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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 616 में से

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पृष्ठ 414

४३० चरकसंहिता [ अ० ८
नागरं चित्रको लाजाः पिप्पल्यामलकं गुडः ॥ १०१ ॥
श्लोकार्धविहितानेतोँल्लिह्यान्ना मधुसर्पिषा ।
कासश्वासापहान्स्वर्यान्पार्श्वशूलापहास्तथा ॥ १०२ ॥
( ४ ) चार लेह—१—पिण्डखर्जूर, पिप्पली, मुनक्का, हरड़, काकड़ा-
शृङ्गी और दुरालभा । २—त्रिफला, पिप्पली, मोथा, सिंघाड़ा, गुड और
शर्करा । ३—क्षीरकाकोली, कचूर, पोहकरमूल, तुलसी, शर्करा, और गुड़ ।
४—सोंठ, चीता, लाजा, पिप्पली, आँवला और गुड आधे आधे श्लोको मे
कहे हुए इन चार योगो को मधु और घी के साथ चाटने से कास, श्वास, स्वर-
भेद और पार्श्वशूल नष्ट होते है ॥ १००-१०२ ॥
सितोपला तुगाक्षीरी पिप्पली बहुलां त्वचम् ।
अन्त्यादूर्ध्वं द्विगुणितं लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ १०३ ॥
चूर्णितं प्राशयेद्वा तच्छ्वासकासकफातुरम् ।
सुप्तजिह्वारोचकिनमल्पाग्निं पार्श्वशूलिनम् ॥ १०४ ॥
हस्तपादाङ्गदाहेषु ज्वरे रक्ते तथोर्ध्वगे ।
( ५ ) सितोपलादि लेह—मिसरी १६ भाग, बंशलोचन ८ भाग, पिप्पली
४ भाग, इलायची २ भाग और दालचीनी १ भाग इस प्रकार पीछे से पूर्व के
द्रव्य को दुगुना लेकर मधु और घी मे चाटे । इसके प्रयोग से श्वास, कास और
कफ नष्ट होता है । सुप्तजिह्वा ( जिसमे स्पर्श या मधुर आदि रसों का ज्ञान
नही होता ), अरुचि, मन्दाग्नि, पार्श्वशूल, हाथ पाँव शरीर मे जलन, ज्वर और
ऊर्ध्वगामी रक्त-पित्त मे लाभकारी है ॥ १०३-१०४- ॥
वाससर्पिः शतावर्या सिद्धं वा परमं हितम् ॥ १०५ ॥
( ६ ) वासा घृत और शतावरी ( कल्क और कषाय ) से सिद्ध घृत अति-
शय हितकारी है ॥ १०५ ॥
दुरालभा श्वदंष्ट्रां च चतस्रः पर्णिनीर्बलाम् ।
भागान्पलोन्मितान्कृत्वा पलं पर्पटकस्य च ॥ १०६ ॥
पचेद्दशगुणे तोये दशभागावशेषिते ।
रसे सुपूते द्रव्याणामेषां कल्कान्समावपेत् ॥ १०७ ॥
शट्याः पुष्करमूलस्य पिप्पलीत्रायमाणयोः ।
तामलक्याः किराताना तिक्तस्य कुटजस्य च ॥ १०८ ॥
फलाना शारिवायाश्च सुपिष्टान्नकर्षसंमितान् ।
ततस्तेन घृतप्रस्थं क्षीरद्विगुणितं पचेत् ॥ १०९ ॥