चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२४ चरकसंहिता [ अ० १३
आती हो (रुक-रुक कर या अपान वायु बाहर आये ), अग्नि बहुत मन्द न
हो, सब रसो के खाने की इच्छा (लालन) हो, मुख मे विरसता न हो, मूत्र
थोड़ा और मल बधा हुआ हो तो इन लक्षणो से पानी उत्पन्न नही हुआ, ऐसा
जानकर दोष, बल, काल को समझनेवाला वैद्य इसकी चिकित्सा आरम्भ करे ॥५८॥
वातोदरं बलवतः पूर्वं स्नेहैरुपाचरेत् ।
स्निग्धाय स्वेदिताङ्गाय दद्यात्स्नेहविरेचनम् ॥ ५६ ॥
हृते दोषे परिम्लानं वेष्टयेद्वाससोदरम् ।
तथाऽस्यानवकाशत्वाद्वार्युर्नाऽऽध्मापयेत्पुनः ॥ ६० ॥
दोषातिमात्रोपचयात्स्रोतसा मन्निरोधनान् ।
संभवन्त्युदराण्येवमतो नित्यं विशोधयेत् ॥ ६१ ॥
वातोदर की चिकित्सा—यदि रोगी बलवान् (शोधन के योग्य हो) तो
प्रथम स्नेहन करना चाहिये । स्निग्ध तथा स्वेदन होने पर पीछे से स्नेहयुक्त
विरेचन देना चाहिये । विरेचन द्वारा दोष के निकल जाने से क्षीण उदर को
कपड़े से लपेट देना चाहिये । इस प्रकार बाधने से वायु को जगह नही मिलती,
जिससे कि पुन आध्मान (फुलाव) नही कर सकती । शरीर मे दोषो के अति-
मात्र सचित होने से स्रोतो का निरोध होता है, इसलिये उदर रोगी को प्रतिदिन
विरेचन देना चाहिये ॥ ५६-६१ ॥
शुद्धं संसृज्य च क्षीरं बलार्थ पाययेत्तु तम् ।
प्रागुत्क्लेशान्निवर्त्यं च बले लब्धे क्रमात्पयः ॥ ६२ ॥
शुद्ध होने पर पेयादि क्रम पर रख कर बल के लिये रोगी को दूध पिलाना
चाहिये । उत्क्लेश (कफ-सचय) के होने से पूर्व बल प्राप्त होने पर धीरे-धीरे
दूध बन्द कर देना चाहिये ॥ ६२ ॥
यूषै रसैर्वा मन्दाम्ललवणैरेधितानलम् ।
सोदावर्तं पुनः स्निग्ध स्विन्नमास्थापयेन्नरम् ॥ ६३ ॥
अल्प अम्ल और लवण से साधित मूग आदि के यूषो से अथवा मास रसो
से रोगी की अग्नि को बढ़ाना चाहिये । यदि रोगी को फिर से उदावर्त्त हो जाये
तो स्नेहन और स्वेदन कार्य करके आस्थापन बस्ति देनी चाहिये ॥ ६३ ॥
स्फुरणाक्षेपसन्ध्यस्थिपार्श्वपृष्ठत्रिकार्तिषु ।
दीप्ताग्नि बद्धविट्वात्तं रूक्षमप्यनुवासयेत् ॥ ६४ ॥
रोगी की सन्धि और अस्थियो मे स्फुरण और आक्षेप हो, पार्श्वशूल, पृष्ठशूल
तथा कटिशूल हो, अग्नि प्रदीप्त हो, मल और वायु का अवरोध हो, रोगी रूक्ष
हो तो अनुवासन बस्ति देनी चाहिये ॥ ६४ ॥