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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 416

४३२ चरकसंहिता [ अ० ८
मधु मिला कर प्रयोग करे । यह घी ज्वर, कास और स्वरभग को नष्ट
करता है ॥ ११४-११५ ॥
आजस्य पयसश्चैव प्रयोगो जाङ्गला रसाः ।
यूषार्थं चणका मुद्गा मकुष्ठाश्चोपकल्पिताः ॥ ११६ ॥
ज्वराणां शमनीयो यः पूर्वमुक्तः क्रियाविधिः ।
यक्ष्मणो ज्वरदाहेषु ससर्पिष्कः प्रशस्यते ॥ ११७ ॥
कफप्रसेके बलवान् श्लेष्मिकश्छर्दयेन्नरः ।
पयसा फलयुक्तेन मधुरेण रसेन वा ॥ ११८ ॥
सर्पिष्मत्या यवाग्वा वा वमनीयोपसिद्धया ।
वान्तोऽन्नकाले लध्वन्नमाददीत सदीपनम् १ ॥ ११९ ॥
यवगोधूममाध्वीकशीध्वरिष्टसुरासवान् ।
जाङ्ग़लानि च शूल्यानि सबमानः कफं जयेत् ॥ १२० ॥
श्लेष्मणोऽतिप्रसेकेन वायुः श्लेष्माणमस्यति ।
कफप्रसेकं तं विद्वान्स्निग्धोष्णेनैव निर्जयेत् ॥ १२१ ॥
क्रिया कफप्रसेके या वन्या सेव प्रशस्यते ।
हृद्यानि चान्नपानानि वातघ्नानि लघूनि च ॥ १२२ ॥
(१०) बकरी का दूध, जांगल पशु-पक्षियों का मास-रस, यूष के लिये
चना, मूग, मोठ का व्यवहार करे । ( ११ ) ज्वर की संशमन चिकित्सा जो
प्रथम कह चुके है, उसी मे घृत मिला कर यक्ष्मा रोगी के दाह और ज्वर मे
व्यवहार करे । ( १२ ) बलवान् और कफ प्रकृति वाले पुरुष को यदि कफ-
प्रसेक हो तो वमन करावे । इसके लिये मैनफल युक्त मधुर दूध से या मैनफल
से युक्त मास-रस से अथवा वमनीय द्रव्यो से सिद्ध की गई घृतयुक्त यवागू द्वारा
रोगी को वमन करावे । ( १३ ) वमन होने के पीछे भोजन के समय अग्नि-
दीपक लघु अन्न खिलावे । ( १४ ) जौ, गेहूँ, माध्वीक मद्य, शीधु, अरिष्ट, सुरा,
आसव, जागल मास को शूलाकृत कर अर्थात् शलाका पर भूनकर उस मास से
कफ को नष्ट करे । ( १५ ) फेफड़ो मे कफ के अधिक होने से वायु इस कफ
को बाहर करता है, इसको कफ-प्रसेक कहते है । इसको स्निग्ध और उष्ण
चिकित्सा से शान्त करे । हृदय के लिये प्रिय वातनाशक और लघु
खान-पान पथ्य है । जो चिकित्सा कफ प्रसेक की है, वही वमन मे भी
प्रशस्त है ॥ ११६-१२२ ॥
१ 'सवान्तोऽद्याच्च लध्वन्नमन्नकाले सदीपनम्' इति च ।