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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 639 में से

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पृष्ठ 427

भेद हैं। मानसिक रोग भी दो प्रकार के हैं। १. राजस (रजोगुण से उत्पन्न
हुए), और २. तामस, (तमोगुण से उत्पन्न हुए)।
रोग के पर्याय—व्याधि, आमय, गद, आतंक, यक्ष्मा, ज्वर, विकार और
रोग ये सब शब्द एक ही अर्थ (रोग) को कहते हैं ॥ ४ ॥
तस्योपलब्धिर्निदान-पूर्वरूप-लिङ्गोपशय-संप्राप्तितः ॥५॥
निदान पंचक अर्थात् रोगज्ञान के पांच उपाय—१. निदान २. पूर्वरूप, ३.
लिंग (रूप), ४. उपशय और ५. सम्प्राप्ति, इन पांच उपायों से रोग पहिचाना
जाता है ॥ ५ ॥
तत्र निदानं कारणमित्युक्तमग्रे पूर्वरूपं प्रागुत्पत्तिलक्षणं व्याधेः ।
रोगों के कारण को निदान कहते हैं, यह पहिले कह चुके हैं। रोग के
उत्पन्न होने से पूर्व जो लक्षण उत्पन्न होते हैं, उनको 'पूर्वरूप' कहते हैं। (जैसे
जंभाई का आना, अंगों का टूटना, शिर का दुखना आदि ये ज्वर के पूर्वरूप
हैं।) रोग के आगे चलनेवाले लक्षण पूर्वरूप हैं। जैसे राजा के आने की
सूचना राजा के आगे चलने वाले लोगों से मिल जाती है।
प्रादुर्भूतलक्षणं पुनर्लिङ्गं, तत्र लिङ्गमाकृतिर्लक्षणं चिह्नं संस्थानं
व्यञ्जनं रूपमित्यनर्थान्तरमस्मिन्नर्थे ।
रोग के उत्पन्न होने पर जो लक्षण स्पष्ट होते हैं, जिन लक्षणों से रोग का
भान होने लगता है, उनको लिंग कहते हैं। इसके लिंग, आकृति, लक्षण,
चिह्न, संस्थान, व्यञ्जन और रूप ये सब पर्यायवाची हैं।
उपशयः पुनर्हेतुव्याधिविपरीतानां विपरीतार्थकारिणां चौषधा-
हारविहाराणामुपयोगः सुखानुबन्धः ।
उपशय—हेतुविपरीत, व्याधि-विपरीत और विपरीतार्थकारी, औषध,
आहार और विहार का सुखोत्पत्ति के लिये सेवन करना 'उपशय' १ है।
१. उपशय द्वारा गूढ़ लिंगों, चिन्हों वाली व्याधि की परीक्षा की जाती है।
जैसे 'मलेरिया' और 'कालाज़ार' रोग में। इनमें मलेरिया कुनीन से चला
जाता है, परन्तु कालाज़ार नहीं जाता। इसका विवरण नीचे लिखे प्रकार
से जानें।
औषध—जैसे शीत कफ ज्वर में सोंठ
हेतुविपरीत { अन्न—जैसे श्रम-वातजन्य ज्वर में मांस रस और चावल ।
विहार—जैसे दिन में सोने से उत्पन्न कफ ज्वर में रात
को जागना ।