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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 639 में से

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पृष्ठ 428

४१० चरकसंहिता [ अ० १
संप्राप्तिर्जातिरागतिरित्थन्त्वन्तरं व्याधेः। सा संख्या-प्राधान्य-विधि-
विकल्प-बल-काल-विशेषैर्भिद्यते । संख्या तावद्यथा—अष्टौ ज्वराः, पञ्च
गुल्माः, सप्त कुष्ठान्येवमादिः। प्राधान्यं पुनर्दोषाणां तरतमाभ्यां योगेनोप-
लभ्यते । तत्र द्वयोस्तरस्त्रिषु तम इति । विधिर्नाम द्विविधा व्याधयो
निजागन्तुभेदेन, त्रिविधास्त्रिदोषभेदेन, चतुर्विधाः साध्यासाध्य-मृदुदा-
रुण-भेदेन । समवेतानां पुनर्दोषाणामंशांश-बल-विकल्पोऽस्मिन्नर्थे । बल-
कालविशेषः पुनर्व्याधीनामृतवहोरान्त्राऽऽहार-काल-विधि-विनियतो
भवति । तस्माद् व्याधीन् भिषगनुपहतसत्त्वबुद्धिर्हेत्वादिभिर्भावैर्यथा-
वदनुबुध्येत ॥ ६ ॥
इत्यर्थसंग्रहो निदानस्थानस्योद्दिष्टो भवति, तं विस्तरेण भूयस्तरम-
तोऽनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥
व्याधि की सम्प्राप्ति, जाति और आगति ये तीनों शब्द एक ही अर्थ के
व्याधिविपरीत ⎧ औषध-जैसे अतिसार में पाठा स्तम्भन ।
⎨ अन्न-जैसे अतिसार में मसूर ।
⎩ विहार-जैसे उदावर्त्त में प्रवाहण ।
हेतु- ⎧ औषध-जैसे वातजन्य शोथ में दशमूल ।
व्याधिविपरीत ⎨ अन्न-जैसे शीत ज्वर में ज्वरनाशक यवागू ।
⎩ विहार-जैसे दिन में सोने से उत्पन्न तन्द्रा में रात्रिजागरण ।
हेतु- ⎧ औषध-जैसे पित्तजन्य शोथ में गरम उपनाह ( पुल्टिस )
विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे पित्तजन्य शोथ में विदाही अन्न ।
⎩ विहार-जैसे वातोन्माद में भय बतलाना ।
व्याधि- ⎧ औषध-जैसे छर्दि में मैनफल से वमन कराना ।
विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे अतिसार में दूध से विरेचन ।
⎩ विहार-जैसे छर्दि में प्रवाहण ।
हेतु-व्याधि- ⎧ औषध-जैसे अग्नि से जलने पर अगुरुका लेप ।
विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे मदात्यय रोग में मद्यपान ।
⎩ विहार-जैसे भ्रमजनित मूरुवात में पानी में तैरना ।