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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 793 में से

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पृष्ठ 137

पागल हो उठता है। शम्भूराजा बहुत ही स्वाभिमानी, भावुक और संवेदनशील थे।
उनकी आयु भी अभी कुल बीस वर्ष थी। इसलिए शरीर का रक्त स्वभावतः गर्म
था। दूसरी ओर मुगल सरदारों ने सात सौ मराठी सैनिकों के हाथ-पैर काट दिए थे।
इस पर गर्म खून वाले, स्वाभिमानी युवराज के क्रोध की कल्पना से ही दिलेरखान
अत्यधिक बेचैन हो रहा था। सबसे अधिक उसको यह चिन्ता सता रही थी कि यदि
यह सिंह का बच्चा क्रुद्ध होकर चला गया तो उसकी अपनी इज्जत का क्या होगा।
भूपालगढ़ की बगल में ही सेना ठहर गयी थी। शम्भूराजा तीन दिन तक
अपनी छावनी से बाहर नहीं निकले। वे भोजन का स्पर्श तक नहीं कर रहे थे। पूरे
दिन में केवल आधा गिलास दूध लेते थे। पूरे समय छावनी के मन्दिर के सामने
पागल की तरह बैठे रहते थे। उनकी वह दशा देखकर पत्नी दुर्गाबाई और बहन
गणूबाई दोनों भयभीत हो गयीं। ये सारे समाचार दिलेरखान को लगातार मिल रहे
थे। शम्भूराजा की बिगड़ती स्थिति से दुर्गाबाई को भी ज्वर आने लगा। मौके का
फायदा उठाने के लिए दिलेरखान ने अपने खास वैद्य और हकीम को युवराज की
छावनी में भेजना आरम्भ किया। पीछे पीछे मिठाइयों और फलों की टोकरियाँ भी
जाने लगीं। हकीमों के माध्यम से चाटुकारिता भी आरम्भ हुई। बताया गया कि
मराठी सैनिकों के हाथ पैर काटने की सजा दिलेरखान ने दी ही नहीं थी। बल्कि
बिना कोई सूचना दिये उनके भतीजे गैरतखान ने यह अमानवीय जुर्म कर दिया था।
इसी अवस्था में चार दिन बीत गये। क्रुद्ध सागर कुछ शान्त हुआ। क्रोध की
नदी की बाढ़ कुछ उतर गयी। दिलेरखान को इस आंशिक परिवर्तन का अन्दाजा हो
गया। वह चोर की तरह धीरे से शम्भूराजा की छावनी में प्रविष्ट हुआ। उनके
सिरहाने दयनीय भाव से बैठ गया। अपनी आँखें गीली होने का नाटक करते हुए
वह व्यग्रतापूर्वक युवराज से बोला—"युवराज जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। हमारा
गैरतखान कहाँ गायब हो गया है कुछ पता नहीं लेकिन उसको फाँसी की सजा देने
के लिए मैंने आलमगीर से सिफारिश की है।"
"गैरत की फाँसी से ऐसा क्या फर्क पड़ने वाला है ? किन्तु खान साहब एक
पैर से लँगड़े और एक हाथ से लूले बन गये ये अभागे मराठी सैनिक जब स्वराज्य
में वापस जाएँगे। तब इन्हें देखकर छोटे छोटे बच्चे भी मेरे मुँह में गोबर भरने के
लिए तैयार हो जाएँगे। यदि प्रजा मुझसे पूछे कि फौज के समीप शिवाजी के पुत्र के
रहते हुए इस प्रकार का अमानवीय जुर्म कैसे हुआ ? तो हम क्या उत्तर देंगे ?"
दिलेरखान ने सोचा कि ऐसी कुशाग्र बुद्धि वाले शम्भूराजा के क्रोध को शान्त
करने के लिए कोई ठोस उपाय करना पड़ेगा। उसने पहले ही एक गुप्त प्रस्ताव
औरंगजेब के पास भेज दिया था। इसका स्मरण उसे यकाएक हो आया। उसने
जियाखान को अपने शामियाने में तुरन्त बुलवाया।
सम्भाजी :: 135

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