चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३१
ज्वर दाह भ्रमं कासमसपार्थशिरोरुजम् ।
तृष्णां छर्दिमतीसारमेतत् सर्पिरपोहति ॥ ११० ॥
इति दुरालभादि घृतम् ।
( ७ ) दुरालभादि घृत—दुरालभा, गोखरू, चारो पर्णिनियों ( मुद्गपर्णी,
माषपर्णी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी ) खरैटी, पित्तपापडा प्रत्येक १-१ पल
इनको दस गुने ( २० प्रस्थ ) पानी मे पकावे । जब दसवाँ भाग रह जाये तो
छान ले । इसमे कचूर, पोहकरमूल, पिप्पली, त्रायमाणा, तामलकी (भुई आँवला),
चिरायता, कुडे के फल ( इन्द्रजौ ) और सारिवा प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनका
कल्क मिला दे, घी एक प्रस्थ और दूध घी से दुगुना ( २ प्रस्थ ) मिला कर
यथाविधि घी सिद्ध करे । यह घी ज्वर, दाह, भ्रम, कास, कधो मे पीडा, पार्श्व-
शूल, शिर-शूल, तृष्णा, वमन और अतिसार को नष्ट करता है ॥ १०६-११० ॥
जीवन्तीं मधुकं द्राक्षा फलानि कुटजस्य च ।
शटी पुष्करमूलं च व्याघ्री गोक्षुरकं बलाम् ॥ १११ ॥
नीलोत्पलं तामलकीं त्रायमाणा दुरालभाम् ।
पिप्पली च समं पिष्ट्वा घृतं वैद्यो विपाचयेत् ॥ ११२ ॥
एतद् व्याधिसमूहस्य रोगेशस्य समुत्थितम् ।
रूपमेकादशविधं सर्पिरग्र्य व्यपोहति ॥ ११३ ॥
इति जीवन्त्यादिघृतम् ।
( ८ ) जीवन्त्यादि घृत—जीवन्ती, मुलहठी, मुनक्का, इन्द्रजौ, कचूर, पोह
करमूल, कटेरी, गोखरू, बला, नीला कमल, भूई आँवला, त्रायमाणा, दुरालभा
और पिप्पली ये सम परिमाण मे लेकर इनके कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत
रोगसमूह रूप रोगराज ( यक्ष्मा ) के ग्यारह प्रकारों के रूप को नष्ट करता है ।
[ यहाँ पर पानी चार गुणा लेवे ] ॥ १११-११३ ॥
बलां स्थिरां पृश्निपर्णी बृहती सनिदिग्धिकाम् ।
साधयित्वा रसे तस्मिन्पयो गव्यं सनागरम् ॥ ११४ ॥
द्राक्षाखर्जूरसर्पिर्भिः पिप्पल्या च शृतं सह ।
सक्षौद्रं ज्वरकासघ्नं स्वर्य चैतत्प्रयोजयेत् ॥ ११५ ॥
( ६ ) बलादि क्षीर—बला, स्थिरा ( शालपर्णी ), पृश्निपर्णी, बड़ी कटेरी,
छोटी कटेरी इनको सम परिमाण मे लेकर आठ गुने जल मे क्वाथ करे ।
चतुर्थांश रहने पर छान ले । इसमे क्वाथ से चतुर्थांश गाय का दूध, दूध से
अष्टमांश सोंठ, पिण्डखर्जूर, घी, पिप्पली मिलावे । इनसे सिद्ध दूध मे