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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 793 में से

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जाएँ? शादीशुदा बहन को ससुराल वाले मायके क्यों भेजते हैं? इसीलिए न कि वह
नयी साड़ी पहनकर वापस जाए? जनानखाने में छोड़ देने के लिए नहीं।"
राणूबाई शम्भूराजा के समीप आयी। उनका हाथ अपने माथे पर रखते हुए
बोली, "शम्भूभाई! शान्त हो जाओ! मेरी चिन्ता न करो। मुझे साथ लेकर जाने की
जल्दबाजी में तुम खुद मुगलों की कैद में जिन्दगी भर के लिए अटक जाओगे। वाई
के जाधव को मेरी जैसी बहुएँ बहुत मिल जाएँगी, किन्तु शिवाजी महाराज के
स्वराज्य को आगे सँभालने वाला दूसरा संभाजी नहीं मिलेगा। क्षमा करो। समय मत
गँवाओ। अपनी बड़ी बहन के पल्लू में सिर्फ इतनी दया की भीख दो और आप
अपने स्वराज्य में वापस चले जाओ।"
बड़ी देर तक शम्भूराजा बहुत देर तक शून्य मनःस्थिति में बैठे रहे। उन्हें सूझ
ही नहीं रहा था कि क्या करे? और क्या न करें? राणूबाई पुनः शम्भूराजा के पास
आयीं और उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "शम्भूराजा, पिताजी का हृदय
आपके लिए कितना पीड़ित होता है? इसका शायद आपको पता नहीं है। उन्होंने
कई बार मुझसे कहा है, "हमारे शम्भू का हृदय यदि केवल राजा का होता तो हमें
कोई चिन्ता न होती। किन्तु उनके हृदय का एक हिस्सा राजा का है तो दूसरा हिस्सा
कवि का। ऐसे व्यक्तियों के साथ बड़ा धोखा होता है। यदि इन्हें क्रोध आ गया तो
हाथियों के झुंड की तरह गरजते हुए हमला कर देंगे। किन्तु एक बार यदि उनके मन
के भाव तरल होकर प्रवाहित हुए तो झरने की तरह प्रवाहित ही रहेंगे। राजा के लिए
इस तरह प्रवाहित होना ठीक नहीं है। राजा के लिए ईर्ष्या, प्रतिशोध जैसे विष के
कुम्भ को उचित समय की प्रतीक्षा में सँभालकर रखना आवश्यक होता है। हमारे
शम्भू के पेट में ऐसा कुछ भी पचता नहीं। इसीलिए हमें उनकी चिन्ता हमेशा लगी
रहती है।"
शम्भूमहाराज बहुत देर तक वैसे ही बैठे रहे। तब उनका हाथ खींचकर उन्हें
उठाने का प्रयास करते हुए राणूबाई ने कहा-
"उठो, शम्भूराजा! पिछले कुछ दिनों से भाग्य हमारे साथ जुआ खेल रहा
है। जबसे हम कृष्णा नदी पार करके यवनों के प्रदेश में आये हैं तब से पिताजी की
स्थिति क्या हो रही होगी? एक भी दिन उन्हें चैन की नींद नहीं आयी होगी। इस
बात का मुझे पूरा विश्वास है।"
"परन्तु दीदीजी ! सबके रोकने के बावजूद आप मेरे साथ यहाँ क्यों
आयीं ?"
"क्यों आयी? मुझे भी नहीं पता। ऐसे ही हमारा मन हमें कोस रहा था।
बेवजह आपकी चिन्ता सता रही थी। इसीलिए यहाँ चली आयी। किन्तु शम्भू अब
समय व्यर्थ में न गँवाओ। चलो तैयार हो जाओ। शम्भूभाई क्या आप जानते हैं कि
144 .. सम्भाजी