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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 616 में से

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पृष्ठ 510

५२६ चरकसंहिता [ अ० १३
स्निग्धं स्विन्नं विशुद्धं तु कफोदरिणमातुरम् ।
संसर्जयेत्कटुक्षारयुक्तैरन्नैः कफापहैः ॥ ७२ ॥
गोमूत्रारिष्टपानैश्च चूर्णायस्कृतिभिस्तथा ।
सक्षारैस्तैलपानैश्च शमयेत्तु कफोदरम् ॥ ७३ ॥
कफोदर की चिकित्सा—रोगी को स्नेहन और स्वेदन करवाके संशोधन
करना चाहिये । फिर कफनाशक, कटुरस तथा क्षारयुक्त पेयादि अन्न द्वारा
ससर्जन ( भाजन ) करना चाहिये । गोमूत्र, अरिष्ट का पान, लाह भस्म का
प्रयोग और क्षारसिद्ध तैल के प्रयोग से कफोदर को शान्त करना चाहिये ॥७२-७३॥
सन्निपातोदरे सर्वा यथोक्ताः कारयेत्क्रियाः ।
सोपद्रवं तु निर्वृत्तं प्रत्याख्येयं विजानता ॥ ७४ ॥
उदावर्तरुजानाहदाहमोहतृषाज्वरैः ।
गौरवारुचिकाठिन्यैश्चानिलादीन् यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
लिङ्गैः प्लीहोदरान् दृष्ट्वा रक्तं वापि स्वलक्षणैः ।
सन्निपातोदर मे सब दोषो की चिकित्सा करनी चाहिये । यदि सन्निपातोदर
मे छर्दि ( वमन ), अतीसार आदि उपद्रव आ जायें तो उसको असाध्य
समझना चाहिये । वैद्य को चाहिये कि प्लीहोदर मे उदावर्त्त, शूल, आनाह से
वायु को, दाह, प्यास, मूर्च्छा और ज्वर से पित्त को, भारीपन, अरुचि, कठिनता
से कफ को तथा सब दोषो के मिलित लक्षणों से सन्निपात को समझे । प्यास की
अधिकता तथा पित्त के अन्य लक्षणो से रक्त को समझना चाहिये ॥७४-७५॥
चिकित्सां संप्रकुर्वीत यथादोषं यथाबलम् ॥ ७६ ॥
स्नेहं स्वेदं विरेकं च निरूहमनुवासनम् ।
समीक्ष्य कारयेद् बाहौ वामे वा व्यधयेत् सिराम् ॥ ७७ ॥
षट्पलं पाययेत्सर्पिः पिप्पलीर्वा प्रयोजयेत् ।
सगुदामभयां वाऽपि क्षारारिष्टगणास्तथा ॥ ७८ ॥
वैद्य को चाहिये कि दोषानुसार और बलानुसार प्लीहोदर में चिकित्सा करे ।
इसके लिये स्नेहन, स्वेदन, विरेचन, निरूह बस्ति और अनुवासन बस्ति का
विचारपूर्वक प्रयोग करना चाहिये । प्यास की अधिकता आदि से रक्त की
वृद्धि को समझ कर बाई बाहु में सिरा-वेध द्वारा रक्त-मोक्षण करे । षट्पल या
महाषट्पल घृत पिलाना चाहिये । रसायन विधि से वर्धमान-पिप्पली खिलानी
चाहिये । गुड के साथ हरड देनी चाहिये । क्षार-अरिष्टो को बरतना चाहिये,
यह चिकित्सा-क्रम कह दिया अब प्रयोगों को सुनो ॥७६-७८॥