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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

धीरे-धीरे हर बात शम्भूराजा की समझ में आने लगी। मराठी राज्य का
युवराज होने के नाते शम्भूराजा को किले में घूमने की चाहे जितनी छूट रही हो,
किन्तु उनके महल के आसपास रात-बिरात धीमे-पाँव से गश्त लगाने वाली
टोलियाँ घूमती रहती थीं। युवराज पर हमेशा निगरानी रखी जाती थी। यदि वे कभी
भीमा नदी की विशाल धारा के किनारे घूमने जाते तो वहाँ भी उन पर निगाह रखी
जाती। एक दिन शम्भूराजा ने इन स्थितियों से ऊबकर दिलेरखान से क्रोध के आवेश
में प्रश्न किया- "खान साहब हम आपके मेहमान हैं या कैदी?"
दिलेरखान का उनके बारे में क्या विचार है? यह शम्भूराजा की समझ में नहीं
आ रहा था। इससे वे बहुत बेचैन हो रहे थे। युवराज के रूप में इतना बड़ा मोहरा
हाथ लग जाने की खबर दिलेरखान ने तत्काल दिल्ली भेज दी थी। किन्तु औरंगजेब
सहज ही उस पर विश्वास करने वाला नहीं था। उसने अपने विश्वस्त लोगों द्वारा
इसकी जाँच कराने का निश्चय किया। उसके लिए यह पता लगाना जरूरी था कि
जो युवक शिवाजी का बेटा बनकर मुगल फौज में आया था वह सचमुच शिवाजी
का पुत्र था या कोई बनावटी युवराज था।
दिल्ली दरबार युवराज के विषय में क्या निर्णय करेगा? यह दिलेरखान के
लिए स्पष्ट नहीं था इसलिए दिलेरखान के मन की बात शम्भूराजा को भी स्पष्ट नहीं
हो रही थी। शम्भूराजा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्हें न दिन को चैन था न रात
को नींद।
एक रात को उन्होंने पिछवाड़े की खिड़की से उस रहस्यमय घर में मोमबत्ती
का प्रकाश देखा। खिड़की के पास मियाँखान आकर बैठा था। किसी असह्य दुख से
वह व्याकुल हो रहा था। उसकी आँखों से धारासार आँसू बह रहे थे। दुख की
तीव्रता के कारण उसकी नाक का अग्रभाग लाल हो गया था। लगता था वह स्वयं
पर क्रुद्ध हो रहा है। असहाय होकर खिड़की की सलाखों पर सर पटकता था।
दूसरे दिन दुर्गाबाई ने भी वही दृश्य देखा। शम्भूराजा का ध्यान आकर्षित करते
हुए वे बोलीं, "पता नहीं किस दुःख से वह बेचारा तड़प रहा है? कल से देख रही
हूँ, उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अगली रात में भी शम्भूराजा ने वही
दृश्य देखा। मियाँखान ऐसे तड़प रहा था जैसे किसी ने छोटी मछली को तपते तवे
पर रख दिया हो। उसे देखकर शम्भूराजा ने दुर्गाबाई से कहा, "आप सवेरे भैरोंबाबा
का दर्शन करने पिछवाड़े के दरवाजे से ही जाती हो न?"
"हाँ, क्यों?" दुर्गाबाई का प्रश्न।
"कल सवेग होने से पहले ही दर्शन करने जाओ और जाते-जाते स्वयं ही
उसके दुख का कारण पूछ लो। किन्तु यह बात नौकर चाकरों के हाथ नहीं लगनी
चाहिए। इसलिए आप स्वयं...।"
सम्भाजी :: 121

भोर होने से बहुत पहले ही दुर्गाबाई अपनी दो विश्वस्त दासियों को साथ
लेकर महल से बाहर निकलीं। सूरज की पहली किरण निकलने के पहले ही वे
भैरोंबाबा का दर्शन करके वापस भी लौट आयीं। सीढ़ियों पर शम्भूराजा उनकी
प्रतीक्षा में खड़े थे। दुर्गाबाई वहाँ आयीं और भावुक होकर कहने लगीं—
"बेचारा बहुत भला आदमी दिखता है। औरंगजेब द्वारा फँसाये जाने का दुख
तो उसे है ही किन्तु इस समय वह एक दूसरी ही घरेलू समस्या से पागल हो रहा
है।"
"क्या ? हुआ क्या है ?"
"उसकी बेगम बच्चों को जन्म देते ही मर गयी। उसने दो बच्चियों को जन्म
दिया था। उन बच्चियों को पालने पोसने में मियाँखान ने अपनी उम्र गँवाई। छ
महीने पहले बीजापुर के एक जमींदार के दो बेटों के साथ इन जुड़वाँ बहनों का
विवाह निश्चित हो चुका है। चार दिनों के बाद विवाह की तिथि है।"
"फिर ?"
"मियाँखान ने अपने दामादों के लिए दहेज की बहुत बड़ी रकम कबूल की
थी। उन बेटियों की माँ नहीं है और बाप ऐन मौके पर कैदखाने में बन्द हो गया।
वह महसूस कर रहा है कि घर के नौकर चाकरों से विवाह का कार्य ठीक ठीक
नहीं हो पाएगा। शादी टूट भी सकती है। दुर्भाग्य से इसकी गलती लड़कियों के
माथे पर ही आएगी। दुनिया समझेगी कि लड़कियों में ही कुछ खोट है। लड़कियों
का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। यही समस्या इस अभागे बाप को पागल बना रही
है।"
उसकी दर्दभरी कहानी सुनकर शम्भूराजा का मन पिघल गया। उसी दिन वे
हवेली की छत पर से इधर उधर देख रहे थे। वे यह सोचकर अधीर हो रहे थे कि
अभी तक अँधेरा होते ही शम्भूराजा की उस हवेली में अनेक हलचलें उग आयीं।
उन्होंने रसोईघर में काम करने वाले जैमुद्दीन को बुला लिया। युवराज उस मोटे
थुलथुल दाढ़ी वाले बुड्ढे जैमुद्दीन को प्रसन्नतापूर्वक देखते ही रह गये। शम्भूराजा ने
रात के अँधेरे में अपने विश्वस्त सहयोगियों के साथ जैमुद्दीन को उस रहस्यमय घर
की ओर भेज दिया।
स्वयं शम्भूराजा हवेली के दरवाजे पर आकर पटाखे फोड़ने लगे। उनके
नौकर-चाकर भी चन्द्र ज्योति और उत्सव का आनन्द लेने लगे। आसपास सभी
जगह हलचल मच गयी। शम्भूराजा के कुछ सेवक वहाँ पर एकत्र लोगों को
जलेबियाँ बाँटने लगे। हवेली के सामने पटाखों की आतिशबाजी चल रही थी। उसे
देखने के लिए आसपास के सभी पहरेदार जमा हो गये। उसी समय पिछवाड़े के
122 सम्भाजी

रहस्यमय घर का दरवाजा लोहे की रिंच से ढीला किया जा रहा था और अब
शम्भुराजा का विश्वस्त खानसामा जैमुद्दीन उस राजबन्दी की जगह पर खिड़की-
दरवाजे बन्द करके बड़े मजे से अन्दर बैठा था।
आधी रात बीत गयी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। इसी समय हवेली के
तहखाने में छुपा हुआ मियाँखान शम्भुराजा के सामने आया। उसने दौड़कर शम्भुराजा
के पैर पकड़ लिए। वह विह्वल होकर बोला, "बेटे, मेरी पुकार सुनकर आप के
रूप में अल्लाह ही आ गया। "
"इसमें इतनी क्या बात है मियाँखान? अब तो मैं भी एक बेटी का पिता बन
गया हूँ। इसलिए बेटी के बाप की पीड़ा...।"
"शम्भू महाराज आपके इस उपकार को जिन्दगी भर नहीं भूलूँगा।"
शम्भुराजा ने अपने सेवक को पहले से ही बुला रखा था। उसने कुछ ही क्षणों
में मियाँखान के चेहरे का भार उतार दिया। बूढ़े सिंह की तरह दिखने वाले
मियाँखान लल्लू जैसे विदूषक जैसा दिखने लगा। मियाँखान शम्भुराजा के
सिपाहियों के साथ सीमा के बाहर जाने वाला था।
"खान साहब! वापस कब आओगे?"
"पाँचवीं रात खत्म होने से पहले ही अपने कैदखाने में वापस आ जाऊँगा।"
शम्भुराजा कुछ बोलने को तत्पर हुए। एक लम्बी साँस छोड़ करके बोले,
"मियाँखान ! बेटी के अभागे बाप के आँसू - उन आँसुओं का विश्वास करके ही
हम यह जोखिम उठा रहे हैं। इसमें यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी हुई तो एक
राजबन्दी बिना किसी अधिकार के मुक्त कराने का इल्जाम मुझ पर लगाया
जाएगा।"
शम्भुराजा के ऐसा कहने पर आसपास खड़े लोग स्तब्ध रह गये। मियाँखान
का गला भर आया। वह हाथ जोड़कर बोला-
"शम्भूमहाराज ! आपका विश्वास मैं टूटने नहीं दूँगा। वह महान अल्लाहताला
यदि मुझे आपकी सेवा का अवसर दे दें तो मैं अपने कलेजे के टुकड़े काटकर आपके
कदमों में रख दूँगा।"
धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि पिछले कुछ दिनों से मियाँखान की
तबीयत कुछ खराब चल रही है। इसीलिए बीच में कई दिन खिड़की में उनका
चेहरा दिखाई नहीं पड़ा। भीतर कुछ खटपट करने की आवाज लोगों को बाहर
सुनाई पड़ती थी। कुछ दिनों बाद मियाँखान की नियमित गतिविधियाँ आरम्भ हो
गयीं। शम्भुराजा की दृष्टि उस पर रोज पड़ती थी। वह प्रातःकाल और सन्ध्या समय
शम्भुराजा की हवेली की ओर देखते हुए बड़े आदर से उन्हें बन्दगी करता था।
सम्भाजी 123

दो
शम्भुराजा को बहादुरगढ़ आये तीन महीने बीत चुके थे। वहाँ की लौह प्राचीर,
अमीर-उमरावों से मिलने-जुलने की मनाही, उनके ऊपर होने वाली जासूसी आदि
से युवराज स्वयं को बन्दी जैसा अनुभव करने लगे थे। अन्तर इतना ही था कि
उनकी हवेली पर ताले नहीं लगाये जाते थे। युवराज के स्वाभिमानी मन ने अच्छी
तरह समझ लिया कि वे बन्दीखाने में कैद हो गये हैं। दुर्गाबाई और राणूबाई भी
व्यक्तिगत परिचारकों के अभाव में पूरी तरह ऊब गयीं थीं।
बूढ़ा दिलेरखान अभी भी उनसे मीठी-मीठी बातें करता था, मित्रता का
नाटक करता था। वर्षों से प्रतिष्ठित मुगलों की रियासत, उनकी अनुशासित सेना,
इस मैदानी प्रदेश पर वर्चस्व आदि के कारण शम्भुराजा की अपनी योजना के सफल
होने के आसार दिखाई नहीं पड़ रहे थे। इसलिए वे निरन्तर अस्वस्थ होते जा रहे
थे।
अभी भी बहादुरगढ़ किले पर मुक्त विचरण की सुविधा शम्भुराजा को नहीं
थी। वे मुगल सेना की टुकड़ी के साथ भीमा नदी के तट पर, किले की प्राचीरों पर
और कभी-कभी नदी की दुर्गम ढलान पर घूमते रहते थे। वहाँ नदी के किनारे चाँद
बीबी द्वारा बनवाया गया एक सुन्दर महल था। उसके दूसरी ओर कुछ यादवकालीन
मन्दिर थे। ये मन्दिर सुन्दर काले पत्थरों से बनाये गये थे। उनकी चारों दीवारों और
गोल छत पर यक्ष और किन्नरों के अनेक चित्र उकेरे गये थे। बहादुरगढ़ के इस
भाग्यशाली जंगल ने अनेक वर्षों की ऋतुओं को ही नहीं अनेक राजाओं के शासन
और संस्कृति को भी देखा और पचाया था।
इस किले के पास ही भीमा नदी ने एक वलयांकित मोड़ लिया था। वहाँ से
कोस-दो-कोस की दूरी पर नदी की विलक्षण गहराई से एक जलाशय बन गया था।
उस जलाशय में इतना पानी था कि गर्मियों में भी लाखों सवारों, सिपाहियों और
जानवरों के लिए पानी की कमी न होती। सम्भवतः इसी कारण अनेक राजा इस
स्थान के प्रति सम्मोहित हुए। यवन शासकों ने नदी के किनारे दो तीन स्थानों पर
हाथियों से चरस द्वारा पानी निकालने के लिए लगभग चालीस फीट ऊँची पउदरें
बाँधी थीं। जिस प्रकार किसान अपने कुओं पर बैलों को बाँधते और खोलते हैं उसी
तरह चमड़े की भारी चरस खींचने के लिए एक साथ चार-चार हाथियों को बाँधा
जाता था। अपने गले में बँधी घंटियों की लय पर हाथी चरस खींचते थे।
124 सम्भाजी

आज शम्भुराजा की सवारी भीमा नदी के किनारे-किनारे चल रही थी।
उन्होंने रास्ते में पत्थरों से बनी सतियों की छोटी-छोटी समाधियाँ देखीं और बड़े
आदर से उन्हें प्रणाम किया। बहादुरगढ़ ने असंख्य चेतनामय जीवनों के साथ अनेक
मृत्यु प्रसंग भी देखे थे। घोड़ा दौड़ाते-दौड़ाते शम्भुराजा ने दमड़ी मस्जिद को पार
किया और बाले किले की सीमा के बाहर निकल गये।
पूर्व दिशा में कुछ दूरी पर सरस्वती नदी की धारा दिख रही थी। वह यहीं
गाँव के परिसर में आकर भीमा नदी में मिलती थी। उसके किनारे पर भी हाथी द्वारा
चरस खींचने की एक बड़ी पउदर बनी थी। सरस्वती नदी के किनारे-किनारे किले
की तटबन्दी की गयी थी। बीचोंबीच मैदान फैला हुआ था।
आज धूप में दौड़ते-दौड़ते शम्भुराजा को अचानक मूर्छा का अनुभव हुआ।
हाथी से चरस खींचने वाली पउदर की ढलान पर उन्होंने जामुन का झुरमुट देखा।
वहाँ पर तटबन्दी की देख रेख के लिए एक उमराव ने उन्हीं जामुन के पेड़ों के बीच
हरे रंग का एक अस्थायी शामियाना खड़ा किया था। शम्भुराजा घोड़े से उतरकर
शामियाने में चले गये। वे बहुत थके हुए थे इसलिए वहाँ पर रखे गये एक बिस्तर
पर लेट गये। लेटे लेटे उनकी दृष्टि सरस्वती नदी के पार विस्तृत मैदान पर पड़ी।
वह हिस्सा 'खंडोबा का थान' नाम से जाना जाता था। शम्भुराजा की दृष्टि उस
मैदान में खो गयी। उन्हें वहाँ पर एक विलक्षण मृग मरीचिका दिखाई देने लगी।
शम्भुराजा नींद में खो गये। अचानक उनके कानों पर हाथी-घोड़ों की इतनी
तेज आवाज आयी मानो आसमान फट गया हो। एक जंगल का राजा शेर मुक्त हो
गया था। सारे वातावरण में कोई आसमानी विपत्ति आ गयी थी। देखते-देखते नदी
की उस तटबन्दी को जोर का धक्का लगा। तटबन्दी सामने वाले जलाशय में गिरने
लगी। तटबन्दी पिघलने लगी। नदी का पानी काला काला और हरा-हरा दिखने
लगा। एक प्राणी की दाढ़ी के आकार की अयाल जल की सतह पर दिखने लगी।
वह विलक्षण प्राणी किले की प्राचीर पर उपहास करता हुआ हँस रहा था।
के तुरन्त बाद शम्भुराजा की आँखों के सामने एक बार फिर 'खंडोबा का
थान' धूप में खड़ा हो गया। वहाँ पुनः मृगमरीचिका नाचने लगी। वह सूना-सूना
मैदान था। उसके सुदूर कोनों से उठने वाली सतियों की चीखें कानों को बहरा बना
रही थीं। फिर बैतालों का एक जुलूस उस मैदान में दिखायी पड़ने लगा। उसमें वाद्य
बहुत बड़े थे और बजाने वाले बहुत छोटे, बीमार चिड़ियों जैसे या आवारा कुत्तों
जैसे। पता नहीं किसका वह जुलूस है और किसकी पालकी। मैदान काँटों से भरा
है, बाजे बजाने वालों के पाँव काँटों को रौंदते हुए खून से लथपथ हैं। ये कहाँ जा रहे
हैं। शम्भुराजा आँखें फाड़ फाड़कर उन आकृतियों को पहचानने का प्रयत्न कर रहे
सम्भाजी 125

हैं, किन्तु आकृतियाँ धुँधली पड़ती जा रही हैं। मैदान की अदृश्य चीखें असह्य होती
जा रही हैं।
क्या है यह भयानक सपना? शम्भूराजा का गला सूख रहा था। वे झट से
बिस्तर से उठकर बैठ गये। दृष्टि के सामने खंडोबा का सूना सूना थान यथावत था।
शम्भूराजा का सारा शरीर पसीने से तर हो गया था।
तीन
दक्खिन की सूबेदारी का अर्थ है एक बहुत ही कठिन कार्य। दिल्ली के बाद मुगल
सत्ता का सही सिंहासन यही सूबेदारी थी। औरंगजेब स्वयं दो बार दक्षिण का
सूबेदार रह चुका था। इसलिए यहाँ की सारी बारीकियाँ, यहाँ के टंटे बखेड़े, लाभ
हानि आदि से भली भाँति परिचित था। दिलेरखान का अनुमान था कि विद्रोही
शिवाजी के पुत्र को बहकाकर बहादुरगढ़ के पिंजरे में बन्द करने के समाचार से
प्रसन्न होकर बादशाह औरंगजेब उसे पुरस्कार देगा किन्तु इसके बदले आलमगीर ने
अपने शहजादे मुअज्जम को दक्खिन की ओर भेजा। इस समाचार ने दिलेरखान को
बेचैन कर दिया था।
दिल्ली से एक साँड़नी सवार सन्देश लेकर आ गया। दिलेरखान को लगा
जैसे जिससे भोजन मिलने की अपेक्षा थी उसने माथे पर पत्थर मार दिया हो। आँखें
फाड़ फाड़कर औरंगजेब के शब्दों को पढ़ते हुए उसका दम घुटने लगा।
“दिलेर! हमें खबर मिल रही है कि आप रोज उठते बैठते उस संभाजी के
स्वागत में जलूस निकालते हो। नाक से मोती बड़ा नहीं होना चाहिए। दुश्मन का
बेटा अपनी फौज में आया है, उसका फायदा उठाओ। अपनी फौज में उसे ढाल
बनाकर हमेशा आगे रखो। मराठों के प्रदेश पर आक्रमण करो। शत्रु को ज्यादा-से
ज्यादा नुकसान पहुँचाओ।”
इनाम के बदले मिलने वाली कान खोलने वाली इस भाषा ने दिलेरखान को
दुखी कर दिया। उसने अपने अनुभवी दीवान से परामर्श किया। उसके दीवान
जियाखान ने हँसकर कहा-
“अजी हुजूर यह सन्देश लिखते समय बादशाह ने बहुत दिमाग लगाया
है।”
“मतलब?”
126 :: सम्भाजी

“उसको एक ही पत्थर से दक्खिन में अनेक पक्षियों का शिकार करना है।
आलमपनाह की इच्छा है कि आप शिवाजी, बीजापुर और गोलकोंडा पर आक्रमण
करो और शिवाजी के बेटे को बगल में लेकर चारों दिशाओं में घूमो।”
दिलेरखान ने जियाखान से पूछा-“मौजूदा स्थिति में हम कहाँ जंग लड़
सकते हैं?”
“भूपालगढ़।”
“भूपालगढ़? कहाँ है यह?”
“बीजापुर के रास्ते में, बानूर गाँव के पास। जत के आसपास।”
“किसका किला?”
“मराठों के ही कब्जे में है। उस किले की तटबन्दी बहुत मजबूत है। उस
किले का मराठा किलेदार भी फौलादी सीने वाला है। किन्तु यदि यह किला हाथ में
आ जाए तो बीजापुर की नाक में नकेल डालना बहुत आसान हो जाएगा।”
दिलेरखान के दिमाग को अनेक पैर निकल आये। उसने तत्काल भूपालगढ़
के सम्बन्ध में छोटी से छोटी जानकारी इकट्ठी करनी आरम्भ कर दी।
एक समय चाकण के पास के किले में पचावन दिन तक निरन्तर लड़ते हुए
बहादुर फिरंगोजी नरसाल। न शाडस्ताखान की नींद हराम कर दी थी। वही
फिरंगोजी इस समय भूपालगढ़ का किलेदार था। विट्ठल भालेराव उसका कुशल
सचिव था। दिलेरखान को सूचना मिल रही थी कि किले में बड़ी मात्रा में बारूद
और अनाज रखा गया था। किले पर बाणोबा अर्थात् महादेव का जागृत मन्दिर था।
वहाँ के निवासियों का फिरंगोजी और महादेव पर अटूट विश्वास था।
बहादुरगढ़ में भूपालगढ़ पर आक्रमण की योजनायें बड़ी तेजी से निश्चित हो
रही थीं। एक दिन सुबह सुबह बहादुरगढ़ के किले से घुड़सवारों की फौज बाहर
जाने लगी। तोपों की गाड़ी के पहिये भी आवाज करते हुए चलने लगे। फौज के
माथ जाने वाला बाजार तो भोर से सक्रिय हो गया था। वणिक, पानी ढोने वाले
भिश्ती आदि सभी अपने घोड़ों और खच्चरों के साथ बाहर निकल रहे थे।
शम्भूराजा अपनी हवेली में चिन्ताग्रस्त बैठे थे। एक तो दिलेरखान ने इस
लड़ाई के सम्बन्ध में उन्हें स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताया था। दूसरे दो दिन पूर्व ही
शृंगारपुर से कवि कलश और रायगढ़ से रानी येसूबाई के गोपनीय पत्र एक साथ
उन्हें मिले थे। दोनों पत्रों में एक ही तरह के समाचार थे। “युवराज अब वहाँ खाली
मत बैठिये। कुछ कीजिये। जब से आप यवनों से जाकर मिले हैं तब से यहाँ पर
आपके विरोधियों ने आपकी बदनामी के कारखाने खोल लिये हैं। कुछ लोगों ने तो
ऐसी अफवाह फैलायी है कि नेताजी पालकर की तरह शीघ्र ही इस्लाम धर्म
स्वीकार करने वाले हैं। अपनी इच्छा पूरी करने में यदि भाग्य साथ नहीं दे रहा है,
आपको अपनी वीरता दिखाने का अवसर नहीं मिल रहा है तो जो है कम से कम
सम्भाजी :. 127

उसकी रक्षा का तो प्रयास करो।" इन गोपनीय पत्रों से शम्भूराजा की स्थिति और
भी नाजुक हो गयी थी।
फौज के बाहर निकलने के लिए नगाड़े बज रहे थे। समय बहुत कम था।
इसलिए फौलादी टोप लगाये, फौजी के वेश में दिलेरखान स्वयं युवराज के महल में
आया। शम्भूराजा की बन्दगी करके दिलेरखान ने कहा, "शहजादे! चलो तैयार हो
जाओ। दो दिन में हमें भूपालगढ़ पहुँचना है।"
"वहाँ जाने की मेरी इच्छा नहीं है।" शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में नकार
दिया।
"लेकिन बादशाह आलमगीर का ऐसा स्पष्ट आदेश है।"
"ऐसा क्या? कौन सा प्रदेश जीतना है और कौन सा नहीं, इसके लिए सीधे
दिल्ली से आदेश आने लगे, फिर तो हो गया।"
दिलेरखान के मन पर बादशाह के आदेश की स्पष्ट छाप थी।
"मराठों का शाहजादा 'संभा' एक बहुत कीमती हीरा है। होशियारी से
उससे ऐसा काम करा लो कि शिवाजी की बदनामी हो और हम यवनों का फायदा
ही-फायदा।"
अपनी इच्छा के विरुद्ध शम्भूराजा को भूपालगढ़ की ओर कूच करना ही
पड़ा। दो तीन दिनों में ही फौज ने भीमा का प्रदेश पार कर लिया। बारामती
फलटण, माणदेश होते हुए भूपालगढ़ के समीप पहुँच गयी। दिलेरखान बड़ी
सावधानी से कदम बढ़ा रहा था। चाकण के किले को बहुत थोड़ी सी फौज से
जीतने वाला, औरंगजेब के मामा शाइस्ताखान के दाँत खट्टे करने वाला फिरंगोजी
नरसाड़ा भूपालगढ़ का किलेदार था। दिलेरखान जानता था कि फिरंगोजी आसानी से
हथियार डाल देने वाला नहीं है, वह बहादुरी से लड़ेगा। इसलिए आधीरात के
समय उसने अपने फौजियों को जगह-जगह तैनात कर दिया। रात में उसने संभाजी
से कहा-
"कहो अपने जात भाइयों से। उनसे कहो कि लड़ाई की बात भूलकर किला
छोड़कर निकल जाओ।"
दिलेरखान की धूर्तता शम्भूराजा की समझ में आ रही थी। किन्तु कंटिया में
फँसी मछली की तरह छूट भी नहीं पा रहे थे। जीवित रहने के लिए तड़पना मजबूरी
थी। उन्होंने अपने विश्वसनीय दूत से किले पर खत भेजा था- "किला कमजोर है
और दिलेरखान की फौज बहुत बलशाली है। लड़ाई लड़ने से कोई फायदा नहीं है।
पिताजी की सेना की व्यर्थ तबाही मत करो। चुपचाप किला हमारे हवाले करके
निकल जाओ।"
128 :: सम्भाजी

गढ़ के नीचे खाई में फौज की छावनी बनाई गयी थी। वहीं पर एक ओर
दिलेरखान और उसके पास शम्भूराजा की छोलदारियाँ खड़ी की गयी थीं। सुबह
होते ही किले से जवाब लेकर दूत वापस आया। युवराज ने 'फिरंगोजी' शब्द पढ़ा
और बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये पत्र को दिलेरखान के हाथ में दे दिया।
"बिना लड़े ही किला छोड़कर हाथ झुलाते हुए चले जाने की रीति शिवाजी
महाराज की सेना की नहीं है। यह रीति तो यवनों की है। शम्भूराजा यह बात आप
अपने मित्र को समझाते क्यों नहीं ?"
जवाब पढ़ते ही दिलेरखान लाल-पीला होने लगा और चीख कर बोला,
"खत का उत्तर देने का यह क्या तरीका है ?"
"खान साहब, एक स्वाभिमानी मराठा इसी स्वाभिमान से व्यवहार करेगा।
क्या सभी लोग इस संभाजी की तरह व्यवहार करने वाले मिलेंगे?"
अपनी स्थिति को स्पष्ट रूप से स्वीकार करते समय संभाजी के चेहरे पर
विषाद
छा गया।
दिलेरखान ने अपनी काजल लगी आँखों की कोर से शम्भूराजा की ओर
देखा। उन्हें मनाते से स्वर में बोला, "शहजादे, रायगढ़ की फालतू बातों को याद
करके कितने दिन तड़पते रहोगे? मराठी राज्य के कानूनन वारिस होने पर भी
रायगढ़ जाने की मनाही, पिताजी तुम्हें अपने साथ लड़ाई पर ले नहीं जाते, सौतेली
माँ राजकार्य की ओर आने नहीं देती, तुम्हारी इज्जत का चिथड़ा करने वाले तुम्हारे
मन्त्री और सरदार हमेशा तैयार खड़े हैं। अरे, ऐसा गैर वाजिब बर्ताव तो किसी
दासीपुत्र के साथ भी नहीं किया जाता।"
"तो क्या आग से तपी हुई मिट्टी खाते-खाते हमें मरना है ?" शम्भूराजा क्रुद्ध
होकर बोले।
युवराज को समझाने के लिए दिलेरखान उनके समीप आ गया और उनका
हाथ अपने हाथ में लेते हुए दुखी स्वर में बोला, "शहजादे, तुम्हारे विपत्ति के दिनों
में हम तुम्हारी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं और तुम दुश्मन की नजर से हमें ही
आँख दिखा रहे हो ?"
युवराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे चुप बैठे रहे। अब समय व्यर्थ गँवाने में
कोई लाभ न समझकर दिलेरखान ने अपने शामियाने से बाहर आकर लड़ाई का
आदेश सुना दिया। फिर क्या था ! खाई से तोपों के गोले दगने लगे। कान फाड़ देने
वाली तोपों की आवाजें आसपास की खाइयों में प्रतिध्वनित होने लगीं।
थोड़े ही समय में खान के गश्ती सैनिकों ने खान को एक एक खत लाकर
दिया। यह खत फिरंगोजी ने शम्भूराजा के लिए लिखा था। किन्तु शम्भूराजा के पास
सम्भाजी :. 129

न पहुँचकर वह यवनों के हाथ लग गया।
"युवराज आप जैसे आये हैं उसी रास्ते से लौट जायें। यदि आप किसी संकट
में हैं तो हमें बतायें। आपको बचाने के लिए हम खून की नदियाँ बहा देंगे। तुरन्त
बताएँ।" दिलेरखान द्वारा इस पत्र को शम्भूराजा के पास पहुँचाने का कोई प्रश्न ही
नहीं था।
दिलेरखान अपनी जगह से ही बुर्ज के ऊपर लड़ रही फौज को देख रहा था।
किले की तटबन्दी को ध्वस्त करने के लिए यवनों की तोपें तेजी से बढ़ रही थीं।
किन्तु मराठों की सेना भी प्रतिकार के नशे में उन्मत्त आगे बढ़ रही थी। सामने से हो
रहे आक्रमण की बिना चिन्ता किये निरन्तर आगे बढ़ रही थी। मराठी सेना ने बुर्ज के
ऊपर से पत्थरों, ढेलवासों, तीरों आदि की घनघोर वर्षा आरम्भ कर दी। मराठी द्वारा
मुकाबले का ढंग देखकर दिलेरखान चकित ही नहीं हुआ, घबरा भी गया। उसने
अपनी अगली पंक्ति की सेना को आदेश दिया—"जैसे भी सम्भव हो भूपालगढ़
की तटबन्दी की ध्वस्त करो। उसके बिना बूढ़ा फिरंगोजी हथियार नहीं डालेगा।"
खान के इस आदेश के अनुसार तोपों की नयी टोली छुपते हुए सामने वाले
रास्ते पर चढ़ने लगी। किले के ऊपर से तीरों और पत्थरों की वर्षा लगातार हो रही
थी। बेलदारी फौज लोहे की बड़ी-बड़ी ढालें लेकर अपनी रक्षा कर रही थी।
एक हाथ से अपने को बचाते हुए और दूसरे हाथ से तटबन्दी में छेद करते हुए
फौज आगे बढ़ रही थी। छेद में सुरंग बनाकर बारूद भरी जा रही थी। मजदूर
शीघ्रता से कार्य समाप्त कर रहे थे। वे सुरंग में आग लगाकर शीघ्रता से दूर भागते
थे। धड़-धड़ की तेज आवाज के साथ बारूद जलने लगी। उसके प्रभाव से बुर्ज में
भी छिद्र होने लगे। तटबन्दी के कुछ पत्थर भी आड़े-तिरछे गिरे किन्तु तटबन्दी की
जिद्दी अभेद्य दीवार वैसे ही सिर उठाए खड़ी रही।
दोपहर के बाद संभाजी ने दूसरी ओर से सेना का नेतृत्व अपने हाथ में लिया।
उन्होंने तटबन्दी की दीवार पर लम्बी-लम्बी सीढ़ियाँ लगवाईं उन सीढ़ियों से यवन
सेना तीव्र गति से किले पर चढ़ने लगी। किन्तु सामने से आने वाले तोप के गोलों
से अनेक सैनिक जलकर खाक हो गये। कुछ सैनिक गोलों से जलकर कागज के
चिथड़ों जैसे झुलसकर नीचे गिर गये। अनेक सैनिकों को मराठों ने अपने तीरों से
घायल कर दिया। अन्त में एक बुर्ज ने मुगलों की सेना को मार्ग दिखाया। फिरंगोजी
ने किला बचाने के लिए जान की बाजी लगा दी। किन्तु संभाजी राजा और
दिलेरखान के भीषण आक्रमण के सामने मराठों को पराजय स्वीकार करनी पड़ी।
किले को हाथ से जाते देखकर बहुत से मराठी सैनिक भाग गये। जो बचे वे बन्दी
बना लिए गये।
सूर्यास्त हो चला। खून से लथपथ भूपालगढ़ अँधेरे का चादर में अपने जख्मों
को छुपाने की कोशिश करने लगा। शम्भूराज और दिलेरखान अपनी छावनी के
130 :: सम्भाजी

सामने खुले मैदान में चारपाई डालकर बैठे थे। शानदार शामियाने के भीतर दीप जल
रहे थे। मशालची मशाल लेकर इधर उधर घूम रहे थे। इसी समय किले से उतरते
हुए सात सौ मराठों का एक दल आया। उन सभी के हाथ पीछे पीठ पर बँधे थे।
बाहर ठंडी हवा चल रही थी। शम्भूराजा के सामने उन मराठा कैदियों को दूसरी
जगह स्थानान्तरित किया जा रहा था। युवराज को देखते ही मराठों का वह दल रुक
गया। शम्भूराजा मराठा सैनिकों के सामने गये। उनमें से अनेक सैनिक युवराज को
पहचानते थे। कुछ आश्चर्य से तो कुछ क्रोध से शम्भूराजा को आँखें दिखा रहे थे। वे
अपनी ऐंठी हुई खिचड़ी मूंछों और लाल लाल आँखों से शम्भूराजा का पूरा शरीर
जला रहे थे।
कुछ सैनिकों ने अपनी गर्दनें नीचे झुकाकर शम्भूराजा का अभिवादन किया।
स्वराज्य की इस दौलत को देखकर शम्भूराजा का मन भर आया। उन्होंने दिलेरखान
से पूछा—"खान साहब इन कैदियों को कहाँ भेज रहे हो?"
"इन्हें बहादुरगढ़ के जेलखाने में भेज रहे हैं।"
"खान साहब, याद रखिएगा, बन्दी बनाने के अतिरिक्त इन्हें और कोई सजा
नहीं होनी चाहिए।" युवराज ने आदेश दिया।
दूसरे दिन सुबह युवराज की नींद लोहे के फावड़ों की आवाजों से खुली।
युवराज को अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। दिलेरखान ने मजदूरों
की कई टोलियाँ लगाई थीं। इन मजदूरों से वह भूपालगढ़ की तटबन्धी की दीवार
तुड़वा रहा था। युवराज उसकी मूर्खता को देखकर चकरा गये। वे उठकर सीधे
दिलेरखान के शामियाने में चले गये। शामियाने की खिड़की से ऊपर की ओर इशारा
करते हुए वे बोले, "खानसाहब यह क्या चला रखा है? एक बार किला हाथ लगने
पर वहाँ शासन करने की बजाय उसे श्मशान बनाने का यह क्या तरीका है?"
दिलेरखान उपहास करते हुए बोला, "वैसे यहाँ किला बनाये रखने से
चलेगा भी नहीं। अपनी बंजर जमीन पर किला देखकर कुनबी जाति के बच्चे राजा
बनने का ख्वाब देखने लगते हैं।"
इन अपमानजनक शब्दों को सुनकर शम्भूराजा को क्रोध आ गया।
माहुली के पास कृष्णा नदी को पार करके मुगलों के क्षेत्र में पहुँचने के समय
से ही अपशकुन सूचक घटनाएँ घटने लगी थीं।
युवराज अपने कुछ सहयोगियों के साथ गढ़ पर बाणोबा का दर्शन करने के
लिए निकले। साथ में दुर्गाबाई और राणूबाई की पालकियाँ भी थीं। चढ़ाई पर घोड़े
बिना सवारी के चल रहे थे। शम्भूराजा के पैर योंही पत्थरों से टकरा रहे थे। पीछे
तटबन्दी तोड़ने वाले गहदालों और कुदालों की आवाज आ रही थी। पिछली सात
पीढ़ियों के पुण्य के प्रभाव से शिवाजी महाराज ने राज्य का निर्माण किया। हम कहीं
सम्भाजी : : 131

उसकी तटबन्दी तो नहीं तोड़ रहे हैं। इस कल्पना से युवराज का सिर चकरा रहा
था।
बीच रास्ते में एक काजी साहब मिले। युवराज को सलाम करते हुए बोले,
"बादशाह औरंगजेब अगले हफ्ते से गैर मुसलमानों पर जजिया कर लगाने वाला
है। ऐसी अनीति औरंगजेब के बाप तो क्या उसके दादा ने भी नहीं की थी।"
चलते-चलते शम्भुराजा स्वयं से ही बोले, "लगता है काजी के रूप में यह
समाचार बाणोबा ही दे रहे हैं। हिन्दू प्रजा पर जजिया जैसा अमानवीय कर लगाने
वाला औरंगजेब हमें क्या न्याय देगा?"
समय बहुत बुरा आ रहा है। यह सोचते हुए शम्भुराजा बाणोबा के शीतल
गर्भगृह में पहुँच गये। भगवान के चरणों पर सिर रखकर वे बहुत समय तक बैठे
रहे।
राणूबाई ने इक्कीस नारियल की माला और अपने गले का सोने का हार
बाणोबा की पिंडी पर चढ़ाया। पुजारी ने उन्हें मंगल आशीर्वाद दिया। राणूबाई बड़ी
व्यग्रता से पुजारी से बोलीं, "गुरुजी वचन दीजिए कि इस बार हमारे युवराज को
पुत्र ही होगा।" मन्नत के फल जानने के लिए राणूबाई पुजारी से आग्रह कर रही
थीं। राणूबाई की बात सुनते ही दुर्गाबाई के चेहरे पर वसन्त की बहार आ गयी। वे
मुस्करा पड़ीं। शम्भुराजा आश्चर्य से दोनों की ओर देखने लगे। वे सोचने लगे कि
इस भागदौड़ में यह मधुर भार उठाकर किस तरह और कितना दौड़ा जा सकता है।
संभाजी राजा के मन की शान्ति अधिक समय तक नहीं टिक सकी। वे वहाँ
विश्राम कर रहे थे। इसी समय उनके चार विश्वस्त सेवक दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे। वे
अत्यधिक डरे और सहमे हुए थे—'युवराज ऽ युवराज ऽऽ' कहते हुए वे मर्मभेदी
दहाड़ें मार रहे थे। उनकी आवाज सुनकर शम्भुराजा तेजी से उठे। उन्हें विश्वास हो
गया कि कोई बड़ा धोखा हो गया है। उन्होंने अधीरता से कहा, "बोलो बोलो!
कहो क्या हो गया?"
"महाराज, बहुत अन्याय हो गया। बहुत अन्याय हो गया।" उनमें से
एक बोला।
दूसरा अत्यन्त भयभीत स्वर में कहने लगा—"कल किले पर बन्दी बनाये
सात सौ मराठा सैनिक, जिन्हें नीचे ले जाया गया था..।"
"अरे क्या हुआ उन्हें?" युवराज की साँस फूलने लगी।
"अब कैसे बतायें महाराज ?" उन सेवकों की आँखों से धारासार आँसू बहने
लगे। दहाड़ें मारते हुए एक बोला, "युवराज, उन दुष्टों ने सात सौ में से आधे
सैनिकों के एक-एक हाथ काटकर अपाहिज बना दिया और बचे हुए आधे सैनिकों
के एक-एक पैर काटकर उन्हें लँगड़ा बना दिया। इनसानों की तो क्या ऐसी दुर्गति
132 :: सम्भाजी

तो जानवरों की भी किसी ने नहीं की होगी।"
यह भयंकर समाचार सुनते ही संभाजी राजा की क्रोधाग्नि धधक उठी। उनके
सिर के नरम रेशमी बाल खड़े हो गये; हथेलियों की मुट्ठी बँध गयी। वे क्रोध से
दाँत पीसने लगे। मन्दिर के बाहर ही युवराज का घोड़ा खड़ा था। वे शीघ्रता से घोड़े
के पास पहुँचे और उसकी पीठ पर अपना मर्दाना हाथ रखा। पीठ का आधार देकर
वे उछलकर घोड़े की पीठ पर सवार हो गये। किले के पिछवाड़े से पत्थरों और
खड्डों के बीच से उन्होंने घोड़े को दौड़ाया। पीछे से दूसरे घुड़सवार जोर जोर से
चिल्ला रहे थे—"युवराज रुक जाओ, गड़बड़ मत करो घोड़ा गिर जाएगा, रुक
जाओ।" किन्तु युवराज के पागलपन को कोई भी आवाज सुनाई नहीं दे रही थी।
देखते देखते खड्डों भरी वह ऊबड़ खाबड़ ढलान घोड़े ने पार कर ली। पसीने से
लथपथ घोड़ा दिलेरखान के शामियाने के सामने आकर रुका।
शम्भुराजा के उस आश्चर्यजनक रूप को मुगल सरदार देखते ही रह गये।
घोड़े के चारों पैर खून से भीग रहे थे, शम्भुराजा की आँखों से लाल अंगारे फूट रहे
थे। वे घोड़े पर से छलाँग लगा कर जमीन पर उतरे। जोर की गर्जना के साथ उन्होंने
आवाज दी—"कहाँ है वह हरामखोर बुड्ढा दिलेरखान?"
दिलेरखान ने जब शम्भुराजा को किले की ढलान से उतरते देखा था तभी
आने वाले भयानक संकट की आहट उसे मिल गयी थी। दिलेरखान की छावनी के
चारों ओर दो हजार सशस्त्र सैनिकों का घेरा था। खेत के मेड़ में छिपे चूहे की तरह
खान अन्दर छुप गया। क्रुद्ध शम्भुराजा का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी।
"डरपोक बुड्ढेऽऽ बाहर निकल।" शम्भुराजा बहुत देर तक पुकारते रहे।
कुछ समय बाद ऊपर की लहरें तो शान्त हो गयीं लेकिन समुद्र का भीतरी
हिस्सा अभी अशान्त बना हुआ था। उन्होंने सामने खड़े सैनिकों से दिलेरखान के
लिए सन्देश भेजा—
"जाओ, कहो अपने बुड्ढे दिलेरखान से कि एक संभाजी मुगलों से आ
मिला तो क्या हुआ, शिवाजी महाराज अभी समाप्त नहीं हुए हैं और समाप्त होंगे
भी नहीं।"
रात में शम्भुराजा को भयंकर बेचैनी रही। कुहनी से कटे हाथ और घुटने से
कटे पाँव वाले मराठे सैनिक उनकी आँखों के सामने बार-बार आते थे। जिस
क्रोधित और अपमानित नजर से वे शम्भुराजा की ओर देख रहे थे उससे शम्भुराजा
उद्विग्न हो गये थे। उनका सिर फटा जा रहा था। उनकी इस बेचैन दशा को देखकर
दुर्गाबाई और राणूबाई आधी रात के बाद भी उनके पलँग के पास बैठी रहीं।
मस्तिष्क की भयानक पीड़ा शान्त होने का नाम नहीं ले रही थी। शम्भुराजा तेजी से
उठे और कोने में पड़ा बाटे का पत्थर हाथ से उठा लिया। राणूबाई को अपने भाई के
सम्भाजी :: 133

असीम क्रोध का अन्दाजा हो गया। उन्होंने दौड़कर पीछे से शम्भूराजा को बाँहों में
भर लिया। दूसरे सैनिक भी उनकी मदद के लिए दौड़ पड़े। सभी मिलकर
शम्भूराजा को सँभालने का प्रयल करने लगे। तब शम्भूराजा जोर से चिल्लाये—
“छोड़ो-छोड़ो, दीदीजी हमें छोड़ दो।”
“क्या कर रहे हैं, युवराज?”
शम्भूराजा अपना सिर पीटते हुए बोले—“रानू दीदी इस खाई में शिवाजी के
पुत्र इस संभाजी के रहते हुए उस पार थोड़ी दूरी पर, सात सौ मराठों के हाथ-पैर
तोड़े जाते हैं और ऐसे अमानवीय कृत्य को हम रोक नहीं पाये तो मेरे इन हाथों का
क्या उपयोग है ? आप रुकिए मुझे अपने इन हाथों को ही तोड़कर प्रायश्चित
करने दीजिए।”
“युवराज धैर्य रखिए, अपने को सँभालिए।” दुर्गाबाई ने हाथ जोड़कर प्रार्थना
करते हुए कहा।
शम्भूराजा ने अपनी पूरी शक्ति से जोर का धक्का दिया। परिणामस्वरूप उन्हें
पकड़कर रोकने वाले सेवक बगल में जा गिरे। यह देखते ही राणूबाई दौड़कर
शम्भूराजा के पैरों में गिर पड़ीं। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर दहाड़
मारकर रोते हुए बोलीं, “शम्भूराजा, आज तुम अपना हाथ खो दोगे तो कल हमारा
क्या होगा ? पिताजी के बाद वह दुष्ट औरंगजेब हमारे देश पर आक्रमण करेगा तो
उसके घोड़े के पैर को काट देने की शक्ति तुम्हारे अतिरिक्त और किसी में है
क्या?”
राणूबाई की चीत्कार और व्याकुलता से शम्भूराजा के हाथ का बाटे का पत्थर
नीचे गिर गया। सामने शामियाने के बीच का खम्भा था। शम्भूराजा ने उसी को बाँहों
में भर लिया। जिस प्रकार भन्नाया हुआ हाथी अपने मस्तक ज्वर को शान्त करने के
लिए पत्थर पर अपना माथा पटकता है, उसी तरह शम्भूराजा भी खम्भे पर अपना
सिर पटकने लगे। आँखों से लगातार गिरते गर्म आँसुओं को पोंछते हुए वे बोले—
“पिताजी बहुत बड़ी भूल की है मैंने, बहुत बड़ी गलती।”
चार
सिंह की नाक पर यदि किसी चूहे ने ज़रा-सी भी खरोंच की तो वनराज क्रोध से
134 :: सम्भाजी

पागल हो उठता है। शम्भूराजा बहुत ही स्वाभिमानी, भावुक और संवेदनशील थे।
उनकी आयु भी अभी कुल बीस वर्ष थी। इसलिए शरीर का रक्त स्वभावतः गर्म
था। दूसरी ओर मुगल सरदारों ने सात सौ मराठी सैनिकों के हाथ-पैर काट दिए थे।
इस पर गर्म खून वाले, स्वाभिमानी युवराज के क्रोध की कल्पना से ही दिलेरखान
अत्यधिक बेचैन हो रहा था। सबसे अधिक उसको यह चिन्ता सता रही थी कि यदि
यह सिंह का बच्चा क्रुद्ध होकर चला गया तो उसकी अपनी इज्जत का क्या होगा।
भूपालगढ़ की बगल में ही सेना ठहर गयी थी। शम्भूराजा तीन दिन तक
अपनी छावनी से बाहर नहीं निकले। वे भोजन का स्पर्श तक नहीं कर रहे थे। पूरे
दिन में केवल आधा गिलास दूध लेते थे। पूरे समय छावनी के मन्दिर के सामने
पागल की तरह बैठे रहते थे। उनकी वह दशा देखकर पत्नी दुर्गाबाई और बहन
गणूबाई दोनों भयभीत हो गयीं। ये सारे समाचार दिलेरखान को लगातार मिल रहे
थे। शम्भूराजा की बिगड़ती स्थिति से दुर्गाबाई को भी ज्वर आने लगा। मौके का
फायदा उठाने के लिए दिलेरखान ने अपने खास वैद्य और हकीम को युवराज की
छावनी में भेजना आरम्भ किया। पीछे पीछे मिठाइयों और फलों की टोकरियाँ भी
जाने लगीं। हकीमों के माध्यम से चाटुकारिता भी आरम्भ हुई। बताया गया कि
मराठी सैनिकों के हाथ पैर काटने की सजा दिलेरखान ने दी ही नहीं थी। बल्कि
बिना कोई सूचना दिये उनके भतीजे गैरतखान ने यह अमानवीय जुर्म कर दिया था।
इसी अवस्था में चार दिन बीत गये। क्रुद्ध सागर कुछ शान्त हुआ। क्रोध की
नदी की बाढ़ कुछ उतर गयी। दिलेरखान को इस आंशिक परिवर्तन का अन्दाजा हो
गया। वह चोर की तरह धीरे से शम्भूराजा की छावनी में प्रविष्ट हुआ। उनके
सिरहाने दयनीय भाव से बैठ गया। अपनी आँखें गीली होने का नाटक करते हुए
वह व्यग्रतापूर्वक युवराज से बोला—"युवराज जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। हमारा
गैरतखान कहाँ गायब हो गया है कुछ पता नहीं लेकिन उसको फाँसी की सजा देने
के लिए मैंने आलमगीर से सिफारिश की है।"
"गैरत की फाँसी से ऐसा क्या फर्क पड़ने वाला है ? किन्तु खान साहब एक
पैर से लँगड़े और एक हाथ से लूले बन गये ये अभागे मराठी सैनिक जब स्वराज्य
में वापस जाएँगे। तब इन्हें देखकर छोटे छोटे बच्चे भी मेरे मुँह में गोबर भरने के
लिए तैयार हो जाएँगे। यदि प्रजा मुझसे पूछे कि फौज के समीप शिवाजी के पुत्र के
रहते हुए इस प्रकार का अमानवीय जुर्म कैसे हुआ ? तो हम क्या उत्तर देंगे ?"
दिलेरखान ने सोचा कि ऐसी कुशाग्र बुद्धि वाले शम्भूराजा के क्रोध को शान्त
करने के लिए कोई ठोस उपाय करना पड़ेगा। उसने पहले ही एक गुप्त प्रस्ताव
औरंगजेब के पास भेज दिया था। इसका स्मरण उसे यकाएक हो आया। उसने
जियाखान को अपने शामियाने में तुरन्त बुलवाया।
सम्भाजी :: 135

पत्र की नयी इबारत बोली—"आलमपनाह, संभाजी ही मराठों का असली
राजा है। वही शाहंशाह है। एक बार ऐसा ऐलान पूरे हिन्दुस्तान में करवा दें। शिवाजी
की फौज में संभाजी को चाहने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं उन लोगों को यदि
आपका संरक्षण मिला तो संभाजी खुश हो जाएगा। बाप-बेटे में एक बार झगड़ा शुरू
हो गया तो अपने आप ही उग्र होता जाएगा। इस तरह मराठों में आपसी दरार
पड़ेगी। एक बार इस दरार से यह प्रदेश बिखर गया तो उसकी तबाही करने में हमें
कितना समय लगेगा!"
जियाखान ने इस सिफारिश को नमक मिर्च लगाकर शम्भुराजा को सुनाया।
किन्तु युवराज ने अपनी कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। वे अच्छी तरह समझ
रहे थे कि शिवाजी महाराज के विरुद्ध भड़काने का यह षड्यन्त्र था। भूपालगढ़ के
पास किये गये दिलेरखान के कुकृत्य का गहरा डर युवराज के मन में बैठ गया था।
एक दिन दिलेरखान क्रुद्ध मुद्रा में युवराज के शामियाने में आया। उसके
गुप्तचरों ने शिवाजी महाराज का एक पत्र प्राप्त कर लिया था। वह पत्र शम्भुराजा के
सामने करते हुए दिलेरखान क्रुद्ध होकर युवराज से बोला "शिवाजी की अपने
बच्चे के साथ व्यवहार करने की यह कैसी रीति है?
"क्यों? क्या गलत कर दिया हमारे पिताजी ने?" शम्भुराजा ने प्रतिप्रश्न
किया।
"पढ़ो! पढ़ो न इस पत्र को। क्या आदेश दे रहे हैं वे किले के सुरक्षाकर्मियों
को। संभाजी ने आक्रमण किया है तो शान्त मत बैठो। हर किले पर, किले के हर
बुर्ज पर, तटबन्दी पर गोले दागो। अन्तिम समय तक किले को बचाने के लिए
लड़ो। संभाजी राजा को हमारा बेटा मानकर किसी प्रकार का लिहाज मत करो। सुन
लिया न आपने जन्मदाता की बात?"
दिलेरखान के इस क्रोध पर शम्भुराजा खिन्नता से हँसे और बोले, "मेरे
पिताजी ऐसा फरमान न निकालते तो और क्या करते? अपना बेटा शत्रु की फौज में
जाकर मिल गया तो क्या प्रसन्न होकर उसके गले में रत्नों का हार पहनाएँ?"
युवराज की इस प्रतिक्रिया पर दिलेरखान की जबान को ताला लग गया।
चालाक और धूर्त दिलेरखान समझ गया कि शम्भुराजा की मनोदशा अब पहले जैसी
नहीं रही। मुगल सेना में वे बहुत बेचैन थे। उसी रात जगकर दिलेरखान ने बादशाह
के पास आधी रात को एक सन्देश भेजा।
"जहाँपनाह मेहरबानी करो। संभाजी को शाहंशाह बनाने की शाही मंजूरी
शीघ्र दीजिए। सल्तनत में इस तरह का फतवा जारी कीजिए। अपने एक पत्र से
बाप-बेटे में भारी बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। मराठों की सल्तनत टुकड़ों में बँट
जाएगी।"
दिलेरखान शाही जवाब की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था। किन्तु उसे उधर
136 :: सम्भाजी

से कोई जवाब नहीं मिला। दिलेरखान निश्चित नहीं कर पा रहा था कि संभाजी का
क्या किया जाय। उसकी बेचैनी और उतावली उमराव जियाखान समीप से देख रहा
था। मौका देखकर उसने दिलेरखान से कहा, "खानसाहब वक्त बरबाद मत करो।
संभाजी आजकल उन्मत्त हो गया है। उसको तुरन्त गिरफ्तार करो। तुमको बहुत
बड़ा इनाम मिलेगा। आलमगीर मेहरबान तो दिलेरखान दिल्ली का दीवान।"
"बेवकूफ़ इसका मतलब तो यह है कि तुमने अभी तक अपने आलमगीर को
पहचाना ही नहीं है।" दिलेरखान हँसते हुए कहने लगा- "आलमगीर की तकदीर
बहुत बड़ी है। उत्तर के सारे दुश्मन समाप्त हो गये। संभाजी और शिवाजी भी
समाप्त हो जाएँगे तो औरंगजेब इतना उन्मत्त हो जाएगा कि अपने जैसे सेवकों की
अवस्था कुत्ते बिल्ली जैसी हो जाएगी।"
"फिर करना क्या है?"
"बस बेटे इतना ही! न साँप को मरने देना है, न लाठी को टूटने देना है। इतने
में ही तेरे मेरे जैसे दरबारी गरुड़ों का पेट भरता रहेगा वरना कौन पूछता है अपने
को?"
एक दिन शाम के समय दिलेरखान बाहर निकला। आसमान में अँधेरा छान
लगा था। दिलेरखान के आगे पीछे रक्षकों के घोड़े दौड़ रहे थे। दिलेरखान का दल
सामने वाली पहाड़ी को पार करके उस पार के मैदान में गया। वहाँ उसे खाई में एक
मजबूत कद काठी का आदमी खड़ा दिखाई दिया। उस धुँधली आकृति के
आसपास कुछ अंगरक्षक भी खड़े दिखाई दिये। दिलेरखान ने सशंक स्वर में
जियाखान से पूछा- "अरे वहाँ कौन है? अपने शम्भू शहजादे ही हैं न?"
"जी, खान साहब।"
"इस अँधेरे में वे क्या कर रहे हैं?"
"खान साहब आप इस जगह को भूल गये क्या? यहीं पर तो तुम्हारे हुक्म से
पन्द्रह दिन पहले सात सौ मराठों के हाथ पैर काट लिये गये थे। यह संभाजी उस
जगह पर कभी दिन निकलने से पहले कभी शाम को या रात बेरात आकर घंटों
रुका रहता है। वहाँ की मिट्टी हाथ में लेकर छोटे बच्चे की तरह रोता है और
बड़बड़ाता है।"
"पागल शायर।" दिलेरखान धीमी आवाज में खुद से ही बोला, "शायर है
और शेर भी है। इसीलिए इस संभाजी से मुझे कभी कभी भय लगता है।"
दिलेरखान अपनी छावनी में वापस आ गया। आते ही अपने दीवानों से वह
धीमे स्वर में बोला- "शैतानों के क़ब्ज़े में आयी इस जगह को जल्दी से छोड़कर
हम बाहर निकल चलें तो ठीक है। नहीं तो संभाजी यहाँ रहकर पागल हो जाएगा।
किसी दूसरे काम की ओर उसका ध्यान आकर्षित करना होगा।"
सम्भाजी :: 137

दिलेरखान बेचैन था। औरंगजेब की इच्छानुसार आजकल वह बीजापुर की
राजनीति में कुछ अधिक ध्यान देने लगा था। बीजापुर की पहले वाली प्रतिष्ठा
समाप्त हो चुकी थी। डूब रही आदिलशाही को जीवन दान देने का प्रयास शिवाजी
महाराज कर रहे थे। किन्तु दरबार के कुछ सरदारों को रिश्वत की बड़ी-बड़ी
गठरियाँ भेजकर अथवा आश्वासनों की खैरात बाँटकर दिलेरखान अपनी ओर
आकर्षित कर रहा था। बीजापुर के बहुत से सरदार मुगलों के पक्षधर बन रहे थे।
सर्जाखान जैसी बड़ी मछली जब दिलेरखान के काँटे में फँस गयी तो सभी को घोर
आश्चर्य हुआ।
इसी समय एक दिन दिल्ली से दिलेरखान के मित्र का एक अति आवश्यक
सन्देश आया। उसमें कहा गया था—‘‘दिलेर इसके बाद संभाजी को राजा बनाने की
सिफारिश बादशाह को कभी नहीं भेजना। तुम्हारी उस सिफारिश से औरंगजेब के
दिमाग पर सन्देह का भूत सवार हो गया है। दिलेरखान उस मूर्ख संभाजी की इतनी
तारीफ क्यों करता है? उन दोनों की मित्रता तो नहीं हो गयी है? दिलेरखान छुपकर
कहीं मराठों से मिल तो नहीं गया है? संभाजी और दिलेर दोनों मिलकर भागानगर
की नौकरी तो नहीं करने वाले हैं? इसी की अनेक आशंकाओं के भूत आलमगीर को
पागल बना रहे हैं।
दूसरे ही दिन दिलेरखान प्रसन्न मुद्रा में संभाजी राजा के शामियाने में पहुँचा।
दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए बोला, ‘‘शम्भू शहजादे, आप को क्या लगता है कि हम
सिर्फ मराठों के प्रदेश पर आक्रमण करते हैं, सिर्फ उनको ही जलाते हैं? चलो तैयारी
करो हम बीजापुर पर हमला करेंगे। मैं आपको दिखा दूँगा कि यह दिलेरखान
इस्लामी प्रदेश को भी किस प्रकार नष्ट करता है?’’
पाँच
एक रात को किसी गुप्तचर के पैरों की आहट शम्भूराजा के डेरे के पास सुनाई पड़ी।
रायगढ़ से अनेक वेश बदलता हुआ यह गुप्तचर लाखों के मोल का यह पत्र लेकर
शम्भू महाराज के पास आया था। शम्भू महाराज ने काँपते हाथों मे वह लिफाफा
पकड़ा। उस पर लगी मुहर को आँख भर देखा।
प्रतिपच्चंद्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्व वंदिता।
शाहसूनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।।
138 :: सम्भाजी

शम्भू महाराज ने अपनी डबडबाई आँखों को पोंछा और अपनी भावनाओं के आवेग
को दबाते हुए पुनः पत्र पढ़ने का प्रयास करने लगे।
क्षत्रिय कुलावतंस महाराज शिवाजी प्रति युवराज शम्भूमहाराज दंडवत
प्रणाम।
जैसे सूखे काष्ठ में कीड़ा घुसकर उसे चालता है उसी प्रकार आपकी चिन्ता
ने हमारे दिमाग को खोखला कर दिया है।
"शृंगारपुर के केशव पंडित से जिस समय आप रामायण पढ़ रहे थे, उसका
अर्थ समझ रहे थे, उस समय आपने क्या सीखा? दशरथ जैसे अपने पिता के आदेश
का पालन करने के लिए, भरे पूरे राज्य को लात मारकर प्रभु रामचन्द्र निकल गये,
वनवासी बन गये। और आपने हमारे करोड़ों मुद्राओं के स्वराज्य को ठुकराया है।
हमसे रुष्ट होकर शत्रु के खेमे में जाने की भूल की है। लाभ हानि का कोई विचार
किये बिना आप रुष्ट होकर शत्रु के प्रदेश में चले गये। आपका यह दुर्भाग्यपूर्ण
वियोग हमें निरन्तर जला रहा है। आज कल भूपालगढ़ में होने वाले अत्याचारों की
कहानी सुन रहा हूँ। इस घटना से हमारी आँखों में आँसुओं की जगह खून उतर
आया है। यहाँ के प्रतिष्ठित ओहदेदार जब विदेशी शासकों की सेवा का गोबर
उठाने में स्वयं को धन्य समझ रहे थे, तब जंगल खाई के किसी तानाजी, किसी
मुरारबाजी जैसे अनेक परिश्रमी हाथों का साथ लेकर मैंने स्वराज्य का यह मन्दिर
खड़ा किया। उन्हीं हाथों को दुश्मनों द्वारा संभाजी राजा की आँखों के सामने काट
दिया जाय तो इस दुर्भाग्य की क्या कहें? ठीक है आपके मन का दुःख भी हम
जानते हैं। आपके प्रति ईर्ष्या रखने वाली आँखें हमारे राज्य में कम नहीं हैं। किन्तु
यदि आपको लगता है कि हम केवल उन्हीं के हाथ का पानी पीते हैं, तो यह झूठ
है। आपसे ईर्ष्या करने वाले लोगों की अपेक्षा ईमानदारी से आपके लिए जान
निछावर करने वाले लोगों की संख्या हमारे राज्य और हमारी फौज में ज्यादा है। एक
सिंहासनासीन राजा और एक उदार पिता होकर मैं इस तथ्य को कैसे झुठला सकता
हूँ। जो हो गया सो हो गया। रूठना भूलकर उस नर्क से जल्दी बाहर निकलो। जैसे
कृष्ण के चले जाने के बाद गोकुल के बाल-बच्चे, स्त्री पुरुष, पशु-पक्षी, वन
बाग, गाय बैल दुःख से पागल हो गये थे, वही दशा यहाँ पर आपसे प्रेम करने
वालों की हुई है। इस राजा शिवाजी के साथ महाराष्ट्र के साधु संन्यासी, देवी
देवता आपका पन्थ निहार रहे हैं। आओ युवराज! शीघ्रातिशीघ्र स्वराज्य में वापस आ
जाओ। भबिष्य का दुःख गोवर्धन आपको उठाना है।"
"मगर के मुँह से सुरक्षित वापस निकलना आपके लिए बहुत कठिन होगा,
इसे हम जानते हैं। किन्तु चिन्ता न करें। हम सावधान हैं। बीजापुर वालों के साथ
आपके सम्बन्ध अच्छे हो गये हैं। आवश्यकता पड़ने पर वे भी आपकी सहायता के
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लिए दौड़े आएँगे। शम्भू बेटे चिन्ता मत करो। दूर मत रहो। पत्र समाप्त करता हूँ।"
शिवाजी महाराज ने इन भाव भरे शब्दों से शम्भूमहाराज के हृदय को जीत
लिया। जिस प्रकार कोई छोटा बच्चा आरम्भिक अवस्था में अपनी लिखी इबारत
माता-पिता को उत्साह के साथ दिखाता है, उसी प्रकार संभाजी शिवाजी महाराज के
पत्र को दुर्गाबाई और गणूबाई को दिखा रहे थे। पिता के इस पत्र से मन को कितनी
शान्ति मिली थी। अब उन पर एक ही धुन सवार थी कि दिलेरखाँ के व्यूह से किस
प्रकार बाहर निकलें?
स्वराज्य का हर समाचार किसी न किसी के माध्यम से शम्भुराजा के कानों
तक पहुँच जाता था। बीजापुर का आदिलशाही शासन विनाश की देहरी पर पहुँच
चुका था। बीजापुर के प्रधान दीवान मसूदखान ने शिवाजी महाराज को पत्र लिखा
था— "मुगलों की फौज से हमारे बीजापुर राज्य को बचाइए।" शिवाजी महाराज
भी इस अवसर का लाभ उठा रहे थे। इसी निमित्त से दक्षिण में मुगलों के विरुद्ध
एक बड़ी साजिश रची जा रही थी। मुगलों के आक्रमण के साथ ही बीजापुर की
प्रजा घोर अकाल का संकट झेल रही थी। भोजन और चारे की कमी के कारण
आदमी और पशु क्षीण होते जा रहे थे। इसीलिए बीजापुर की प्रजा की सहायता के
लिए शिवाजी महाराज ने तत्परता दिखाई। दो हजार बैलों की पीठ पर अनाज की
गोनियाँ लादकर उन्होंने प्रजा की ठोस सहायता के लिए बीजापुर भेजा। संभाजी
राजा बार-बार अनुभव कर रहे थे कि इस भाग-दौड़ के समय में उन्हें स्वराज्य में
होना चाहिए था। किन्तु उन्हें यह चिन्ता सता रही थी कि घड़ियाल के जबड़े से
अपने परिवार के काफिले के साथ कैसे निकलें? उसी बीच एक दिन सेनापति
हंबीरराव मोहिते का सन्देश आया। उन्होंने कहा था, "युवराज! हमने बहुत बहादुर
सैनिकों को आपके पास भेजा है। वे अथणी के आसपास जंगलों में घूम रहे हैं।
उनकी सहायता लीजिए और शीघ्रातिशीघ्र स्वराज्य में वापस आ जाइए।"
यह सूचना शम्भूमहाराज को बहुत अच्छी लगी। शम्भूमहाराज और
दिलेरखान दोनों ही नियति के जटिल फन्दे में फँस गये थे। ऐसा हो रहा था जैसे दो
हाथी आपस में लड़े और उनकी सूँड़ एक-दूसरे से उलझ गयी हों और उनकी
खम्भे जैसी टाँगें नीचे के कीचड़ में धँस गयी हों।
"सभा को तुरन्त गिरफ्तार करो और उसे बाँधकर औरंगाबाद ले जाओ।"
मुगलों के वरिष्ठ अधिकारियों का यही कहना था। किन्तु दिलेरखान सोचता था कि
यदि ऐसा पारस अपने हाथ से निकल गया तो आगे अपनी कीमत एक तिनके के
बराबर भी नहीं रहेगी। इस विचार से दिलेरखान हड़बड़ा गया था।"
उसी बीच एक रात को जोत्याजी और कवि कलश जैसे आत्मीय मित्रों का
एक गुप्त पत्र मिला। उसमें लिखा था— "शम्भू महाराज! सावधान रहें दिल्ली के
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