सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 509

अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२५
तीक्ष्णाधोभागयुक्तः स्यान्निरूहो दाशमूलिकः ।
वातघ्नाम्लशृतैरण्डतिलतैलानुवासनः ॥ ६५ ॥
तीक्ष्ण और अधो-दोष-नाशक द्रव्यो से युक्त दशमूल के क्वाथ से उदर-
रोगी को निरूह और आस्थापन देना चाहिये । वातनाशक अम्ल द्रव्यो से एरण्ड
तैल और तिल-तैल पकाकर इनसे अनुवासन देना चाहिये ॥ ६५ ॥
अविरेच्य तु यं विद्याद् दुर्बलं स्थविरं शिशुम् ।
सुकुमारं प्रकृत्याऽल्पदोष वाऽथोलबणानिलम् ॥ ६६ ॥
तं भिषक् शमनैः सर्पिर्यूषमासरसौदनैः ।
बस्त्यभ्यङ्गानुवासनैश्च क्षीरैश्चोपचरेद् बुधः ॥ ६७ ॥
जो रोगी निर्बल, वृद्ध, बालक, कोमल प्रकृति, अल्पदोष, प्रबलवायु होने
से विरेचन के अयोग्य हो, उसकी घी, यूष, मास रस, रसौदन (मास रस से सिद्ध
चावल) से, बस्ति, अभ्यग, अनुवासन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥६६-६७॥
पित्तोदरे तु बलिनं पूर्वमेव विरेचयेत् ।
दुर्बलं त्वनुवास्याऽऽदौ शोधयेत् क्षीरबस्तिना ॥ ६८ ॥
संजातबलकायाग्निं पुनः स्निग्धं विरेचयेत् ।
पयसा सत्रिवृत्कल्केनोरूबूकशृतेन वा ॥ ६९ ॥
सातलात्रायमाणाभ्या शृतेनाऽऽरग्वधेन वा ।
पित्तोदर की चिकित्सा—यदि रोगी बलवान् हो तो रोग के प्रारम्भ मे
प्रथम विरेचन देना चाहिये । रोगी निर्बल हो तो प्रथम अनुवासन देकर पीछे
से क्षीर-बस्ति द्वारा शोधन करना चाहिये । रोगी मे बल आने पर तथा अग्नि के
प्रदीप्त होने पर पुनः रोगी को स्निग्ध करके विरेचन देना चाहिये । इसके लिय
निशोथ के कल्क से अथवा एरण्ड के कल्क (या तैल) से या सातला और त्रायमाणा
के कल्क द्वारा अथवा अमलतास के साथ दूध पका कर देना चाहिये ॥ ६६- ॥
सकफे वा समूत्रेण सवाते तिक्तसर्पिषा ॥ ७० ॥
पुनःक्षीरप्रयोगं च बस्तिकर्म विरेचनम् ।
क्रमेण ध्रुवमातिष्ठन् युक्तः पित्तोदरं जयेत् ॥ ७१ ॥
पित्तोदर मे यदि पित्त के साथ कफ मिश्रित हो तो मूत्रयुक्त दूध से, वायु
का मिश्रण होने पर तिक्त-घृत मिश्रित दूध से विरेचन देना चाहिये । इस प्रकार
आनुपूर्व्य कर्म द्वारा बार-बार क्षीर प्रयोग से विरेचन और बस्ति कर्म करने पर
निश्चित रूप से रोगी का पित्तोदर शान्त हो जाता है १ ॥ ७०-७१ ॥
१ अष्टागसग्रह मे कहा है—
सजातबलाग्निं च पुन. क्षीरेण सत्रिवृत्कल्केन, ऊरूबकशृतेन, सातलात्राय-
माणाभ्यां वा, आरग्वधेन वा सश्लेष्मणि पित्ते समूत्रेण पयसा पुन. पुन विरेचयेत् ॥