी। बल्कि
बिना कोई सूचना दिये उनके भतीजे गैरतखान ने यह अमानवीय जुर्म कर दिया था।
इसी अवस्था में चार दिन बीत गये। क्रुद्ध सागर कुछ शान्त हुआ। क्रोध की
नदी की बाढ़ कुछ उतर गयी। दिलेरखान को इस आंशिक परिवर्तन का अन्दाजा हो
गया। वह चोर की तरह धीरे से शम्भूराजा की छावनी में प्रविष्ट हुआ। उनके
सिरहाने दयनीय भाव से बैठ गया। अपनी आँखें गीली होने का नाटक करते हुए
वह व्यग्रतापूर्वक युवराज से बोला—"युवराज जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। हमारा
गैरतखान कहाँ गायब हो गया है कुछ पता नहीं लेकिन उसको फाँसी की सजा देने
के लिए मैंने आलमगीर से सिफारिश की है।"
"गैरत की फाँसी से ऐसा क्या फर्क पड़ने वाला है ? किन्तु खान साहब एक
पैर से लँगड़े और एक हाथ से लूले बन गये ये अभागे मराठी सैनिक जब स्वराज्य
में वापस जाएँगे। तब इन्हें देखकर छोटे छोटे बच्चे भी मेरे मुँह में गोबर भरने के
लिए तैयार हो जाएँगे। यदि प्रजा मुझसे पूछे कि फौज के समीप शिवाजी के पुत्र के
रहते हुए इस प्रकार का अमानवीय जुर्म कैसे हुआ ? तो हम क्या उत्तर देंगे ?"
दिलेरखान ने सोचा कि ऐसी कुशाग्र बुद्धि वाले शम्भूराजा के क्रोध को शान्त
करने के लिए कोई ठोस उपाय करना पड़ेगा। उसने पहले ही एक गुप्त प्रस्ताव
औरंगजेब के पास भेज दिया था। इसका स्मरण उसे यकाएक हो आया। उसने
जियाखान को अपने शामियाने में तुरन्त बुलवाया।
सम्भाजी :: 135
पत्र की नयी इबारत बोली—"आलमपनाह, संभाजी ही मराठों का असली
राजा है। वही शाहंशाह है। एक बार ऐसा ऐलान पूरे हिन्दुस्तान में करवा दें। शिवाजी
की फौज में संभाजी को चाहने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं उन लोगों को यदि
आपका संरक्षण मिला तो संभाजी खुश हो जाएगा। बाप-बेटे में एक बार झगड़ा शुरू
हो गया तो अपने आप ही उग्र होता जाएगा। इस तरह मराठों में आपसी दरार
पड़ेगी। एक बार इस दरार से यह प्रदेश बिखर गया तो उसकी तबाही करने में हमें
कितना समय लगेगा!"
जियाखान ने इस सिफारिश को नमक मिर्च लगाकर शम्भुराजा को सुनाया।
किन्तु युवराज ने अपनी कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वे अच्छी तरह समझ
रहे थे कि शिवाजी महाराज के विरुद्ध भड़काने का यह षड्यन्त्र था। भूपालगढ़ के
पास किये गये दिलेरखान के कुकृत्य का गहरा डर युवराज के मन में बैठ गया था।
एक दिन दिलेरखान क्रुद्ध मुद्रा में युवराज के शामियाने में आया। उसके
गुप्तचरों ने शिवाजी महाराज का एक पत्र प्राप्त कर लिया था। वह पत्र शम्भुराजा के
सामने करते हुए दिलेरखान क्रुद्ध होकर युवराज से बोला "शिवाजी की अपने
बच्चे के साथ व्यवहार करने की यह कैसी रीति है?
"क्यों? क्या गलत कर दिया हमारे पिताजी ने?" शम्भुराजा ने प्रतिप्रश्न
किया।
"पढ़ो! पढ़ो न इस पत्र को। क्या आदेश दे रहे हैं वे किले के सुरक्षाकर्मियों
को। संभाजी ने आक्रमण किया है तो शान्त मत बैठो। हर किले पर, किले के हर
बुर्ज पर, तटबन्दी पर गोले दागो। अन्तिम समय तक किले को बचाने के लिए
लड़ो। संभाजी राजा को हमारा बेटा मानकर किसी प्रकार का लिहाज मत करो। सुन
लिया न आपने जन्मदाता की बात?"
दिलेरखान के इस क्रोध पर शम्भुराजा खिन्नता से हँसे और बोले, "मेरे
पिताजी ऐसा फरमान न निकालते तो और क्या करते? अपना बेटा शत्रु की फौज में
जाकर मिल गया तो क्या प्रसन्न होकर उसके गले में रत्नों का हार पहनाएँ?"
युवराज की इस प्रतिक्रिया पर दिलेरखान की जबान को ताला लग गया।
चालाक और धूर्त दिलेरखान समझ गया कि शम्भुराजा की मनोदशा अब पहले जैसी
नहीं रही। मुगल सेना में वे बहुत बेचैन थे। उसी रात जगकर दिलेरखान ने बादशाह
के पास आधी रात को एक सन्देश भेजा।
"जहाँपनाह मेहरबानी करो। संभाजी को शाहंशाह बनाने की शाही मंजूरी
शीघ्र दीजिए। सल्तनत में इस तरह का फतवा जारी कीजिए। अपने एक पत्र से
बाप-बेटे में भारी बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। मराठों की सल्तनत टुकड़ों में बँट
जाएगी।"
दिलेरखान शाही जवाब की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था। किन्तु उसे उधर
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से कोई जवाब नहीं मिला। दिलेरखान निश्चित नहीं कर पा रहा था कि संभाजी का
क्या किया जाय। उसकी बेचैनी और उतावली उमराव जियाखान समीप से देख रहा
था। मौका देखकर उसने दिलेरखान से कहा, "खानसाहब वक्त बरबाद मत करो।
संभाजी आजकल उन्मत्त हो गया है। उसको तुरन्त गिरफ्तार करो। तुमको बहुत
बड़ा इनाम मिलेगा। आलमगीर मेहरबान तो दिलेरखान दिल्ली का दीवान।"
"बेवकूफ़ इसका मतलब तो यह है कि तुमने अभी तक अपने आलमगीर को
पहचाना ही नहीं है।" दिलेरखान हँसते हुए कहने लगा- "आलमगीर की तकदीर
बहुत बड़ी है। उत्तर के सारे दुश्मन समाप्त हो गये। संभाजी और शिवाजी भी
समाप्त हो जाएँगे तो औरंगजेब इतना उन्मत्त हो जाएगा कि अपने जैसे सेवकों की
अवस्था कुत्ते बिल्ली जैसी हो जाएगी।"
"फिर करना क्या है?"
"बस बेटे इतना ही! न साँप को मरने देना है, न लाठी को टूटने देना है। इतने
में ही तेरे मेरे जैसे दरबारी गरुड़ों का पेट भरता रहेगा वरना कौन पूछता है अपने
को?"
एक दिन शाम के समय दिलेरखान बाहर निकला। आसमान में अँधेरा छान
लगा था। दिलेरखान के आगे पीछे रक्षकों के घोड़े दौड़ रहे थे। दिलेरखान का दल
सामने वाली पहाड़ी को पार करके उस पार के मैदान में गया। वहाँ उसे खाई में एक
मजबूत कद काठी का आदमी खड़ा दिखाई दिया। उस धुँधली आकृति के
आसपास कुछ अंगरक्षक भी खड़े दिखाई दिये। दिलेरखान ने सशंक स्वर में
जियाखान से पूछा- "अरे वहाँ कौन है? अपने शम्भू शहजादे ही हैं न?"
"जी, खान साहब।"
"इस अँधेरे में वे क्या कर रहे हैं?"
"खान साहब आप इस जगह को भूल गये क्या? यहीं पर तो तुम्हारे हुक्म से
पन्द्रह दिन पहले सात सौ मराठों के हाथ पैर काट लिये गये थे। यह संभाजी उस
जगह पर कभी दिन निकलने से पहले कभी शाम को या रात बेरात आकर घंटों
रुका रहता है। वहाँ की मिट्टी हाथ में लेकर छोटे बच्चे की तरह रोता है और
बड़बड़ाता है।"
"पागल शायर।" दिलेरखान धीमी आवाज में खुद से ही बोला, "शायर है
और शेर भी है। इसीलिए इस संभाजी से मुझे कभी कभी भय लगता है।"
दिलेरखान अपनी छावनी में वापस आ गया। आते ही अपने दीवानों से वह
धीमे स्वर में बोला- "शैतानों के क़ब्ज़े में आयी इस जगह को जल्दी से छोड़कर
हम बाहर निकल चलें तो ठीक है। नहीं तो संभाजी यहाँ रहकर पागल हो जाएगा।
किसी दूसरे काम की ओर उसका ध्यान आकर्षित करना होगा।"
सम्भाजी :: 137
दिलेरखान बेचैन था। औरंगजेब की इच्छानुसार आजकल वह बीजापुर की
राजनीति में कुछ अधिक ध्यान देने लगा था। बीजापुर की पहले वाली प्रतिष्ठा
समाप्त हो चुकी थी। डूब रही आदिलशाही को जीवन दान देने का प्रयास शिवाजी
महाराज कर रहे थे। किन्तु दरबार के कुछ सरदारों को रिश्वत की बड़ी-बड़ी
गठरियाँ भेजकर अथवा आश्वासनों की खैरात बाँटकर दिलेरखान अपनी ओर
आकर्षित कर रहा था। बीजापुर के बहुत से सरदार मुगलों के पक्षधर बन रहे थे।
सर्जाखान जैसी बड़ी मछली जब दिलेरखान के काँटे में फँस गयी तो सभी को घोर
आश्चर्य हुआ।
इसी समय एक दिन दिल्ली से दिलेरखान के मित्र का एक अति आवश्यक
सन्देश आया। उसमें कहा गया था—‘‘दिलेर इसके बाद संभाजी को राजा बनाने की
सिफारिश बादशाह को कभी नहीं भेजना। तुम्हारी उस सिफारिश से औरंगजेब के
दिमाग पर सन्देह का भूत सवार हो गया है। दिलेरखान उस मूर्ख संभाजी की इतनी
तारीफ क्यों करता है? उन दोनों की मित्रता तो नहीं हो गयी है? दिलेरखान छुपकर
कहीं मराठों से मिल तो नहीं गया है? संभाजी और दिलेर दोनों मिलकर भागानगर
की नौकरी तो नहीं करने वाले हैं? इसी की अनेक आशंकाओं के भूत आलमगीर को
पागल बना रहे हैं।
दूसरे ही दिन दिलेरखान प्रसन्न मुद्रा में संभाजी राजा के शामियाने में पहुँचा।
दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए बोला, ‘‘शम्भू शहजादे, आप को क्या लगता है कि हम
सिर्फ मराठों के प्रदेश पर आक्रमण करते हैं, सिर्फ उनको ही जलाते हैं? चलो तैयारी
करो हम बीजापुर पर हमला करेंगे। मैं आपको दिखा दूँगा कि यह दिलेरखान
इस्लामी प्रदेश को भी किस प्रकार नष्ट करता है?’’
पाँच
एक रात को किसी गुप्तचर के पैरों की आहट शम्भूराजा के डेरे के पास सुनाई पड़ी।
रायगढ़ से अनेक वेश बदलता हुआ यह गुप्तचर लाखों के मोल का यह पत्र लेकर
शम्भू महाराज के पास आया था। शम्भू महाराज ने काँपते हाथों मे वह लिफाफा
पकड़ा। उस पर लगी मुहर को आँख भर देखा।
प्रतिपच्चंद्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्व वंदिता।
शाहसूनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।।
138 :: सम्भाजी
शम्भू महाराज ने अपनी डबडबाई आँखों को पोंछा और अपनी भावनाओं के आवेग
को दबाते हुए पुनः पत्र पढ़ने का प्रयास करने लगे।
क्षत्रिय कुलावतंस महाराज शिवाजी प्रति युवराज शम्भूमहाराज दंडवत
प्रणाम।
जैसे सूखे काष्ठ में कीड़ा घुसकर उसे चालता है उसी प्रकार आपकी चिन्ता
ने हमारे दिमाग को खोखला कर दिया है।
"शृंगारपुर के केशव पंडित से जिस समय आप रामायण पढ़ रहे थे, उसका
अर्थ समझ रहे थे, उस समय आपने क्या सीखा? दशरथ जैसे अपने पिता के आदेश
का पालन करने के लिए, भरे पूरे राज्य को लात मारकर प्रभु रामचन्द्र निकल गये,
वनवासी बन गये। और आपने हमारे करोड़ों मुद्राओं के स्वराज्य को ठुकराया है।
हमसे रुष्ट होकर शत्रु के खेमे में जाने की भूल की है। लाभ हानि का कोई विचार
किये बिना आप रुष्ट होकर शत्रु के प्रदेश में चले गये। आपका यह दुर्भाग्यपूर्ण
वियोग हमें निरन्तर जला रहा है। आज कल भूपालगढ़ में होने वाले अत्याचारों की
कहानी सुन रहा हूँ। इस घटना से हमारी आँखों में आँसुओं की जगह खून उतर
आया है। यहाँ के प्रतिष्ठित ओहदेदार जब विदेशी शासकों की सेवा का गोबर
उठाने में स्वयं को धन्य समझ रहे थे, तब जंगल खाई के किसी तानाजी, किसी
मुरारबाजी जैसे अनेक परिश्रमी हाथों का साथ लेकर मैंने स्वराज्य का यह मन्दिर
खड़ा किया। उन्हीं हाथों को दुश्मनों द्वारा संभाजी राजा की आँखों के सामने काट
दिया जाय तो इस दुर्भाग्य की क्या कहें? ठीक है आपके मन का दुःख भी हम
जानते हैं। आपके प्रति ईर्ष्या रखने वाली आँखें हमारे राज्य में कम नहीं हैं। किन्तु
यदि आपको लगता है कि हम केवल उन्हीं के हाथ का पानी पीते हैं, तो यह झूठ
है। आपसे ईर्ष्या करने वाले लोगों की अपेक्षा ईमानदारी से आपके लिए जान
निछावर करने वाले लोगों की संख्या हमारे राज्य और हमारी फौज में ज्यादा है। एक
सिंहासनासीन राजा और एक उदार पिता होकर मैं इस तथ्य को कैसे झुठला सकता
हूँ। जो हो गया सो हो गया। रूठना भूलकर उस नर्क से जल्दी बाहर निकलो। जैसे
कृष्ण के चले जाने के बाद गोकुल के बाल-बच्चे, स्त्री पुरुष, पशु-पक्षी, वन
बाग, गाय बैल दुःख से पागल हो गये थे, वही दशा यहाँ पर आपसे प्रेम करने
वालों की हुई है। इस राजा शिवाजी के साथ महाराष्ट्र के साधु संन्यासी, देवी
देवता आपका पन्थ निहार रहे हैं। आओ युवराज! शीघ्रातिशीघ्र स्वराज्य में वापस आ
जाओ। भबिष्य का दुःख गोवर्धन आपको उठाना है।"
"मगर के मुँह से सुरक्षित वापस निकलना आपके लिए बहुत कठिन होगा,
इसे हम जानते हैं। किन्तु चिन्ता न करें। हम सावधान हैं। बीजापुर वालों के साथ
आपके सम्बन्ध अच्छे हो गये हैं। आवश्यकता पड़ने पर वे भी आपकी सहायता के
सम्भाजी :: 139
लिए दौड़े आएँगे। शम्भू बेटे चिन्ता मत करो। दूर मत रहो। पत्र समाप्त करता हूँ।"
शिवाजी महाराज ने इन भाव भरे शब्दों से शम्भूमहाराज के हृदय को जीत
लिया। जिस प्रकार कोई छोटा बच्चा आरम्भिक अवस्था में अपनी लिखी इबारत
माता-पिता को उत्साह के साथ दिखाता है, उसी प्रकार संभाजी शिवाजी महाराज के
पत्र को दुर्गाबाई और गणूबाई को दिखा रहे थे। पिता के इस पत्र से मन को कितनी
शान्ति मिली थी। अब उन पर एक ही धुन सवार थी कि दिलेरखाँ के व्यूह से किस
प्रकार बाहर निकलें?
स्वराज्य का हर समाचार किसी न किसी के माध्यम से शम्भुराजा के कानों
तक पहुँच जाता था। बीजापुर का आदिलशाही शासन विनाश की देहरी पर पहुँच
चुका था। बीजापुर के प्रधान दीवान मसूदखान ने शिवाजी महाराज को पत्र लिखा
था— "मुगलों की फौज से हमारे बीजापुर राज्य को बचाइए।" शिवाजी महाराज
भी इस अवसर का लाभ उठा रहे थे। इसी निमित्त से दक्षिण में मुगलों के विरुद्ध
एक बड़ी साजिश रची जा रही थी। मुगलों के आक्रमण के साथ ही बीजापुर की
प्रजा घोर अकाल का संकट झेल रही थी। भोजन और चारे की कमी के कारण
आदमी और पशु क्षीण होते जा रहे थे। इसीलिए बीजापुर की प्रजा की सहायता के
लिए शिवाजी महाराज ने तत्परता दिखाई। दो हजार बैलों की पीठ पर अनाज की
गोनियाँ लादकर उन्होंने प्रजा की ठोस सहायता के लिए बीजापुर भेजा। संभाजी
राजा बार-बार अनुभव कर रहे थे कि इस भाग-दौड़ के समय में उन्हें स्वराज्य में
होना चाहिए था। किन्तु उन्हें यह चिन्ता सता रही थी कि घड़ियाल के जबड़े से
अपने परिवार के काफिले के साथ कैसे निकलें? उसी बीच एक दिन सेनापति
हंबीरराव मोहिते का सन्देश आया। उन्होंने कहा था, "युवराज! हमने बहुत बहादुर
सैनिकों को आपके पास भेजा है। वे अथणी के आसपास जंगलों में घूम रहे हैं।
उनकी सहायता लीजिए और शीघ्रातिशीघ्र स्वराज्य में वापस आ जाइए।"
यह सूचना शम्भूमहाराज को बहुत अच्छी लगी। शम्भूमहाराज और
दिलेरखान दोनों ही नियति के जटिल फन्दे में फँस गये थे। ऐसा हो रहा था जैसे दो
हाथी आपस में लड़े और उनकी सूँड़ एक-दूसरे से उलझ गयी हों और उनकी
खम्भे जैसी टाँगें नीचे के कीचड़ में धँस गयी हों।
"सभा को तुरन्त गिरफ्तार करो और उसे बाँधकर औरंगाबाद ले जाओ।"
मुगलों के वरिष्ठ अधिकारियों का यही कहना था। किन्तु दिलेरखान सोचता था कि
यदि ऐसा पारस अपने हाथ से निकल गया तो आगे अपनी कीमत एक तिनके के
बराबर भी नहीं रहेगी। इस विचार से दिलेरखान हड़बड़ा गया था।"
उसी बीच एक रात को जोत्याजी और कवि कलश जैसे आत्मीय मित्रों का
एक गुप्त पत्र मिला। उसमें लिखा था— "शम्भू महाराज! सावधान रहें दिल्ली के
140 :: सम्भाजी
बादशाह से आपकी जान को खतरा है। इस प्रकार की सूचना मुगलों के मिरज और
रहिमतपुर की चौकियों पर पहुँच गयी है। आप किसी भी समय कैद हो सकते हैं।
जाल को तोड़ दीजिए और पक्षियों की तरह उड़ान भरिए।"
शम्भूमहाराज निकल भागने के लिए मौका ढूँढ़ रहे थे। किन्तु दिलेरखान
गत दिन उनके आसपास ही घूमता रहता था। एक दिन दोपहर को उसने युवराज से
स्पष्ट शब्दों में कहा, "शम्भू महाराज ! हमें आपके झंडे के नीचे पन्हाला जीतना
है।"
खान की धूर्तता को शम्भूमहाराज समझ रहे थे। उन्होंने खिन्नता से कहा,
"इसका मतलब ! तुमको मुझे आगे करके भूपालगढ़ की तरह पुनः लड़ाई करवानी
है। हमारे प्रदेश में ले जाकर मुझे बदनाम करना है।"
शम्भू महाराज को अपनी बगल में दबोचे दिलेरखान पन्हाला की ओर जाने
की ज़िद कर रहा था। उसी समय गुप्त जासूसों ने युवराज को सूचित किया- "दो
साल पहले इसी दिलेरखान ने वाडकर पिता-पुत्र को मित्र बनाया था। पंचमी के
त्योहार के दिन रायगढ़ में दंगा फसाद करके शिवाजी महाराज की जान लेने की
योजना बनायी थी। उस पर विश्वास करना एक गुनाह ही है। खान ने अभी तक
शराफत का नकाब पहना हुआ था। किन्तु इन दिनों उसके भीतर छुपा हुआ शैतान
उसे चुप नहीं बैठने दे रहा था। उसने फौज के रास्ते में पड़ने वाले टिकोटा और
अथणी गाँवों पर गधे का हल चलवा दिया था। वास्तव में इन दोनों गाँवों में
हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमान ही अधिक बसे थे। उनका केवल यह गुनाह था कि
वे बीजापुर की सीमा में रहने वाले थे।
"दिलेरखान ने भयानक अत्याचार किये। उसने दुकानें लूटीं और व्यापारियों
को नंगा किया। सारे खेत जला दिये। किन्तु इतने से भी उसकी भूख नहीं मिटी।
दिलेर दुष्ट सैनिकों ने हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्म की लड़कियों में कोई भेद
नहीं किया। दिन दहाड़े उनकी इज्जत लूटी। बहुत सी महिलाओं को बेइज्जत
करके मार डाला। उनके शव पेड़ों पर लटकाए। अनेक माँ बहनों ने भरे हुए कुओं
का आश्रय लिया और अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी।"
दिलेरखान के इस क्रूर अत्याचार से बहुत से मुसलमान भी सहम गये थे।
किन्तु खान के विरोध में खड़े होने की उनमें हिम्मत न थी। उन सभी लोगों ने एक
साथ मिलकर शम्भूमहाराज से शिकायत की। पहले से ही नाराज शम्भूमहाराज
क्रोधावेश में पैर पटकते हुए दिलेरखान की छावनी में गये। उन्होंने डाँटते हुए उससे
पूछा- "आप इनसान हैं या हैवान ? गरीब प्रजा पर इस तरह का अत्याचार आप कर
कैसे पाते हैं?"
"शम्भूशहजादे ! हो गया न यकीन ? हम सिर्फ हिन्दुओं का ही गला नहीं
सम्भाजी 141
काटते, मुसलमानों का भी उसी तरह खात्मा करते हैं।"
"आप हो कौन? दिल्ली के बादशाह के सूबेदार या लुटेरे पिंडारियों के
मुखिया ? यह अत्याचार तुरन्त बन्द करो ! नहीं तो - ?"
"नहीं तो क्या कर लोगे ?" दिलेरखान ने मुस्कराते हुए पूछा।
शम्भूराजा के पूरे शरीर को मानो बिच्छू डंक मार गया हो। वे आँखें फाड़े
अपने बिस्तर पर बैठे थे। उनकी वह विकल अवस्था देखकर दुर्गाबाई और राणूबाई
के होश उड़ गये। कोल्हू में जिस प्रकार गन्ने को निचोड़ा जाता है उसी प्रकार
शम्भूमहाराज का मन आक्रान्त हो रहा था। उन्होंने कहा, "दुर्गा, हम अपने ही हाथों
से अपना क्या कर बैठे ? यह दिलेरखान अब चुप नहीं बैठेगा। वह इसी तरह हमें
पन्हाला तक खींचकर ले जाएगा। वहाँ भी वह भूपालगढ़ जैसा ही नाच करेगा और
हमें जन्म जन्मान्तर के लिए बदनाम कर देगा।"
दो ही दिनों में शम्भूमहाराज को बहादुरगढ़ से एक गुप्त पत्र मिला। यह
जानकर कि यह पत्र मियाँखान का ही लिखा है, शम्भूमहाराज आनन्दित हो उठे।
मियाँखान ने राजाजी को लिखा था-
"मेरे प्यारे दोस्त शम्भूमहाराज !
सिर्फ आपके एहसान से मेरी दोनों लाड़ली बेटियों के हाथ में सगाई की
मेहँदी लगी। आजकल जब भी मैं छोटी उम्र में ही मर गये अपने बेटों की सूरत याद
करता हूँ तब महाराज आपकी ही तस्वीर मेरी आँखों के सामने आती है। यह खत
इतनी जल्दी भेजने की दो वजहें हैं। एक यह खुशखबरी है कि दिल्ली के शाही
फरमान ने मुझे बेगुनाह घोषित कर दिया है। जल्दी ही मेरी रिहाई हो जाएगी।
लेकिन उन्हीं कर्मचारियों से यह भी मालूम पड़ा कि आने वाले दो-चार दिनों में
आप गिरफ्तार हो जाएँगे। यह बहुत बुरी खबर है। इसी काम के लिए बादशाह के
खास शैतान औरंगजेब से पाँच हजार की फौज लेकर कब के निकले चुके हैं।
आपको हमेशा के लिए कैद करके हाथ-पैर के नाखून निकालकर चिड़ियाघर के
मजबूर शेर की तरह जिन्दगी भर नचाने और शिवाजी जैसे आपके महान पिता का
जीना हराम कर देने का औरंगजेब का पक्का इरादा है। याद रखो दिलेरखान सिर्फ
औरंगजेब का गुलाम है। वह कभी भी किसी का दोस्त नहीं बन सकता। एक पल
की भी देर नहीं कीजिए। शम्भूमहाराज ! भाग जाइए, भाग जाइए।"
मियाँखान का पत्र पढ़कर शम्भूमहाराज के सिर के बाल खड़े हो गये उनकी
रातें शत्रु बनकर शैतान की तरह परेशान करने लगीं। एक ओर बड़े महाराज की दुखी
मनःस्थिति उन्हें परेशान कर रही थी तो दूसरी ओर भूपालगढ़ पर टूट कर गिरे सात
सौ हाथ और लँगड़े हो गये पाँव भूत बनकर उनकी आँखों के सामने मशाल की
तरह नाचते रहते थे। शिवाजी महाराज के अधिकार से बाहर निकला बहादुरगढ़ का
वह हाथी युवराज के सारे शरीर को मसल रहा था। उनके उद्गार निकले—"नहीं
142 :: सम्भाजी
नहीं चाहिए यह अपमानित जिन्दगी! दुश्मन की सलाखों के पीछे तड़पते रहना और
सूर्य जैसे पिता को जीवनभर दुखी करना, यह भी कोई जिन्दगी है?''
अपनी आँखों की ज्योति जलाये हुए शम्भूराजा रातभर मन्दिर के सामने बैठे
रहे। वहीं पर दुर्गाबाई भी आ गयीं। उन्होंने आँसुओं से भीगा अपना चेहरा शम्भूराज
के पैरों पर रख दिया। उनका धीरे-धीरे सिसकना फूटकर क्रन्दन बन गया।
"युवराज, हमारी चिन्ता से ही आपके जैसे वीर के पैर यहाँ अटके हैं। हमारे
कारण ही आपके पंखों में उड़ान की शक्ति नहीं आ रही है। आपका कलेजा फटता
है। लेकिन महाराज हम यहाँ की यातनाभरी जिन्दगी में मर भी गये तो कोई अन्तर
पड़ने वाला नहीं है। किन्तु आपकी रक्षा से शिवाजी महाराज का स्वराज्य
टिकने वाला है।"
शम्भूमहाराज ने आँसू पोंछ लिया। वे कुछ निश्चय करके उठे। दुर्गाबाई के
गर्भ में छः सात महीने का बच्चा था। पाँव भारी होने के कारण उनका पूरा शरीर
सूजा था। उनका पीला रंग, भारी हो गया शरीर और काजल अँजी आँखें देखकर
संभाजी राजा का मन भर आया। अपने भारी शरीर को लेकर दुर्गाबाई आगे बढ़ीं। वे
गिर न पड़ें, इसलिए उन्हें सँभालने के लिए शम्भूमहाराज अपने आँसू पोंछते हुए
आगे बढ़ आए। उन्होंने दुर्गाबाई के तप्त शरीर को बाँहों में भर लिया। दुर्गाबाई ने
कहा, "महाराज हमारी ममता में आप इतना क्यों उलझ रहे हैं?"
"दुर्गा कैसी बुरो तकदीर है हमारी? हम शृंगारपुर से बाहर निकले तो
येसूबाई के पेट में भी बच्चा था। आज ऐसी ही हालत में तुम्हें शैतानों के हाथ मे
छोड़कर हम स्वराज्य में वापस चले जाएँ? क्या तुम यही सलाह मुझे दे रही हो?
अपनी ही लताओं पर खिलने वाली कलियों को अपनी आँखों से देखने का सौभाग्य
इस अभागे शम्भू को कभी मिलेगा कि नहीं?"
भोर होते ही शम्भूमहाराज ने राणूबाई को जगाया। वे पहले से ही जग रही
थीं। उन सभी का भाग्य अँधेरे की खाई में था। अपनी बड़ी बहन को समझाते हुए
शम्भूमहाराज बोले, "कल परसों जब भी अवसर मिलेगा मैं घोड़े को बाहर
निकालूँगा। साथ शृंगारपुर के अश्वदल के दो सौ बहादुर सवार होंगे। पलक झपकते
ही हम दोनों को यहाँ से बाहर निकलना है।"
"हम दोनों को? मतलब ?" राणूबाई चौंक गयी।
"दुर्गा यहाँ खान की छावनी में ही रहेगी।"
"शम्भूराजा! ऐसी पाँव भारी अवस्था में उनकी देखभाल कौन करेगा?"
णू ने प्रश्न किया।
"पागल हो गयी हैं दीदी आप? चार दिन की मेहमानी के लिए जीजाजी ने
पको मायके भेजा था। आपको यहाँ छोड़कर हम किस मुँह से वापस स्वराज्य में
सम्भाजी : 143
जाएँ? शादीशुदा बहन को ससुराल वाले मायके क्यों भेजते हैं? इसीलिए न कि वह
नयी साड़ी पहनकर वापस जाए? जनानखाने में छोड़ देने के लिए नहीं।"
राणूबाई शम्भूराजा के समीप आयी। उनका हाथ अपने माथे पर रखते हुए
बोली, "शम्भूभाई! शान्त हो जाओ! मेरी चिन्ता न करो। मुझे साथ लेकर जाने की
जल्दबाजी में तुम खुद मुगलों की कैद में जिन्दगी भर के लिए अटक जाओगे। वाई
के जाधव को मेरी जैसी बहुएँ बहुत मिल जाएँगी, किन्तु शिवाजी महाराज के
स्वराज्य को आगे सँभालने वाला दूसरा संभाजी नहीं मिलेगा। क्षमा करो। समय मत
गँवाओ। अपनी बड़ी बहन के पल्लू में सिर्फ इतनी दया की भीख दो और आप
अपने स्वराज्य में वापस चले जाओ।"
बड़ी देर तक शम्भूराजा बहुत देर तक शून्य मनःस्थिति में बैठे रहे। उन्हें सूझ
ही नहीं रहा था कि क्या करे? और क्या न करें? राणूबाई पुनः शम्भूराजा के पास
आयीं और उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "शम्भूराजा, पिताजी का हृदय
आपके लिए कितना पीड़ित होता है? इसका शायद आपको पता नहीं है। उन्होंने
कई बार मुझसे कहा है, "हमारे शम्भू का हृदय यदि केवल राजा का होता तो हमें
कोई चिन्ता न होती। किन्तु उनके हृदय का एक हिस्सा राजा का है तो दूसरा हिस्सा
कवि का। ऐसे व्यक्तियों के साथ बड़ा धोखा होता है। यदि इन्हें क्रोध आ गया तो
हाथियों के झुंड की तरह गरजते हुए हमला कर देंगे। किन्तु एक बार यदि उनके मन
के भाव तरल होकर प्रवाहित हुए तो झरने की तरह प्रवाहित ही रहेंगे। राजा के लिए
इस तरह प्रवाहित होना ठीक नहीं है। राजा के लिए ईर्ष्या, प्रतिशोध जैसे विष के
कुम्भ को उचित समय की प्रतीक्षा में सँभालकर रखना आवश्यक होता है। हमारे
शम्भू के पेट में ऐसा कुछ भी पचता नहीं। इसीलिए हमें उनकी चिन्ता हमेशा लगी
रहती है।"
शम्भूमहाराज बहुत देर तक वैसे ही बैठे रहे। तब उनका हाथ खींचकर उन्हें
उठाने का प्रयास करते हुए राणूबाई ने कहा-
"उठो, शम्भूराजा! पिछले कुछ दिनों से भाग्य हमारे साथ जुआ खेल रहा
है। जबसे हम कृष्णा नदी पार करके यवनों के प्रदेश में आये हैं तब से पिताजी की
स्थिति क्या हो रही होगी? एक भी दिन उन्हें चैन की नींद नहीं आयी होगी। इस
बात का मुझे पूरा विश्वास है।"
"परन्तु दीदीजी ! सबके रोकने के बावजूद आप मेरे साथ यहाँ क्यों
आयीं ?"
"क्यों आयी? मुझे भी नहीं पता। ऐसे ही हमारा मन हमें कोस रहा था।
बेवजह आपकी चिन्ता सता रही थी। इसीलिए यहाँ चली आयी। किन्तु शम्भू अब
समय व्यर्थ में न गँवाओ। चलो तैयार हो जाओ। शम्भूभाई क्या आप जानते हैं कि
144 .. सम्भाजी
अपने यहाँ बहुत से किलों को बनाते समय क्या किया जाता था?''
"क्या ?"
"पुराने जमाने में कभी कभी किले बनाते समय उनकी दीवारें गिर जाती थीं,
बुर्ज गिर जाते थे! उस निर्माण को पक्का करने के लिए नींव में नरबलि दी जाती
थी। स्त्रियों और बच्चों के रक्त में चूना घोला जाता था। तो मेरे भैया आप अपनी
इस बहन और लाड़ली की चिन्ता न करें। भविष्य में यदि भाग्य ने साथ दिया तो
हम सब अवश्य मिलेंगे। किन्तु वैसा नहीं हो पाया तो भी चिन्ता की कोई बात
नहीं। हम मर गये तो भी कोई बात नहीं लेकिन शिवाजी महाराज और संभाजी
महाराज के स्वराज्य का बुर्ज हर तूफ़ान से टकराते हुए ऐसे ही खड़ा रहना
चाहिए।"
छह
दिलेरखान की नींद अब सच में उड़ गयी थी। इतनी बड़ी फौज के सामने मराठों के
युवराज के ऊपर तलवार उठाने के साहस से दिलेरखान घबरा गया था।
उसी सुबह मुनासिबखान दिलेरखान से मिलने के लिए आया। उसके साथ
उसका भतीजा बालेखान भी था। कुछ महीने बीजापुर की नौकरी छोड़कर अपने
भतीजे के साथ दिलेरखान से आ मिला था। मुनासिब के पास अपनी पाँच हजार की
फौज थी। दिलेर खान ने चिन्तित स्वर में पूछा- "मुनासिब चाचा आगे क्या
हुआ?''
"खानसाहब आपके हुक्म की तामील हो गयी। संभा के प्रदेश से आये हुए
दो सौ मराठे घुड़सवारों को हमने अलग कर दिया।"
"बहुत अच्छा।"
"उनके घोड़ों को हमने अपने क़ब्ज़े में ले लिया और उन दो सौ नामर्दों को
अपने बेगारियों में सम्मिलित कर लिया।"
मुनासिबखान से यह समाचार सुनकर दिलेरखान बहुत प्रसन्न हो गया। उसने
बगल में रखी सुराही का शरबत गटाक से पी लिया। अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ
फेरते हुए बोला, "संभा के खून में खूब जलवा है। कल उसका साहस देखकर मैं
सम्भाजी :: 145
हैरान हो गया था।"
"लेकिन खान साहब इस आग को कब तक सँभालना है?"
"मुनासिब चाचा कल सुबह तक औरंगाबाद की पाँच हजार की फौज यहाँ
पहुँच जाएगी। साथ में अपने पाँच हजार सैनिक दे देंगे फिर इस आग के अंगार को
भेज देंगे औरंगजेब के पास। एक बार आलमगीर साहब के क़ब्ज़े में कोई चीज तो
भभकती आग भी पानी पानी हो जाती है। औरंगजेब की इस शक्ति को सारी
दुनिया जानती है।"
दूसरे दिन दोपहर में फौज आगे बढ़ रही थी। दिलेरखान ने जानबूझकर
संभाजी को अपनी बगल में चल रहे हाथी के हौदे में बिठाया था। वह चाहता था
कि कल के झगड़े का क्रोध उनके मन से निकल जाय। कम-से कम उन्हें कैद
करने के लिए बादशाह की फौज से निकला घोड़ों का दल जब तक यहाँ नहीं
पहुँचता, उन्हें रोक रखना था। दिलेरखान उनके साथ मीठी मीठी बातें कर रहा था।
उन्हें खुश रखने का प्रयास कर रहा था।
फौज ने सामने की एक पहाड़ी पार की। हाथी घोड़े पहाड़ी उतरने लगे।
शम्भूमहाराज की दृष्टि बगल की घाटी में पड़ी। वहाँ एक पानी से भरा तालाब था।
उसकी बगल में एक झरना भी दिखाई पड़ा। तालाब के किनारे एक छोटा सा
पत्थरो का बना पुराना शिवमन्दिर था। युवराज ने हाथी को रोकने के लिए कहा।
उन्होंने हँसते हुए दिलेरखान से कहा, "खानसाहब बहुत दिन हो गये मैंने भगवान
का दर्शन नहीं किया। यहाँ कुछ समय ठहरिये। मेरी इच्छा हो रही है कि स्नान
करके भगवान के दर्शन कर लूँ।"
दिलेरखान ने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहा, "युवराज इस तरह विनती
क्यों करते हैं? हमें भी दोपहर में आराम के लिए रुकना ही था, कीजिए आप
अपनी पूजा।"
दिलेरखान बहुत प्रसन्न था। उसका पक्का विश्वास था कि उसके कब्जे में
रहते हुए संभाजी का यह आखिरी स्नान है। फौज वहीं रास्ते के आसपास, आगे-
पीछे जहाँ भी जगह मिली आराम के लिए पसरने लगी। संभाजी राजा अपने खास
सेवकों के साथ तालाब की ओर गये। पहले महादेव को प्रणाम करके फिर बगल के
तालाब में उतरे।
आज शम्भूमहाराज का मन बहुत प्रसन्न था। उन्होंने अपने सेवकों को भी
कपड़े उतारकर पानी में प्रवेश करने के लिए विवश किया। स्वयं युवराज हाथ
आगे-पीछे मारते हुए, पानी उड़ाते हुए, प्यार से जल-क्रीड़ा का आनन्द ले रहे थे।
उनके पहरे वाली मुनासिबखान की फौज झरने के किनारे दोपहर का भोजन ले रही
थी। किन्तु सावधानी के लिए मुनासिब ने कुछ बहादुर सैनिकों को तालाब के किनारे
146 संभाजी
पहरे पर खड़ा किया था। उसी तालाब के किनारे पाँच साधु स्नान कर रहे थे। उनका
मन्त्रपाठ चल रहा था। बीच बीच में वे 'जय शंभोऽऽ' कहकर पुकार रहे थे। पहले
तो शम्भूमहाराज का ध्यान उनकी ओर नहीं गया। फिर कानों तक एक आवाज
पहुँची—'शंभोऽऽ शिवा का शंभोऽऽ।'
शम्भूमहाराज का ध्यान उनकी ओर गया। उन्होंने ध्यान से देखा तो उनके
शरीर में बिजली दौड़ गयी। उन पाँच साधुओं में एक थे जोत्याजी और दूसरे
रायप्पा।
राजा की आँखें चारों ओर घूमीं। पहरेदारों को शक न हो इस दृष्टि से वे
धीरे धीरे तैरते हुए आगे को सरकने लगे। साधुओं के पास पहुँचते ही मन्त्रपाठ के
बहाने से जोत्याजी ने धीमे स्वर में कहा, "मन्दिर के पीछे हमारे सिर्फ चार घोड़े हैं।
पहाड़ी के पीछे जंगल में सिर्फ साठ शृंगारपुरी घुड़सवार हैं। इन्हीं के भरोसे आपको
साहस करना है।"
शम्भुराजा ने पानी में सूर्य को नमस्कार किया। वे पानी में बार बार डुबकियाँ
लेने लगे। पहरे पर खड़े सिपाही उनकी ओर तारीफ की दृष्टि से देखने लगे। बहुत
देर तक शम्भूमहाराज पानी से बाहर नहीं आये तब पहरेदार और सिपाही हैरान होने
लगे। समीप के मन्दिर के पीछे से कुछ शोरगुल सुनाई पड़ा—'संभा निकल गयाऽऽ.
संभा भाग गयाऽऽ, संभा गयाऽऽ।'
दिलेरखान की छावनी में हलचल मच गयी। दिलेरखान क्रोध से नाचने
लगा। किन्तु उसी समय हुक्म की प्रतीक्षा किये बिना ही बालेखान अपनी पाँच
हजार की सेना लेकर जंगल में घुस गया। दिलेरखान क्रोध से आग बरसाने लगा।
इसी समय बूढ़ा मुनासिबखान घोड़ा दौड़ाते हुए दिलेरखान के सामने आ गया।
उसके चेहरे पर चिन्ता की कोई रेखा नहीं थी। दिलेरखान मुनासिबखान से उखड़कर
बोला—"ये क्या हँसी की बात है?"
"नहीं तो क्या हुजूर?" मुनासिब ने कहा, "संभा जैसा बेवकूफ लौंडा
किसी ने देखा तक न होगा। हुजूर मैंने पूरी जानकारी ले ली है। गिने चुने पाँच साधु
उसके साथ हैं। हमारा बालेखान पाँच हजार की फौज लेकर जंगल में घुसा है।
भाग भागकर भी वह बेवकूफ संभा कितना भागेगा? पूरा जंगल छान मारता हूँ।
एक-दो घंटे में ही उसकी बोटी-बोटी करके रूमाल में बाँधकर ले आता हूँ।"
मुनासिबखान का घोड़ा आगे बढ़ा ही था कि दिलेरखान चिल्लाया, "ठहरो
मुनासिब मियाँ।"
"क्यों? खान साहब?"
"संभा को जिन्दा पकड़कर ले आइए। उसे मारना मत। नहीं तो शाहंशाह को
यकीन नहीं होगा कि लाश संभा की ही है। आफत आ जाएगी।"
सम्भाजी :: 147
मुनासिबखान अपने साथ के सैनिकों को लेकर जंगल में घुसा। किन्तु
शम्भूराजा और उनके साथी तेज गति से आगे निकल चुके थे। उनका पीछा करते
हुए बालेखान की फौज बहुत आगे जा चुकी थी। यह जानकर मुनासिब हैरान हो
गया। अपने घोड़े को बार-बार ललकारते हुए, उस जानवर को अपनी जाँघों से
दबाते हुए वह पवन की गति से आगे निकल रहा था।
शाम होने को आ गयी। परछाइयाँ जंगलों में उतरने लगीं। नाचता हुआ मोर
जिस प्रकार अपने पंख समेटता है उसी प्रकार सूर्य की एक-एक किरण विलुप्त हो
रही थी। सूर्य डूब चला। एक पहाड़ी पर से मुनासिबखान ने घाटी में देखा। वहाँ
एक बड़ा झरना बह रहा था। झरने के किनारे शम्भूमहाराज को एक पेड़ के तने से
बाँधा गया था। जंगल में आकर उनसे मिले साठ शृंगारपुरी सैनिकों में से आधे मरकर
एक ओर गिरे थे। पीछा करते समय बड़ी लड़ाई हो चुकी थी, यह साफ साफ
दिखाई पड़ रहा था।
शम्भूराजा का सारा शरीर खून से लथपथ था। चेहरा भी खून लगे खरोंचों से
भर गया था। उनकी खरोंचों और उनके शरीर के घावों से स्पष्ट दिख रहा था कि
इस बहादुर ने कम-से-कम साठ-सत्तर लोगों को घायल किया होगा। उनका और
बालेखान का जोरदार झगड़ा चल रहा था। उनके झगड़े को मुनासिबखान ऊपर से
देख रहा था। बालेखान हाथ में तलवार नचाते हुए संभाजी राजा के सामने नाच रहा
था। दोनों क्रोधित होकर एक-दूसरे को गालियाँ दे रहे थे।
यह दृश्य देखकर मुनासिब का कलेजा हिल गया। वह अपने भतीजे की ओर
देखकर चिल्लाया—"बेटे बालेखानऽ ठहरोऽऽ। आगे मत बढ़ोऽऽ। खुदा के वास्ते
बेटेऽऽ।" ऐसा कहते हुए उसने घोड़े पर से नीचे छलाँग मारी। घोड़े पर जो हथियार
लदे थे उसमें से पल्लेदार भाला हाथ में लिया। भाले के डंडे का सहारा लेते हुए
सीधे रास्ते से उतरते सरकते नीचे जाने लगा। अभी भी बालेखान और शम्भूराजा के
झगड़े की ऊँची आवाज उसके कानों तक पहुँच रही थी। सरकते सरकते नीचे जाने
वाला मुनासिबखान बीच-बीच में बोल रहा था, "बेटे बालेखान कुछ मत करना। मैं
आ रहा हूँ, बेटे।"
मुनासिब ढलान उतरकर कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा। कि क्रुद्ध
बालेखान आगे बढ़कर बँधे हुए शम्भूराजा को मुट्ठियों से मार रहा है। उन्हें गालियाँ
दे रहा है। क्रोध-उन्मत्त होकर उसने शम्भूमहाराज की दाढ़ी पकड़कर खींची।
शम्भूराजा बहुत चिढ़ गये। उन्होंने बालेखान के मुँह पर जोर से थूक दिया। इस पर
बालेखान अपने क्रोध पर नियन्त्रण खो बैठा। उसने म्यान से अपनी तलवार खींच
ली। तलवार की नोक से शम्भूराजा के सिर पर वार करने ही वाला था कि पीछे से
एक गर्जना आयी—"बालेखानऽऽ बेटेऽऽ।" उसके ठीक बाद तीर की गति से
148 :. सम्भाजी
भाला आया और उमकी नोक तेजी से बालेखान की पीठ में घुस गयी। देखते-
देखते बालेखान अपने ही खून के गड्ढे में गिर गया।
स्वयं शम्भूमहाराज, उन्हें घेरकर खड़े हजारों मुमलमान सैनिक और भाला
फेंकने वाले मुनासिबखान सभी आश्चर्यचकित रह गये। दूसरे ही क्षण मुनासिब
बालेखान की ओर झपटा। खून से लथपथ बालेखान का शरीर उसने बाँहों में भर
लिया। उसे पानी पिलाने का भी व्यर्थ प्रयास किया। बालेखान तो कब का समाप्त
हो चुका था। मुनासिब उसके लिए दहाड़ें मारकर रो रहा था।
मुनासिबखान के अनेक फौजी साथी आगे आये। उन्हें अपने मालिक पर
बहुत क्रोध आया। उनमें से एक ने बहुत सन्तप्त होकर पूछा—“चाचा, एक
जहन्नमी काफिर को बचाने के लिए आपने यह क्या किया? अपने भतीजे को ही
मार डाला?"
बालेखान के शव को देखकर एकबार पुनः मुनासिब को रोना आया। आँसू
बहाते हुए वह बोला, “जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। दोस्तोऽऽ यह तुम्हारा
मुखिया था और मेरा इस दुनिया में एकलौता वारिस।”
"वही कह रहा हूँ खानसाहब ! एक मूर्ख काफिर के लिए अपने ही बच्चे की
हत्या करने की आपको क्या ज़रूरत थी?”
"क्यों बेटे, सिर्फ एक मुर्दा देखकर तुमको इतना बुरा लग गया?"
"मतलब?"
अपने सहयोगियों पर एक तीखी नजर फेंकते हुए मुनासिबखान गरजा,
“अथणी और तिकोता में उस बदमाश दिलेरखान ने भरे चौक में किसकी इज्जत
लूटी थी? अनेक औरतों, माँ, बहनों को नंगी करके पेड़ों पर किसने लटकाया था?
भूल गये आप लोग? उन बेसहारा औरतों में हिन्दू कम मुसलमान ज्यादा थीं। किन्तु
उस दारुण दृश्य को देखकर तुम में से किसी की भी तलवार म्यान से बाहर क्यों
नहीं निकली?"
"याने?"
"उस अत्याचार को देखकर जिसके शरीर का खून खौल उठा था, उस
अत्याचारी दिलेरखान पर आक्रमण करने जो व्यक्ति गया था, वह एक ही व्यक्ति था
शिवाजी का बेटा। आप में से कोई नहीं था। तब कहाँ थीं अपनी तलवारें? कहाँ चुप
बैठी थी यह मर्दानगी?"
सभी चुप हो गये। मुनासिब की बात से सभी चकरा गये। उनमें से एक ने
अधीर होकर पूछा- "चाचा, आप कहना क्या चाहते हैं?"
"बस इतना ही! हम सबकी बड़ी इच्छा थी। इसलिए छः महीने पहले हम
सम्भाजी १२१
सब अपनी बीजापुर की चाकरी छोड़कर दिलेरखान से मिल गये। वह हमारी
ज़िन्दगी का सबसे बड़ा गुनाह था। आज औरंगजेब का एक सरदार दक्खिन में
आकर हमारी मुस्लिम माँ-बहनों पर इतना अत्याचार कर रहा है तो कल औरंगजेब
के आने के बाद क्या होगा?''
“चाचा, आप ठीक कहते हैं।'' सामने से कुछ आवाजें आयीं।
“मैं ख़ुदा की कसम खाकर कहता हूँ आज शियापन्थी दक्खिन मुसलमानों
के लिए सबसे बड़ा काफ़िर बादशाह औरंगजेब है। बच्चो! दिल्ली का यह शैतान
मराठों का राज्य नेस्तनाबूद करने में कामयाब हो गया तो अपनी बीजापुर और
गोलकुंडा की सल्तनतों को एक दिन के लिए भी ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। हम कैसे भूल
सकते हैं? पिछले साल बीजापुर की सहायता के लिए शिवाजी महाराज ने दस
हजार बैलों की पीठ पर लादकर अनाज भेजा था। औरंगज़ेब ने नहीं। इसलिए
कहता हूँ कि औरंगजेब के अत्याचारों से दक्खिनियों को मुक्ति दिलाने के लिए
शिवाजी का राज्य बना रहना चाहिए।''
मुनासिबखान ने अपनी कमर की कटार बाहर निकाली। बात ही-बात में
उसने शम्भुराजा के सारे बन्धन काट दिये। सामने से उसने अपने कुछ साथियों को
पास बुलाया। शम्भुमहाराज को ले जाने के लिए आये हुए लोगों को पच्चीस-तीस
नये घोड़े दिये। शम्भुराजा की पीठ पर प्यार से हाथ थपथपाते हुए मुनासिब ने अपने
साथियों से कहा, “शिवाजी पर एहसान करने के लिए नहीं, दक्खिन की हिफ़ाज़त
के लिए शिवाजी का बेटा सलामत रहना चाहिए। जाऽऽ बेटेऽऽ भाग जा। निश्चिन्त
होकर निकल जाऽऽ।''
शम्भुराजा ने ख़ून से लथपथ अपनी बाँहों में मुनासिब को भर लिया। सभी
को अलविदा कहा।
संभा किस चतुराई से भाग गया? दिलेरखान को क्या बताया जाय? यही
सोचते-सोचते बीजापुरी फौज वापस लौटी। फौजी बालेखान का खून से भीगा शव
कन्धे पर उठाये दफ़नाने के लिए ले जा रहे थे। साथ में घोड़े पर चल रहा मुनासिब
अपने वारिस के शव को बार-बार देख रहा था। वह अपनी बूढ़ी दाढ़ी पर निरन्तर
गिर रहे आँसुओं को पोंछने का प्रयास कर रहा था।
150 · सम्भाजी
जीव ही शिव
एक
कल देर रात शिवाजी महाराज की पालकी पन्हालगढ़ पर आ पहुँची थी। उस समय
सिंह द्वार पर तोपें दागी गयी थीं। महाराज का स्वागत किया गया था। उसी भीड़ में
सामने की ओर शम्भूमहाराज खड़े थे। शिवाजी महाराज ने उन्हें अपनी बाँहों में भर
लिया। वे अपने काँपते हाथों को उनकी पीठ पर फेरने लगे। मन भर आया। उन्हें
बहुत सी बातें करनी थीं। किन्तु इस भीड़ के सामने खुलकर बातें करना
उचित नहीं था।
शम्भूमहाराज को पन्हाना आये एक महीना बीत चुका था। वे प्रायः बाहर
नहीं निकलते थे। उनके जैसा सुयोग्य युवराज मुसलमान शत्रुओं से जाकर मिल
जाय, इस कल्पना से ही प्रजा को बड़ा दुख हो रहा था। यदि वे सहज रूप में घोड़े
पर बाहर निकलते तो भी लोग उन्हें कुछ विचित्र दृष्टि से देखते थे। इसलिए महल
के भीतर बैठे रहना ही युवराज को ठीक लगता था। कल रात तक शम्भूमहाराज के
मन में भयंकर भ्रम बना हुआ था। वे भीतर ही भीतर बहुत तड़प रहे थे। तोप के
सामने जाना उतना भयानक नहीं था जितना स्वराज्य द्रोह जैसा भयानक अपराध
करके पिता के सामने जाना। कौन सा मुँह लेकर पिता के सामने जाएँ? किन्तु कल
रात को पिता का आलिंगन शम्भू महाराज को बहुत आह्लादकारी और आश्वस्तिकारक
प्रतीत हुआ।
सुबह संभाजी राजा ने अपने शरीर पर से चादर हटाई। खिड़कियाँ खोल दीं।
प्रभात की शीतल हवा अन्दर आकर उनके शरीर का स्पर्श करने लगी। रात समाप्त
हो रही थी। मस्तिष्क के गर्भगृह में पवित्रता की घंटियाँ बज रही थीं। युवराज की
स्मृति अतीत की ओर मुड़ रही थी। तेरह वर्ष पहले आगरा के वे तूफानी दिन याद
आ रहे थे। मराठा साम्राज्य के शिवराय भयंकर जानलेवा संकट में फँस गये थे। उस
समय शम्भूमहाराज की उम्र सिर्फ नौ वर्ष थी। उनके चेहरे की शिशुता समाप्त नहीं
सम्भाजी :: 151